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Sunday, August 30, 2009

रिश्ते और समय की धारा-हिंदी कविता (rishtey aur samay ki dhara-hindi kavita)

हम दोनों तूफान में फंसे थे
उनको सोने की दीवारों का
सहारा मिला
हम ताश के पतों की तरह ढह गये।

अब गुजरते हैं जब उस राह से
यादें सामने आ जाती हैं
कभी अपनो की तरह देखने वाली आंखें
परायों की तरह ताकती हैं
रिश्ते समय की धारा में यूं ही बह गये।
जुबां से निकलते नहीं शब्द उनके
पर इशारे हमेशा बहुत कुछ कह गये।

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3 comments:

एकलव्य said...

दीपक जी
बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना

एकलव्य said...

दीपक जी
बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना

परमजीत बाली said...

सुन्दर भावपूर्ण रचना|

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