लुट रहे हैं शहर, मगर हर आदमी खामोश है,
खुलेआम खंजर चलते, जैसे कि ज़माना बेहोश है।
सरेराह खज़ाना लुट गया, किसी ने देखा नहीं,
पहरेदारों के हिस्सा मिल जाने पर बहुत जोश है।
हर शहरी डरा हुआ है हादसों के खौफ से,
मगर कातिलों की नज़र न पड़े, इसलिये खामोश है।
दीपक बापू ढूंढ रहे जिंदा दिल को सड़कों पर,
दौड़ती भीड़ में हर कोई, अपने मतलब का सरफरोश है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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6 years ago
1 comment:
har pankti ekdum satik aur arthpurn hai.... shandar soch..... maza aa gaya padkar.... :)
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