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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Thursday, July 24, 2008

रास्ते दो ही हैं इस दुनियां में-व्यंग्य हिंदी शायरी

चेले ने पूछा गुरू से
‘भारी मानसिक युद्ध में फंसा हूं
कोई उपाय बताईये
जंग है विश्वास की
उससे मुझे पार लगाईये
एक का निभाता हूं
दूसरे का किसी हालत में तोड़ना होगा विश्वास
इधर जाऊं समझ में नही आता
रास्ता कोई आप ही बताईये
आपके उपदेश पर ही है विश्वास’

गुरू ने कहा
‘किस माया के चक्कर में पड़े हो
उसके हैं तीन रूप धन, शक्ति और प्रतिष्ठा
पहले उसका स्वरूप बताओ
विश्वास की कभी जंग नहीं होती
हमारी बुद्धि की गली ही तंग होती
तभी हालत ऐसी आती है
सत्य की कोई परीक्षा नहीं है
जिस पर विश्वास है वह निभाएगा भी
पर माया में ही ऐसा होता है
इसलिये जहां माया मोल तोल में भारी हो
वहीं पहुंच जाओ
चाहे जितना माया का ढेर उठा लाओ
नैतिकता का मानदंड कोई
किसी किताब में नहीं लिखा
आज के लोगों में हमें भी कहीं वह नहीं दिखा
हम तो ठहरे निष्काम
हमें समझ में नहीं आता माया का काम
जिधर ले जाए वहीं होता विश्वास
जिसे नहीं मिलती वही होता निराश
जमाने को लगी है हवा ऐसी
धन और प्रतिष्ठा में
आदमी की बुद्धि का हो गया निवास
सत्य की राह पर चलते हो तो
अधिक सोचना नहीं
पर माया के रास्ते जाओ तो
कर लेना पहले कम और अधिक का आभास
रास्ते दो ही है इस दुनियां में
एक है सत्य का
दूसरा माया का
इस नियम पर करना विश्वास
........................................................................
यह कविता मूल रूप से इस ब्लाग दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान- पत्रिका पर प्रकाशित है। इसे अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं दी गयी है
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, July 20, 2008

हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन-हिंदी शायरी

सपने सजाता है
उनको बिखरता देख
टूट जाता है मन
कहीं लगाने के लिये ढूंढो जगह
वहीं शोर बच जाता है
जैसे जल रहा हो चमन

भला आस्तीन में सांप कहां पलते हैं
इंसानों करते हैं धोखा
नाम लेकर का खुद ही जलते हैं
क्या दोष दें आग को
जब अपने चिराग से घर जलते हैं
वही सिर पर चढ़ आता है
जिसे करो पहले नमन
जब बोलने को मचलती है जुबान
अंदाज हालातों का नहीं करती
चंद प्यार भरे अल्फाज भी
नहीं दिला पाते वह कामयाबी
जो खामोशी दिला देती है
सपनों में जीना अच्छा लगता है
पर हकीकत वैसी नहीं होती अमूनन
.........................................
दीपक भारतदीप


.......................................

Monday, July 7, 2008

फरिश्ते दिखने की कोशिश-हिंदी शायरी

अगर होता अमन इस जहां में
चैन होता हर इंसान में
तो ऐसे कई लोगों के घर में
सन्नाटा रह जाता
जो रहते हैं महलों में
जहां रौशनी बिखरी पड़ी है रात में
कभी इंसान तो कभी उसके जज्बात
उनके निशाने पर होते हैं
कभी करते सौदा
तो कभी कत्ल कर देते हैं उनका
दिल में शैतान उनके
पर फरिश्ते दिखने की कोशिश
करते हैं वह अपनी जुबां से हर बात में
..................................

बरसात में गंदे नालों का पानी लेकर
उफनती हुई चलती हैं नदियां
मुरझाये फूल हैं पर
मेकअप बना देता ऐसे जैसेकलियां
अगर इतरायें नहीं तो
लोग भूल जायें उनकी गलियां
.............................
दीपक भारतदीप

Thursday, June 26, 2008

समय रहते होश में आओ-हिंदी शायरी

जिंदगी भर ख्वाहिशों की फसल बोते रहे
कुछ पर फल लगे, बाकी पर उम्मीद ढोते रहे
प्यार के लिये की खाली पलों की तलाश
पर हिसाब किताब में जिंदगी खोते रहे
खुशियां किसी पेड़ पर नहीं उगा सके
जिस दिल में रहती हैं उसे जगा नहीं सके
जुबान जो बात कह सकती हैं लफ्जों में
उसको समझाने के लिये दौलत के
आंकड़ों का बनाया जाल
जिसमें फंसकर बस रोते रहे
कहें महाकवि दीपक बापू
बरसता है पानी तभी होती है फसल
लहलहाते खेत जब मेहनत होती असल
नीयत बूरी हो तो खेल बिगड़ जाते
मतलब अपने हमेशा नहीं निकल पाते
प्यार पाने से पहले करना जरूरी है
समय रहते होश में आ जाओ
नहीं तो फिर आयेगा एक दिन वह जब
कहोगे हम अपनी जिंदगी बिना चैन के ढोते रहे
.................................

