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Sunday, November 27, 2011

महंगाई, भ्रष्टाचार और दान की दर-हिन्दी हास्य कविता (megngai,bhratshtachar or corruption and donation or dan-hindi hasya kavita or comedy poem)

गुरुजी ने छेड़ा जैसे ही
महंगाई और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान
चेले का दिल घबड़ाया,
वह दौड़ा आश्रम में आया,
और बोला
‘‘महाराज,
आप यह क्या करते हो,
जिनकी हमारे आश्रम पर पर कृपा है
ऐसे ढेर सारे समाज सेवक
बड़े पदों पर शोभायमान पाये जाते हैं,
कहीं सौदे में लेते कमीशन
कहीं कमीशन देकर सौदे कर आते हैं,
आपके दानदाता कई सेठों ने चीजों में कर दी महंगाई,
क्योंकि उनकी कृपा जबरदस्त पाई,
भ्रष्टाचार और महंगाई से
आम आदमी भले परेशान है,
पर इससे आपके दानदाताओं की बड़ी शान है,
इस तरह अभियान छेड़ने पर
वह नाराज हो जायेंगे,
बिफरे तो हमारे यहां भी
आप अपना खजाना खाली पायेंगे,
इस तरह तो आपके आश्रम में
सन्नाटा छा जायेगा,
सेठ और समाज सेवकों के घर
दान मांगने वाला आपका हर चेला
जोरदार चांटा खायेगा।’’

सुनकर गुरु जी बोले
‘‘कमबख्त, मुझे सिखाता है राजनीति
होकर मेरा चेला,
नहीं है तुझे उसका ज्ञान एक भी धेला,
महंगाई और भ्रष्टाचार
देश में बढ़ता जा रहा है,
आम आदमी हो रहा है विपन्न
अमीर के धन का रेखाचित्र चढ़ता जा रहा है,
मगर अपने दान की रकम
बीस बरस से वही है,
यह बिल्कुल
नहीं सही है,
जाकर दानदाताओं से बोल दे,
महंगाई और भ्रष्टाचार की तराजु में
अपने दान की रकम तोल दे,
हमारी रकम बढ़ा दें,
हम अपने अभियान पर
अभी नहीं की सांकल चढ़ा लें,
अगर नहीं मानते तो
यह अभियान सारे देश में छा जायेगा,
अपने पुराने दानदाता रूठें परवाह नहीं
कोई नया देने वाला आयेगा,
वैसे तुम मत परवाह करो
बस, उनके सामने जाकर अपनी चाह धरो,
मुझे मालुम है
तुम इसलिये घबड़ाये हुए हो,
क्योंकि दान की बड़ी रकम
उनसे लेकर दबाये हुए हो,
मगर मुझे चिंता नहीं
अपने दान की रकम जरूर वह बड़ा देंगे,
पंगे के डर से दान बढ़ा देंगे,
इस तरह हमारा खजाना भी
महंगाई और भ्रष्टाचार की बढ़ती
ऊंची दर तक
अपने आप पहुंच जायेंगा।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, November 18, 2011

समाज में चेतना-हिन्दी कवितायें (samaj mein chetana-hindi kavitaen)

नारे लेकर वह समाज में
चेतना लायेंगे,
मसलों का हल होना नहीं है
खोखले वादों का प्रमाणपत्र लेकर
जीत का जश्न मनायेंगे।
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देश में जिसे देखो
समाज में चेतना ला रहा है,
हर कोई अपने नुस्खों का महत्व
शोर के साथ सुना रहा है,
कहें दीपक बापू
बरसों से कोई मसला नहीं हुआ हल,
इतिहास में दर्ज होते नये महापुरुषों के नाम
देखकर दिमाग जाता है आग से जल,
समाज का कल्याण व्यापार बन गया है
हर सौदागर
प्रचार के लिये विज्ञापनों का जाल बुना रहा है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, November 11, 2011

बिग बॉस के घर में स्वामी-हिन्दी हास्य व्यंग्य (a swami in house of big boss-hindi satire article)

