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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, February 21, 2008

मनुस्मृति: आसक्ति रहित लोग ही हो सकते हैं धर्मोपदेशक

१.धर्मोपदेश देने का विधान उन्हीं लोगों के लिए है जो अर्थ और काम में आसक्त नहीं है। जो व्यक्ति विषयों में आसक्ति रखता उसकी धर्म में रूचि हो ही नहीं सकती और होगी तो दिखावे की। धर्म तत्व को जानने के इच्छुक लोगों के लिए धर्म ग्रंथों का ज्ञान ही सर्वोच्च प्रमाण है।
२.वेदों में जहाँ दो कथनों में विरोध हो वहाँ विद्वान लोगों को बराबर महत्व देते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।
३.धर्म के चार लक्षण हैं-१.वेदों द्वारा प्रतिपादित २. स्मृतियों द्वारा अनुमोदित ३. महर्षियों द्वारा आचरित 4. जहाँ किसी विषय में एक से अधिक मत हों वहाँ उस धर्म को अपनाने वाले व्यक्ति की आत्मा को प्रिय। इन कसौटियों पर सिद्ध होने वाला ही प्रामाणिक धर्म है।

Wednesday, February 20, 2008

संत कबीर वाणी:हरि हैं हीरा और भक्त है जौहरी

हरि हीरा, जन जौहरी, ले ले मौड़ी हाटि
जबर मिलेगा पारिषी तब हरि हीरा की साटि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हरि ही हीरा है और जौहरी है हरि का भक्त। हीरे को हाट-बाजार में बेच देने के लिए उसने दूकान लगा रखी है। वहीं और तभी उसे कोई उसे खरीद सकेगा।

पदारथ पेलि करि, कंकर लिया हाथि
जोड़ी बिछ्टी हंस की, पडया बगां के साथि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अनमोल पदार्थ जो मिल गया उसे तो छोड़ दिया और कंकड़ हाथ में ले लिया। हंसों के साथ से बिछुड़ गया और बगुलों के साथ हो लिया।

Saturday, February 16, 2008

चाणक्य नीति:बदहजमी में अच्छा भोजन भी विष होता है

१.स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन जिस प्रकार बदहजमी के अवस्था में लाभ के स्थान पर हानि पहुंचाता है और विष का काम करता है। इस अवस्था में किया गया सुस्वादु भोजन व्यक्ति के लिए प्राणलेवा भी हो सकता है।

२.निरंतर अभ्यास न होने से शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान भी मनुष्य के लिए घातक हो सकता है। वैसे तो वह विद्वान होता पर अभ्यास के अभाव में अपने ज्ञान का विश्लेषण नहीं करता इसलिए वह भ्रमित होता है और अवसर आने पर सही ढंग से काम न करने पर उसे उपहास का सामना करना पड़ता है और सम्मानित ज्ञानीव्यक्ति के लिए अपमान मृत्यु के समान होता है।

३.वृद्ध व्यक्ति यदि किसी युवा कन्या से विवाह कर लेता है तो उसका जीवन मरण के समान हो जाता है। कहा जाता है कि पुरुषों के अपेक्षा स्त्रियों में काम की शक्ति आठ गुना अधिक होती है। हब वृद्ध पति से पत्नी को संतुष्टि नहीं होती वह गुप्त रूप से कहीं और मन लगाने की सोचती है। इसलिए वृद्ध पुरुष को किसी तरुणी से विवाह कर अपना जीवन नरकमय नहीं बनाना चाहिऐ।

४.प्रत्येक अच्छी बुरी वस्तु के लिए सीमा होती है और और उसका अतिक्रमण उसे दुर्गति का शिकार बना देता है.

Monday, January 21, 2008

शेर ही चल सकते हैं आगे-कविता साहित्य

भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि कोशिश में हैं सब
चलते जाते हैं आगे ही आगे
सीना तानकर अपना चलते
पर कोई शेर आ जाये सामने
तो कायरता का भाव उनमें जागे

भेड़ों की तरह भीड़ में चलते
अब में थक गया हूँ
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह
जो कभी सामने नहीं आते
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं भागे-भागे

मन नहीं चाहता किसी को
अपने पंजों से आहत करूं
पर फिर सोचता हूँ कि
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ
चल पडा हूँ
जिन्दगी की उस दौर में
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे
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Tuesday, January 15, 2008

विदुर नीति:झूठा निर्णय देने वाला कष्ट उठाता है

१.पशु के लिए झूठ बोलने वाले से पांच पीढियों को, गौ के लिए झूठ बोलने पर दस पीढियों को, घोडे के लिए असते भाषण करने पर सौ पीढियों को और मनुष्य के लिए झूठ बोलने पर एक हजार पीढियों को नरक में धकेलता है।
२.सोने के लिए झूठ बोलने वाला भूत और भविष्य की सभी पीढियों को नरक में गिराता है. पृथ्वी तथा स्त्री के लिए झूठ कहने वाला तो अपना सर्वनाश कर लेता है इसलिए तुम भूमि या स्त्री के लिए कभी झूठ न बोलना।
३.जो झूठा निर्णय देता है वह राजा नगर में कैद होकर बाहरी दरवाजे का कष्ट उठाता हुआ बहुत से शत्रुओं को देखता।
४.हस्तरेखा देखने वाला, चोरी करके व्यापार करने वाला, जुआरी वैद्य शत्रु, मित्र और नर्तक-इन सातों को कभी भी गवाह न बनाएं।

