समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, May 25, 2017

वादों के सौदागरों का याद से नाता नहीं-दीपकबापूवाणी (vadon ke saudagar ko yaad se nata nahin-DeepakBapuWani)

घासफूस के घर में भी इंसान रहते हैं, देह के पसीने में उनके बयान बहते हैं।
दीपकबापूशिकायतें अब नहीं करते, माननीयों की हर ठगी खुलेआम सहते हैं।।
-----
वादे निभाने के लिये नहीं होते, करने वाले कभी शब्दों का बोझ नहीं ढोते।
दीपकबापूचतुराई से बेच रहे सपने, जागने वाले उनके ग्राहक नहीं होते।।
---------
जीवन के सफर में मार्ग भी बदल जाते हैं, कहीं हम कहीं साथी बदल जाते हैं।
दीपकबापूकिसका इंतजार करें किसे करायेंअपने इरादे भी बदल जाते हैं।।
--
सबसे ज्यादा झूठे अपने सिर पर ताज पहने, सज्जन लगे बदनीयती का राज सहने।
दीपकबापूलाचार से ज्यादा हुए आलसी, मक्कार शान से विजयमाला आज पहने।।
---
बेकार की बातों का जारी  है सिलसिला, तारीफ के विचार पर है भारी गिला।
दीपकबापूढूंढते जहान में मीठे बोल, हर शब्द अर्थ मिठास से खाली मिला।।
-----
खरीदने से मिले खुशी सभी जाने, बांटने से बढ़ती जाती सभी माने।
दीपकबापूसोचते कोई खुश दिखे, चिंता में सभी खड़े मुक्का ताने।।
-
अपने सपने सभी ने सजा लिये, जीते है सभी पराये दर्द का मजा लिये।
दीपकबापूमृत संवेदना के साथी, कौन सुने दर्द सभी ने मुंह बजा लिये।
---------
वादों के सौदागरों का याद से नाता नहीं, भूलने से कुछ उनका जाता नहीं।
दीपकबापूबातों से पकाते लोगों का दिमाग, भरती जेब मगर कुछ जाता नहीं।।
-----------
भूख जिसे लगी उसने रोटी पाई, हर गुंजरते पहर खाली पेट लेता अंगड़ाई।
दीपकबापूसब पाया दिल का चैन छोड़, हर ऊंचे पर्वत से लगी मिली खाई।।
----------

Wednesday, May 3, 2017

सौदे की वफा एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता (Saude ki Vafa ek saal-Hindisatire poem)

सौदे की वफा एक साल-हिन्दी व्यंग्य कविता
------
सामानों से शहर सजे हैं
खरीदो तो दिल भी
मिल जायेगा।

इंसान की नीयत भी
अब महंगी नहीं है
पैसा वफा कमायेगा।

कहें दीपकबापू बाज़ार में
घर के भी सपने मिल जाते
ग्राहक बनकर निकलो
हर जगह खड़ा सौदागर
हर सौदे की वफा
एक साल जरूर बतायेगा।
--------
सिंहासन का नशा-हिन्दी व्यंग्य कविता
-----
आकाश में उड़ने वाले पक्षी
कभी इश्क में
तारे तोड़कर लाने का
वादा नहीं करते हैं।

जाम पीने वाले
कतरा कतरा भरते ग्लास में
ज्यादा नहीं भरते हैं।

कहें दीपकबापू सिंहासन पर
बैठने का नशा ही अलग
जिन्हें मिल जाता 
फिर कभी उतरने का 
इरादा नहीं करते हैं।
---
नीयत के सियार
दिखने मे गधे हैं।
‘दीपकबापू’ न पालें भ्रम
स्वार्थ से सभी सधे हैं।
--------

Saturday, April 22, 2017

फांकामस्ती की नहीं पीर कहलाते-दीपकबापूवाणी(Fankamasti Ki nahin peer Kahlate-DeepakBapuWani)

