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Sunday, January 1, 2012

नया वर्ष आया यानि कैलेंडर बदल गया-हिन्दी लेख (new year meens change of calengder naya varsha ya sal ka ana yani celader ka badlana-hindi lekh aur kavita or article or poem)

              1 जनवरी 2012 सुबह से ही बरसात की बूंदों की आवाज घंटी की तरह सुनाई दे रही थी। ऐसा भी लगा कि शायद ओले गिर रहे हों। ईसवी संवत् के नये वर्ष का नया दिन इस तरह ही शंखनाद करता हुआ बता रहा था कि वह आ गया है। 31 दिसम्बर 2011 रात्रि ग्यारह बजे हम सोये तो प्रातः निद्रा खुलते ही हमारा यह अनुभव था। बिस्तर से उठने का मन इसलिये नहीं हुआ कि सर्दी लग रही थी बल्कि हम न तो उस समय योग साधना कर सकते थे न ही उद्यान में जा सकते थे जो कि हमारे लिये प्रतिदिन शुरुआत की पहली प्रक्रिया है।
             घर की बिजली भी जा चुकी थी और इस तरह धुप अंधेरे में घड़ी में समय देखना भी मुश्किल था। अलबत्ता साढ़े चार बजे का टाईम लगाकर हम जिस ट्रांजिस्टर को रखते हैं वह बज रहा था। इसका मतलब यह था कि समय उससे आगे निकल चुका है। आखिर थोड़ी उहापोह के बाद हमनें बिस्तर का त्याग किया और कमरे में ही आसन लगाकर योग साधना प्रारंभ की। वहीं कुछ सूक्ष्म व्यायाम के साथ आसन किये जिसमें देह विस्तार रूप न ले। सूक्ष्म व्यायाम, जांधशिरासन तथा सर्वांगासन करने के पश्चात् पदमासन पर बैठकर प्राणायाम किया। प्राणायाम प्रारंभ करते हुए मनस्थिति बदलने लगी। प्रतिदिन आने वाली नवीनता ने धीरे धीरे अंदर पदार्पण किया। तब नव वर्ष जैसा आभास नहंी रहा। फिर ध्यान तथा नहान के बाद अन्य नियमित अध्यात्मिक प्रक्रिया संपन्न की। अब हमारा नवीन दिन आरंभ हो चुका था मगर वर्षा ने बता दिया कि अभी हमें घर से बाहर निकलने नहीं देगी।
         कुछ देर बरसात रुकी तो हम आश्रम चले गये। वहां से कई दूसरी जगह जाने का विचार मौसम की वजह से नहीं बन सका।
       अपने वाहन पर बैठकर हम बाहर निकले तो अपने ही वाहन पर जा रहे एक मित्र ने हाथ उठाकर अभिवादन में कहा-‘‘हैप्पी न्यू ईयर’।
        हमने औपचारिकता निभाई-‘‘आपको भी बधाई’।
वह बोले-‘‘आज तो जमकर बरसात हो रही है।’’
    हमने कहा-‘‘हां, दक्षिण में थाने नाम का तूफान आया है उसका परिणाम यहां दिखाई दे रहा है। मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया था कि इस तरह की बरसात होगी।’
       वह बोले-‘‘पर दक्षिण तो बहुत दूर है।’’
      हमने कहा‘‘हवाओं को कौन हवाई जहाज या रेल में सवार होना होता है। न ही वह किलोमीटर की माप जानती हैं जो डर जायें। वह तो चलती हैं तो चलती हैं। बादलों को भी कुछ नहंी दिखता। जहां मौका मिला पानी गिरा दिया। वैसे अपने इलाके में पानी की जरूरत है। एक तरह से कहें तो यह नये वर्ष के पहले ही दिन अमृत बरस रहा है।’’
       भले ही सर्दी बढ़ती है पर मावठ की बरसात हमारे उत्तर भारत में अमृत मानी जाी है। यही बरसात न केवल फसलों के लिये सहायक है बल्कि गर्मी तक के लिये भूजल स्तर को भी बनाये रखती है। इस दृष्टि से ईसवी संवत 2012 का नया दिन एक शुभ संदेश लेकर आया है। इतना जरूर है कि ऐसे में घर के बाहर मौज मस्ती करने में बाधा आती है। फिर हमारे देश की सड़कें इस तरह की हैं कि सामान्य स्थिति में भी वहां रात्रि को चलना खतरनाक होता है ऐसे में बरसात का पानी वहां संकट बन जाता है तब दुर्घटनाओं का भय अधिक दिखता है। फिलहाल भारत के दक्षिण के साथ ही जापान में यही दिन खतरनाक परिणामों वाला रहा है। जिस थाने ने उत्तर भारत में अमृतमयी बरसात की है वही दक्षिण में भयंकर उत्पात मचाता रहा है। जापान में भूकंप के तेज झटके अनुभव किये गये हैं। वैसे उत्तर भारत में भी सभी के लिये आरामदायक स्थिति केवल स्वस्थ लोगों के लिये हो सकती है अगर वह संयम के साथ रहें तो, मगर अनेक प्रकार रोगियों के लिये यह ठंड अत्यंत दर्दनाक हो जाती है। कुल मिलाकर हम नया वर्ष या नया दिन पर खुशियां जो मनाते हैं वह केवल मन को बहलाने के लिये है जीवन और प्रकृत्ति का जो रिश्ता है उसका इससे कोई संबंध नहीं है। इस अवसर पर प्रस्तुत है कल लिखी गयी एक कविता-
दिन बीतता है
देखते देखते सप्ताह भी
चला जाता है
महीने निकलते हुए
वर्ष भी बीत जाता है,
नया दिन
नया सप्ताह
नया माह
और नया वर्ष
क्या ताजगी दे सकते हैं
बिना हृदय की अनुभूतियों के
शायद नहीं!
रौशनी में देखने ख्वाब का शौक
सुंदर जिस्म छूने की चाहत
शराब में जीभ को नहलाते हुए
सुख पाने की कोशिश
खोखला बना देती है इंसानी दिमाग को
मौज में थककर चूर होते लोग
क्या सच में दिल बहला पाते हैं
शायद नहीं!
-------------
             वर्ष का बदलना तो कैलेंडर बदलने से ही हो जाता है। हमने कैलेंडर नया खरीदा आज सुबह लगा दिया ताकि अवसर पड़ने पर तारीखें देख सकें। शादी विवाह के निमंत्रण मिलने पर वहां जाने के कार्यक्रम बनाने या किसी त्यौहार पर उसे बाहर मनायें या घर में ही, यह फैसला करने में कैलेंडर बड़ा सहायक होता है। उसमें दूध का हिसाब लिखने का भी काम किया जा सकता है। मन चाहे तो अपना भविष्य फल भी देखा जा सकता है। पुराने साल का जो समय था वह निकल गया। अब नया इसलिये लाये कि शायद उसमें हमारे लिये नया मामला बन जाये। हां मन को बहलाने के लिये यह ख्याल बुरा नहीं है। यह मन ही तो है जो मनुष्य को चलाता है। मनुष्य की बुद्धि को यह भ्रम होता है कि वह उसे चला रही है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Monday, December 19, 2011