दीपक भारतदीप

Thursday, June 19, 2008

पीकर जो कविता लिख जाते वह होते भाग्यशाली-हिन्दी शायरी


यूं तो शराब के कई जाम हमने पिये
दर्द कम था पर लेते थे हाथ में ग्लास
उसका ही नाम लिये
कभी इसका हिसाब नहीं रखा कि
दर्द कितना था और कितने जाम पिये

कई बार खुश होकर भी हमने
पी थी शराब
शाम होते ही सिर पर
चढ़ आती
हमारी अक्ल साथ ले जाती
पीने के लिये तो चाहिए बहाना
आदमी हो या नवाब
जब हो जाती है आदत पीने की
आदमी हो जाता है बेलगाम घोड़ा
झगड़े से बचती घरवाली खामोश हो जाती
सहमी लड़की दूर हो जाती
कौन मांगता जवाब
आदमी धीरे धीरे शैतान हो जाता
बोतल अपने हाथ में लिये

शराब की धारा में बह दर्द बह जाता है
लिख जाते है जो शराब पीकर कविता
हमारी नजर में भाग्यशाली समझे जाते हैं
हम तो कभी नहीं पीकर लिख पाते हैं
जब पीते थे तो कई बार ख्याल आता लिखने का
मगर शब्द साथ छोड़ जाते थे
कभी लिखने का करते थे जबरन प्रयास
तो हाथ कांप जाते थे
जाम पर जाम पीते रहे
दर्द को दर्द से सिलते रहे
इतने बेदर्द हो गये थे
कि अपने मन और तन पर ढेर सारे घाव ओढ़ लिये

जो ध्यान लगाना शूरू किया
छोड़ चली शराब साथ हमारा
दर्द को भी साथ रहना नहीं रहा गवारा
पल पल हंसता हूं
हास्य रस के जाम लेता हूं
घाव मन पर जितना गहरा होता है
फिर भी नहीं होता असल दिल पर
क्योंकि हास्य रस का पहरा होता है
दर्द पर लिखकर क्यों बढ़ाते किसी का दर्द
कौन पौंछता है किसके आंसू
दर्द का इलाज हंसी है सब जानते हैं
फिर भी नहीं मानते हैं
दिल खोलकर हंसो
मत ढूंढो बहाने जीने के लिये
...........................
दीपक भारतदीप

Wednesday, May 7, 2008

एक पोस्ट साथियों के नाम

ब्लागस्पाट पर मेरे सात ब्लाग ऐसे हैं जो हिंदी फोरमों पर पंजीकृत है और इन पर तीन बार ऐसा अवसर आया है जब एक दिन में 99 तक व्यूज पहूंचे हैं आज यह ब्लाग है जो 100 की संख्या पार कर गया। पंजीकृत ब्लागों से आशय मेरा यह है कि जिनको मैंने स्वयं इन फोरमों पर ईमेल भेजकर कराये हैं। वैसे मेरे दो ब्लाग नारद और चिट्ठाजगत ने मुझसे पूछे बगैर पंजीकृत कर लिये बिना यह जाने कि मैंने उनको प्रयोग के लिये शुरू किया था और उनमें एक ब्लाग ने एक दिन में 183 व्यूज लेकर मुझे हिला दिया जबकि उसकी पोस्टें नगण्य हैं। मैने उसका जिक्र इसलिये नहीं किया क्योंकि मुझे लगा कि मेरे प्रयोग पर भी कोई प्रयोग कर रहा है-और मैं भी अभी प्रयोग जारी रखूंगा। आजकल हिंदी के एग्रीगेटरों के कर्णधार अधिक सक्रिय हो गये है, और किसी भी ब्लाग को खुला नहीं छोड़ते अपने यहां खींच ले जाते हैं। बहरहाल यह कोई शिकायतनामा नहीं लिख रहा।

आज ही मेरे वर्डप्रेस के एक ब्लाग ने बीस हजार की संख्या पार की और उस पर पोस्ट लिखी और स्टेट काउंटर खोलकर जब अपने इस ब्लाग की संख्या देखी तो सोच में पड़ गया। कल लिखी गयी पोस्ट ने अपेक्षा से अधिक पोस्ट जुटाये। यह पोस्ट मैंने आधी अपने विंडो पर और आधी ब्लागस्पाट पर लिखी। वही हुआ जिसकी संभावना थी। कुछ हिस्से मैने कुछ लिखे लोगों ने कुछ और समझे। मैंने देर गये रात यह पोस्ट डाली और मुझे लग रहा था कि अब भला कौन पढ़ेगा? मगर ऐसा लगता है कि कई ब्लाग लेखक तो ताक में बैठे रहते हैं कि कोई अच्छा या अलग हटकर विषय आये तो पढ़ें। सहमति या असहमति एक अलग विषय है पर एक बात तो सिद्ध होती है कि ब्लाग और ब्लाग लेखकों से अलग हटकर लिखे विषय भी यहां हिट पा सकते हैं। कुछ लोग केवल ब्लाग लेखकों से हिट लेने के लिये उनसे संबंधित विषय ही उठाते हैं और हिट लेने में सफल होते हैं और जो ब्लागर अन्य विषय लिखते हैं उनको वैसे हिट नहीं मिलते पर उसके लिये किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

