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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, August 11, 2016

हमारा कारवां-हिन्दी कविता (Hamara Karvan-HindiPoem)

एक तो रास्ता
ऊबड़खाबड़ था
फिर हमराही भी सुस्त थे
वरना हम भी मंजिल तक
पहुंच गये होते।

कहें दीपकबापू हमारा कारवां
बहुत बड़ा था
मजबूरियों के साथ
कमजोरी से खड़ा था
ताकतवारों की नीयत साफ होती
हम भी थकते नहीं
शिखर पर पहुंच गये होते।
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Friday, July 22, 2016

स्वाद में फंसे-हिन्दी शायरी (Swad mein Fanse-HindiShayari)


पर्दे पर तस्वीर
देखकर बहक जाते हैं।

शोरगुल के स्वर सुनकर
कान चहक जाते हैं।

कहें दीपकबापू स्वाद में
फंसे ज़माने के लोग
व्याधि के भोजन से
पेट में कांटे महक जाते हैं।
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Thursday, July 14, 2016

विश्वास का रिश्ता-हिन्दी कविता (Vishvas ka rishta-HindiKavita)


दिल का फासला
जब ज्यादा हो
घर दूर नज़र आता है।

प्रेम का मोल न हो
विश्वास का रिश्ता भी
बहुत दूर नज़र आता है।

कहें दीपकबापू अपनों में
मनोबाल बढाना आता नहीं
टकटकी लगाये बैठे
भरोसा निभाने की
जबकि विश्वास का धरा पर
उतरना दूर नज़र आता है।
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Sunday, June 26, 2016

स्वार्थ की दीवार-हिन्दी व्यंग्य कविता(Swarth ki Deewar-Hindi Satire Poem)


भावनाओं के समंदर में
ख्यालों की लहर
उठती गिरती हैं।

जश्न की साथी भीड़
मुश्किलों में दौर में
वादे से फिरती है।

कहें दीपकबापू दिल में
अपने अपने टापू
बना लिये ज़माने में
जिसकी हर दीवार
स्वार्थ से घिरती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, June 10, 2016

दिल टूटे मिलते हैं-हिन्दी कविता(Dil Toote milte hain-Hindi Kavita)


अपने कदम 
जिस लक्ष्य की तरफ बढ़ायें
रास्ते टूटे मिलते हैं।

हर चेहरा देखकर
दोस्ती की चाहत होती
मगर दिल रूठे मिलते हैं।

कहें दीपकबापू व्यवहार से
पहचान होती है
बातों के सभी शेर
पराक्रम के दावेदारों को
हमेशा बंधे खूंटे मिलते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, May 31, 2016

प्यार की भाषा-हिन्दी कविता (Pyar ki Bhasha-Hindi Kavita)

सम्मान के शब्द से
अयोग्य लोग
फूल जाते हैं।

प्यार की भाषा
समझते नहीं कभी
मद में झूल जाते हैं।

कहें दीपकबापू समझ से
संबंध नहीं रहा ज़माने का
एक पल देखते सामने
अगले पल भूल जाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Saturday, May 14, 2016

अनमोल रत्न-हिन्दी कविता (Anmol Ratna-Hindi Poem)

सभी भव्य इमारतें
आम इंसान का 
निवास नहीं होती।

रसीले गुरुओं के आश्रम
कुशल चिकित्सकों की दुकान
भव्यता में कम नहीं होती।

कहें दीपकबापू अनमोल रत्न
प्यास नहीं बुझा पाते
फिर भी इंसान में
अमीर बनने की इच्छा
कभी कम नहीं होती।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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