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Sunday, October 24, 2010

योग फिनोमिना-हिन्दी लेख (yoga sadhna and all religion-hindi article)

इंटरनेट पर एक हिंद ब्लॉग में लिखा   गया वह एक दिलचस्प लेख था! मन में आया टिप्पणी करना चाहिए! लेख दोबारा पढ़ा तो लगा कि चलो एक अपना पाठ ही लिख लेते हैं क्योंकि भारतीय योग साधना से संबंधित विधियां और उनके महत्व को लेकर विश्व भर में चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्व किसी को नहीं दिखाई दे रहे हैं। एक तरह से अंधों का हाथी हो गया है भारतीय योग जो केवल देह के इर्दगिर्द ही घूम रहा है और मन और विचारों में उससे होने वाले परिवर्तनों को अनदेखा किया जा रहा है।

बात उन दिनों की है जब इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी। शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी तब बाबा रामदेव का नाम इतना प्रसिद्ध नहीं था। भारतीय योग संस्थान के शिविर में अनेक साधकों से भेंट होती। कुछ अन्यत्र शिविरों की भी जानकारी आती थी। ऐसे ही अन्यत्र चल रहे योग शिविर की जानकारी मिली कि एक शिक्षक ने अचानक ही साधना का परित्याग कर दिया था। एक साधक ने बताया कि उनके किसी संत गुरु ने उनको योग साधना करने से मना कर कहा था कि इससे भगवान के प्रति भक्ति भाव कम होता है। अपने गुरु के आदेश का उन्होंने पालन किया। बात आई गयी खत्म होना चाहिए थी, मगर हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अनेक लोग योग साधना के बारे में अनेक संशय पाले हुए हैं। उससे भी ज्यादा यह बात कि लोग इससे अनेक प्रकार की सिद्धियां होने का दावा करते हैं। यह दोनों ही बुरी बात है और मन में असहजता का भाव उत्पन्न करती हैं जो कि ठीक योग के विरुद्ध है। योग साधना से केवल देह, मन और विचारों में सकारात्मक भाव पैदा होता है इससे अधिक कुछ नहीं। अगर कोई योग साधक श्रीमद्भागवत गीता पढ़ ले तो वह अध्यात्मिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाता है और तब स्वर्ग में टिकट दिलाने, हर मर्ज की दवा देने, मनोरंजन करने, सौंदर्य बनाये रखने और काम शक्ति बढ़ाने के उपाय बताने के नाम पर उस पर शासन करने वाले बाज़ार तथा प्रचार का उस नियंत्रण उस पर से समाप्त हो जाता है। सभी योग साधक श्रीमद्भागवत गीता पढ़ें यह जरूरी नहीं है पर चरम पर आने के बाद उसका मन ऐसे तत्व ज्ञान की तरफ स्वतः ही बढ़ता है। ऐसे में वह इस संसार में बुद्धि और मन के आधार पर सामान्य मनुष्यों पर शासन करने वाली शक्तियों के घेरे से बाहर हो जाता है। कोई वाद या विचार उसके आगे निरर्थक विषय के अलावा कुछ नहीं रह जाता। वह संसार के सामान्य कर्म नहीं त्यागता वरन् वह एक स्वतंत्र और मौलिक कर्मयोगी मनुष्य बन जाता है। यही से शुरु होता है योग का विरोध जो शासन और बाज़ार के स्वामी अपने प्रचारकों से करवाते हैं।
उस लेख में बाबा रामदेव के फिनोमिना की बात कही गयी थी। लिखने वाले स्वयं ही कार्ल मार्क्स की किताब पूंजी से प्रभावित हैं। कार्ल मार्क्स का नाम और उनकी पूंजी किताब का भी एक समय फिनोमिना रहा है। कार्ल मार्क्स एक विदेशी लेखक था और उसके विचारों को भारत के संबंध में अप्रासंगिक माना जाता रहा है, मगर शैक्षणिक संस्थानों तथा साहित्यक क्षेत्रों में एक समय ऐसे लोगों का जमावड़ा था जो सोवियत संघ की कथित क्रांति के प्रभाव में वैसी ही क्रांति अपने देश में लाना चाहते थे और गरीब और मज़दूर का उद्धार करना ही उनका लक्ष्य था। उनकी बहसें कॉफी हाउसों में होती थी। यह बहसें या मुलाकतें एक फैशन थी जो किसी विचार या आंदोलन का निर्माण करने में सहायक नहीं थी। उन्होंने इस देश में बुद्धिजीवियों की ऐसी छबि का निर्माण किया जिसका अपना फिनोमना जनता में था। यही कारण था कि ऐसे लोग जो कार्ल मार्क्स के विचारों से प्रभावित नहीं थे और कहीं न कहीं उनके मन में अपने भारत की विचाराधारा का प्रभाव था वह भी