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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Wednesday, April 22, 2009

परदे के पीछे और सामने-हिंदी व्यंग्य कविता

परदे के सामने जो उन्होंने दिखाया
अपनी समझ में नहीं आया
हमने कहा
‘हमें परदे के पीछे ले जाओ।
बाकी हम समझ लेंगे
तुम मत समझाओ’।

वह बोले
‘यहां परदे के सामने
आकर ही खेल देखने की
तुमको इजाजत मिली है
परदे के पीछे का खेल
देखना इतना आसान नहीं
वहां की बात तो हम भी
नहीं कर सकते
अपनी जुबान इस तरह सिली है
यहां चलते फिरते और बोलते
हमारे बुत एकदम प्रशिक्षित हैं
खेल चाहे जो भी हो यही सामने आयेंगे
कभी थोड़ी देर के लिये बुत सजायेंगे
फिर उसकी जगह दूसरा ले आयेंगे
यह रंगमंच सजाया है हमने
जिनकी मर्जी से
कितने भी बादशाह हों कहीं के तुम
नाराज हो गये वह तो
शतरंज की इस बिसात पर
देंगे वह मात अपने फर्जी से
परदे के पीछे धुप अंधेरे में बैठे हैं
दौलत और शौहरत बेचने वाले
अंधे सौदागर
तुम उनकी असलियत देख लोगे
तो डर जाओगे
इसलिये परदे के सामने
खेल देखकर सीधे अपने घर जाओ।

.........................
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4 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

उम्दा!!

परमजीत बाली said...

उम्दा!!

RAJ SINH said...

पर्दा है पर्दा......पर्दा --------का (?) :)

amy said...
This comment has been removed by a blog administrator.

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