कल की पोस्ट यौन शिक्षा और ब्रह्मचर्य पर थी, जिसमें कुछ हास्य तो कुछ चिंतन था. वैसे यौन शिक्षा और ब्रह्मचर्य जैसे विषयों पर मैंने अधिक अध्ययन किया नहीं किया है और यह जरूरी नहीं है कि मैं किताबों में लिखी हर बात को वैसे ही मान लूं। अपने चिंतन और मनन से मैं कोई नई परिभाषा या अर्थ भी वर्तमान संदर्भों में गढ़ भी सकता हूं। सरस्वती माता की कृपा और अपने प्राचीनतम ग्रंथों के अध्ययन और गुरूजनों की शिक्षा के साथ कुछ नवीनतम विचार और रचना के सृजन करने की प्रेरणा ने मुझे इतना सक्षम बनाया है कि अपने मौलिक विचार व्यक्त कर सकता हूं। मेरे निजी मित्र और साथी कभी मेरे विचारों से सहमत होते हैं और नहीं भी, पर एक बात सभी कहते हैं कि तुम्हारी बात में दम तो है। आशा है कि अपने ब्लाग लेखक साथियों की प्रेरणा से ऐसे ही मेरे ब्लाग बढ़ते रहेंगे।
दीपक भारतदीप

Sunday, April 27, 2008

माफ़ी किस बात की-हिन्दी शायरी

अपनी जिंदगी में कामयाबी पाने का नशा
आदमी के सिर कुछ यूं चढ़ जाता
कि नाकामी झेलने की मनस्थिति में नहंी आता
जजबातों के खेल में
कुछ ऐसा भी होता है
कि जिसकी चाहत दिल में होती
वही पास नहीं आता है
इस जिंदगी के अपने है दस्तूर
अपने दस्तूरों पर चलने वाला
आदमी हमेशा पछताता है

.....................................................

अपने वादे से मुकर कर उसने कहा
‘यार माफ करना मैंने तुम्हें धोखा दिया’
हमने कहा
‘माफी किस बात की
भला कब हमने तुम पर यकीन किया’
.......................................................

Friday, April 25, 2008

स्वयंभू होने का सुख-हास्य व्यंग्य

हम चारों मित्र अलग-अलग जातियों से संबंधित होने के बावजूद कभी ऐसा नहीं लगता कि कोई भेद हो और न ही कभी जातियों पर बातचीत करते हैं और करते हैं तो कभी ऐसा जाहिर नहीं होता कि अपनी जातियों से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। उस दिन पता नहीं अपने मित्र के उपनाम को लेकर चर्चा कर बैठे। हमारे एक मित्र ने उससे पूछा-‘क्या तुम लोगों मे भी कोई गोत्र वगैरह होते है।’’

हमारे मित्र ने कहा-‘‘हां, कभी होते थे पर अब नहीं रहे, पर क्षेत्रवाद के आधार पर तो विभाजन है ही। हालांकि गौत्र के आधार तो हमें भी पता नहीं है।

मुझे अपने एक ऐसे मित्र की याद आयी जो लेखक भी और उससे मेरी पटरी नहीं बैठती। कई बार तो उससे वाद-विवाद काफी तीखा भी हो चुका है। वह कहीं मुलाकात होने पर उल्टी बात शुरू करता और मेरे लिखे पर विवाद करता है। हालांकि जिस मित्र की बात कर रहा हूं वह भी उससे इसी बात से नाराज रहते हैं कि वह हमारे लिखे पर बेकार की कमेंट करता रहता है। बहरहाल हमने अपने उस मित्र से कहा-‘‘हां, मुझे लगता है कि उस बड़बोले का गौत्र तुमसे अलग ही होगा। यार, उससे मेरी कभी नहीं बनती और तुमसे बन जाती है।’8

मेरे मित्र ने मुझसे कहा-‘‘यार, उससे तुम्हारी नहीं बनती यह तो हमें मालुम है पर यह गौत्र वाली बात उससे मत जोड़ो क्योंकि तुम दोनो हो लेखक और मेरे ख्याल से तुम लोगों की वही जाति और गौत्र होता है। कहीं तुम्हारी याद आती है तो हमारे दिमाग में यही बात रहती है कि तुम लेखक हो। तुम तो हिंदी के लेखक हो और कोई अगर तुम में जाति ढूंढेगा तो बेवकूफ ही कहलायेगा। तुम्हारा झगड़ा हिंदी के परंपरांगत लेखकों से कम थोडे+ ही है और हमें उसका लिखा पसंद नहीं है पर है तो वह भी लेखक। वैसे भी तुम लोग अपने लिखे में किसी को बख्शते हो जो हम तुम्हें किसी जाति विशेष से जोड़कर देखें’’

उसकी बात पर सब मित्र सहमत हो गये और मुझे हंसी आयी क्योंकि उसके कहने से मुझे अहसास हुआ कि वह सही कर रहा था-सबसे अच्छा लगा कहने का उसका सहज भाव। वहां एक मौजूद अन्य मित्र बोला-‘‘तभी तो जब हमारे सामने तुम लोगों की बहस होती है तो हम बिल्कुल नहीं बोलते क्योंकि लगता है कि दो लेखकों की लड़ाई में पड़कर अपनी अज्ञानता न दिखा बैठें।’

