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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Saturday, December 29, 2007

साधू और शैतान ने ब्लोग बनाया

साधू ने अंतर्जाल पर धर्म प्रचार के लिए
चेलों की प्रार्थना पर एक ब्लोग बनाया
और ''सत्य दर्शन" का शीर्षक लगाया
खबर लगी शैतान को तो
उसे भी ब्लोग बनाने का ख्याल आया
उसने उस पर 'सैक्स दर्शन' नाम लगाया
साधू के ब्लोग पर
कभी-कभी कभार कोई कमेंट टपकता
वरना फ्लॉप श्रेणी में जमा रहता
उधर शैतान का ब्लोग हिट होता गया
एक के बाद एक 'वंस मोर' जैसी आवाज में
कमेन्ट बटोरता गया
आखिर उसने साधू के ब्लोग पर
एक कमेन्ट लगाया और लिखा
''काहे तुम लिखते हो
हमें तो फ्लॉप दिखते हो
आ जाओ
ऐसा ब्लोग बनाओ
जैसा मैंने बनाया
वैसे भी हूँ तभी तुम्हारी पहचान है
मेरे बिना कौन साधू को जान पाया''

साधू ने भी लगाई कमेन्ट और लिखा
''तुम्हारी सफलता से कोई दुख नहीं है
मैं तुम्हारी तरह ब्लोग नहीं बना सकता
क्योंकि मैंने तो धर्म के लिए
काम करने का ठाना है
लोग जब ऊब जाते हैं
तब मेरे ब्लोग पर भी आते हैं
जब छोड़ जाती तुम्हारी माया
तब कुछ अच्छा पढें इसीलिए
चेलों के कहने पर मैंने यह ब्लोग बनाया"
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नोट-यह काल्पनिक हास्य-व्यंग्य रचना है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई लेना-देना नहीं है
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पूर्व में प्रकाशित एक रचना अब पुन:प्रसारित

साधू, शैतान और इंटरनेट
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शैतान ने दी साधू के आश्रम पर दस्तक
और कहा
'महाराज क्या ध्यान लगाते हो
भगवान के दिए शरीर को क्यों सुखाते हो
लो लाया हूँ टीवी मजे से देखो
कभी गाने तो कभी नृत्य देखो
इस दुनिया को भगवान् ने बनाया
चलाता तो मैं हूँ
इस सच से भला मुहँ क्यों छुपाते हो'

साधू ने नही सुना
शैतान चला गया
पर कभी फ्रिज तो कभी एसी ले आया
साधू ने कभी उस पर अपना मन नहीं ललचाया
एक दिन शैतान लाया कंप्यूटर
और बोला
'महाराज यह तो काम की चीज है
इसे ही रख लो
अपने ध्यान और योग का काम
इसमें ही दर्ज कर लो
लोगों के बहुत काम आयेगा
आपको कुछ देने की मेरी
इच्छा भी पूर्ण होगी
आपका परोपकार का भी
लक्ष्य पूरा हो जायेगा
मेरा विचार सत्य है
इसमें नहीं मेरी कोई माया'

साधू ने इनकार करते हुए कहा
'मैं तुझे जानता हूँ
कल तू इन्टरनेट कनेक्शन ले आयेगा
और छद्म नाम की किसी सुन्दरी से
चैट करने को उकसायेगा
मैं जानता हूँ तेरी माया'

शैतान एकदम उनके पाँव में गिर गया और बोला
'महाराज, वाकई आप ज्ञानी और
ध्यानी हो
मैं यही करने वाला था
सबसे बड़ा इन्टरनेट तो आपके पास है
मैं इसलिये आपको कभी नहीं जीत पाया'
साधू उसकी बात सुनकर केवल मुस्कराया

3 comments:

Srijan Shilpi said...

बढ़िया, दिलचस्प...धार भी है।

rajivtaneja said...

बहुत बढिया.....लिखते रहें...धार अपनी पैनी दर पैनी करते रहें...

विनोद पाराशर said...

हास्य-व्यंग्य से शुरू होकर,आपकी कवितायें अंत में कोई न कोई संदेश अवश्य छोड जाती हॆं.सुंदर रचना के लिए धन्यवाद.

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