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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Monday, April 25, 2016

दिल का इरादा-हिन्दी कविता(Dil ka Irada-Hindi Kavita)

कभी कभी प्रेम भरे
शब्द भी प्रयोग कर लेते हैं
भले दिल का इरादा न हो।

जिंदगी का खेल
व्यापार बन गया है
भले फायदा ज्यादा न हो।

कहें दीपकबापू दिल की बात
अब बाहर लाना ठीक नहीं
हल्दी लेकर चूहे बने वज़ीर
देते चालाकी की नज़ीर
शायद ही कोई शब्द हो
जिसमें झूठा वादा न हो।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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