बहरहाल हम दोनों को स्वयंभू लेखक के रूप में मित्र लोगांे में पहचाना जाता है और मेरे ब्लाग पढ़ने वाले मित्र तो मुझे स्वयंभू लेखक और संपादक भी कहने लगे हैं। पहले मैं खूब सुनता था कि अमुक तो स्वयंभू अध्यक्ष है या सचिव है या संपादक है और जब अपने लिये ऐसी उपमाएं सुनता हूं तो हंसी आती है। स्वयंभू का मतलब है कि आप स्वयं घोषित कर देते हैं पर अन्य कोई नहीं मानता। अगर कोई दूसरा बनाये तो आप घोषित हो जाते हैं नहीं तो स्वयंभू कहलाते हैं। हम पुराने संपादक रह चुके हैं पर अब नहीं हैं और ब्लोग पर लिख छोड़ा है तो वह किसी सेठ का नहीं है जो हमें कोई मान लेगा।

इसके बावजूद स्वयंभू होने में सुख तो लगता है। यह अब महसूस होने लगा है। कल मेरा एक ब्लाग बीस हजार की व्यूज संख्या को पार करने वाला है। आज मुझे एक मित्र ने याद दिलाया और कहने लगा कि-‘‘दस हजार का संदेश तो हम नहीं पढ़ पाये थे पर वह तुम्हारा ब्लोग 19900 पार कर चुका है और कोई जोरदार संदेश लिखना।‘‘

हमने पूछा-‘‘क्या जरूरी है? तुंम ही तो कहते हो कि ब्लागरों के लिये कम लिखो। आम पाठकों के लिये व्यंग्य और कहानी लिखो। फिर क्या जरूरी है कि हम लिखें।’’

वह बोला-‘‘नहीं, मेरा मतलब है कि तुम पाठकों के लिये ही लिखो। यार हम देखना चाहते हैं कि तुंम स्वयंभू संपादक के रूप में कैसे लिखते हो? अगर जोरदार रहा तो हम तुम्हें संपादक के रूप में मान्यता दे देेंगे। तुम ही खुद ही कहते हो कि स्वयंभू उसको कहा जाता है जिसे किसी और की मान्यता नहीं होती। जब मान्यता दे देंगे तो फिर तुम्हारे स्वयंभू होने का प्रश्न नहीं उठता। हां, लेखक तुम हो क्योंकि तुंम्हारा लिखा हमें पसंद है।’

सच बात तो यह है कि हमारे पास इतने ब्लाग हो गये हैं कि और व्यस्तता बढ़ गयी है पर हमारे मित्र वर्डप्रेस के ब्लागों पर व्यूज अवश्य देखते हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि हमारे मित्रों ने यह तक अनुमान लगा लिया कि वह एक दो दिन में इस सीमा को पार कर लेगा।
हमने मित्र के कहने पर घर आते ही पाठकों के लिये बीसहजारीय संदेश लिखने का प्रयास किया पर कई कागज फाड़ चुके हैं। कुछ समझ में नही आ रहा कि क्या लिखें? कहीं ऐसा न हो कि मित्रों से संपादक के रूप में मिली मान्यता खतरे मेंे पड़ जाये। काफी माथामच्ची करने के बाद हमने आज लिखने का विचार छोड़ दिया क्योंकि एक तो वह ब्लाग आज उस संख्या को छू नहीं रहा दूसरा हमने सोचा कि जितना सुख स्वयंभू में उतना मान्यता मिलने में नहीं है। स्वयंभू होने पर लोग छींटाकशी कम ही करते हैं क्योंकि उनके दिमाग में वास्तविक छवि वह नहीं होती जो हम बताते हैं। अभी यह कोई नहीं कहता कि‘यार कैसे संपादक हो’, कहीं मान्यता मिल गयी तो फिर ‘यार कैसे लेखक हो’ कि जगह जुमला संपादक वाला हो जायेगा। स्वयंभू का सुख उठा लें यही बहुत है इसलिये सोचा कि जब ब्लाग बीसहजारीय संख्या को पार करेगा तो स्वयंभू लेखक और संपादक की तरह ही लिखेंगे क्योंकि हमें लगता है कि हम तभी लिख पाते हैं जब अपने को स्वयंभू समझते हैं और बचपन से शायद इसलिये यह लिखने का रोग लग गया।


Thursday, April 24, 2008

दिल के फासले होते है ज्यादा-हिंदी शायरी

हमें क्या पता वह समय भी आयेगा
जब हम जमीन पर खड़े रह जायेंगे
उनका चेहरा आकाश में नजर आयेगा
हमें वह आकाश में उड़ते नजर आते हैं
पर हमारा चेहरा उनको वहां कैसे नजर आयेगा
हमारे दिल में आज भी उनके लिये जगह है
पर कौन उड़कर उनको यह बतायेगा
जमीन और आसमान की दूरी
बहुत होती ज्यादा
पर दिल के फासले उससे भी ज्यादा
हम उनके उड़ने पर बहुत खुश हैं
भला यह बात उनको कौन समझाएगा