छोटे कदमों से ही बहुत दूरी की तय है, चिंता से परे चिंत्तन की लय है।
‘दीपकबापू’ सब बटोरने का व्यर्थ प्रयास, अपने खाली हाथ में ही जय है।।
-
इश्क की हिम्मत का दावा करते हैं, उद्यान में छिपकर आह भी भरते हैं।
‘दीपकाबापू’ गृहस्थी की कथा बोलें नहीं, शादी के सपने में घर बसते हैं।।
-
पराया दुःख अमृत भी बन जाता है, जब अपनी चिंता में मन सताता है।
‘दीपकबापू’ ऊंचे देख गर्दन अकड़ी, जमीन के पानी से गला तर पाता है।
--
वाणी जाल में फंस उन्हें मुखिया चुनते हैं, वह फिर स्वार्थ जाल बुनते हैं।
‘दीपकबापू’ धोखे खाने की हुई आदत, नयी उम्मीद के बाद सिर धुनते हैं।।
-
घाव देख सब मुंह फेर लेते हैं, आफत में दुश्मन जैसा घेर लेते हैं।
‘दीपकबापू’ भीड़ में खड़े भेड़ की तरह, अंगूर समझकर बेर लेते हैं।।
-
पुराने ख्यालों से अब तो रिश्ते फूटे हैं, नये शहर में भी रास्ते टूटे हैं।
‘दीपकबापू’ विकास टांगा दीवार पर, पुराने चित्र भी आंखों से रूठे हैं।
-
फांकामस्ती की नहीं पीर कहलाते, मुफ्त के माल से दिल अमीर बहलाते।
‘दीपकबापू’ मासूम पर कर देते हमला, कमजोर होकर भी वीर कहलाते।।
-
धरा पर खून बहाने से राज चलते हैं, बादशाह की तरह बाज पलते हैं।
‘दीपकबापू’ बुझा देते अपनी फूंक से, जो रोशन चिराग आज जलते हैं।।
-
जमाने में चर्चे कातिलों के होते हैं, दर्द के साथ कोने में मासूम रोते हैं।
‘दीपकबापू’ जज़्बातों के बाज़ार में, हमदर्दी के भी ऊंचे भाव होते हैं।।
-
अवैध धंधों के काले धन से हाथ रंगे हैं, ज़माने की नज़र में वही चंगे हैं।
‘दीपकबापू’ सवाल नहीं उठाते नीयत पर, सब भले पकड़े गये वही नंगे हैं।।
-
आग से तबाही का वह खेल करते हैं, भड़काने के लिये तेल भरते हैं।
‘दीपकबापू’ न जाने कौन देव कौन असुर, सभी मतलब से मेल करते हैं।।
-
दर्द भी जो नशे की तरह पीते हैं, वही दरियादिल जिंदगी जीते हैं।
‘दीपकबापू’ आंसु से अमृत नहीं बनाते, भुलाते रहो जो बुरे पल बीते हैं।।
--
वाणी विलास में विकास शब्द भरते हैं, नयी राह की तरफ जाने से डरते हैं।।
‘दीपकबापू’ धरा को रूप बदलते देखा है, लोग यूं ही अपना नाम करते है।।
-

Sunday, April 9, 2017

ढोल की तरह दूर का चेहरा भी हर बार नया लगे-हिन्दी क्षणिकायें (Dhol ki taraha door ka chehara bhi naya lag-Hindi Short Poem)

रोज नये नायक
बदलाव की बात कह जाते हैं।
फिर मजबूरी जताकर
चलती धारा में बह जाते हैं।
-----
दिल पर नाम लिख्स
फिर मिटा देते हैं।
आज के आशिक
मासूम दिल
कितनी बार पिटा लेते हैं।
-
इश्क आशिक की इबादत है
भक्ति प्रेमी की आदत है।
हर भाषा का भाव अलग
यही अदावत है।
---
दिल का क्या कसूर
मौसम बदल जाते हैं।
बेवफाई पर सवाल क्यों
हालात से मतलब के
दौर बदल जाते हैं।
------
सब पी रहे दर्द
एक बूंद खुशी की आस है।
फिर भी डालते हाथ वहां
जहां लालची का वास है।
-------
जिंदा इंसान की
परवाह नहीं
मरे हुए भूत से डरते हैं।
मिट्टी के बुत में सौंदर्य
कपास के सूत से भरते हैं।
-
वही कत्लखानों में फरिश्ता
अपना देखते हैं।
जो लाश खाकर
सेहत बनाने का
सपना देखते हैं।
---
पहचान से सभी
अपने नही हो जाते।
कटु सत्य के साथी
कभी सपने नहीं हो पाते।
......
ढोल की तरह
दूर का चेहरा भी
हर बार नया लगे।
जिसके पास है
उसे गुजरा गया लगे।
-------
मदारी भी बंदर के
सहारे भीड़ लगा लेते हैं।
तारीफ है उनकी 
जो मौन से ज़माने में
चेतना जगा देते हैं।
-
डूबने का खतरा
उनके लिये 
जो भीड़ में  नाव पर चढ़े हैं।
डरे हैं वह
जो औकात से ज्यादा
बड़े तख्त पर चढ़े हैं।
---
ऊचे ओहदे पर
कोई मद से नहीं बच पाता।
खाना पचाने के ढेर मंत्र
पर खजाना कभी नहीं पच पाता।

