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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, February 22, 2018

खजाना लूटकर लेते दुनियां का मजा-दीपकबापूवाणी (Khazana lootkar lete duniyab ka Maza-DeepakBapuWani)

राजकाज में व्यस्त दौलत के दलाल, पाखंड पर नहीं करते कभी मलाल।
‘दीपकबापू’ भलाई की दुकान खोले बैठे, बेचते हमदर्दी की छाप में बवाल।।
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जनधन लूटकर साहूकार भी बड़े हो गये, सरकार के कदम उनके द्वार खड़े हो गये।
‘दीपकबापू’ सत्ता की दलाली में हाथ सभी के काले, लुटेरे भी सेठ जैसे बड़े हो गये।।
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खजाना लूटकर लेते दुनियां का मजा, सब मिल बांटकर खाते कौन देगा सजा।
‘दीपकबापू’ तिजोरी से लूटे सोने के सिक्के, पहरेदारों के कान में घंटा देर से बजा।।
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न सत्संग किया न कभी ध्यान लगाया, पढ़ किताब बाज़ार मे चेलों का मेला लगाया।
‘दीपकबापू’ ज्ञान की बातें सब जगह करें, जोगी ने अपना मन माया संग्रह में लगाया।।


इंसानी नाम के साथ काम भी बोले, कभी काम भी बुरे नाम का खाता खोले।
‘दीपकबापू’ अपने नाम पर इतराने से डरें, जिंदगी कभी नीचे कभी ऊपर डोले।।
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ताज पहनते ही हर सिर पर घमंड चढ़े, इंसान दिखना चाहते फिर भगवान से बढ़े।
‘दीपकबापू’ दरबार की जुबान पर नहीं करें भरोसा, चाटुकारों जहां लालच से खड़े।।
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Thursday, January 25, 2018

नैतिकता की बात कर छिपाते अपने पाप-दीपकबापूवाणी (Naitika ki bat ka chhipate apna paap-DepakBapuwani)


भ्रष्टाचार में डूबे भलाई की बात करें, भुखमरी पर रोयें अपने मुख में मलाई साथ भरें।
‘दीपकबापू’ पांच साल में एक बार हाथ जोड़ते, फिर तो आमजन के सिर लात धरें।।
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नैतिकता की बात कर छिपाते अपने पाप, ज़माने के भ्रष्टाचार का करें विज्ञापन जाप।
‘दीपकबापू’ गणित पढ़ा समझा नहीं गुणा भाग, सत्ता के दलाल बने इ्र्रमानदार छाप।।
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रुपहले पर्दे पर जंग का समाचार सजा, कभी कभी धर्म संदेश का बाजा भी बजा।
‘दीपकबापू’ खौफ और इश्क से दूर रहते, वह लोग जिनके पास अंदर ही है मजा।।
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पहरेदारों के सामने जिंदा लोग लापता हो जाते, ज़माने के सामने फिर मुर्दा हो जाते।
‘दीपकबापू’ हथियार में डालते कातिल जज़्बात, कायर हाथ में लेकर बहादुर हो जाते।
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दोवास में  व्यापार का ढोल बजा है, दिल्ली में बाज़ार बंद दुकान से सजा है।
स्वदेश का जुमला भूल जाओ यारो, विदेशों में हमारे विकास का डंका बजा है।।
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मनोरंजन के नाम मरा इतिहास हैं पेले, महंगे भवन बन गये सभ्यता के ठेले।
‘दीपकबापू’ पढ़ते अपने अध्यात्मिक पावन ग्रंथ, नहीं भाते उनको ख्वाबी खेले।।
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Sunday, December 3, 2017

मन गुलाम फिर भी आजादी की चाह है-दीपकबापूवाणी


विकास अब धुंध बनकर खड़ा है,
सौम्य सुबह में धुआं जड़ा है।
‘दीपकबापू’ अंधे लेते रौशनी का ठेका
उनकी लगाई आग में शहर खड़ा है।
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मत पूछना हिसाब उनसे
उनके खाते बहुत बड़े हैं।
‘दीपकबापू’ तुम पड़े जमीन पर
वह दौलत के पहाड़ पर खड़े हैं।
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कोई कहता है ख्वाहिशें छोड़ दो,
कोई उकसाता दिल में नई जोड़ दो।
‘दीपकबापू’ चीजों के गुलाम कहें
नयी खरीदो पुरानी जल्दी तोड़ दो।
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मन गुलाम फिर भी आजादी की चाह है,
लालच का अवरोध बंद सभी राह है।
‘दीपकबापू’ तन से बुरा आलस मन का
योद्धा पूजे सोते शव को किसने सराह है।
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Sunday, September 24, 2017