Tuesday, March 18, 2008

सामान भी आदमी की तरह पुराने हो जाते हैं-हिन्दी शायरी

अपनी रौशनी बेचने के लिए
पहले अँधेरे वह करवाते हैं
सौदागरों को जमाने से क्या मतलब
उन्हें तो अपनी चीज के दाम सुहाते हैं
आग लगाने का सामान हो या बुझाने का
दोनों ही वह बाजार में सजाते हैं

चैन और अमन कभी बाजार में नहीं मिलते
सुख और प्यार कहीं सजता नहीं
पर सौदागर इनको भी सजाते हैं
डुगडुगी बजाकर सन्देश सुनाने वाले
उनके प्रचार में झूठ को ही सच बताते हैं
ए, बाजारमें सौदा लेने वालों
पैसे के साथ अपनी अक्ल भी साथ ले जाना
चीजें खरीदना पर दिल न लगाना
सामान भी आदमी की तरह पुराने हो जाते हैं
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Friday, March 14, 2008

आदमी व्यस्त नजर आता है-साहित्यक कविता

एक बच्चे के पैदा होने पर
घर में खुशी का माहौल छा जाता है
भागते हैं घर के सदस्य इधर-उधर
जैसी कोई आसमान से उतरा हो
ढूढे जाते हैं कई काम जश्ने मनाने के लिए
आदमी व्यस्त नजर आता है

एक देह से निकल गयी आत्मा
शव पडा हुआ है
इन्तजार है किसी का, आ जाये तो
ले जाएं और कर दें आग के सुपुर्द
तमाम तरह के तामझाम
रोने की चारों तरह आवाजें
कई दिन तक गम मनाना
दिल में न हो पर शोक जताना
आदमी व्यस्त नजर आता है

निभा रहे हैं परंपराएं
अपने अस्तित्व का अहसास कराएं
चलता है आदमी ठहरा हैं मन
बंद हैं जमाने के बंदिशों में
लगता है आदमी काम कर रहा है
पर सच यह है कि वह भाग रहा है
अपने आपसे बहुत दूर
जिंदा रहने के बहाने तलाशता
आदमी व्यस्त नजर आता है
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Sunday, March 2, 2008

फटे हुए मामले पर कुछ नहीं लिखा-हास्य व्यंग्य

चेले को हमें एक निबंध लिखने को दिया और कहा-''कम से कम आधा घंटा तंग मत करना। हम अंतर्जाल पर लिख रहे हैं। बहुत दिन हुए कोई हिट होने वाला मसाला नहीं बना पाए। ''

उसके बाद हम कुर्सी पर आलथी-पालथी मारकर टाईप करने लगे। तो चेला बोला-''बढिया, गुरूजी। वाह मजा आ गया।''

हमने चौंक कर कहा-''क्या बात हैं अभी तो हमने तुम्हें ब्लोग लिखना और कमेन्ट देना सिखाया ही नहीं और तू देखते-देखते सीख गया। देख हमारे पास पढ़ने का तुझे कितना फायदा हो गया। अब तू अपने घर से डबल फीस ले आया कर। यह ब्लोग का विषय मुफ्त में नहीं सीखने दूंगा।''

चेला बोला-''गुरूजी, में ब्लोग की बात नही कर रहा हूँ। आप जिस तरह करवटें बदलकर लिख रहे हैं ऐसे अंग्रेज लेखक करते हैं। मेरे पापा बता रहे थे एक अंग्रेज लेखक ३२ प्रकार की कुर्सियों पर ६४ प्रकार की बैठक आकर लिखते थे। अब आप भी भी जिस तरह करवट बदलकर लिख रहे हैं उससे तो लगता है आप भी देश के नंबर वन हिन्दी ब्लोगर बन जायेंगे। ''

हमें गुस्सा आ गया-''तो तू हमारे जले पर नमक छिड़क रहा है जरूर गुरु माता ने तुझे हमारी फजीहत के बारे में बता दिया है। सुन पहली बात तो यह है कि वह लोग हमारे हलके ब्लोग को उड़ाकर ले गए और पांच रेटिंग रख दी। भारी ब्लोग तो वह लोग उठा ही नहीं पाए। उसके बाद जो हमने हास्य कवितायेँ बरसाईं वह भी बेमिसाल थीं और जमकर हिट हुईं थीं। तेरी गुरु माता तो बस हमारा मजाक बनातीं हैं। दूसरा यह अंग्रेज लेखकों की बात तो मेरे सामने किया ही मत कर। हम भारत के लोग जमीन पर जमीन के और देखते हुए लिखते हैं और इसलिए आज भी हमारा पुराना लिखा दुनिया में सम्मान पाता है। तीसरा यह है कि हम फटे हुए मामले पर लिख रहे हैं और इसलिए सुखासन में बैठकर लिख रहे हैं ताकि कहीं 'फटे में टांग न फंस जाये'।

चेला पहले तो देखने लगा फिर आश्चर्य चकित होते हुए बोला-''इस तरह फटे मामले पर लिखेंगे तो टांग नहीं फंसेगी?''