           दीपक बापू हाथ में पुराना थैला लेकर सब्जी खरीदने मंडी जा रहे थे। उनके मोहल्ले और मंडी के मार्ग के बीच में एक बहुत बड़ी कॉलोनी पड़ती थी। दीपक बापू जब भी मंडी जाते तो उसी कालोनी से होकर जाते थे। वहां बीच में पड़ने वाले शानदार मकानों, बहुमंजिला इमारतों और किसी नायिका के चेहरे की तरह चिकनी सड़कों पर अपनी साइकिल चलाते हुए वह आहें भरते थे कि ‘काश! हमारा मोहल्ला भी इस तरह का होता’।
         कुछ दिन पहले वह इसी कालोनी में जब गुजरे तब उनकी मुलाकात आलोचक महाराज से हुई तो दीपक बापू ने अपने मन की यही बात उनसे कही थी तो उन्होंने झिड़कते हुए कहा कि-‘‘रहे तुम ढेड़ के ढेड़! यह क्यों नहंी सोचते कि तुम्हारा घर ऐसी कालोनी में होता। वैसे ऐसा घर तुम्हारा भी यहां होता अगर इस तरह की बेहूदी कवितायें लिखकर बदनाम नहीं हुए होते। चाहे जिसे अपना हास्य का शिकार बनाते हो। कोई तुम्हें प्रायोजित नहीं कर सकता। बिना प्रायोजन के कवि या लेखक तो रचनाओं का बोझ ढोले वाला एक गधे की तरह होता है जो कभी अपने तो कभी जमाने का दर्द ढो्रता है।’’
            उस कालोनी में अक्सर आलोचक महाराज का आना होता था और दीपक बापू उनसे मुलाकात की आशंका से भी भयग्रस्त रहते थे। अगर उनको कहंी दूर से आलोचक महाराज दिखते तो वह साइकिल से अपना रास्ता बदल लेते या पीछे मुड़कर वापस चले जाते। आज उन्होंने देखा कि कालोनी में दूर तक सड़क पर कोई नहंी दिखाई दे रहा था-न आदमी न कुत्ता। यह दीपक बापू के लिये साइकिल चलाने की आदर्श स्थिति थी। ऐसे में चिंत्तन और साइकिल एक साथ चलना आसान रहता है। इसलिये आराम से साइकिल पर बैठे उनके पांव यंत्रवत चल रहे थे।
वह एक मकान से गुजरे तो एक जोरदार आवाज उनके कानों में पड़ी-‘ओए दीपक बापू! हमसे नजरें मिलाये बगैर कहां चले जा रहे हो।’’
          दीपक बापू के हाथ पांव फूल गये। वह आवाज आलोचक महाराज की ही थी। उन्होंने झैंपकर अपनी बायें तरफ देखा तो पाया कि चमकदार कुर्ता और धवन चूड़ीदार पायजामा पहने, माथे पर तिलक लगाये और गले में सोने की माला पहने आलोचक महाराज खडे थे। खिसियाते हुए वह आलोचक महाराज के पास गये और बोले-‘‘महाराज आप कैसी बात करते हैं, आपकी उपेक्षा कर हम यहां से कैसे निकल सकते हैं? कभी कभार हल्की फुल्की रचनायें अखबारों में छप जाती हैं यह सब आपकी इस कृपा का परिणाम है कि आपकी वक्रदृष्टि हम पर नहीं है। वैसे यहां आप ‘बिग बॉस निवास’ के बाहर खड़े क्या कर रहे हैं? जहां तक हमारी जानकारी है इस घर में आप जैसे रचनाकारों का घुसना वर्जित है। यहां की हर घटना का सीधा प्रसारण टीवी चैनलों पर दिखता है। आप जैसे उच्च व्यक्त्त्वि इसके अंदर प्रविष्ट होना तो दूर बाहर इस तरह खड़ा रहे यह भी उसके स्तर के अनुकूल नहीं दिखता।’’