Monday, March 27, 2017

हमने तो चंद शब्दों में अपनी बात कही-छोटीकविताये एवं क्षणिकायें (Hamane to chand shabdon mein apni bat kahi Thi-HindiShortPoem)

चाहें तो स्वयं पर भी
हंस सकते हैं।
मगर बेबस
दूसरे पर मजाक बकते हैं।
-
हमने तो चंद शब्दों में
अपनी बात कही।
उनकी अक्ल का
दरवाजा बंद था
इसलिये बाहर ही रही।
------
पेड़ के पत्तों पर भी
जीवन संदेश अंकित है
कोई पढ़ तो पाये,

खुशी होती है
जब किसी को 
चहकता देखते हैं।
इसी बहाने
अपना मन भी
महकता देखते है।
---
जिस्म के घाव सभी देखें
दिल के कोई नहीं पढ़ पाता।
झेलते सभी
हर कोई शेर नहीं गढ़ पाता।
---
हर बार तुम्हारी 
पसंद की बात नहीं कहेंगे।
एक रस में डूबकर
हम अपनी पसंद नहीं रहेंगे।
-----------------
अब चित्रों से दिल
नहीं बहलता
कुछ शब्द भी लिखा करो।
स्थिर आंखें मौन हैं
मन की बात करते दिखा करो।
---------

Wednesday, March 8, 2017

लगे करचोरी में सीना फुलाते हैं-दीपकबापूवाणी (Strong Body Languase Of TexThief-DeepakBapuWani)

मुफ्त में तोहफे सभी आशिक चाहें, अक्ल के अंधे इश्क में ढूंढें रौशन राहें।
‘दीपकबापू’ जज़्बात के बाज़ार में खड़े, सौदागरों के दाम सुन भरते आहें।।
------
बंद कर दिये भक्ति के अपने दरवाजे, आसक्ति के घर बजा रहे बाजे।
‘दीपकबापू’ अमृत से किया मन खाली, विष में ढूंढते आनंद फल ताजे।।
-----
बाहर वजूद ढूंढते रहे अंदर झांका नहीं, चीजों का मोल किया अपना आंका नहीं।
‘दीपकबापू‘ देखते रहे सब का वेश, कभी अपने फटे वस्त्र पर लगाया टांका नहीं।।
.........
जिंदगी की राहें कहीं भी मुड़तीं हैं, हृदय की भावनाऐं कहीं भी जुड़ती हैं।
‘दीपकबापू’ फिर भी बेचैनी बांधे चलते साथ, सोच चिंता में उड़ती है।।
--------
अनोखे दिखने में सब आम लगे हैं, जरूरतों के गुलाम खुद को ठगे हैं।
‘दीपकबापू’ न जागते न नींद आती, लालच से पैदा संकट में सब जगे हैं।।
--
भीड़ में मिलने वाले होते तो अकेले में खड़े तुम्हें क्यों बुलाते।
जज्बात मरे होते तो तुम्हारी याद के सहारे उनको कैसे सुलाते।।
--------
अपनी नीयत पर बस नहीं चलता, गैर के हर कदम पर शक पलता।
‘दीपकबापू’ छिछोरे से बने सुल्तान, बात से बतंगड़ में पूरा दिन ढलता।।
---------
नशे में गुम तो पूरा जमाना है, किसी को पीना किसी को कमाना है।
‘दीपकबापू’ कहीं हिसाब नहीं लिखा, बुरी आदतें भूलने का बहाना है।।
------
लोहे की सलाखें हों तो यूं ही फाड़ें, मन का पिंजर भाव से कैसे झाड़ें।
‘दीपकबापू’ चाहतों की बनायी बड़ी सूची, बाकी दुनियां का दर्द कैसे ताड़ें।।
-------
जिंदगी जीन के भी कई ढंग हैं, मस्ती के रास्ते भी बहुत तंग हैं।
‘दीपकबापू’ नजरिये का खेल देखें,  स्याल धवल आंखों में भरे रंग हैं।।
ज्ञानी कहां मिले सब माया को रोय, गुरु ढूंढे सभी धन से पस्त होय।
‘दीपकबापू’ भृकृटि पर गढ़ाये दृष्टि, ज्ञान की तेज धारा में मस्त होय।।
-------
बंद कर लेते अपने दिल के दरवाजे, मुख से प्रेम शब्द के बजाते बाजे।
‘दीपकबापू’ सोच से किया किनारा, कंधे पर ढो रहे चिंताओं के जनाजे।।
-------