बिना पांव का झूठ उड़ता चलेगा-हिन्दी कविता (bina paanv ke jhooth udta chalega-hindi kavita or poem or shayari)

जोर से चिल्लाओं
बेबस, गरीब और मरीजों की सेवा करेंगे,
कुछ कायदे कागज पर छपवाओ
सारे जहान के घर में मेवा भरेंगे।
कहें दीपक बापू
झूठ बिना पांव के
इसलिये उड़ता चलेगा,
तुम ही नहीं
तुम्हारा भाविष्य का खानदान भी
इतिहास के सहारे पलेगा,
अगर चले सत्य की राह
कुब्बत होगी तो
चढ़ जाओगे आसमान पर
वरना गैर ही क्या
अपने ही तुम पर हंसेंगे।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, December 12, 2011

दीपक बापू कहिन ने पार की तीन लाख पाठक संख्या-हिन्दी संपादकीय

            दीपक भारतदीप समूह के दीपक बापू कहिन ब्लॉग/पत्रिका ने तीन लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर ली है। यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है पर जब देश में भाषा का तोतलीकरण-अंग्रेजी शब्दों की मिलावट-हो रहा हो और आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत नयी पीढ़ी सहज हिन्दी को बोध से विरक्त हो रही हो तब हम जैसे फोकटिया लेखकों के लिये इतना ही बहुत है कि उनके ब्लॉग अपनी विषय सामग्री के दम पर कुछ पाठक जुटा लेते हैं। यह सही है कि हिन्दी जगत में इस लेखक का नाम कोई चर्चित हस्ताक्षर नहीं है पर इससे लिखने समय जो बेपरवाही होती है वह ऐसी रचनाओं के सृजन में सहायक होती है जिसको चुराकर लोग छापना चाहते हैं।
             जिस तरह देश को आधुनिक बनाने के नाम पर अंग्रेजी पद्धति थोपी गयी उससे बेरोजगारों की फौज बनती जा रही है। उसी तरह अब हिन्दी भाषा में अंग्रेजी शब्द जोड़कर उसका तोतलीकरण हो रहा है। हमारे देश के मध्यम वर्ग के लोगों में विकास के नाम पर केवल अधिक से अधिक धन संपदा सृजन करते रहने का स्थाई भाव है। अधिक से अधिक सुविधा जुटाने की ललक पूरे समाज में है। सबसे बड़ी बात यह है कि बहुत कुछ कमाकर आराम से जिंदगी गुजारने का लक्ष्य है। इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है। मुश्किल यह है कि एक तो लोग आराम करना नहीं जानते दूसरी बात यह कि हमारी जो पंचतत्वों से बनी यह देह है उसमें मन, बुद्धि और अहंकार जैसी तीन प्रकृतियां हैं वह ऐसा नाच नचाती हैं कि विरले ज्ञानी ही उसके दुष्प्रभाव से बच पाते हैं। अगर किसी आदमी को ंसंगमरमर से बनी इमारत में बहुत दिन से रहना पड़े तो उसका मन गांव घूमने का करता है। जो गांव में है वह महल चाहता है। इस अंतर्द्वंद्व में फंसा आदमी इधर से उधर भटकता है। बदलते परिवेश में छोटा निजी व्यवसाय या नौकरी करना छोटे होने का प्रमाण बन गया है। इसलिये हमारा सभ्य समाज अपने लड़के लड़कियों के लिये विदेशों में नौकरी ढूंढ रहा है। पहले अंग्र्रेजी जरूरी जा रही थी तो अब उसे हिंन्दी में मिलाकर हिंगलिश बनाया जा रहा है। सभी को विदेश जगह नहीं मिलेगी और जो देश में बच गये वह यहां किस तरह गांव या मध्यवर्गीय शहर में काम करेंगे क्योंकि उनकी भाषा तो तोतली हो गयी होगी।