उनकी शैली अपनाने लगे। इससे भारत में विचारधाराओं का फिनोमिना बढ़ा। नये नये देवता गढ़े गये मगर चूंकि सभी भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे थे इसलिये चिंतन केवल चिंता तक सिमट गया। ऐसे में भारतीय योग को देशी विचारधारा के लोग भी एक बेकार चीज़ मानने लगे थे। उनका मानना था कि योगियों की निष्क्रियता की वज़ह से ही विदेशी यहां आकर जम गये जबकि सच यह है कि यह केवल अधंविश्वासी तथा पाखंडी लोगों की सक्रियता से हुआ था। श्रीमद्भागवत गीता को तो केवल सन्यासियों के लिये प्रचारित किया गया।
ऐसे में यह देश बहुत बड़े वैचारिक भटकाव में फंस गया और नतीजा यह निकला कि नारे और वाद ही दर्शन बनकर रह गये मगर यह समाज बिना फिनोमिना के चलने के आदी नहीं है। एक आदर्श आदमी के फिनोमिना में चलने के आदी इस समाज को अगर बाबा रामदेव नाम का नायक मिल गया तो उस पर अध्यात्मिकवादी लोग खुश ही होते हैं। रहा बाज़ार और उसके प्रचारतंत्र का सवाल तो उसके दोनों ही हाथों में लड्डू रहने है और इसे रोकना मुश्किल काम हैं। मुश्किल यह है कि वैचारिक भटकाव के समय इस देश में ऐसे बुद्धिजीवियों की भरमार हो गयी जो चिंतन कम चिंताओं पर अधिक लिखते हैं। समस्याओं को उभारते हैं पर हल उनके पास नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि वह समाज को वैचारिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर समस्याओं का हल ढूंढने की बजाय सरकारी कानूनों से करने की शैली आज के बुद्धिजीवियों में है। पराश्रित बुद्धिजीवी जब योग साधना पर लिखते हैं तो उनका सामना करने वाले लोग भी वैसे ही हैं। आदमी जब दैहिक तनाव से मुक्त होगा वह मानसिक और वैचारिक रूप से स्वतंत्र हो जायेगा। ऐसे में इन बुद्धिजीवियों की सुनेगा कौन?
अमेरिका के एक पादरी ने घोषित किया कि भारतीय योग साधना ईसाई धर्म के विरुद्ध है। इस पर भारत में कुछ लोगों ने विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना है कि यह ईसाई धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह विरोध करने वाले नहीं जानते कि अनेक हिन्दू संत ही इसका विरोध करते हैं।
सच बात तो यह है कि पूरे विश्व में इतने सारे धर्म होना ही इसका प्रमाण है कि इसके नाम पर जनसमुदाय में भ्रम फैलाया जाता रहा है। किसी भी भारतीय ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है और इसका आशय केवल आचरण से लिया जाता रहा है। मतलब पूरी दुनियां में दो ही प्रवृतियां रहती हैं एक धर्म की दूसरी अधर्म की! धर्म के नाम पर बांटने का काम तो पश्चिम से ही आया है। इसका कारण यह रहा है कि लोग अपने संकटों, बीमारियों तथा अन्य समस्याओं का हल दूसरे से कराना चाहते हैं। योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है। जब व्यक्ति आत्मनिर्भर हो जायेगा और धर्म का मतलब समझ जायेगा तब वह किसी भी धर्म के किसी ठेकेदार के पास नहीं जायेगा। यह योग तो हर धर्म के लिये खतरा है जिसमें इंसान स्वयं ही इंसान होकर जीना सीख जाता है। ऐसे में सभी धर्म प्रेम, अहिंसा तथा दया भाव से जीना सिखाते हैं जैसी बातें सुनाकर बहसें और चर्चा करने वाले तथा शांति संदेश बेचने वालों का क्या होगा? यही कारण है कि योग फिनोमिना से बहुत लोग आतंकित हैं क्योंकि आधुनिक बाज़ार तथा उसके प्रचारकों का फिनोमिना कम होने का खतरा है। हमने फिनोमिना शब्द का अर्थ इधर उधर ढूंढा पर मिला नहीं। इसका आशय हिन्दी में प्रभाव या प्रभावी हो सकता है और इसीलिये फिनोमिना शब्द प्रयोग करके देखा है। जब आप योग साधना करते हैं तो ऐसे प्रयोगों की प्रेरणा स्वतः पैदा होती है। यह लेखक कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं है पर योग फिनोमिना की वजह से ही यह लिखने को विवश हुआ है इसमें संदेह नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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Tuesday, February 26, 2008