लगे करचोरी में सीना फुलाते हैं, अनजान लोग साहुकार नाम बुलाते हैं।
‘दीपकबापू’ अपना महिमामंडन करते, दान के पाखंड रचकर पाप भुलाते हैं।।
---------
शब्द में बोले पर दिल से प्रेम कभी किया नहीं,
सम्मान के नारे लगाये पर किसी को दिया नहीं।
सभी एक दूजे पर घाव करने के लिये हैं आमादा,
‘दीपकबापू’ किसी ने मरहम लगाने को लिया नहीं।।
-

Tuesday, January 3, 2017

नोटबंदी के बाद सामान्य स्थिति की कामना यानि कालेधन की पुर्नस्थापना का सपना-हिन्दी चिंत्तन लेख (After DeMonetisation thinking of Normalisation means Dream for Balck Money-Hindi Thought artciel)

                            नोटबंदी के बाद ग्वालियर से बाहर हमारी पहली यात्रा वृंदावन की हुई। रेल से लेकर घर ता आने के बीच कहीं लगा नहीं कि देश में मुद्रा की कमी चल रही है।  सात दिन तक भीड़ के बीच नोटबंदी की चर्चा तो सुनी पर किसी ने परेशानी बयान नहीं की।  वापसी में ऑटो वाला तो प्रधानमंत्री मोदी का ऐसा गुणगान कर रहा था जैसे मानो उसे पंख लग गये हों।  सबसे बड़ी बात जो हमें लगी कि अमीरों ने अपने प्रदर्शन से जो कुंठा सामान्यजनों में पैदा की वह अब समाप्त हो गयी है-हम देश को मनोवैज्ञानिक लाभ होने की बात पहले भी लिख चुके हैं। सामान्यजनों की रुचि इस बात में नहीं है कि बैंकों में कितना कालाधन आया बल्कि वह तो धनिक वर्ग के वैभव का मूल्य पतन देखकर खुश हो रहा है।
                      नोटबंदी ने प्रधानमंत्री मोदी को एक तरह से जननायक बना दिया है। अनेक बड़े अर्थशास्त्री भले आंकड़ों के खेल दिखाकर आलोचना में कुछ भी कहें पर हम जैसे जमीन के अर्थशास्त्री सामान्यजनों के मन के भाव पर दृष्टिपात करते हैं।  अभी सरकार कह रही है कि फरवरी के अंत तक स्थिति सामान्य होगी।  हम जैसे लोग चाहते हैं कि यह स्थिति यानि नकदी मुद्रा की सीमा अगले वर्ष तक बनी रहे तो मजा आ जाये।  बताया जाता है कि इस समय साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में है और हमारे अनुसार यह पर्याप्त है।  अब नये नोट छापने की बजाय बैंकों से वर्तमान उपलब्ध मुद्रा को ही घुमाने फिराने को निर्देश दिया जाये तो देश के आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिति के लिये सबसे बेहतर रहेगा।
            बैंक तथा एटीएम से भीड़ नदारद है।  बड़े भुगतान एटीएम से खातों में किये जा सकते हैं।  ऐसे में वह कौन लोग हैं जो यह चाहते हैं कि पूरी तरह मुद्रा बाज़ार में आये और नकद भुगतान की सीमा समाप्त हो? उत्तर हमने खोज निकाला।  अनेक लेनदेन दो नंबर मेें किये जाते हैं ताकि राजस्व भुगतान से बचा जा सके।  खासतौर से भवन निर्माण व्यवसाय तो करचोरी का महाकुंुभ बन गया है।  इसका पता हमें तब चला जब हमारे एक परिचित ने एक निर्मित भवन खरीदने की इच्छा जताई।
