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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Monday, April 27, 2015

इमारते और कवियों के शब्द-हिन्दी कविता(iamrten aur kaviyon ke shabda-hindi poem)


सीमेंट और ईंटों से बनी
इमारते कभी धरती के कोप से
ढह जाती हैं।

इससे तो बेहतर होती
कवियों की शब्द रचनायें
अमरत्व की धारा में
बह आती हैं।

कहें दीपक बापू जिस्म से
मांस या पत्थर के बुत
कभी हमेशा एक जैसे नहीं रहते,
रूप बदलते हुए
पतन के हमले सहते,
किसी के गिरने पर
रोना बेकार है
ज्ञान की अमर कहानियां
यही कह जाती हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर   

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Monday, April 20, 2015

इंसान मस्तिष्क घड़ा है-हिन्दी कविता(insanin mastishk ghada hai-hindi kavita)


बूंद बूंद से घड़ा
भरता है
ऐसा कहा जाता है।

छेद हो तो बूंद बूंद
घड़ा खाली भी होता
ऐसा नहीं कहा जाता है।

कहें दीपक बापू इंसानी मस्तिष्क भी घड़ा है
ज्ञान की बूंद बूंद से
भरता है
अहंकार के छेद से होता खाली
यह हमारा विचार है
ऐसा कहा नहीं जाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Monday, April 6, 2015

सावधान होकर सड़क पर चलना-हिन्दी कविता(sawdhan hokar sadak par chalana-hindi poem)


सावधान होकर सड़क पर चलना, शैतान भी विचरते हैं।
दौलतमंदों से बचकर रहना, जल्दी दिमाग से बिफरते हैं।

ढेर सारे दो पांव वाले पशु भी सड़क पर नज़र आयेंगे,
हादसे पर अकेले होगे, दर्शक मनोरंजन में ही सिहरते हैं।

इंसानों की भीड़ का शोर चारों तरफ नज़र आयेगा
कत्ल होती मानवता, सभी की जुबां में दांत बिखरते हैं

कहें दीपक बापू कातिल आज शेर समझे जाते हैं
 इंसानो को भेड़ बनाकर हांकते कायदे से निखरते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, April 2, 2015

अपनी रुंआसी तस्वीर बनाते-हिन्दी कविता(apni ruansi tasveer banate-hindi poem)


बहुत धन पाने का
सपना दिल में होता
टूटे जाने पर
जरूर आंसु बहाते।
राजपद की लालसा
दिमाग में होती
बिखर जाने पर
जरूर अपना दर्द बताते।

कहें दीपक बापू कलम का धनुष
शब्दों के तीर के साथ
हाथ में थामा था
जिंदगी की जंग जीतने के लिये
जारी है अभी तक
हार जाते तो
अपनी रुंआसी तस्वीर
स्वयं के हाथ से जरूर बनाते।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, March 28, 2015

कोई किसी का नाथ नहीं है-हिन्दी कविता(koi kisi ka naath nahin ia-hindi poem)



सवार है वह सत्ता के रथ पर
घोड़ों की लगाम
उनके हाथ में नहीं है।

सारथि चाबुक के सहारे
रास्ता तय कर रहा है
सवार की सलाह
उसके साथ नहीं है।

कहें दीपक बापू तख्त पर
बैठने वालों के चेहरे देखकर
उनके शक्तिमान होने का अहसास
केवल एक भ्रम है,
जिंदगी की चाल
चलने के अपने क्रम है,
कोई राजा
कोई प्रजा
कोई किसी का नाथ नहीं है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, March 24, 2015

व्यवसायिक क्रिकेट मनोरंजन उद्योग मानना चाहिये-हिन्दी चिंत्तन लेख(cricket is not a play but a tred-hindi article on cricket match)