           आलोचक महाराज बोलें-‘अच्छा, हमें समझा रहे हो! तुम्हारे जैसे स्तर का महान हास्य कवि यहां से निकल रहा है इस पर भी कोई सवाल कर सकता है। बिग बॉस में ढेर सारी सुंदरियां आती है, कहीं उनको देखने के प्रयास का आरोप तुम पर भी लग सकता है।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज, हमें तो कोई जानता भी नहीं है। आप तो प्रसिद्ध आदमी है। बहरहाल हमें आज्ञा दीजिये। बिना आज्ञा यहां पोर्च तक आ गये यही सोचकर डर लग रहा है। निवास रक्षक ने अगर आपत्ति कहीं हमें पकड़ लिया तो आप हमें यहां बुलाने की बात से भी इंकार कर पहचानने ने मना कर देंगे।’’
आलोचक महाराज बोले-‘‘आज हम यहां स्वामी आगवेशधारी का इंतजार कर रहे हैं। उनको हमने बिग निवास में प्रवेश दिलवाया है। उनको समझाना है कि क्या बोलना है, कैसे चलना है? तुम जानते हो कि हम तो अब कंपनियों के पटकथाकार हो गये हैं।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘स्वामी आगवेशधारी का यहां क्या काम है? वह तो गेरुऐ वस्त्र पहनते है और उनका अभिनय से क्या वास्ता है?’’
           आलोचक महाराज बोले-‘तुम इसलिये फ्लाप रहे क्योंकि तुम बाज़ार और प्रचार का रिश्ता समझे नहीं । अरे, दीपक बापू आजकल वही कंपनियां साहित्य, कला, राजनीति, धर्म और फिल्म में अपना पैसा लगा रही हैं जो हमें सामान बनाकर बेचती हैं। टीवी चैनल और अखबार भी उनकी छत्रछाया में चलते है। वही समाज में सक्रिय अभिनेताओं, स्वामियों, लेखकों, चित्रकारों और समाज सेवकों को प्रायोजित करती है। किसको कब कहां फिट कर दें पता नहीं। फिल्म और टीवी की पटकथा तक कंपनियां लिखवाती हैं। आदमी इधर न खप सका तो उधर खपा दिया। स्वामी धर्म और समाज सेवा के धंधे में न चला तो अभिनेता बना दिया। हमे क्या? हम तो ठहरे रचनाकार! जैसा कहा वैसा बना दिया।’’
           दीपक बापू अवाक खड़े होकर सुनते रहे फिर बोले-‘‘महाराज अब हमारे समझ में आया कि हम फ्लाप क्यों हैं? इतना बड़ा राज हमने पहली बार सुना। यह आगवेशधारी स्वामी तो कभी गरीब बंदूकचियों की दलाली करता था। फिर यह इधर हमारे तीर्थयात्रियों पर कुछ अनाप शनाप बोला। बाद में समाज सुधार आंदोलन में चला आया। वहां उसने अपने ही लोगों को पिटवाने का इंतजाम करने का प्रयास किया। बाहर किया गया। फिर कहीं श्रीश्री के यहां मौन व्रत पर चला गया। अब फिर इधर बिग बॉस के घर आ रहा है। अपने समझ में अभी तक नहीं आया। यह बाज़ार और प्रचार का मिलाजुला खेल है।’’
           आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा! तुम्हारी बुद्धि मोटी हैं। तुम्हें इतना पहले भी कई बार समझाया कि हमारे यहां बंदूकची हों या चिमटाधारी समाज सेवा में लगें या विध्वंस मे,ं आदमी का प्रायोजन तो कंपनियां ही करती हैं, पर तुम अपनी हास्य कविताओं तक ही सीमित रहे।’’
इतने में दीपक बापू ने देखा कि एक गेरुए वस्त्रधारी पगड़ी पहने एक स्वामी कार से उतर रहे हैं। आलोचक महाराज दनदनाते हुए वहां पहुंच गये और बोले-‘‘आईये महाराज, आईये महाराज! बिग बॉस के घर में आपका स्वागत है।’’