               नाम तो पता नहीं पर वह किसी मध्यस्थ के पास हमें ले गये।  हमारे परिचित का पूरा धन एक नंबर का है।  दलाल से उन्होंने बात की तो उसने साफ कहा कि इस समय तो भवनों की कीमत गिरी हुई है पर बेचने वाले भी तैयार नहीं है। हमारे मित्र ने अपनी त्वरित इच्छा जताई तो उन्होंने एक 26 लाख की कीमत वाले भवन की कीमत 23 लाख बताई।  जब उनसे रजिस्ट्री का मूल्य पूछा गया तो वह बोले इसका आधा या कम ही समझ लो। हमारे मित्र ने बताया कि वह तो पूरा पैसा चैक से करेंगे।  तब उसने साफ मना कर दिया हमारे साथी  ने केवल चैक के भुगतान की बात दोहराई।  हमारे मित्र ने बताया कि वह अन्य मध्यस्थों से भी ऐसी ही बात कर चुके हैं।
             हमारा माथा ठनका। भवन की जो कीमत सरकारें रजिस्ट्री के लिये तय करती हैं उससे अधिक निर्माता वसूल करता है। रजिस्ट्री की कीमत वह चैक से ले सकता है पर उससे आगे वह खुलकर कालाधन मांग रहा है। यहां से हमारा चिंत्तन भी प्रारंभ हुआ।  आठ नवंबर से पूर्व देश में कुल 17 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में थी पर यह एक माध्यम थी।  अगर देश में समस्त नागरिकों के खातों में जमा रकम का अनुमान करें तो वह करोड़ करोड़ गुना भी हो सकती है पर सभी एक दिन ही एक समय में पूरी रकम नहीं निकालने जाते।  कोई जमा करता तो कोई दूसरा  निकालता है। इस तरक मुद्रा चक्र घूमता है तो पता नहीं चलता।  आठ नवंबर से नकदी निकालने की सीमा ने सारा गणित बिगाड़ दिया।  अनेक लोगों ने भूमि, भवन, सोना तथा शेयर में अपना पैसा लगा रखा है और आठ नवंबर से पूर्व वह उनके मूल्य पर इतराते थे।  विमुद्रीकरण ने उनकी हवा निकाल दी है। पहले जो पांच या दस करोड़ की संपत्ति इतराता था वह अब उसका वर्तमान मूल्य बतलाते हुए हकलाता है।  बताये तो तब जब बाज़ार में कोई खरीदने की चाहत वाला इंसान मिल जाये।
                    उस दिन एक टीवी  चैनल पर  भवन निर्माता मोदी जी के भाषण पर चर्चा करते हुए कह रहा था कि उन्होंने सब बताया पर यह नहीं स्पष्ट किया कि नकदी निकालने की सीमा कब खत्म होगी?  हमने मजदूर निकाल दिये क्योंकि उनको देने के लिये पैसा नहीं मिल पा रहा। फिर हमारा उद्धार तब होगा जब नये प्रोजेक्ट मिलेंगें।
                 वह सरासर झूठ बोल रहा था। भवन निर्माता इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि नयी मुद्रा कब कालेधन का रूप ले ताकि उन्हें सरकारी कीमत से ज्यादा मूल्य मिले।  भवन निर्माण व्यवसायी तथा मध्यस्थ छह महीने तक सामान्य स्थिति अर्थात नयी मुद्रा के कालेधन में परिवर्तित होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।  मजदूरों का नाम तो वह ऐसे ही ले रहे हैं जैसे समाज सेवक उनका मत पाने के लिये करते हैं। 
             हमारे अनुसार प्रधानमंत्री श्रीमोदी को नोटबंदी के बाद की प्रक्रियाओं पर भी सतत नज़र रखना चाहिये ताकि कहीं अधिकारीगण इन कालेधनिकों के दबाव में उतनी मुद्रा न जारी कर दें जितनी पहले थी।  बाज़ार में दिख रही  छटपटाहट उन कालेधन वालों की है जो कि राजस्व चोरी कर अपनी वैभव खड़ा करते हैं। हम जैसे जमीनी अर्थशास्त्री तो अब यह अनुभव करने लगे हैं कि देश ने 70 सालों में कथित विकास कालेधन का ही था।  सरकार के राजस्व में भारी बढ़ोतरी उस अनुपात में नहीं देखी गयी जितना आर्थिक विकास होने का दावा किया जाता है।


लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर