Friday, July 10, 2009

आखिरी सच-व्यंग्य कविता (akhri sach-hindi vyangya kavita)

डरपोक लोगों के समाज में
बहादुर बाहर से किराये पर लाये जाते हैं.
किसी गरीब को न देना पड़े मुआवजा
इसलिए किसी की कुर्बानी
कहाँ दी गयी
इससे न होता उनका वास्ता
उधार के शहीदों के गीत
चौराहे पर गाये जाते हैं.

कमअक्लों की महफ़िल में
बाहरी अक्लमंदों के
चर्चे सुनाये जाते हैं
किसी कमजोर की पीठ थपथपाने से
अपनी इज्जत छोटी न हो जाए
इसलिए उनको दिए इसके दाम
सभी के सामने सुनाये जाते हैं.
घर का ब्राह्मण बैल बराबर
ओन गाँव का सिद्ध
यूंही नहीं कहा जाता
दौलतमंदों और जागीरदारों की चौखट पर
हमेशा नाक रगड़ने वाले समाज की
आज़ादी एक धोखा लगती है
फिर भी उसके गीत गाये जाते हैं.
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उसने कहा ''मैं आजाद हूँ
खुद सोचता और बोलता हूँ.''
उसके पास पडा था किताबों का झुंड
हर सवाल पर
वह ढूंढता था उसमें ज़वाब
फिर सुनाते हुए यही कहता कि
'वही आखिर सच है जो मैं कहता हूँ

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Monday, July 6, 2009

नही भज सकते अब साली और भाभी-व्यंग्य कविता (hasya vyangya kavita)

दनदनाता हुआ आया फंदेबाज और बोला
‘दीपक बापू, तुम्हारे हिट होने के मिली गयी चाभी
तुम भी बना लो कोई व्यंग्य पात्र
जिसके नाम के साथ जोड़ दो भाभी।
गारंटी है हमारी, तुम्हारे फ्लाप होने का
सिलसिला भी टूट जायेगा
हर विरोधी सामने से फूट जायेगा
देखो प्रतिबंधित हो गयी एक वेबसाईट
जिसकी नायिका थी कोई कल्पित भाभी
लोग उसे अब अधिक ढूंढ रहे हैं
नाम लेकर लिख लिखकर कंप्यूटर पर कूद रहे हैं
तुम अपना ब्लाग भी पहुंचा दो
हिट का ताला खोलने वाली यही है एक चाभी।

सुनकर पहले चौंके
फिर अपना पसीना पौंछते कहें बोले दीपक बापू
‘कमबख्त इंटरेनेट पर कोई नाम हिट नहीं होता
बूढ़े हों या जवान ‘सेक्स’ शब्द डालकर
लगाते हैं यौन साहित्य के अथाह समुद्र में गोता।
अपनी आंखें फोड़ते रहेंगे
अपने ही शरीर का रस जलाकर
किससे शिकायत करेंगे
नाम कोई भी हो
घरवाली शब्द हिट नहीं दिला सकता
साली लिखो तभी कोई जाल में फंसता
जेठ को हिट नहीं बना सकती भाभी
देवर ही उसके यौन साहित्य की है एक चाभी।
तुमने आने में कर दी है देरी
हम लगा चुके भाभी साहित्य घर की फेरी।
मिल भी गये हिट वहां तो
हमारे किस काम आयेगा
हम ठहरे फोकटिया, धेला भी हाथ नहीं आयेगा।
फिर सोचो
आदमी कब तक उस श्रृंगार रस से चिपका रहेगा
कभी तो अति होने की बात कहेगा
फिर हास्य रस की तरफ आयेगा
फंदेबाज, सच कहें तो
तुमने इतने हिट दिला दिये हैं
उन पर ही हमें नाज है
तुम्हारे सामने पहली बार खोला यह राज है
इससे अधिक क्या कहें
नहीं भज सकते अब साली और भाभी।

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Thursday, July 2, 2009

हिंदी भाषा के वीभत्स शब्दों पर भरोसा-व्यंग्य आलेख (hasya vyangya in hindi)