          स्वामी ने कहा-‘‘तुम बिग बॉस हो। लगता तो नहीं है! बिग बॉस तो जींस पहने, काला चश्मा लगाये और सिर पर टोपी धारण करने वाला कोई  जवान आदमी होना चाहिए। तुम तो जैसे कुर्ता पायजामा पहनने के साथ माथे पर तिलक लगाये और सोने की माला पहने कोई नेता लग रहे हो।’
        आलोचक महाराज बोले-‘हुजूर बिग बॉस वास्तव में कौन है पता नहीं! अलबत्ता चाहे इस घर में विज्ञापन मैनेजर जिस अभिनेता को चाहते हैं वही बनकर हमारे सामने आता है। अब बताईये इस कंपनी राज में बिग बॉस भला कभी दिखता है? यहां तक कंपनियों के बॉस भी अपने को दूसरे नामों से पुकारे जाते हैं। हां, आपकी भूमिका मुझसे ही लिखवाई गयी थी। एक कंपनी ने कहा कि हमारा प्रायोजक आदमी इस समय फालतु घूम रहा है उसे काम दो। वह समाज सुधार में फ्लाप हुआ तो गरीबों के उद्धार में उसके सामने पैंच आ जाते हैं ? आपका चेहरा जनता के सामने से गायब न हो जाये इसलिये किसी टीवी धारावाहिक में उपयोग करें। इसलिये हमने तय किया कि आपको बिग बॉस से अच्छी जगह नहीं मिल सकती।’
          स्वामी ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस समय मेरा समय ठीक नहीं चल रहा है। बिग बॉस के घर से अपनी छवि सजाकर फिर समाज सेवा करने जाऊंगा। वैसे मुझे तुम्हारे लिखे डायलाग की जरूरत नहीं है। मेरे पास अपना अध्यात्मिक ज्ञान बहुत हैं।’’
          आलोचक महाराज बोले-‘महाराज, वह ठीक है। डायलाग लिखना मेरा काम है। आप अपने चाहे मेरे लिखे बोलें या अपने सुनायें पर नाम मेरा ही होगा।’’
           स्वामी ने दीपक बापू की तरफ देखते हुए पूछा-‘‘यह बूढ़ा आदमी यहां क्या कर रहा है?’’
आलोचक महाराज ने कहा-‘यह एक फ्लाप हास्य कवि है। काम मांगने आया था। मैंने कहा कि हमें तो हमारे महाराज मिल गये अब तुम निकल लो।’’
           स्वामी ने कहा-‘‘अच्छा किया! मुझे हास्य कवियों से नफरत हैं। वैसे यह फटीचर धोती, कुर्ता और टोपी पहने हुए है। इससे बिग बॉस के घर क्या बरामदे तक नहीं आने देना चाहिए। कुछ हास्य कवियों ने मेरा मजाक बनाया है इसलिये उनसे चिढ़ हो गयी है।’
        आलोचक महाराज ने वहां से दूर ले जाकर दीपक बापू से कहां-‘‘निकल लो गुरु तुम यहां से! तुमने इस पर एक हास्य कविता लिखी थी। हमने इंटरनेट पर पढ़ी है। अगर कहीं तुम्हारा नाम इसे पता चला तो हो सकता है एकाध चमाट मार दे।’’
        दीपक बापू बाहर निकलते हुए बोले-सच कहते हो आलोचक महाराज। यह बिग बॉस का निवास और इधर यह स्वामी! फिर आपकी मौजूदगी! हमारे लिये यहां हास्य कविता लायक लिखने का विषय हो नहीं सकता। गंभीर चिंत्तन और दर्दनाक रचनायें हमसे होती नहीं हैं। सो हम तो चले।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Thursday, October 27, 2011

सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा पर कितना रोयें-हिन्दी लेख (government hospital and comman public-hindi article)

         कलकत्ता के एक अस्पताल में 48 घंटे में 11 से 14 बच्चों की मौत का समाचार टीवी चैनलों पर देखने और सुनने को मिला। ऐसा समाचार वहां इसी वर्ष जून में भी मिला था। उस समय प्रचार माध्यमों की व्यग्रता देखकर अस्पताल में सुधार की बात कही गयी। अब प्रचार माध्यम स्वयं कह रहे हैं कि सुधार के नाम पर वहां शून्य है और मौतों का सिलसिला जारी है।
          भारत में शिशु दर की अधिकता ही बढ़ती जनसंख्या का कारण मानी जाती है क्योंकि जन्मदाता अपने शिशुओं के जीवन को लेकर आश्वस्त नहीं होते और बुढ़ापे में आसरे की खातिर अधिक बच्चों को जन्म देते हैं। हालांकि बढ़ती जनसंख्या में अशिक्षित नागरिकों के साथ ही देश के अविकसित होना भी एक कारण माना जाता हैं। देखा यह गया है कि विकसित देश में जनंसख्या कम होती है तो वही धनाढ्य नागरिक भी अधिक बच्चों के जनक नहीं होते। बहरहाल मौतों पर मचे बवाल पर चिकित्सकों का कहना है कि पांच या छह बच्चे कलकत्ता के उस अस्पताल में बड़ी बात नहीं है। उनका यह भी स्पष्टीकरण है कि बच्चे वहां इतनी खराब हालत में लाये जाते हैं कि उनमें से सभी को बचाना मुमकिन नहीं रहता। वहीं मृत शिशुओं के परिवार उन पर चिकित्सा में लापरवाही का आरोप लगाते हैं। वैसे हमारे देश में पं बंगाल प्रदेश तथा पड़ौसी देश बंग्लादेश अधिक आबादी और गरीबी के कारण जाने जाते हैं तब कलकत्ता जैसे महानगर के अस्पताल में ऐसी घटना होना कोई बड़ी बात नहीं लगती पर चिंताजनक तो है।
            ईमानदारी की बात यह है कि हमें दोनों की बातों से विरोध नहीं है। सीधी बात कहें तो दोनों ही अपने तर्क पर सही हो सकते हैं पर मूल बात यह है कि शिशुओं की मौत हो रही है और इसके लिये हम समाज को इस अपराध ने बरी नहीं कर सकते। एक बात तो यह है कि बढ़ते भौतिकतावाद ने शिशुओं की रक्षा के उत्तरदायित्वों से लोगों को विमुख कर दिया है। माता पिता हों या चिकित्सक दोनों ही एक तरह से ऐसी मौतों के लिये जिम्मेदार माने जा सकते हैं। हम देखते हैं कि बीमारी की शुरुआत में लोग उसे यह कहकर टाल देते हैं कि एक दो दिन में सही हो जायेगी। यहां तक घरेलू परंपरागत उपचार तक से लोग परहेज करते हैं। यहां हम यह भी बता दें कि हमारा यह अनुभव रहा है कि शुरुआती दौर में अगर घरेलू उपाय किये जायें तो खांसी, जुकान, सिरदर्द तथा अन्य बीमारियों से मुक्ति पाई जा सकती है। यह अलग बात है कि कुछ लोग झाड़ फूंक में वक्त खराब करते हैं और घरेलू उपचार में हिचकते हैं। उसके बाद जब बीमारी बढ़ती है तो फिर नीम हकीमों के चक्कर पड़ जाते हैं। जब मामला बिगड़ता है तब सरकारी अस्पताल की तरफ जाते हैं। यह भी देखा जाता है कि जब निजी चिकित्सालयों के स्वामियों को लगता है कि मरीज का अब आगे चलना मुश्किल है तब उसे सरकारी अस्पताल की तरफ रवाना करते हैं।
         सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा पर लिखना अब समय बेकार करना है। स्थिति यह है कि अगर जेब में बहुत पैसा हो तो बहुत कम लोग ऐसे होंगे जो सरकारी अस्पताल का रुख करेंगे। स्थिति यह है कि जिनके पास कम पैसा है वह तो संकट में पड़ जाते हैं कि सरकारी अस्पताल जायें या निजी नर्सिंग होम की शरण लें। अनेक लोगों को तो सरकारी अस्पताल में इलाज कराने पर उलाहना भी झेलना पड़ता है। एक समय था जब सरकारी अस्पतालों में अच्छी व्यवस्था थी और वहां उपचार कराने पर विश्वास होता था कि ठीक हो जायेंगे। प्रसंगवश हमें याद आया कि उस समय विद्यालय भी सरकारी अधिक बेहतर माने जाते थे। कथित उदारीकरण के चलते सारा स्वरूप बदल गया है। कहने को हमारे यहां लोकतांत्रिक प्रणाली है पर जिस तरह जनउपयोगी सेवाओं में बदहाली के चलते उनका निजीकरण हुआ है उससे तो यही लगता है कि व्यवस्था का मुख आमजन के कल्याण से अधिक जगह धनपतियों की तरफ खुला है। जनकल्याण के दावे खोखले लगने लगे हैं क्योंकि अब रोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा जीवन की अन्य दिनचर्याओं के लिये लोग अब राज्य से अधिक धनपतियों पर निर्भर हो गये हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि आखिर जनकल्याण के दावे करने वाले किस तरह उस पर अमल कर सकते हैं क्योंकि यहां तो आमजन का दैनिक सरोकार अब निजी क्षेत्र पर निर्भर हो गया है।
          आखिरी बात यह है कि अक्सर प्रचार माध्यम दावा करते हैं कि हमारी खबर के परिणाम की वजह से यह कार्यवाही हुई या वह काम हुआ। यह दावा वहीं सही सिद्ध होता है जहां निजत्व का संबंध होता है। जैसे कहीं घोटाला हुआ या हत्या हुई या कहीं चोरी हुई उसका राजफाश करने पर अपराधी तो पकड़ा जाता है पर जहां व्यवस्था का कोई दोष सामने उजागर होने पर भी उसमें सुधार नहीं होता। जब कलकत्ता के अस्पताल की खबर पहले आयी थी तब भी व्यवस्था नहीं सुधरी। इसका मतलब सीधा है कि व्यवस्था में सुधार का दावा प्रचार माध्यम नहीं कर सकते। शक्तिशाली और संगठित लोग या समूह उनकी खबरों से नहीं डरते। बहरहाल कलकत्ता का यह अस्पताल अगर इसी तरह चलता रहा तो आगे प्रचार माध्यमों के लिये इसी तरह की सनसनी खबरों में बना रहेगा।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, October 16, 2011