हमने कहा-''कैसे फंसेगी? कम अक्ल कहीं के! देख नहीं रहा आलथी-पालथी मारकर लिख रहे हैं।''

फिर बोला-''गुरु जी, पर मामला फटा कैसे है?''
हमने कहा-''हमें खुद नहीं मालुम? बस फटा हुआ है। लोग एक दूसरे पर बरस रहे हैं। उनको मिल रहे हैं जोरदार हिट बाकी तरस रहे हैं। ऐसा लगता है कि फटा हुआ मामला ही पढा जा रहा है। लोगों को फुरसत ही नहीं है कुछ और पढ़ने से।''
चेले ने पूछा-''गुरु जी, फिर आप क्यों झमेले में पढ़ रहे हैं। वैसे वह लोग लिख क्या रहे हैं।''
हमने कहा-''यही समझ में नहीं आ रहा है। हमने कल खूब प्रयास किया पर समझ में नहीं आया। कंप्यूटर के सामने उल्लुओं की तरह बैठे रहे।''

चेले ने पूछा-''फिर आप क्या लिख रहे हैं?''
हमने कहाँ-''हम भी लिख रहे हैं पर क्या हमको नहीं मालुम। अगर कुछ पढ़कर समझ में आता समझने वाली बात लिखते। अब हम भी लिख रहे हैं और किसी के समझ में आएगा इसमें हमें भी शक है। बात समझ में आये तो समझ वाली बात लिखें।''
उधर से गुरु माता की आवाज सुनकर किचन में चाय लेने चला गया। वहाँ उसकी गुरुमाता ने पूछा--''तेरे गुरूजी तुझे पढा रहे हैं कि कंप्यूटर से चिपके हुए हैं।''
चेले ने कहा--''गुरु जी फटे मामले पर कुछ आलथी-पालथी मारकर लिख रहे हैं।''
गुरुमाता ने पूछा-''क्यों? आलथी-पालथी मारकर क्यों?
चेले ने कहा-''इसलिए के फटे में टांग न फस जाये।''
गुरुमाता वहीं से जोर से चिल्लाकर बोली-''गुरु जी से कहो, दूसरों के मामले में टांग मत फंसाओ।

चेला चाय के दो कप लेकर आया और बोला-''गुरु जी, आखिर आप लिख क्या ले रहे हो। मुझसे गुरुमाता ने कहा है कि पूछ कर आओ।''

हमने कहा-'' बोल दे। कुछ नहीं लिख रहे। तुझे वहाँ सब कहने की क्या जरूरत थी? जाकर कह दे गुरूजी फटे मामले पर कुछ नहीं लिख रहे हैं।''

Monday, January 21, 2008

शेर ही चल सकते हैं आगे-कविता साहित्य

भीड़ में सबको भेड़ की तरह
हांकने कि कोशिश में हैं सब
चलते जाते हैं आगे ही आगे
सीना तानकर अपना चलते
पर कोई शेर आ जाये सामने
तो कायरता का भाव उनमें जागे

भेड़ों की तरह भीड़ में चलते
अब में थक गया हूँ
सोचता हूँ कि अब बची जिन्दगी
शेरों की तरह लड़ते हुए गुजारूं
कर देते हैं वह शिकार होने के लिए भेड़ों को आगे
सियारों का ही खेल चल रहा है सब जगह
जो कभी सामने नहीं आते
भेडो को शिकार के लिए सामने लाते
खुद चढ़ जाते अट्टालिकाओं भागे-भागे

मन नहीं चाहता किसी को
अपने पंजों से आहत करूं
पर फिर सोचता हूँ कि
मैं किसी की भेड़ भी क्यों बनूँ
चल पडा हूँ
जिन्दगी की उस दौर में
जहाँ शेर ही चल सकते हैं आगे
------------------------------------------

Wednesday, January 2, 2008

मोबाइल पर बात, मोबाइल की बात

मैं और मेरा मित्र दोनों उस चाय की दुकान पर बैठकर चाय पी रहे थे, और हमारे पीछे पांच लोग बैठकर आपस में बातें कर रहे थे

''सुन यह आईपोट जो है बहुत काम का है, इससे फोटो ली जा सकती है, और फिर कंप्यूटर में उसे लोड किया जा सकता है।'' एक बोला।

दूसरा बोला-''देखा जाये तो मोबाइल तो सस्ता रखना चाहिए इसे खरीद लिया जाये, यह तो काफी उपयोग की चीज है।''

फिर शुरू हुआ उनके बीच मोबाइल और उनकी कंपनियों की बातचीत का दौर। 'अमुक कंपनी की स्कीम सही है', अमुक कंपनी से यह फायदा है और यह नहीं है'।
मैं और मेरा मित्र वहाँ आधे घंटे बैठे रहे और उनकी बात सुनते रहे। इस दौरान वह लड़के अपनी मोबाइल पर कभी बात करते और कभी उसे ऐसे ही दबाकर एक दूसरे को दिखाते। चाय पीने के बाद हम दोनों उठकर चाय वाले को पैसे देकर उनके पास से गुजरे तो उनमे से एक मेरी हाथ की तरफ बंधी घड़ी की तरफ इशारा करते बोला-''आपकी घड़ी में समय कितना हुआ है?''
मैंने अपनी घड़ी में देखने की बजाय जेब से मोबाइल निकाला और उसे देखकर कहा-''एक बजकर पैंतालीस मिनट'।
दूसरा बोला-''क्या आपकी घड़ी बंद है जो मोबाइल पर देखकर बताया।''
मैंने कहा-''जब से मोबाइल लिया है तब से घड़ी में समय देखने की आदत तो चली गयी है पर हाथ में घड़ी पहनने की आदत नहीं गयी है। ''
हम दोनों वहा से निकल गए तो पीछे से एक को कहते सुना-''यार, हम भी तो अपनी मोबाइल पर समय देख सकते थे।''