          लोगों की अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बड़े सपने होते हैं जो अपने शहर में पूरे नहीं होते। इसलिये वह उनको बाहर भेजकर स्वयं अकेले रहना मंजूर कर लेते हैं। यह एकाकीपन अंततः उनके लिये असहनीय होता है। दूर रहते बच्चों पर आक्षेप आता है कि वह माता पिता को देखने नहीं आते। जब संस्कृति और संस्कार की बात हो तो प्राचीन बातें करते हुए सब खुश होते हैं, पर जब स्तर की बात हो तो अपने बच्चों को विदेश या परे दूसरे शहर में रहने के लिये स्वयं तैयार करने वाले दंपत्तियों का यह अंतद्वंद्व समाज में देखा जा सकता है। लब्बोलुआब यह कि खेल रही है माया और आदमी सोच रहा है कि मैं खेल रहा हूं।
       हम जब प्राचीन संस्कारों की बात करते हैं तो यह बात भी देखना चाहिए कि तब व्यवसाय और रहन सहन सहज था। अपने लोग अपनों के पास होते थे। अब विकास के नाम पर हमने जो मार्ग अपनाया है उसमें कथित रूप से संस्कारों की बात तो करना ही नहीं चाहिए। फिर भी लोग कर रहे हैं। ऐसे में व्यंग्य के लिये विषयों की कमी नहीं होती। लोग अपने सिर का बोझ दूसरे पर डालना चाहते हैं पर स्वयं किसी का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। एक समृद्ध, संस्कारवान तथा प्रतिष्ठत परिवार का मुखिया होने का मोह आदमी को अंततः ऐसे संकट में डालता है जहां से उबरना सभी के बूते की बात नहीं होती।
        ऐसे में हम जैसे लोग उन गुरुओं का स्मरण करते हुए प्रसन्न होते हैं जिन्होंने तत्वज्ञान दिया है। इस नश्वर देह को लेकर जिस तरह लोग नाटकबाजी करते हुए उसे बर्बाद करते हैं उसे देखकर ज्ञानी लोग दुःखी होते हैं पर मुश्किल यह है कि अपने भौतिक शक्ति केंद्रों पर मजबूती से जमे आदमियों को यह बात समझाना मुश्किल ही नहीं खतरनाक भी होता है। आज ही रहीम के दोहे पर लेख लिखा था। उसका आशय यह था कि सच है तो संसार साथ नहीं है और झूठ है तो राम नहीं मिलते। ऐसे में यहां कुछ पैसा नही भी मिलने पर इस बात की प्रसन्नता होती है कि कबीर, रहीम, तुलसी, चाणक्य, विदुर तथा अन्य विद्वानों के संदेश और उन पर व्याख्यान लिखते हुए जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है वह अनमोल है। लोग लाखों कमाते हैं पर ज्ञान तो विरलों को ही मिल पाता है। सच बात तो यह है कि ब्लॉग हमारे गुरु हो रहे हैं।
दीपक बापू ब्लॉग के तीन लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार करने पर पाठकों, मित्र ब्लॉग लेखकों तथा अंतर्जाल पर सक्रिय अज्ञात हिन्दी विशेषज्ञों का आभार। हिन्दी विशेषज्ञों को इसलिये आभार जता रहे हैं कि क्योंकि उनकी वजह से ही अनेक टूल लिखने के लिये मिले हैं।
संपादक और लेखक
दीपक भारतदीप
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, December 3, 2011