संत कबीर वाणी: गले में माला डालने से हरि नहीं मिलते

मैं-मैं बड़ी बलाइहै सकै तो निकसौ भाजि

कब लग राखु हे सखी, रुई लपेटी आगि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मैं-मैं बहुत बड़ी बला है। इससे निकलकर भाग सको तो भाग जाओ, अरी सखी रुई में आग को लपेटकर तू कब तक रख सकेगी।

'कबीर'माला मन की, और संसार भेष

वाला पहरयां हरि मिलै तो अरहट कई गलि देखि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सच्छी माला ही अचंचल मन की है बाकी तो संसारी भेष है। मालाधारियों का यदि माला पहनने से हरि मिलना होता तो रहटको देखो हरि से क्या उसकी भेंट हो गई। उसने तो इतने बड़ी माला गले में डाली।

Saturday, February 23, 2008

संत कबीर वाणी:सोने का मदिरा से भरा पात्र भी निंदनीय

ऊंचे कुल की जनमिया करनी ऊँच न होय

कनक कलश मद सों, भरा साधू निंदा सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि केवल ऊंचे कुल में जन्म लेने से किसी के आचरण ऊंचे नहीं हो जाते। सोने का घडा यदि मदिरा से भरा है तो साधू पुरुषों द्वारा उसकी निंदा की जाती है।

कोयला भी हो ऊजला जरि बरि ह्नै जो सेव

कनक कलश मन सों, भरा साधू निंदा होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं भली भांति आग में जलाकर कोयला भी सफ़ेद हो जाता है पर निबुद्धि मनुष्य कभी नहीं सुधर सकता जैसे ऊसर के खेत में बीज नहीं होते।

Thursday, December 13, 2007

कंप्यूटर पर काम करने के साथ योग साधना करने से लाभ

अक्सर मैं सोचता हूँ कि लोग कंप्यूटर से इतना चिपके कैसे रहते हैं। अगर देखा जाये तो मैं भी कंप्यूटर पर दिन में दो से तीन घंटे काम करता हूँ पर उसके तरफ निगाह तभी जाती है जब उस पर कुछ पढ़ना हो या कोई फोटो देखना हो नहीं तो मैं अपने लिखने में मस्त हो जाता हूँ और कभी कभार त्रुटि देखने के लिए नजर फेर कर देखता हूँ। मैं कंप्यूटर पर टाईप में बिलकुल नहीं थकता। हाँ, पर अगर इस पर पढ़ना देखना मुझे बहुत थका देता है। जब थक जाता हूँ तो अपनी कुर्सी पर भी बैठ कर अपनी आँखे बंद कर शरीर को ढीला छोड़ते हुए ध्यान कर लेता हूँ। जब लगता है कि आराम है तब फिर पढता हूँ। पर यह आलेख कोई आत्मप्रन्चना के लिए नहीं लिख रहा।

चिट्ठाकार की चर्चा में मैं जब कल एक सक्रिय और आज उसके साथ दूसरे ब्लोगर के चौपाल पर न दिखने की चर्चा पढी तो मुझे याद आया कि ऐसे एक नहीं तीन चार ब्लोगर हैं और एक तो हर जगह कमेन्ट लगाते थे पर अब इतने सक्रिय नहीं हैं । एक महाशय कनाडा से अपने देश आये तो फिर उनके मुझे दर्शन ही नहीं हुए। यह सब ब्लोगर मुझे इस क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित करने वाले मेरे मित्र है और मुझे लग रहा था कि कहीं थकावट की वजह से आराम तो नहीं कर रहे। इसमें कोई सन्देश नहीं है कि कंप्यूटर पर काम करते थकावट बहुत होती है और उसका विकल्प यही है कि हम योग साधना कर उसका मुकाबला कर सकते हैं।
इसी बात पर विचार करते सोच रहा था। कंप्यूटर पर निरंतर काम करने से बहुत सारी व्याधियां पैदा होतीं हैं और कई ब्लोग लेखक अपने को थका हुआ अनुभव करते होंगे। कंप्यूटर पर काम करने के जो दुष्परिणाम होते हैं मैं उनको पहले ही भुगत चुका हूँ और आज से पांच वर्ष पूर्व जब योग साधना शुरू नहीं की होती हो वह सब नहीं लिख सकता था। कंप्यूटर पर काम करते हुए उच्च रक्तचाप की वजह से अपने स्वास्थ्य की लगभग हारी हुई लड़ाई जीतकर खडा हुआ। मैंने कई ब्लोग देखे हैं और उनमें लोगों की उदास रचनाएं मुझे बहुत कुछ कह जातीं हैं। मैं तो उन लोगों की तारीफ करूंगा को जो योग साधना नहीं करते और ब्लोग लिख रहे हैं या वह लोग मनोरंजन के लिए अंतर्जाल पर चिपके रहते हैं जैसे कभी देखा ही नहीं हों क्योंकि मैं ऐसा बिना योगसाधना के नहीं कर सकता।

