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Wednesday, April 2, 2008

चिड़िया का घरौंदा-हिन्दी शायरी

तिनका-तिनका मूंह में दबाकर
मेरे कमरे में ला रही है
चिडिया अपना घरौंदा बनाने के लिये
कभी पंखे पर रखती है
कभी रोशनदान पर ही रख देती
पंखा चलाने पर
बिखर जाता है घरौंदा
फिर ले आती है तिनके
कहीं दूसरी जगह घरौंदा बनाने के लिये

कई बार चिडिया पंखे से
टकराकर कर गिर जाती है
जिनको बचा सकता हूं
बचाने की कोशिश करता हूं
उसका संघर्ष विचलित किये रहता है कि
कहीं मेरी गलती से
बिखर न जाये उसका घरौंदा
कई बार उसके घरौंदे
उठाकर दूसरी
सुरक्षित जगह पहुंचा देता हूं
पर वह तैयार नहीं होती इसके लिये
हमेशा चुनती है वही जगह
जो मेरी दृष्टि में उसके लिये असुरक्षित हैं
पर मैं नहीं समझा पाता उसे
वह तो चलती है
अपने पथ पर अपने इरादे लिये
............................................

2 comments:

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

one word, fabulous!

अल्पना वर्मा said...

पर वह तैयार नहीं होती इसके लिये
हमेशा चुनती है वही जगह
जो मेरी दृष्टि में उसके लिये असुरक्षित हैं
bahut gahare bhaaav liye hai kavita deepak ji badhayee!

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