पूरा फोटो दिखाओ, हास्य कविता लिखाओ-हिन्दी हास्य कविता (pura foto dikhao, hasya kavita likhao-hindi comedy poem)

फंदेबाज हांफता हुआ आया और बोला
’’दीपक बापू सभी टीवी चैनलों ने
पाकिस्तान से भारत में आयातित
फिल्म अभिनेत्री का नग्न फोटो दिखाया,
मगर बहुत सारा हिस्सा काले रंग में छिपाया,
आप लिखो इस पर कोई कविता,
शायद आपके ऊपर लगा फ्लाप का ठप्पा मिट जाये,
बहने लगे सफलता की सरिता,
देखो
उसकी हरकातें से अपने देश में
पूरा ज़माना बिगड़ जायेगा,
चारों तरफ नग्न फोटो का जाल छायेगा,
अपनी संस्कृति इस तरह मिट जायेगी,
संस्कारों की जगह संकीर्णता आयेगी,
आज जैसे ज्ञानियों और ध्यानियों पर
अब देश का भविष्य टिका है
कुछ करो
वरना देश की अस्मिता खतरे में पड़ जायेगी।’’

दीपक बापू ने घूरकर फंदेबाज को देखा
फिर मुंह में रखी लोंग चबाते हुए कहा
‘‘कमबख्त,
पहली बात यह है कि हमें ज्ञानी और ध्यानी कहना
एक तरह से मजाक लग रहा है,
या फिर तू तस्वीर देखकर वाकई
हादसे का शिकार हो गया है
इसलिये तेरा तीसरा नेत्र जग रहा है,
वरना क्या हमारी कविताऐं पढ़कर
तू अभी तक समझा नहीं इस बाज़ार का खेल,
खींचना है जिसे आम आदमी की जेब से पैसा
भले ही निकल जाये उसका तेल,
हम किस आधार पर
इस फिक्स निर्वस्त्र धारावाहिक पर
अपनी हास्य कविता लिखें,
बिना पूरी तस्वीर देखे टिप्पणी कर
किस तरह जिम्मेदार शहरी दिखें,
हमने देखा टीवी चैनलों पर
पूरी तस्वीर नहीं दिखा रहे हैं
किसी तरह नैतिकता का पाठ
आज के जवानों को सिखा रहे हैं,
लगता है तेरे को गुस्सा इस बात पर नहीं कि
उसने नग्न फोटो क्यों प्रकाशित कराया,
बल्कि तुझे अफसोस है इस बात का
फोटो खिंचते समय वहां तू नहीं था
इस अफसोस ने तुझे सताया,
बिगड़ा है इस बात पर कि
पूरा फोटो किसी चैनल ने क्यों नहीं दिखाया,
तेरी आंखें तरस गयी
पाकिस्तानी अभिनेत्री का जिस्म देखने के लिये
जिसने अपने देश को नंगपन सिखाया,
मगर गुरु हम भी कम नहीं है,
बाज़ार हमसे लिखवा ले
आधे अधूरे प्रमाण पर
उसमें यह दम नहीं है,
पहले पूरा फोटो लाकर दिखाओ,
हमसे एक फड़कती हास्य कविता लिखाओ,
एक नंगे फोटो से संस्कृति और संस्कारों पर खतरा
दिखाकर हमें न डराओ,
हमारे दर्शन में बहुत ताकत है
यह सभी जानते हैं,
मगर दौलत और शौहरतमंद इंसान
अपनी हवस के लिये
धर्म, संस्कृति और नैतिकता की सीमाऐं
लांघ जाते हैं
यह भी मानते हैं,
अपनी हवस मिटाने के लिये
दुश्मन देश से दोस्ती करते हैं,
फिर बिगड़ जाये तो
यहां आकर देशभक्ति का दम भरते हैं,