          अभी आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड में विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता समाप्त भी नहीं हुई है कि भारत में एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रचार प्रारंभ हो गया है। सभी टीवी चैनल पर उसका विज्ञापन आ रहा है।  तय बात है कि क्रिकेट जहां आम लोगों के लिये खेल है तो व्यवसायियों के लिये यह मनोरंजन का सामान बन गया है।  मेरे विचार से क्रिकेट का खेल तभी तक खेल है जब तक उसे मुफ्त मन बहलाने के लिये अपनाया जाये। जहां पैसे का लेनदेन हो वहां इसे व्यापार मानना चाहिये।  एक तरह से यह फिल्म की तरह ही आम जनमानस का मनोरंजन करता है।
          ऐसे में यह सवाल उठता है कि जिस तरह छोटे बड़े व्यापारियों से कर वसूली की जाती है उसी तरह क्या क्रिकेट से भी की जायेगी?  जब सड़क पर ठेले और फुटपाथ पर गुमटी लगाने वाले से कर वसूला जाता है यह मानकर कि वह कमाता है तो क्या क्रिकेट का व्यापार करने वालों से भी राजस्व वसूली नहीं की जाना चाहिये?

          अनेक आर्थिक विशेषज्ञ तो यही कहते हैं कि इस पर उसी तरह मनोरंजन कर लगना चाहिये। हालांकि क्रिकेट से छोटी या बड़ी राशि कमाने वाले कथित नये पुराने खिलाड़ी इसे प्रोत्साहन देने के लिये करमुक्त की सुविधा जारी रखने के समर्थक हैं।  जहां तक नये तथा युवा खिलाड़ियों की बात है तो सभी को राष्ट्रीय या क्लब स्तरीय टीम में जगह नहीं मिलती पर अनेक इस प्रयास में रहते हैं कि शायद उनका भाग्य चमक जाये।  इतना ही नहीं अनेक क्रिकेट कोच तथा संस्थान हजारों युवकों को महान खिलाड़ी बनाने का सपना दिखाकर अपनी कमाई कर रहे हैं।  देखा जाये तो क्रिकेट खेल से सट्टा व्यवसाय ही नहीं बल्कि प्रशिक्षण उद्योग भी फलने फूलने के लिये खड़ा हो गया है।  हमने देखा है कि अनेक नवयुवक क्रिकेट खिलाड़ी बनने के लिये हाथ पांव मारने के बाद जीवन के दूसरे मार्ग की तरफ मुड़ गये पर इसके पहले उन्होंने ढेर सारी राशि अपने अपूर्ण सपने पर व्यय कर दी। जब से रंग बिरंगे कपड़े पहनने का प्रचलन क्रिकेट खिलाड़ियों में आया है तब से वह फिल्मी नायक की तरह लगते हैं।  जिस तरह पहले लोग फिल्म में भूमिका पाने के लिये लालायित रहते थे अब क्रिकेट खिलाड़ी बनने का प्रयास करते हैं-फिल्मों के बारे में तो अब यह धारण बन गयी है कि वहां पर अब वंशवाद की परंपरा चल पड़ी है इसलिये वहां सामान्य परिवार के लोग जाने की नहीं सोचते। शायद यही कारण है कि अनेक आर्थिक तथा सामाजिक विद्वान व्यवसायिक क्रिकेट को खेल नहीं वरन् मनोरंजन का व्यापार मानते हुए उससे राजस्व वसूली की सिफारिश करते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Tuesday, March 17, 2015

वादों के सौदागर-हिन्दी कविता(vadon ke saudagar-hindi poem)



कागज़ पर हिसाब
लिखने का लाभ नहीं
जब दिल में ही
गड़बड़ फैली हो।

वह लोग कभी
अहसान का कर्ज नहीं चुकाते
जिनकी नीयत मैली हो।

कहें दीपक बापू वादों के सौदे
होते हैं भलाई के व्यापार में
ख्वाबों को सच में
वह सौदागर नहीं बदलते
जिनकी भरी थैली हो।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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