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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Friday, August 22, 2008

पालता है अन्न पत्थर नहीं-व्यंग्य क्षणिकायें

पद पुजता है आदमी नहीं
चमकती है प्रतिष्ठा देह नहीं
पालता है अन्न पत्थर नहीं
ओ! जमाने को उसूलों के बयां करने वालों
आकाश से कोई चीज जमीन पर
आकर टपकती नहीं
धरती पर उगती नहीं
उन चीजों की शौहरत को ही
असली सच बताकर
मत बहलाओ भोले लोगों को
जो बनती बिगड़ती हैं यहीं
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दुनियां में जितने खिलौने हैं
जब तक खेलें उनके साथ ठीक
बिगड़्र जायें तो खुद को ही ढोने हैं
खुद से ही बहलायें दिल तो कितना अच्छा
काटें हम अपने अंदर ही बेहतर फसल
ऐसे ही बीज हमको बोने हैं

...................................
यह कविता दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका पर लिखा गया है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

2 comments:

Udan Tashtari said...

आप अपनी कविताओं की किताब छपवाने के विषय में गंभीरता से सोचें.शुभकामनाऐं.

महेंद्र मिश्रा said...

आपको जन्माष्टमी की बधाई एवं शुभकामनाएं..

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