क्रिकेट, फिल्म और टीवी के धारावाहिकों में
फिक्सिंग होती है यह सभी को पता है,
फंसते जो लोग उनकी अपनी खता है,
इसलिये आधे अधूरे फोटो पर
हम कुछ नही लिख सकते,
शालीनता और अश्लीलता के बीच
पाखंड बहुत चल रहा है
हम अपने को उसमें फंसते नहीं दिख सकते।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, November 27, 2011

महंगाई, भ्रष्टाचार और दान की दर-हिन्दी हास्य कविता (megngai,bhratshtachar or corruption and donation or dan-hindi hasya kavita or comedy poem)

गुरुजी ने छेड़ा जैसे ही
महंगाई और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान
चेले का दिल घबड़ाया,
वह दौड़ा आश्रम में आया,
और बोला
‘‘महाराज,
आप यह क्या करते हो,
जिनकी हमारे आश्रम पर पर कृपा है
ऐसे ढेर सारे समाज सेवक
बड़े पदों पर शोभायमान पाये जाते हैं,
कहीं सौदे में लेते कमीशन
कहीं कमीशन देकर सौदे कर आते हैं,
आपके दानदाता कई सेठों ने चीजों में कर दी महंगाई,
क्योंकि उनकी कृपा जबरदस्त पाई,
भ्रष्टाचार और महंगाई से
आम आदमी भले परेशान है,
पर इससे आपके दानदाताओं की बड़ी शान है,
इस तरह अभियान छेड़ने पर
वह नाराज हो जायेंगे,
बिफरे तो हमारे यहां भी
आप अपना खजाना खाली पायेंगे,
इस तरह तो आपके आश्रम में
सन्नाटा छा जायेगा,
सेठ और समाज सेवकों के घर
दान मांगने वाला आपका हर चेला
जोरदार चांटा खायेगा।’’

सुनकर गुरु जी बोले
‘‘कमबख्त, मुझे सिखाता है राजनीति
होकर मेरा चेला,
नहीं है तुझे उसका ज्ञान एक भी धेला,
महंगाई और भ्रष्टाचार
देश में बढ़ता जा रहा है,
आम आदमी हो रहा है विपन्न
अमीर के धन का रेखाचित्र चढ़ता जा रहा है,
मगर अपने दान की रकम
बीस बरस से वही है,
यह बिल्कुल
नहीं सही है,
जाकर दानदाताओं से बोल दे,
महंगाई और भ्रष्टाचार की तराजु में
अपने दान की रकम तोल दे,
हमारी रकम बढ़ा दें,
हम अपने अभियान पर
अभी नहीं की सांकल चढ़ा लें,
अगर नहीं मानते तो
यह अभियान सारे देश में छा जायेगा,
अपने पुराने दानदाता रूठें परवाह नहीं
कोई नया देने वाला आयेगा,
वैसे तुम मत परवाह करो
बस, उनके सामने जाकर अपनी चाह धरो,
मुझे मालुम है
तुम इसलिये घबड़ाये हुए हो,
क्योंकि दान की बड़ी रकम
उनसे लेकर दबाये हुए हो,
मगर मुझे चिंता नहीं
अपने दान की रकम जरूर वह बड़ा देंगे,
पंगे के डर से दान बढ़ा देंगे,
इस तरह हमारा खजाना भी
महंगाई और भ्रष्टाचार की बढ़ती
ऊंची दर तक
अपने आप पहुंच जायेंगा।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, November 18, 2011