सुरसा महंगाई से कौन करेगा लड़ाई-हिन्दी कविताएँ (sursa mehangai se kaun karega ladai-hindi kavitaen)

जरूरत चीजों की दामों में महंगाई पर
उनको फिक्र नहीं है,
गरीब के दर्द का उनके बयानों में जिक्र नहीं है,
मगर फिर भी देशभक्ति दिखाने का नारा दिये जाते हैं,
कौन समझायें उनको
वफादारी के सबसे बड़े सबूत हैं कुत्ते
वह भी रोटी न देने पर गद्दार हो जाते हैं।
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बरसों से सुन रहे हैं
सुरसा की तरह बढ़ रही महंगाई,
इंतजार है हमें
कोई हनुमान आकर करे लड़ाई।
इंसानों में फरिश्ते नहीं होते,
हुक्मराम और प्रजा में बराबर के रिश्ते नहीं होते,
महलों में बैठे लोग
मशगुल हैं अपने ही आप में
कभी लड़ते लूट की कमाई पर
कभी करते एक दूसरे की बड़ाई।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, October 7, 2011

बगावत-‘हिन्दी लघु कथा कहानी (bagawat-hindi short story or kahani satire)

          एक इंसान ने पर्वत की ऊंचाई की तरफ कई पत्थर उछाल कर फैके। उस पर्वत पर फरिश्तों का समूह बैठता था जो नीचे रहने वाले इंसानों के भाग्यविधाता थे। यह अलग बात है कि वह जुटाता ते मक्खन खाने का सामान था पर नीचे इंसानों के पास सूखी रोटी भेजता था ।
          उस इंसान ने कई पत्थर फैंके तो एक पत्थर फरिश्तों की सभा के बीच गिर ही गया। इस पर वहां हाहाकार मच गया। हमेशा वाह वाह सुनने और गपशप के आदी फरिश्तों को ऐसे पत्थर झेलने की आदत नहीं थी। उनको यह पता था कि नीचे से किसी इंसान की इतनी न हिम्मत है न औकात कि उन पर पत्थर तो क्या लकड़ी का टुकड़ा भी फैंक सके। इंसान को भूखा रखा तो ठीक और रोटी का झूठा टुकड़ा तो भी ठीक! अगर वह फरिश्ता जाति का नहीं है तो जिंदा क्या मरा क्या?
           पत्थर के टुकड़े इस तरह गिरना वहां सनसनीखेज खबर जैसा था। सारे फरिश्ते टीवी के सामने चिपक गये कि देखें आगे क्या होता है? यहां तक कि इंसानों में भी ब्रेकिंग खबर फैल गयी तो वह भी ऊपर ताक रहे थे कि कहीं से कोई फरिश्ता तो पत्थर की चोट खाकर नीचे तो नहीं टपक रहा।
          फरिश्तों ने आकाश की तरफ देखा। वहां ऐसा कोई संकेत मौजूद नहंी था कि पत्थर वहां से फैंका गया हो। फरिश्तों ने जांच शुरु की। खुफिया एजेंसी के मुखिया को तलब किया गया। फरिश्तों के प्रधान ने इस पर चिंता जताई। खुफिया संस्था के मुखिया ने बताया कि यह अंतरिक्ष के जीवों की साजिश का परिणाम है। कुछ एलियन धरती पर घूमते हैं तो कभी पर्वत पर भी चले आते हैं। इनमें कोई मौका मिलते ही पत्थर फैंक गया होगा।
           जांच जारी थी कि एक पत्थर फिर आ गिरा। अब नीचे झांका गया तो एक आदमी पर्वत की तरफ पत्थर उछाल रहा था।
