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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Monday, December 8, 2008

अपना अपना दाव-हास्य कविता

पोता घर में घुसा
तो दादा ने पूछा
'क्या देखकर आया
रिजल्ट आ गया न'
पोता बोला
''हाँ गया
पर अभी पूरी तरह नहीं मालुम
किसको कितनी सीटें मिलीं हैं'

दादा बोले
''तुम सुबह कहकर निकले थे
मैं रिजल्ट देखने जा रहा हूँ
अगर चुनाव का रिजल्ट देखना था
तो घर पर ही देख लेते
कुछ हम से भी राजनीति सीख लेते
हम ही बता देते
किसकी सूरत हुई फक और किसकी खिली है''

पोता बोला
''दादाजी आपकी पीढी
मुफ्त में मजे लेने की आदी है
हमारे लिए तो समय की बर्बादी है
फिल्म, क्रिकेट और चुनाव है
आपके लिए मनोरंजन और खेल
पर हम खर्च करने के आदी हैं
दूसरे की हार जीत पर
हंसना-रोना समय की बर्बादी है
हम तो खेलते हैं अपना दाव
जीत हमारी हो
इसलिये देखते भाव
दाव जीते तो होती है पार्टी
हारें तो निकल जाता तेल
फिल्म में आप देखते अभिनेता की सूरत
चुनाव में देखते प्रत्याशी की सीरत
हमें इससे मतलब नहीं
हमें तो अपने दाव जीतने से वास्ता
फ़िदा उसी पर होते हैं
दिखाता है जो दाव जीतने का रास्ता
हम तो अपना खेल भी
साथ-साथ खेलते है
यही शिक्षा नई पीढ़ी को मिली'

पोता चला गया तो दादा ने
अपने बेटे से कहा
''कुछ गलती हमसे ही हुई है
हमने तो ऐसी शिक्षा नही दी
फिर इसे कहाँ मिली
मुझसे तो दूर बचपन गुजारा था इसने
पर तुम्हारे तो पास रहा
फिर बनी संस्कारों से परे रहा
जिसे खेल और मनोरंजन
करना नहीं आता
अपना धन और मन तबाह करना आता है
ऐसी नयी पीढी मिली

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1 comment:

विनय said...

बढ़िया है!

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