थोडा दूर चलकर मेरा मित्र बोला-''यार, उनको घड़ी देखकर ही समय बता दिया होता, जेब से मोबाइल निकालकर समय बताने की क्या जरूरत थी।''

मैंने कहा-''उनको यह बताने के लिए की इस दुनिया में वही अकेले मूर्ख नहीं है बल्कि और भी हैं। पिछले आधे घंटे से मोबाइल के विषय पर बात तो ऐसे कर रहे थे जैसे कि उन्हें सारी अक्ल है।''
इस देश में हर आदमी को एक न एक विषय चाहिए बात करने के लिए। पहले फिल्म पर बातचीत होती थी फिर टीवी एक विषय हो गया। अब जिसके पास बैठो वही मोबाइल लिए बैठा उस बात कर रहा है या हाथ में पकडे उसकी उपयोगिता बता रहा है। मतलब के सुविधा के लिए बनी चीज जिन्दगी बना लेते हैं।मोबाइल मेरे पास भी है पर वह मैंने अपने कुछ मित्रों के दबाव में लिया था पर उसका अनावश्यक उपयोग करना या दिखावा करना मुझे पसंद नहीं। जब मैं उन लड़कों की बात सुन रहा था तो लग रहा था कि मोबाइल कंपनियों के लिए मुफ्त में माडलिंग कर रहे हैं। इसलिए उन्हें इस तरह जवाब देने में मुझे मजा भी आया।

Sunday, December 30, 2007

क्या लिखूं ''ब्लोगश्री कि ब्लोगरश्री''

दरवाजे पर दस्तक हुई तो ब्लोगर की पत्नी ने खोला सामने वह शख्स खडा था जिसके बारे में उसे शक था कि वह भी कोई ब्लोगर है-उस समय उसके गले में फूलों की माला शरीर पर शाल और हाथ में नारियल और कागज था। इससे पहले कुछ कहे वह बोल पडा-''नमस्ते भाभीजी!
''आप कहीं ब्लोगर तो नहीं है? आप पहले भी कई बार आए हैं पर अपना परिचय नहीं दिया-'' उस भद्र महिला में कहा।

"कैसी बात करती हैं?मैं तो ब्लोगरश्री हूँ अभी तो यह सम्मान लेकर आया हूँ-''ऐसा कहकर वह सीधा उस कमरे में पहुंच गया जहाँ पहला ब्लोगर बैठा था। उसे अन्दर आते देख वह बोला-"क्या बात है यह दूल्हा बनकर कहाँ से चले आये। ''
दूसरे ब्लोगर ने कहाँ-''आपको बधाई हो। मेरा सम्मान हुआ है।''
पहले ब्लोगर ने कहा-''सम्मान तुम्हारा हुआ है, बधाई मुझे दे रहे हो?''
दूसरा-''तुम तो मुझे दोगे नहीं क्योंकि मुझसे जलते हो.''
पहले ब्लोगर उससे कुछ कहता उसकी पत्नी बोल पडी-बधाई हो भाईसाहब, चलो आपका सम्मान तो हुआ। जरूर आप अच्छा लिखते होंगे। इनकी तरह फ्लॉप तो नहीं है।'
दूसरा ब्लोगर-''भाभीजी, आप खुश हैं तो आज चाय का एक कप पिला दीजिये।''
वह बोली-'आप आराम से बैठिये, मैं चाय के साथ बिस्कुट भी ले आती हूँ।''
पहला ब्लोगर बोला-"चाय तक तो ठीक है पर बिस्कुट बाद में ले आना पहले देख तो लूं इसे सम्मान कैसा मिला है?''
पत्नी ने कहा-'चाहे कैसा भी है मिला तो है। आपके नाम तो कुछ भी नहीं है वैसे भी घर मेहमान का सम्मान करना चाहिए ऐसा कहा जाता है।''
वह चली गयी तो दूसरा बोला-''यार, तुम में थोडा भी शिष्टाचार नहीं है, मुझे सम्मान मिला है तो तुम थोडी भी इज्जत भी नहीं कर सकते।

पहला-''यार, जितनी करना चाहिऐ उससे अधिक ही करता हूँ, पहले यह बताओं यह सम्मान का क्या चक्कर है? तुमने अभी तक लिखा क्या है?''