समलैंगिकों को कानूनी अधिकार क्या मिला इस देश में एक ऐसी बहस चली पड़ी है जिसका आदि या अंत फिलहाल नजर नहीं आता। यहां हम समलैंगिकों के अधिकारों या उनकी मनस्थिति पर विचार न कर यही देखें कि इस पर तर्क क्या दिया जा रहा है?
ऐसा लगता है कि आज थोड़ा हिंदी के उस वीभत्स रूप पर जरा गौर करें जो समलैंगिकों को डरा सकता है। यह डर है गालियों का। अधिकतर शिक्षित लोग गालियां न देते हैं न सुनने का उनमें सामथ्र्य होता है। कुछ लोग देते हैं पर सुनने की हिम्मत नहीं करते।
समलैंगिक एक आकर्षक शब्द लगता है पर यह केवल बड़े शहरों में रहने वाले मनोविकारी लोगों को ही सुहा सकता है। छोटे शहरों और गांवों में अगर समलैंगिक अगर पहुंच जाये तो उसे जो शब्द अपने लिये सुनने को मिलेगा उसे वह समझेगा नहीं और सच बात तो यह है कि उस शब्द का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि आशय ही समलैंगिकता के अधिक निकट है। समलैंगिक संबंध वही बनायेगा जिसने उस शब्द को कभी सुना नहीं होगा।
जब हिंदी के वीभत्य रूप का विचार आया तो यह प्रश्न भी उठा कि क्या जितने भयानक शब्द हिंदी-जिसे विश्व की सर्वाधिक मधुर और वैज्ञानिक भाषा भी अब माना जाने लगा है-में होते हैं उतने किसी अन्य भाषा में भी शायद ही होते होंगे। कम से कम अंग्रेजी में तो नहीं होते होंगे क्योंकि अपने यहां अंग्रेजी में बोलने वाले हेकड़ हमेशा ही गालियों के लिये हिंदी का जिस सहारा लेते हैं उससे तो यही लगता है।
बात से बात यूं निकली कि एक विद्वान ने कहा कि समलैंगिक संबंध बीमारी नहीं है-यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है। अगर यह सच है तो पश्चिम और पूर्व की संस्कृति में जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उससे अधिक तो अंतर तो मानवीय सोच में है। अगर इस तरह की सोच ही सभ्यता का प्रतीक है तो हम भारतीय असभ्य भले मगर विश्व के अध्यात्मिक गुरु कहे जाने वाले अपने भारत देश में विश्व संगठन की यह राय कतई स्वीकारी नहीं जा सकती।
अगर हमारे देश के विद्वानों का यह मानना है कि जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन बीमारी नहीं मानता तो उसे हम भी नहीं मानेंगे तो कुछ कहना व्यर्थ है। इस देश के विद्वानों और प्रचार माध्यमों का कहना ही क्या? स्वाईन फ्लू के देश में कुल सौ मरीज भी नहीं है पर आप उसके बारे में पढ़ेंगे और सुनेंगे तो लगेगा कि जैसे पूरा देश ही स्वाईन फ्लू की चपेट में हैं जबकि उससे हजार गुना लोग तो टीवी, पीलिया आंत्रशोध और मलेरिया से पीड़ित हैं उससे बचाव के तरीकों का प्रचार अधिक नहीं होता क्योंकि उसकी दवायें तो ऐसे ही बिक जाती हैं पर स्वाइन फ्लू को एक विज्ञापन की जरूरत है जो जागरुकता पैदा करने के नाम पर ही चलता है। हम तो आज तक यही नहीं समझ पाये कि हेपेटाइटिस और पीलिया में अंतर क्या है? आखिर हैपेटाइटिस के टीके लगते हैं पर वह पीलिया से किस तरह अलग हमें पता नहीं।
बात हम करें समलैंगिक संबंधों की तो उसके लिये जो हिंदी में शब्द है वह इतना वीभत्स है कि हमारा बूता तो यहां लिखने का नहीं हैं। अक्सर एक पुरुष जब दूसरे से नाराज होता है तो वही शब्द कहता है और फिर झगड़ा अधिक बढ़ जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन को उस गाली के बारे में नहीं मालुम होगा! अंग्रेजी में गिटिर पिटिर करने वालों को नहीं पता कि मंकी (बंदर) शब्द उनके लिये जिस तरह नस्लवाद का प्रतीक है वैसे ही पुरुष समलैंगिक संबंधों के लिये ऐसा शब्द हिंदी में है जिस पर कोई भला लेखक तो लिख ही नहीं सकता।
अंतर्जाल पर एक लेखक ने उस भयानक लगने वाले शब्द को अपने ब्लाग पर लिखा था। हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरम पर जब हमने उसे पढ़ा तो पूरा दिन उस फोरम का रुख नहीं किया। इतना ही नहीं उस फोरम ने बाद में उस लेखक का ब्लाग का लिंक ही अपने यहां से हटा लिया। उससे मन इतना खराब हुआ कि दो आलेख और तीन व्यंग्य कवितायें जब तक नहीं लिख डाली तब चैन नहीं आया। नहीं लिखा तो वह शब्द।
हिंदी वार्तालाप करने वाले सामान्य लोगों में बहुत से लोग गालियों का उपयोग करते हैं। हां, अब शिक्षित होते जाने के साथ ही गालियों का आद्यक्षर कर लिया है जैसे कि अंग्रेजी का संक्षिप्त नाम लिखते हैं। सभ्य लोग इन्ही आद्यक्षरों के सहारे काम चलाकर अपने गुस्से का इजहार कर लेते हैं। इसकी एक दिलचस्प घटना याद आ रही है। आस्ट्रेलिया के साथ एक मैच में एक भारतीय खिलाड़ी ने आस्ट्रेलियो के खिलाड़ी को मंकी (बंदर) कह डाला। इस पर भारी हायतौबा मची। भारतीय खिलाड़ी पर प्रतिबंध भी लगा। आरोप लगाया कि यह तो सरासर नस्लवाद है। भारत में इस पर जमकर विरोध हुआ। कहा गया कि ‘भारतीय कभी नस्लवादी नहीं होते।’

