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Saturday, February 7, 2009

क्रिकेट खेल का अर्थशास्त्र किसी के समझ में नहीं आता-आलेख

क्रिकेट का अर्थशास्त्र कई लोगों की समझ में नहीं आया। एक समय क्रिकेट के दीवाने इस देश में बहुत थे पर उनको इस खेल से कुछ लेना था तो केवल दिल की खुशी-क्योंकि देश के प्रति जज्बात जुड़े होत थे। मगर अब दीवानगी जिन युवाओं को है वह केवल इसलिये है क्योंकि वह वैसा ही अमीर क्रिकेट खिलाड़ी बनना चाहते हैं जैसे कि वह पर्दे पर देखते हैं। बाकी जो लोग देख रहे हैं वह केवल टाईम पास की दृष्टि से देखते हैं इनमें वह भी लोग हैं जिनका इस खेल से मोहभंग हो गया था पर बीस ओवरीय विश्व कप के बाद वह फिर इस खेल की तरफ आकृष्ट हुए हैं। जहां तक क्रिकेट में देश प्रेम ढूंढने वाली बात है तो वह बेकार है।

पूरे विश्व में सभी जगह मंदी का प्रकोप है। सभी कंपनियां मंदी को रोना रो रही हैं पर क्रिकेट के प्रयोजन के लिये वह सब तैयार हैं। सच बात तो यह है कि क्रिकट अब केवल एक खेल नहीं हैं बल्कि एक व्यवसाय है। इसमें जो खिलाड़ी आ रहे हैं वह खेल प्रेम की वजह से कम कमाने की भावना से अधिक सक्रिय हैं। जब किसी नये खिलाड़ी को लोग देखते हैं तो कहते हैं कि‘ देखो आ गया नया माडल’।
कभी क्रिकेट की बात याद आती है तो अपनी दीवानगी अब अजीब लगती है। विश्व कप 2007 प्रारंभ होने से पूर्व जब भारतीय टीम वेस्टइंडीज रवाना हो रही थी तब ही उसके बुरे लक्षण दिखने लगे थे पर भारतीय प्रचार माध्यम है कि मान ही नहीं रहे थे। वह लगे थे बस इस बात पर कि भारतीय टीम जीतेगी और जरूर जीतेगी। उस समय भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाडि़यों की शारीरिक भाषा देखकर ही लग रहा था कि वह पस्त टीम के सदस्य है। मैंने उस समय कृतिदेव फोंट में एक लेख लिखा था ‘क्रिकेट में सब चलता है यार,’। यूनिकोड में होने के कारण उसे लोग पढ़ नहीं पाये और अब वह पता नहीं कहां है। बहरहाल उसमें इस खेल से जो मुझे निराशा हुई थी उसकी खुलकर चर्चा की थी। इस खेल पर जितना मैंने समय खर्च किया उतना अगर वह साहित्य लेखन में खर्च करता तो शायद बहुत बड़े उपन्यास लिख लिये होते। उस समय मुझे अपने ब्लाग लिखने के तरीके के बारे में अधिक मालुम नहीं था। इधर विश्व कप प्रतियोगिता शुरु होने वाली थी और मैं उस पर ही लिखता जा रहा था। शीर्षक तो मैंने ब्लागस्पाट पर लिखे पर अपनी अन्य सामग्री कृतिदेव में लिखी। ब्लाग स्पाट के ब्लाग पर अंग्रेजी फोंट की जगह कृतिदेव फोंट सैट कर दिये जिससे मेरे पाठ मुझे तो पढ़ाई आते थे पर दूसरों को समझ में नहीं आते थे। यही हाल वर्डप्रेस के ब्लागों का भी था। उसे अपने UTF-8 में कृतिदेव में लिखकर प्रकाशित कर देता था। वह भी मेरे पढ़ाई में आते थे पर बाकी लोग उनको देखकर नाराज हो गये। उन्होंने मुझसे संवाद कायम किया पर मेरे जवाब उनकी समझ से परे थे।
इसी उठापटक के चलते भारतीय टीम हार गयी। मैंने सोचा था कि ब्लाग तैयार कर लूं फिर जमकर दूसरे दौर के क्रिकेट मैच देखूंगा पर वाह री किस्मत! वह पहले ही ढेर हो गयी। तब पहला बड़ा पाठ ‘मेमनों ने किया शेरों का शिकार‘ यह लेख मैंने लिखा’। नारद ने अपने यहां एक विशेष स्तंभ बनाया था जो क्रिकेट के पाठ अपने यहां रख लेता था। मेरे पाठ वहां पर देखकर अन्य ब्लाग लेखक मित्र भड़क गये। होते होते मैंने ब्लाग स्पाट का हिंदी टूल समझ लिया और पहला पाठ पढ़ने योग्य वह भी क्रिकेट पर लिखा। उससे एक पाठक खुश हो गया पर उसने एक बड़े खिलाड़ी के लिये अभद्र शब्द लिख दिया। मैंने वह अभद्र शब्द हटाने की वजह से अपना पूरा पाठ ही हटा लिया।