दूसरा-''जिन्होंने दिया है उनको क्या पता?मोहल्ले के लोगों में यह बात फ़ैल चुकी है कि मैं इंटरनेट पर लिखता हूँ। इस वर्ष से उन्होने अपने कार्यक्रम में किसी को सम्मानित करने का विचार बनाया था। मैंने कुछ लोगों को समझाया कि देखो अपने यहाँ भी कई प्रतिभाशाली लोग हैं उनको सम्मानित करना शुरू करो इससे हमारी इज्जत पूरे शहर में बढेगी और अखबारों में खबर पढ़कर अपने नाम भी लोगों की जुबान पर आ जायेंगे।''

पहला ब्लोगर-'यह माला, शाल और नारियल कहाँ से आये इसका खर्चा किसने दिया? और यह हाथ में कौनसा कागज पकड रखा है?''

दूसरा ब्लोगर-''हमारे पास एक मंदिर है उसके बाहर जो आदमी माला बेचता है उससे ऐसे ही ले आया। यह नारियल बहुत दिन से घर में उसी मंदिर में चढाने के लिए रखा था पर भूल गए थे। यह शाल सेल से मेरी पत्नी ले आयी थी पर पहन नहीं पायी, और यह कागज़ नहीं है, उपाधि है, इसे मैंने खुद अपने कंप्यूटर पर टाईप किया है अब इस पर भाभीजी के दस्तक कराने हैं। वहाँ मुझे इस लायक कोई नहीं लगा जिससे इस पर दस्तक कराये जाएं। ''
पहला ब्लोगर हैरानी से उसकी तरह देख रहा था। इतने में वह भद्र महिला उसके लिए बिस्कुट ले आयी तो वह बोला-''भाभीजी, आप मेरे इस सम्मान-पत्र पर दस्तक कर दें तो ऐसा लगेगा कि मैं वाकई सम्मानित हुआ। आपने इतनी बार मुझे चाय पिलाई है सोचा इस बहाने आपका कर्जा भी उतार दूं। ''

वह खुश हो गयी और बोली-''लाईये, मैं दस्तक कर देती हूँ, हाँ पर इनको पढ़वा दीजिये तब तक मैं चाय बनाकर लाती हूँ।''
वह दस्तक कर चली गयी तो पहला ब्लोगर कागज़ अपने हाथ में लेते हुए बोला-''मुझसे क्यों दस्तक नहीं कराये?

दूसरा बोला-''क्या पगला गए हो? एक ब्लोगर से दस्तक करवाकर अपनी भद्द पिट्वानी है। आखिर ब्लोगरश्री सम्मान है?''
पहले ब्लोगर ने पढा और तत्काल दूसरे ब्लोगर के सामने रखी बिस्कुट के प्लेट हटाते हुए बोला-''रुको।
दूसरे ब्लोगर ने हैरान होते हुए पूछा-''क्या हुआ?''
पहले ब्लोगर ने कहा-''इसमें एक जगह लिखा है ब्लोगश्री और दूसरी जगह लिखा है ब्लोगरश्री। पहले जाकर तय कर आओ कि दोनों में कौनसा सही है? फिर यहाँ चाय पीने का सम्मान प्राप्त करो।'
दूसरा ब्लोगर बोला-''अरे यार, यह मैंने ही टाईप किया है। गलती हो गयी।''
पहला ब्लोगर--''जाओ पहले ठीक कर आओ। दूसरा कागज़ ले आओ।
दूसरा ब्लोगर-अरे क्या बात करते हो? ब्लोग पर तुम कितनी गलतिया करते हो कभी कहता हूँ।'
पहला-"तुम मेरा लिखा पढ़ते हो?''
दूसरा-''नहीं पर देखता तो हूँ।'
पहले ब्लोगर की पत्नी चाय ले आयी और बोली-''हाँ, इनको पढ़वा लिया?''
दूसरा ब्लोगर-''हाँ भाभीजी इनको कैसे नहीं पढ़वाता। इनकी प्रेरणा से ही यह सम्मान मिला है।''
पहला ब्लोगर इससे पहले कुछ बोलता उसकी पत्नी ने पूछा-''आप लिखते क्या हैं?''
दूसरा ब्लोगर चाय का कप प्लेट हाथ में लेकर बोला--''बस यूं ही! कभी आप पढ़ लीजिये आपके पति भी तो ब्लोगर हैं।''
वह बोली-''पर आप तो ब्लोगरश्री हैं।''
पहला ब्लोगर बोला-''ब्लोगरश्री कि ब्लोगश्री।''
दूसरे ब्लोगर ने उसकी बात को सुनकर भी अनसुना किया और चाय जल्दी-जल्दी प्लेट में डालकर उदरस्थ कर उठ खडा हुआ और बोला-''बस अब मैं चलता हूँ। और हाँ इस ब्लोगर मीट पर रिपोर्ट जरूर लिखना।''
पहले ब्लोगर ने पूछा-''क्या लिखूं ब्लोगरश्री या ब्लोगश्री?''
दूसरा चला गया और पत्नी दरवाजा बंद कर आयी और बोली-''आप कुछ जरूर लिखना।''
पहले ब्लोगर ने पूछा-''तुमने दस्तक तो कर लिया अब यह भी बता तो क्या लिखूं..........अच्छा छोडो।

जब वह लिखने बैठा तो सोच रहा था कि मैंने तो उससे पूछा ही नहीं कि इस पर कविता लिखनी है या नहीं चलो इस बार भी हास्य आलेख लिख लेता हूँ

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