सच कहा होगा। आप तो जानते हैं कि चाय के ठेलों, विद्वानों की बैठकों और बाजारों में ऐसे घटनाओं पर खूब चर्चा होती है। एक सज्जन ने कहा-‘हम भारतीय बहुत सज्जन हैं। विदेश में जाकर ऐसी हरकतें करें यह संभव नहीं है। फिर गुस्से में बंदर कहें यह तो संभव ही नहीं है। बंदर तो यहां प्यार से कहा जाता है। हां, यह संभव है कि भारतीय सभ्य खिलाड़ी ने क्रोध में आकर उस गाली का आद्यक्षर प्रयोग किया हो जिसका स्वर मंकी (बंदर) के रूप में सुनाई दिया हो।’
पता नहीं उस आदमी का यह कहना सही था या गलत पर जो लोग उसे सुन रहे थे उनका मानना था कि ऐसा भी हो सकता है।
जब हमने एक विद्वान सज्जन द्वारा समलैंगिकता को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा उसे बीमारी न मानने की बात सुनी तब लगा कि अब हमारे देश के लोग उस हर चीज और विचार पर फिर से दृष्टिपात करें जो उन्होंने अपनाया है। एक भयानक मनोविकार अगर बीमारी नहीं है तो फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन किस आधार पर यह कहता है कि ‘इस दुनियां में चालीस फीसदी से अधिक लोग मनोविकारों का शिकार है पर उनको पता नहीं है।’
अगर वह इसे मानसिक रोग नहीं मानता तो उसे जाकर बतायें कि हिंदी में इसके लिये विकट शब्द है जो बहुत भड़काने वाला है। यह शब्द उस मंकी शब्द से अधिक विस्फोटक है जिसे वह लोग नस्लवाद का प्रतीक मानते हैं।
वैसे जब चालीस फीसदी मनोरोगियों के होने की बात विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कही थी तब हमने सोचा कि वह संख्या कम ही बता रहा है क्योंकि इंसान जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उससे तो यह संख्या पचास से अधिक ही लगती है और यह वह लोग हैं जिनके पास धन, प्रतिष्ठा और पद की ताकत है, वह मदांध हो रहा है। किसी को कुचलकर वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है। बाकी पचास फीसदी तो गरीब हैं जिनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो ऐसे मनोविकार पाल सकें।
अगर हमारी बात पर यकीन न हो तो इस विषय पर टीवी पर चर्चायें सुन लो। अखबार पढ़ लेना। कुछ लोग समलैंगिक अधिकार मिलने पर नाच रहे हैं तो कुछ विरोध में धर्म और संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। जो नाच रहे हैं उनके मनोरोगी होने पर हम क्या कहें? मगर जो विरोध कर रहे हैं वह मनोरोगी हैं या भावनाओं के व्यापारी यह भी देखने वाली बात है।
कह रहे हैं कि
1.इससे समाज भ्रष्ट हो जायेगा।
2.क्या इस देश में माता पिता चाहेंगे कि उनके बच्चे समलैंगिक बन जायें।
3.यह तो पूरी प्रकृति के लिये खतरा है
उनके सारे तर्क हास्यास्पद हैं। हमें तो अपनी मातृभाषा के हिंदी शब्द कोष में अदृश्य रूप से मौजूद वीभत्स शब्दों के साथ ही अपने देश के युवकों और युवतियों में अध्यात्मिकता की तरफ बढ़ते रुझान पर पूरा भरोसा है। बड़े शहरों का पता नहीं छोटे शहरों तथा गांवों में रहने वाले युवक भी उन शब्दों का उपयोग करते हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि समलैंगिक शब्द के लिये कौनसा शब्द है? वैसे भी हमारे महापुरुष कहते हैं कि असली भारती गांवों में बसता है। समलैंगिकता भी वैसा ही रोग है जैसा स्वाईन फ्लू-दिखेगा कम पर प्रचार माध्यमों में चर्चित अधिक होगा। चंद समलैंगिक लोगों की वजह से देश की युवा पीढ़ी को अज्ञानी मान लेना हमें स्वीकार्य नहीं है। इस देश के युवक युवतियां पश्चिमी देशों से अधिक चेतनशील हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वहां पहुंचकर अपनी योग्यता का लोहा नहीं मनवाते। यह योग्यता मनोविकारी नहीं अर्जित कर सकते।
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Tuesday, June 30, 2009