          एक फरिश्ते ने जाकर अपने प्रधान को बताया कि-‘‘साहब, एक इंसान हमारी तरफ पत्थर फैंक रहा है। वह कह रहा है कि ‘तुम फरिश्ते इसलिये कहलाते हो क्योंकि मेरे जैसे इंसान नीचे रहते हैं। अगर हम न हों तुम फरिश्ते नहीं कहला सकते। आखिर हमारी तरह तुम्हें भी तो दो पांव, दो हाथ, दो आंख, एक नाक, एक मुख और दो कान हैं। अब तुम कर्तव्य विमुख हो रहे हो। हमारे साथ न्याय नहंी कर रहे हो’ इसलिये हम तुम्हें पहाड़ से उतारकर अपनी जमात में बिठायेंगे।’’
            फरिश्तों के प्रधान ने अपने सचिव से कहा-‘‘जाओ, उसे लाकर कहीं अपने पर्वत पर बसा दो। अपनी बिरादरी में शामिल करने से वह हमारी लिये वफादार हो जायेगा।’’
           सचिव ने कहा-‘‘महाराज! इस तरह हम अनेक इंसानों को ऊपर ला चुके हैं। सभी के सभी हरामखोर हैं। हमने जब उनसे कहा कि इस इंसान को रोको तो कोई मधुमेह की बीमारी का बहाना कर घर में घुस गया तो कोई दिल के दौरे की नाम लेकर अस्पताल में दाखिल हो गया। अब यह इंसान यहां मत लाईये।’
          फरिश्तों के प्रधान ने कहा‘‘मूर्ख! यह बगावत रोकने का तरीका है। इस समय वह एक इंसान पत्थर फैंकता रहा तो दूसरे भी फैंकने लगेंगे। धरती पर बरसों में कोई एक क्रांतिकारी पैदा होता है। जो इंसान पहले आये वह सब बूढें हो गये हैं। यह जवान है इसलिये उसे बुलाकर बसा लो। सुरा, सुंदरी और संपत्ति की चाशनी में डुबो दो। फिर कोई दूसरा करता है तो यह उसे कुचलने के काम आयेगा।’
           सचिव उस इंसान को पर्वत पर ले आया। एक फरिश्ते ने उससे कहा कि ‘‘अब तुम हमारे आदमी हो। यहां कोई बगावत मत करना।’
           उस इंसान ने कहा-‘मेरा काम हो गया। अब क्या मैं पागल हूं कि बगावत करूंगा। इस पर्वत पर और नीचे प्रचार में मेरा नाम आ गया। यहां सुरा और सुंदरी के साथ संपत्ति मिलेंगे। तब काहे की बगावत!’’
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Wednesday, September 21, 2011

32 रुपये और गरीबी-हिन्दी कविता (32 rupess and powerty or 32 rupaye aur garibi-hindi kavita or poem)

खबर यह थी कि
बत्तीस रुपये खर्च करने वाले लोग
गरीब नहीं माने जायेंगे,
किसी तरह की मदद नहीं पायेंगे।
तब तय किया भिखारियों की यूनियन ने
अब दानदाताओं से पांच दस रुपया मांगने की बजाय
पांच सौ और हजार रुपयें का नोट
मांगने के लिये हाथ बढ़ायेंगे,
खाना तो मिल जाता है कहीं भी
मगर दवा दारु के लिये
अब हमारा जिम्मा हमारे ही कटोरे पर है
उनको समझायेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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