जिंदगी के दर्द यूं ही बहने हैं, हमदर्दों के शब्द भी सहने हैं-दीपकबापूवाणी (Zindagi ke Dard youn hi Sahane Hain-DeepakBapuWani)

जिंदगी के दर्द यूं ही बहने हैं,
हमदर्दों के शब्द भी सहने हैं।
‘दीपकबापू’ अपने जंग स्वयं लड़ना है
जख्म हमेशा साथ रहने हैं।
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झूठे बोल से लोगों के दिल लूटे,
असली रूप देखा कांच जैसे टूटे।
‘दीपकबापू’ यकीन मार चुके
पर जिंदगी से उसका नाता न टूटे।।
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चलो बाहर टहल आयें,
सड़क पर दिल बहलायें।
‘दीपकबापू’ अंधेरे की प्रतीक्षा क्यों करें
पहले ही चिराग जलायें।
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अपने घर से जो लोग तंग हैं,
शोर करती भीड़ के संग हैं।
‘दीपकबापू’ बदहाल ज़माने में
रह गये दर्द के ही ढेर रंग हैं।
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हर स्वाद चखने का है चाव,
चाहत से महंगे हो गये भाव।
‘दीपकबापू’ दिल काबू में नहीं
चीज लूटने की जंग में झेलते घाव।।
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अपने कामयाबी पर बोलते रहें
अपनी गम और खुशी खोलते रहें।
‘दीपकबापू’ आओ बहरे हो जायें
अमीरों के बड़ेबोल कब तक सहें।
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Sunday, September 10, 2017

गुनाह पर फरिश्तों का पर्दा पड़ा है-दीपकबापूवाणी (Gunahon par Farishton ka parda pada hai-DeepakBapuWani)

लोकतंत्र के सहारे अपराधी पले हैं, कातिल चेहरे भलमानस अदाओं में ढले हैं।
‘दीपकबापू’ अपने ख्याली पुलाव पकाते, मगर गुस्से की आग में सब जले हैं।।
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गुनाह पर फरिश्तों का पर्दा पड़ा है, बदनाम होने पर भी नाम बड़ा है।
‘दीपकबापू’ जिम्मा लिया पहरेदारी का, वही चोरों की संगत में खड़ा है।।
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अपने सुख के साथ लोग नहीं चलते, पराये घर की रौशनी से सब जलते।
‘दीपकबापू’ खुशहाल वातावरण बनाते नहीं, ज़माने के दर्द पर सब मचलते।।
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चेहरे तो अब भी इंसानों जैसे लगते हैं, दिल हो गये बेरहम जज़्बात ठगते हैं।
‘दीपकबापू’ हर कदम पर बैठा हादसे का डर, पता नहीं कब सोते कब जगते हैं।
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पर्दे पर तर्क वितर्क का व्यापार चल रहा है, निरर्थक शब्द प्रचार में पल रहा है।
‘दीपकबापू’ कत्ल और आग के इंतजार में, हर चर्चाकार का दिल मचल रहा है।।
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लाश होकर बन जाते बड़े,
दर्द के सौदगार पास होते खड़े।
‘दीपकबापू’ दिल तो ठहरा फकीर
बेदिल उससे जज़्बात की जंग लड़े।।
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भीड़ में पहचान खोने से डरते हैं,
तन्हाई में पहचान के लिये मरते हैं।
‘दीपकबापू’ इधर नज़र तो आंखें उधर
अपनी सोच में चिंतायें भरते हैं।
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इंसानों में कातिल भी
जगह बनाये रहते हैं।
इसलिये तो फरिश्तों के
नाम जुबानों में बहते हैं।
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Friday, August 11, 2017

फरिश्ते कभी अपनी तस्वीर नहीं लगाते-दीपकबापूवाणी (fFarishtey Kabhi Tasweer nahin lagate-DeepakBapuwani)