(article on savita bhabhi hindi) बात बेबात की-आलेख (hindi article)

सविता भाभी नाम की एक पौर्न साईट को बैन कर दिया गया है। बैन करने वालों का इसके पीछे क्या ध्येय है यह तो पता नहीं पर बैन के बाद इसे समाचार पत्र पत्रिकाओं में खूब स्थान मिला उससे तो लगता है कि इसके चाहने वालों की संख्या बढ़ेगी। पता नहीं इस पर बैन का क्या स्वरूप है पर कैसे यह संभव है कि बाहर लोग इससे भारत में न देख पायें।
यह साइट कैसे है यह तो पता नहीं पर अनुमान यह है कि यह किसी विदेशी साईट का देसी संस्करण होगी। गूगल, याहू, अमेजन और बिंग आदि सर्च इंजिनों तो सर्वव्यापी हैं और इन पर जाकर कोई भी इसे ढूंढ सकता है। यह अलग बात है कि इनके पास कोई ऐसा साफ्टवेयर हो जो भारतीय प्रयोक्ताओं को इससे रोक सके। तब भी सवाल यह है कि अगर विदेशों में अंग्रेजी में जो पोर्न वेबसाईटें हैं उनसे क्या भारतीय प्रयोक्ताओं को रोकना संभव होगा।
इस लेखक को तकनीकी जानकारी नहीं है इसलिये वह इस बात को नहीं समझ सकता है कि आखिर इस पर यह बैन किस तरह लगेगा?
लोगों को कैसे रहना है, क्या देखना है और क्या पहनना है जैसे सवालों पर एक अनवरत बहस चलती रहती है। कुछ बुद्धिजीवी और समाज के ठेकेदार उस हर चीज, किताब और विचार प्रतिबंध की मांग करते हैं जिससे लोगों की कथित रूप से भावनायें आहत होती हैं या उनके पथभ्रष्ट होने की संभावना दिखती है। अभी कुछ धर्माचार्य समलैंगिकता पर छूट का विरोध कर रहे हैं। कभी कभी तो लगा है इस देश में आवाज की आजादी का अर्थ धर्माचार्यों की सुनना रह गया है। इस किताब पर प्रतिबंध लगाओ, उस चीज पर हमारे धर्म का प्रतीक चिन्ह है इसलिये बाजार में बेचने से रोको।
हमारा धर्म, हमारे संस्कार और हमारी पहचान बचाने के लिये यह धर्माचार्य जिस तरह प्रयास करते हैं और जिस तरह उनको प्रचार माध्यम अपने समाचारों में स्थान देते हैं उससे तो लगता है कि धर्म और बाजार मिलकर इस देश की लोगों की मानसिक सोच को काबू में रखना चाहते है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में वह शक्ति है जो आदमी को स्वयं ही नियंत्रण में रखती है इसलिये जो भी व्यक्ति इसका थोड़ा भी ज्ञान रखता है वह ऐसे प्रयासों पर हंस ही सकता है। दरअसल धर्म, भाषा, जाति, और नस्ल के आधार पर बने समूहों को ठेकेदार केवल इसी आशंका में जीते हैं कि कहीं उनके समूह की संख्या कम न हो जाये इसलिये वह उसे बचाने के लिये ऐसे षडयंत्र रचाते हैं जिनको वह आंदोलन या योजना करार देते हैं। सच बात तो यह है कि अधिक संख्या में समूह होने का कोई मतलब नहीं है अगर उसमें सात्विकता और दृढ़ चरित्र का भाव न हो। इस मामले में यहूदियों का मानना चाहिये जो कम संख्या में होते हुए भी इजरायल में बैठकर लोहा ले रहे हैं। वह एक खुला समाज है और वहां ऐसी खबरें नहीं आती कि उस किताब पर बैन किया गया या उस फिल्म को रोक दिया या फिर फलां व्यक्ति को गलत विचार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। ऐसा नहीं है कि इजरायल में वहां की वर्तमान नीति का विरोध करने वाले कम यहूदी हैं। इतना ही नहीं वह अपने धर्म की आलोचना सुनने में भी परहेज नहीं करते।
कुतर्कों को तर्क से काटना चाहिये। एक दूसरी बात यह भी है कि जब आप कोई सार्वजनिक रूप से किसी व्यक्ति, किताब, दृश्य या किताब को बहुत अच्छा कहकर प्रस्तुत करते हैं तो उसके विरुद्ध तर्क सुनने की शक्ति भी आप में होना चाहिये। न कि उन पर की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों से अपनी भावनायें आहत होने की बात की जानी चाहिये। इस मामले में राज्य का हस्तक्षेप होना ही नहीं चाहिये क्योंकि यह उसका काम नहीं है। अगर ऐसी टिप्पणियों पर उत्तेजित होकर कोई व्यक्ति या समूह हिंसा पर उतरता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही होना चाहिये न कि प्रतिकूल टिप्पणी देने वाले को दंडित करना चाहिये। हमारा स्पष्ट मानना है कि या तो आप अपने धर्म, जाति, भाषा या नस्ल की प्रशंसा कर उसे सार्वजनिक मत बनाओ अगर बनाते हो तो यह किसी भी व्यक्ति का अधिकार है कि वह कोई भी तर्क देकर आपकी तारीफ की बखिया उधेड़ सकता है।
यह लेखक शायद ऐसी बातें नहीं कहता पर अंतर्जाल पर लिखते यह एक अनुभूति हुई है कि लोग पढ़ते और लिखते कम हैं पर ज्ञानी होने की चाहत उन्हें इस कदर अंधा बना देती है कि वह उन किताबों के लिखे वाक्यों की निंदा सुनकर उग्र हो जाते हैं। इस लेखक द्वारा लिखे गये अनेक अध्यात्म पाठों पर गाली गलौच करती हुई टिप्पणियां आती हैं पर उनमें तर्क कतई नहीं होता। हैरानी तो तब होती है कि विश्व की सबसे संपन्न भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा से जुड़े होने का दावा करने वाले लोग भी पौर्न साईटों बिना विवाह साथ रहने तथा समलैंगिकता का विरोध करते हैं। बिना विवाह के ही लड़के लड़कियों के रहने में उनको धर्म का खतरा नजर आता है। यह सब बेकार का विरोध केवल अपनी दुकानें बचाने का अलावा कुछ नहीं है।
कहने को तो कहते हैं कि आजकल की युवा पीढ़ी इनको महत्व नहीं देती पर वास्तविकता यह है कि लड़के लड़कियां विवाह करते ही इसी सामजिक दबाव के कारण हैं। कई लड़कियां धर्म बदल कर विपरीत संस्कार वाले लड़कों से विवाह कर बाद में पछताती हैं। धर्म बदलकर विवाह करने पर उनको ससुराल पक्ष के संस्कार मानने ही पड़ते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि उन संस्कारों को उसकी ससुराल में ही बाकी लोग महत्व नहीं देते पर उसे मनवाकर अपनी धार्मिक विजय प्रचारित किया जाता है। विवाह एक संस्कार है इसे आखिर नई पीढ़ी तिलांजलि क्यों नहीं दे पाती? इसकी वजह यही है कि जाति, धर्म, भाषा और नस्ल के आधार पर बने समाज ठेकेदारों के चंगुल में इस कदर फंसे हैं कि उनसे निकलने का उनके पास कोई चारा ही नहीं है। आप अगर देखें। किस तरह लड़का प्यार करते हुए लड़की को उसके जन्म नाम को प्यार से पुकारता है और विवाह के लिये धर्म के साथ नाम बदलवाकर फिर उसी नाम से बुलाता है। इतना ही नहीं बाहर समाज में अपनी पहचान बचाने रखने के लिये लड़की भी अपना पुराना नाम ही लिखती है। समाज से इस प्रकार का समझौता एक तरह से कायरता है जिसे आज का युवा वर्ग अपना लेता है।

बात मुद्दे की यह है कि मनुष्य का मन उसे विचलित करता है तो नियंत्रित भी। उसे विचलित वही कर पाते हैं जो व्यापार करना चाहते हैं। फिर मनुष्य को एक मित्र चाहिये और वह ईश्वर में उसे ढूंढता है। अभी हाल ही मेें पश्चिम के वैज्ञानिकों ने बताया कि मनुष्य जब ईश्वर की आराधना करता है तो उसके दिमाग की वह नसें सक्रिय हो जाती हैं जो मित्र से बात करते हुए सक्रिय होती हैं। इसका मतलब साफ कि दिमाग की इन्हीं नसों पर व्यापारी कब्जा करते हैं। ईश्वर के मुख से प्रकट शब्द बताकर रची गयी किताबों को पवित्र प्रचारित किया जाता है। इसकी आड़ में कर्मकांड थोपते हुए धर्माचार्य अपने ही धर्म, जाति और समूहों की रक्षा का दिखावा करते हुए अपना काम चलाते हैं। मजे की बात है कि आधुनिक युग के समर्थक बाजार भी अब इनके आसरे चल रहा है। वजह यह है कि धर्म की आड़ में पैसे का लेनदेन बहुत पवित्र माना जाता है जो कि बाजार को चाहिये।
निष्कर्ष यह है कि कथित पवित्र पुस्तकों के यह कथित ज्ञानी पढ़ते लिखते कितना है यह पता नहीं पर उनकी व्याख्यायें लोगों को भटकाव की तरफ ले जाती हैं। आम व्यक्ति को समाज के रीति रिवाजों और कर्मकांडों का बंधक बनाये रखने का प्रयास होता रहा है और अगर कोई इनको नहीं मानता तो उसकी इसे आजादी होना चाहिये। यह आजादी कानून के साथ ही निष्पक्ष और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों द्वारा भी प्रदान की जानी चाहिये।
किसी को बिना विवाह के साथ रहना है या समलैंगिक जीवन बिताना है या किसी को नग्न फिल्में देखना है यह उसका निजी विचार है। धर्म भी नितांत निजी विषय है। जन्म से लेकर मरण तक धर्म के नाम पर जिस तरह कर्मकांड थोपे जाते हैं अगर किसी को वह नापसंद है तो उसे विद्रोही मानकर दंडित नहीं करना चाहिये। कथित रूप से पवित्र पुस्तक की आलोचना करने वालों को अपने तर्कों से कोई धर्मगुरु समझा नहीं पाता तो वह राज्य की तरफ मूंह ताकता है और राज्य भी उसके द्वारा नियंत्रित समूह को अपनी हितैषी मानकर इन्हीं धर्माचार्यों को संरक्षण देता है और यही इस देश के मानसिक विकास में बाधक है।
इस लेखक का ढाई वर्ष से अधिक अंतर्जाल पर लिखते हुए हो गया है पर पाठक संख्या नगण्य है। देश में साढ़े सात करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता है फिर भी इतनी संख्या देखकर शर्म आती है क्योंकि अधिकतर लोग इन्हीं पौर्नसाईटों पर अपना वक्त बिताते हैं पर फिर भी अफसोस जैसी बात नहीं है। एक लेखक के रूप में हम यह चाहते हैं कि लोग हमारा लिखा पढ़ें पर स्वतंत्रता और मौलिकता के पक्षधर होने के कारण यह भी चाहते हैं कि वह स्वप्रेरणा से पढ़ें न कि बाध्य होकर। अपने प्राचीन ऋषियों. मुनियों, महापुरुषों तथा संतों ने जिस अक्षुण्ण अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन किया है वह मनुष्य मन के लिये सोने या हीरे की तरह है अगर उसे दिमाग में धारण किया जाये तो। अपनी बात कहते रहना है। आखिर आदमी अपने दैहिक सुख से ऊब जाता है और यही अध्यात्मिक ज्ञान उसका संरक्षक बनता है। हमने कई ऐसे प्रकरण देखे हैं कि आदमी बचपन से जिस संस्कार में पला बढ़ा और बड़े होकर जब भौतिक सुख की वजह से उसे भूल गया तब उसने जब मानसिक कष्ट ने घेरा तब वह हताश होकर अपने पीछे देखने लगता है। उसे पता ही नहीं चलता कि कहां से शुरु हुआ और कहां पहुंचा ऐसे में सब कुछ जानते हुए भी वह लौट नहीं पाता। जैसे कर्म होते हैं वैसे ही परिणाम! अगर देखा जाये तो समाज को डंडे के सहारे चलाने वाले कथित गुरु या धर्माचार्यों से बचने की अधिक जरूरत है क्योंकि वह तो अपने हितों के लिये समाज को भ्रमित करते हैं। मजे की बात यह है कि यह बाजार ही है जो कभी नैतिकता, धर्म और संस्कार की बात करता है और फिर लोगों के जज्बात भड़काने का काम भी करता है।
यह आश्चर्य की बात है कि इस देश के शिक्षित वर्ग का मनोरंजन से मन नहीं भरता। दिन भर टीवी पर अभिनेता और अभिनेत्रियों को देखकर वह बोर होता है तो कंप्यूटर पर आता है पर फिर वहां पर उन्हीं के नाम डालकर सच इंजिन में डालकर खोज करता है। यही हाल यौन साहित्य का है। टीवी और सीडी में चाहे वह कितनी बार देखता है पर कंप्यूटर में भी वही तलाशता है। ऐसे समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है। बाजार फिर उसका पैसा बटोरने के लिये कोई अन्य वेबसाईट शुरु कर देगा।शेष फिर कभी।
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Saturday, June 27, 2009

बरसात के लिये प्रार्थना-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)

अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है। जब कहीं सार्वजनिक रूप से प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है। ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें। वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं। उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं। आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।

उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये। उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है। मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है।

ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है। ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ। कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते। जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं। वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं। उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है। बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने। जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है। कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।
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Wednesday, June 24, 2009

अल्फ़ाजों की लहरें-हिंदी शायरी (hindi shayri)

दिल में जलती गम की आग
गर्मी में दोपहर की तपिश
उसे और बढ़ा देती है।
वर्षा की बूंदों के इंतजार में
में पथरा गयी हैं आंखें
जल रहा है बदन
कोई सागर ढूंढता हूं
जिसकी ठंडक तसल्ली दे सके
पर नउम्मीदी नरक सजा देती है।
उठा रहा हूं इसलिये अल्फाजों की लहरें
शायद बन जाये शायरी का कोई सागर
जिससे रौशन हो दिल
यही उम्मीद आसरा बढ़ा देती है।
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Monday, June 22, 2009

इश्तिहार-त्रिपदम (hindi tripadam)

इश्तिहार
प्यारे मजमून
धोखे से भरे।

अनजाने में
सामने आ जाये तो
दिल में भरे।

कामयाबी के
ढेर सारे सपने
सोने से भरे।

झूठे हों तो भी
देखने की कीमत
दर्शक भरे।

तस्वीर में
चमकते चेहरे
रंग से भरे।

अलसुबह
देख वह चेहरे
आईना डरे।

मेला या खेल
नट और खिलाड़ी
पैसे से भरे।

पैसे के लिये
इश्तिहारी खेल
सच से परे।

खामोश देखो
जब सिक्के न हों
जेब में भरे।

इश्तिहार
पढ़कर करना
याद से परे।

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