समाज में चेतना-हिन्दी कवितायें (samaj mein chetana-hindi kavitaen)

नारे लेकर वह समाज में
चेतना लायेंगे,
मसलों का हल होना नहीं है
खोखले वादों का प्रमाणपत्र लेकर
जीत का जश्न मनायेंगे।
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देश में जिसे देखो
समाज में चेतना ला रहा है,
हर कोई अपने नुस्खों का महत्व
शोर के साथ सुना रहा है,
कहें दीपक बापू
बरसों से कोई मसला नहीं हुआ हल,
इतिहास में दर्ज होते नये महापुरुषों के नाम
देखकर दिमाग जाता है आग से जल,
समाज का कल्याण व्यापार बन गया है
हर सौदागर
प्रचार के लिये विज्ञापनों का जाल बुना रहा है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, November 11, 2011

बिग बॉस के घर में स्वामी-हिन्दी हास्य व्यंग्य (a swami in house of big boss-hindi satire article)

           दीपक बापू हाथ में पुराना थैला लेकर सब्जी खरीदने मंडी जा रहे थे। उनके मोहल्ले और मंडी के मार्ग के बीच में एक बहुत बड़ी कॉलोनी पड़ती थी। दीपक बापू जब भी मंडी जाते तो उसी कालोनी से होकर जाते थे। वहां बीच में पड़ने वाले शानदार मकानों, बहुमंजिला इमारतों और किसी नायिका के चेहरे की तरह चिकनी सड़कों पर अपनी साइकिल चलाते हुए वह आहें भरते थे कि ‘काश! हमारा मोहल्ला भी इस तरह का होता’।
         कुछ दिन पहले वह इसी कालोनी में जब गुजरे तब उनकी मुलाकात आलोचक महाराज से हुई तो दीपक बापू ने अपने मन की यही बात उनसे कही थी तो उन्होंने झिड़कते हुए कहा कि-‘‘रहे तुम ढेड़ के ढेड़! यह क्यों नहंी सोचते कि तुम्हारा घर ऐसी कालोनी में होता। वैसे ऐसा घर तुम्हारा भी यहां होता अगर इस तरह की बेहूदी कवितायें लिखकर बदनाम नहीं हुए होते। चाहे जिसे अपना हास्य का शिकार बनाते हो। कोई तुम्हें प्रायोजित नहीं कर सकता। बिना प्रायोजन के कवि या लेखक तो रचनाओं का बोझ ढोले वाला एक गधे की तरह होता है जो कभी अपने तो कभी जमाने का दर्द ढो्रता है।’’
            उस कालोनी में अक्सर आलोचक महाराज का आना होता था और दीपक बापू उनसे मुलाकात की आशंका से भी भयग्रस्त रहते थे। अगर उनको कहंी दूर से आलोचक महाराज दिखते तो वह साइकिल से अपना रास्ता बदल लेते या पीछे मुड़कर वापस चले जाते। आज उन्होंने देखा कि कालोनी में दूर तक सड़क पर कोई नहंी दिखाई दे रहा था-न आदमी न कुत्ता। यह दीपक बापू के लिये साइकिल चलाने की आदर्श स्थिति थी। ऐसे में चिंत्तन और साइकिल एक साथ चलना आसान रहता है। इसलिये आराम से साइकिल पर बैठे उनके पांव यंत्रवत चल रहे थे।
वह एक मकान से गुजरे तो एक जोरदार आवाज उनके कानों में पड़ी-‘ओए दीपक बापू! हमसे नजरें मिलाये बगैर कहां चले जा रहे हो।’’
          दीपक बापू के हाथ पांव फूल गये। वह आवाज आलोचक महाराज की ही थी। उन्होंने झैंपकर अपनी बायें तरफ देखा तो पाया कि चमकदार कुर्ता और धवन चूड़ीदार पायजामा पहने, माथे पर तिलक लगाये और गले में सोने की माला पहने आलोचक महाराज खडे थे। खिसियाते हुए वह आलोचक महाराज के पास गये और बोले-‘‘महाराज आप कैसी बात करते हैं, आपकी उपेक्षा कर हम यहां से कैसे निकल सकते हैं? कभी कभार हल्की फुल्की रचनायें अखबारों में छप जाती हैं यह सब आपकी इस कृपा का परिणाम है कि आपकी वक्रदृष्टि हम पर नहीं है। वैसे यहां आप ‘बिग बॉस निवास’ के बाहर खड़े क्या कर रहे हैं? जहां तक हमारी जानकारी है इस घर में आप जैसे रचनाकारों का घुसना वर्जित है। यहां की हर घटना का सीधा प्रसारण टीवी चैनलों पर दिखता है। आप जैसे उच्च व्यक्त्त्वि इसके अंदर प्रविष्ट होना तो दूर बाहर इस तरह खड़ा रहे यह भी उसके स्तर के अनुकूल नहीं दिखता।’’
           आलोचक महाराज बोलें-‘अच्छा, हमें समझा रहे हो! तुम्हारे जैसे स्तर का महान हास्य कवि यहां से निकल रहा है इस पर भी कोई सवाल कर सकता है। बिग बॉस में ढेर सारी सुंदरियां आती है, कहीं उनको देखने के प्रयास का आरोप तुम पर भी लग सकता है।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज, हमें तो कोई जानता भी नहीं है। आप तो प्रसिद्ध आदमी है। बहरहाल हमें आज्ञा दीजिये। बिना आज्ञा यहां पोर्च तक आ गये यही सोचकर डर लग रहा है। निवास रक्षक ने अगर आपत्ति कहीं हमें पकड़ लिया तो आप हमें यहां बुलाने की बात से भी इंकार कर पहचानने ने मना कर देंगे।’’
आलोचक महाराज बोले-‘‘आज हम यहां स्वामी आगवेशधारी का इंतजार कर रहे हैं। उनको हमने बिग निवास में प्रवेश दिलवाया है। उनको समझाना है कि क्या बोलना है, कैसे चलना है? तुम जानते हो कि हम तो अब कंपनियों के पटकथाकार हो गये हैं।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘स्वामी आगवेशधारी का यहां क्या काम है? वह तो गेरुऐ वस्त्र पहनते है और उनका अभिनय से क्या वास्ता है?’’
           आलोचक महाराज बोले-‘तुम इसलिये फ्लाप रहे क्योंकि तुम बाज़ार और प्रचार का रिश्ता समझे नहीं । अरे, दीपक बापू आजकल वही कंपनियां साहित्य, कला, राजनीति, धर्म और फिल्म में अपना पैसा लगा रही हैं जो हमें सामान बनाकर बेचती हैं। टीवी चैनल और अखबार भी उनकी छत्रछाया में चलते है। वही समाज में सक्रिय अभिनेताओं, स्वामियों, लेखकों, चित्रकारों और समाज सेवकों को प्रायोजित करती है। किसको कब कहां फिट कर दें पता नहीं। फिल्म और टीवी की पटकथा तक कंपनियां लिखवाती हैं। आदमी इधर न खप सका तो उधर खपा दिया। स्वामी धर्म और समाज सेवा के धंधे में न चला तो अभिनेता बना दिया। हमे क्या? हम तो ठहरे रचनाकार! जैसा कहा वैसा बना दिया।’’
           दीपक बापू अवाक खड़े होकर सुनते रहे फिर बोले-‘‘महाराज अब हमारे समझ में आया कि हम फ्लाप क्यों हैं? इतना बड़ा राज हमने पहली बार सुना। यह आगवेशधारी स्वामी तो कभी गरीब बंदूकचियों की दलाली करता था। फिर यह इधर हमारे तीर्थयात्रियों पर कुछ अनाप शनाप बोला। बाद में समाज सुधार आंदोलन में चला आया। वहां उसने अपने ही लोगों को पिटवाने का इंतजाम करने का प्रयास किया। बाहर किया गया। फिर कहीं श्रीश्री के यहां मौन व्रत पर चला गया। अब फिर इधर बिग बॉस के घर आ रहा है। अपने समझ में अभी तक नहीं आया। यह बाज़ार और प्रचार का मिलाजुला खेल है।’’
           आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा! तुम्हारी बुद्धि मोटी हैं। तुम्हें इतना पहले भी कई बार समझाया कि हमारे यहां बंदूकची हों या चिमटाधारी समाज सेवा में लगें या विध्वंस मे,ं आदमी का प्रायोजन तो कंपनियां ही करती हैं, पर तुम अपनी हास्य कविताओं तक ही सीमित रहे।’’