अमन में रहते लोभी जंग नहीं करते, मुफ्तखोर कायर कभी तंग नहीं भरते।
‘दीपकबापू’ अस्त्र शस्त्र का बोझ उठाते, मौके पर वीरता का रंग नहीं भरते।।
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पटकथा से पर्दे पर चल रहे लोग, सुबह सिखाये त्याग शाम विज्ञापन से भोग।
‘दीपकबापू’ योग के नारे लगा रहे जोर से, पर्चे से याद करा रहे ढेर सारे रोग।।
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रौशनी में नहाते वह अंधेरा न जाने, लूट के हकदार कभी रक्षा का घेरा न जाने।
‘दीपकबापू’ त्रासदी के खेल का मजा लेते, बदन से बहे धारा पर खून तेरा न माने ।।
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फरिश्ते कभी अपनी तस्वीर नहीं लगाते, पुजवाने वाले कभी तकदीर नहीं जगाते।
‘दीपकबापू’ ईमान की छाप लगाने वाले, दुआओं का सौदा कर पीड़ा नहीं भगाते।।
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राजा कहे बंजारा सुखी बंजारा कहे राजा सुखी, अपने अपने हाल हैं पर सब दुःखी।
चाहत की चिंगारी से जलाते चिंता की आग, ‘दीपकबापू’ अपने ही ताप होते दुःखी।।
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अपनी आंखे स्वयं की आदतों से फेरी है, परायी कमियों ने उनकी रौशनी घेरी है।
‘दीपकबापू’ जंग कराकर निकलते अमन के लिये, नाकामी छिपायें कामयाबी कहें मेरी है।।
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कुदरती दुनियां में तरह तरह के रंग हैं, पसंद नापसंद में जूझती इंसानी नज़रें तंग है।
‘दीपकबापू’ अपनी सोच से आगे बढ़ते नहीं, अक्लमंद कहलाये जो उधार की राय के संग हैं।।
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भीड़ लगाकर इंसान ढूंढता अपनी पहचान, दूसरे को गिराकर बनाता अपनी शान।
‘दीपकबापू’ वैभव पास लाये स्वयं से हुए दूर,अनमने घूमते अंदर है कि बाहर जान।।
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दौलतमंदों के खड़े किये गये जिंदा प्यादे हैं, जिनके गरीबी दूर करने के वादे हैं।
‘दीपकबापू’ जगह जगह करते आदर्श की बात, दिल में संपदा लूटने के इरादे हैं।।
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प्रेम शब्द सब जपें पर रस जाने नहीं, मतलब निकले तब संबंध कभी माने नहीं।
‘दीपकबापू’ धनिकों की चाकरी पर तत्पर, मजबूरी से लड़ने की कोई ठाने नहीं।।
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Friday, July 14, 2017

मुफ्त माल पाने के लिये सब होते गरीब-दीपकबापूवाणी-(muft mal ki liye garib hote-Deepakbapuwani)

चाहत कर अपना संकट आप बुलाते, लोभ में अपनी अपनी चेतना आप सुलाते।
दीपकबापूसिर से पांव तक नाटकीयता भरी, नाकामियों से अपना सिर धुलाते।।
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मुफ्त माल पाने के लिये सब होते गरीब, प्रभाव जताने दबंग के हो जाते करीब।
दीपकबापूकभी ताकत दिखाते कभी औकात, जीत पर हंसे हारें तो कोसें नसीब।।
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कहानी सुना दिल बहलाने की करें तैयारी, जज़्बाती दिखते पर होती लूट से यारी।
दीपकबापूनज़र लगाते पराये माल पर, मुफ्त चीज पाने पर ही लगें उनको प्यारी।।
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किसी को पता नहीं उसका पैसा ही दम है, हैरान है वह भी जिसके पास कम है।
दीपकबापूखजाने पर बैठकर होते बेहोश, नहीं देख पाते गरीब की आंख नम है।।
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जिस पर घाव हुआ वही दर्द सहता है, पाखंडी हमदर्द तो बस दो शब्द कहता है।
दीपकबापूइंसानी भेष में पशु भी हैं, खुश होते जब रक्त सरेराह बहता है।।
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बिकने के लिये हर इंसान तैयार है, पैसा पास हो तो हर बंदा अपना यार है।
दीपकबापूजज़्बात की बात करते बेकार, दिल से नहीं पर जिस्म से प्यार है।।
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लोगों को भय दिखाकर साहस सिखाते, कायरों की महफिल में वीरता दिखाते।
दीपकबापूदूरदेश में मची देखी खलबली, घर में अपनी कूटनीति के नाम लिखाते।।
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