उसके बाद ब्लाग लिखने की राह पर चलते गये तो लगा कि अच्छा ही हुआ अब जबरदस्ती क्रिकेट में मन नहीं लगाना पड़ेगा। इससे इतना दुःख हुआ कि टीम की हार के बाद प्रचार माध्यमों की हालत देखकर अच्छा लगा। उन्होंने क्रिकेट खिलाडि़यों के विज्ञापन ही हटा लिये। यह क्रम करीब आठ महीने चला पर जैसे ही बीस ओवरीय विश्व कप भारत ने जीता तो प्रचार माध्यमों को संजीवनी मिल गयी। भारत के तीन कथित महान खिलाडि़यों को फिर से येनकेन प्रकरेण टीम में लाया गया जो बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता में शामिल नहीं हुए। उस प्रतियोगिता में भारत के जीतनं पर यह आशंका हो गयी थी कि एक बार प्रचार माध्यम फिर क्रिकेट को भुनाना चाहेंगें। वही हुआ भी। एक बेकार सी कविता‘बीस का नोट पचास में नहीं चलेगा’ इसी उद्देश्य से लिखी गयी थी कि अब उन तीन खिलाडि़यों को फिर से अवसर मिलेगा जिनको टीम से हटाने की बात चल रही है। हैरानी की बात यह है कि आज जब उस कविता को देखता हूं तो मुझे स्वयं ही बेसिरपैर की लगती है पर वह फिर जबरदस्त हिट लेती है। फिर मैं सोचता हूं कि अगर वह बेसिरपैर की है तो भला इस क्रिकेट नाम के खेल का कौनसा सिर पैर है। यह न तो खेल लगता है न कोई व्यापार। हर कोई इसका अपने हिसाब से उपयोग कर रहा है। कभी कभी कुछ महान हस्तियां क्रिकेट के विकास की बात करती है पर क्या इस खेल को भला किसी विकास या प्रचार की आवश्यकता है?
आज हालत यह है कि जिस दिन मुझे पता लग जाता है कि क्रिकेट मैच है उस दिन कोई भी टीवी समाचार चैनल खोलने की इच्छा नहीं होती सिवाय दिल्ली दूरदर्शन के। वजह मैच वाले दिन टीवी चैनल एक घंटे मेें से कम से कम तीस मिनट तो मैच पर लगाते ही हैं-बाकी के लिये लाफ्टर शो और फिल्म के समाचार उनके पास तो वेेस ही होते हैं। टीम जीत जाती है तो अगले दिन अखबार के मुखपृष्ठ देखते ही नीचे वाली खबरों में ध्यान स्वतः चला जाता है क्योंकि पता है कि ऊपर जो खबर है वह मेरे पढ़ने लायक नहीं है। वहां किसी बड़े खिलाड़ी का गेंद फैंकते या बल्लेबाजी करते हुए बड़ा फोटो होता है। एक दिवसीय मैंचों की विश्व रैकिंग में भारत नंबर एक पर पहुंच गया है इस पर सभी अखबारों ने प्रसन्नता जाहिर की है। ठीक है 2006 में शर्मनाक हार को भुलाने के लिये उनको कोई तो बहाना चाहिये।
दरअसल अनेक लोगों का मन तब ही इस खेल से विरक्त होने लगा था जब टीम के सदस्यों पर फिक्सिंग वगैरह की आरोप टीम के पुराने सदस्यों ने ही लगाये थे। कुछ खिलाडि़यों पर प्रतिबंध भी लगा। सच क्या है कोई नहीं जानता। क्या क्रिकेट जनता के पैसों से चल रहा है या विज्ञापन उसका आधार है? कोई नहीं जानता। कुछ लोगों को यह खेल अब अपने ऊपर जबरन थोपना लगता है क्योंकि उनको समाचार चैनलों और समाचार पत्र पत्रिकाओं पर वह सब सामग्री देखनी पड़ती है जिसे वह देखना नहीं चाहते।
फिर भी वह देखते हैं। वह बिचारे करें भी क्या? सभी लोगों को समय काटने के लिये ब्लाग लिखना तो आता नहीं। हालांकि अनेक लोग यह सवाल तो करते ही हैं कि आखिर इस मंदी में भी यह क्रिकेट चल कैसे रहा है? लोगों के पास न तो चिंतन और मनन का समय है और न क्षमता कि इसके क्रिकेट के अर्थशास्त्र पर दृष्टिपात करें। इसलिये क्रिकेट है कि बस चल रहा है तो चल रहा है।
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2 comments:

परमजीत बाली said...

अच्छी पोस्ट लिखी है।

amy said...
This comment has been removed by a blog administrator.

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