इतने में दीपक बापू ने देखा कि एक गेरुए वस्त्रधारी पगड़ी पहने एक स्वामी कार से उतर रहे हैं। आलोचक महाराज दनदनाते हुए वहां पहुंच गये और बोले-‘‘आईये महाराज, आईये महाराज! बिग बॉस के घर में आपका स्वागत है।’’
          स्वामी ने कहा-‘‘तुम बिग बॉस हो। लगता तो नहीं है! बिग बॉस तो जींस पहने, काला चश्मा लगाये और सिर पर टोपी धारण करने वाला कोई  जवान आदमी होना चाहिए। तुम तो जैसे कुर्ता पायजामा पहनने के साथ माथे पर तिलक लगाये और सोने की माला पहने कोई नेता लग रहे हो।’
        आलोचक महाराज बोले-‘हुजूर बिग बॉस वास्तव में कौन है पता नहीं! अलबत्ता चाहे इस घर में विज्ञापन मैनेजर जिस अभिनेता को चाहते हैं वही बनकर हमारे सामने आता है। अब बताईये इस कंपनी राज में बिग बॉस भला कभी दिखता है? यहां तक कंपनियों के बॉस भी अपने को दूसरे नामों से पुकारे जाते हैं। हां, आपकी भूमिका मुझसे ही लिखवाई गयी थी। एक कंपनी ने कहा कि हमारा प्रायोजक आदमी इस समय फालतु घूम रहा है उसे काम दो। वह समाज सुधार में फ्लाप हुआ तो गरीबों के उद्धार में उसके सामने पैंच आ जाते हैं ? आपका चेहरा जनता के सामने से गायब न हो जाये इसलिये किसी टीवी धारावाहिक में उपयोग करें। इसलिये हमने तय किया कि आपको बिग बॉस से अच्छी जगह नहीं मिल सकती।’
          स्वामी ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस समय मेरा समय ठीक नहीं चल रहा है। बिग बॉस के घर से अपनी छवि सजाकर फिर समाज सेवा करने जाऊंगा। वैसे मुझे तुम्हारे लिखे डायलाग की जरूरत नहीं है। मेरे पास अपना अध्यात्मिक ज्ञान बहुत हैं।’’
          आलोचक महाराज बोले-‘महाराज, वह ठीक है। डायलाग लिखना मेरा काम है। आप अपने चाहे मेरे लिखे बोलें या अपने सुनायें पर नाम मेरा ही होगा।’’
           स्वामी ने दीपक बापू की तरफ देखते हुए पूछा-‘‘यह बूढ़ा आदमी यहां क्या कर रहा है?’’
आलोचक महाराज ने कहा-‘यह एक फ्लाप हास्य कवि है। काम मांगने आया था। मैंने कहा कि हमें तो हमारे महाराज मिल गये अब तुम निकल लो।’’
           स्वामी ने कहा-‘‘अच्छा किया! मुझे हास्य कवियों से नफरत हैं। वैसे यह फटीचर धोती, कुर्ता और टोपी पहने हुए है। इससे बिग बॉस के घर क्या बरामदे तक नहीं आने देना चाहिए। कुछ हास्य कवियों ने मेरा मजाक बनाया है इसलिये उनसे चिढ़ हो गयी है।’
        आलोचक महाराज ने वहां से दूर ले जाकर दीपक बापू से कहां-‘‘निकल लो गुरु तुम यहां से! तुमने इस पर एक हास्य कविता लिखी थी। हमने इंटरनेट पर पढ़ी है। अगर कहीं तुम्हारा नाम इसे पता चला तो हो सकता है एकाध चमाट मार दे।’’
        दीपक बापू बाहर निकलते हुए बोले-सच कहते हो आलोचक महाराज। यह बिग बॉस का निवास और इधर यह स्वामी! फिर आपकी मौजूदगी! हमारे लिये यहां हास्य कविता लायक लिखने का विषय हो नहीं सकता। गंभीर चिंत्तन और दर्दनाक रचनायें हमसे होती नहीं हैं। सो हम तो चले।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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