Friday, January 11, 2008

चजई- ब्लोगर नंबर वन का रास्ता

लिखने में जो मजा है
वह इनाम में कहाँ आता है
जिनकी होती है इनाम पर नजर
उनको लिखना भी नहीं आता
कुछ लोगों के लिए भाषा कभी
मन के भाव की नहीं होती
यह एक व्यापार का जरिया बन जाता है

करते हैं बहुत सारे ढोंग
भाषा को समृद्ध करने का
पर उनका शब्द ज्ञान
पुरस्कारों के सौदे तक ही सिमट जाता है
कहीं से तस्वीर उठाते
कहीं से शब्द चुराते
और अपने ग्रंथालय सजाते
बनते हैं शब्दों के व्यापारी जब निर्णायक
अपनों-अपनों की शक्ल देख पाते
भला अक्ल से कहाँ नाता जोड़ पाते
चेहरे पर होती है मुस्कराहट
मन में स्वार्थ छा जाता है

अख़बार और पत्रिकाओं में तो देखा था
अब अंतर्जाल पर भी
उनकी माया का विस्तार नजर आता है
नाम के लिए बनाते वेब साईटें
कटिंग उठाकर चिपकाते
अपनी मौलिकता सब जगह जताते
सर्वोतम से होते कोसों दूर
पर खिताबों के लिए भीड़ में जुट जाते
जिस भाषा की सेवा करने का करते दावा
उससे उनका कोई रिश्ता नजर नहीं आता है

कहैं दीपक बापू
कलम कोई हमने इनाम पाने के लिए
कभी नहीं उठाई हैं
पर कभी नहीं भायी धोखाधड़ी
इसलिए हास्य कविता से जोड़ दी दिल की लड़ी
कभी पढा नहीं इसलिए ऐसा कर गए
हमारे लिए विषय का जुगाड़ कर गए
उनको निभाना है इनामों से रिश्ता
हमें हास्य कविता से नाता जोड़ना आता है
नही चाहते कभी शिखर
पर ख़ुद ही हमारे सामने खडा हो जाता है
किसी को नंबर वन से हटाना नहीं चाहते
क्योंकि लोगों के दिल से ही रास्ता
ब्लोगर नंबर वन को ले जाता है
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नोट यह एक काल्पनिक हास्य रचना है और इसका किसी घटना या व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है और अगर किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाए तो वही जिम्मेदार होगा.

Thursday, January 10, 2008

रहीम के दोहे:ओछा व्यक्ति बड़ा पद पाकर इतराता है

जो बड़ेन को लघु कहैं नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहै, कछु दुख मानत नाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि जो बडे लोगों को तुच्छ कहते हैं वह कथन मात्र से छोटे हो जाते। गोवर्धन पर्वत धारी श्री कृष्ण को मुरली पकड़ने वाला कहने से कुछ दुख नहीं होता।
भावार्थ- यदि किसी में कोई योग्यता और शक्ति है तो उसको समाज में बहुत सम्मान मिलता है पर अगर कुछ निम्न कोटि के लोग उसकी आलोचना करते हैं तो उसको कोई नहीं सुनता क्योंकि जिसमें शक्ति है उसकी सभी पूजा करते हैं और वह इन बातों की परवाह नहीं करते कि कोई उनके बारे में क्या कह रहा है।

जो रहीम ओछो बढे तौ अति ही इतराय
प्यादे सौं फर्जी भयो, टेढो टेढो जाय


कविवर रहीम कहते हैं कि छोटे व्यक्ति बड़ा पद पाने के बाद अहंकारी हो जाते हैं-जैसे शतरंज के खेल में पैदल चलाने वाला यदि वजीर बन जाये तो वक्र गति से चलने लगते हैं।

भावार्थ-कुछ बहुत ओछी मनोवृति के लोग होते हैं जिनको थोडी योग्यता, संपति या सम्मान मिलता है वह फूल जाते हैं और अपने मुहँ से अपनी बधाई करते हैं और ऐसे दिखावा करते हैं जैसे कि बहुत बडे व्यक्ति हो गए हैं। ऐसे लोगों कि परवाह नहीं करना चाहिऐ.

जो रहीम ओछो बढे तौ अति ही इतराय
प्यादे सौं फर्जी भयो, टेढो टेढो जाय

कविवर रहीम कहते हैं कि छोटे व्यक्ति बड़ा पद पाने के बाद अहंकारी हो जाते हैं-जैसे शतरंज के खेल में पैदल चलाने वाला यदि वजीर बन जाये तो वक्र गति से चलने लगते हैं।

भावार्थ-कुछ बहुत ओछी मनोवृति के लोग होते हैं जिनको थोडी योग्यता, संपति या सम्मान मिलता है वह फूल जाते हैं और अपने मुहँ से अपनी बधाई करते हैं और ऐसे दिखावा करते हैं जैसे कि बहुत बडे व्यक्ति हो गए हैं। ऐसे लोगों कि परवाह नहीं करना चाहिऐ

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