सुबह योग साधना, प्राणायाम, ध्यान, और प्रार्थना करने के बाद मैं ब्लोग पर आता हूँ, और उस समय कल की लिखी गयी पोस्ट मुझे याद नहीं रहती। दिमाग में केवल यही रहता है कि आज कुछ नया लिखूंगा। जब आप कंप्यूटर पर आते हैं और आपको कल के कुछ पल याद आते हैं या आपको लग रहा है कि कल मैंने यह किया था तो आप समझ लीजिये कि वह विकार है। योग साधना जीवन जीने की कला है और नहीं करते तो उसे ढोना कहते हैं। हम मीठा खाएं या कड़वा, पका खाएं या कच्चा वह गंदगी में बदल जाता है वैसे ही आँखों से देखे गए अच्छे-बुरे दृश्य, कानों से सुने गए अच्छे-बुरे स्वर और देह को स्पर्श करने वाले अच्छी और बुरी हवाएं भी वैसे ही विकार पैदा करतीं हैं। खाने से उत्पन्न विकार हमें लगता है कि सुबह शरीर से एकदम निकला गए हैं तो गलत हैं। कुछ लोग सुबह घूमने जाते हैं और सोचते हैं कि सब ठीकठाक हो गया। नहीं ऐसा नहीं है। शरीर के विकार सुबह सैर करने से कुछ हद तक निकल सकते हैं पर मन और विचार के विकारों का क्या? जो आँखों, कानों और देह से उत्पन्न होते हैं। फिलहाल तो इतना ही कहूंगा कि कंप्यूटर पर सतत काम करना है तो योग साधना करें इसके बिना अगर काम चला रहे तो मैं कहूंगा कि बहुत बहादुर हो।
योगासन से शरीर, प्राणायाम से मन और ध्यान से विचारों के विकार निकलते हैं।अगर आप सुबह उठते हैं और सुबह सैर करते हैं तो आकर थोडा प्राणायाम करें, और कुछ नहीं तो अनुलोम--विलोम प्राणायाम करें और नहाधोकर ध्यान लगाएं। पहले ओम का जाप करें और फिर उसे मन में कुछ देर दोहराने के बाद अपना ध्यान नासिका के बीच केन्द्रित करें-भृकुटी पर रखें। आरंभ में आपके अन्दर विचार अधिक आयेंगे और उन्हें आने दें और आखें बंद कर बैठे रहें। जो विचार आपके आ रहे होंगे वह वास्तव में मन के विकार हैं जो भस्म हो रहे होते हैं। कुछ दिनों के बाद आब देखने कि आप शून्य में जायेंगे जब आप अपने ध्यान को भृकुटी पर अधिक समय तक केन्द्रित कर सकेंगे। दूकान, आफिस, यात्रा और घर में जहाँ भी अवसर मिले शरीर को ढीला छोड़ते हुए आँखें बंद कर भृकुटी पर ध्यान लगाएं। साथ में महसूस भी करें कि आपके मानसिक विकार भस्म हो रहे हैं।

कुछ समय के बाद आपको लगने लगेगा कि आपको शरीर और मन में अत्यधिक सहजता का अनुभव हो रही है और आप तब जान पायेंगे कि तनाव किस तरह का होता है-अभी तो आपको जब लग रहा है कि कोई तनाव नहीं है तब भी है,पर इसका अनुभव जब आप योग साधना करेंगे तब आपको नई-नई अनुभूतियाँ होंगीं। मैं अपने ब्लोगों पर अपना ज्ञान बघारने के लिए यह सब नहीं लिखता बल्कि अपने विचारों से अपने साथियों को इससे अवगत कराते रहना है।
नोट-भारतीय योग संस्थान द्वारा प्रकाशित 'योग-मंजरी'के नवीनतम अंक में 'दीपक राज' के नाम से मेरा लेख प्रकाशित हुआ जिन सज्जन के पास हो उसे पढें।

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