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Wednesday, May 18, 2011

पर्दे की हकीकत-हिन्दी शायरी (parde ki hakikat-hindi shayari)

इंसानों को भीड़ को
भेड़ों की तरह हांका जा सकता है,
सपने बेचना आना चाहिए।

लोगों की आंखें खुली रहें
पर देख न सकें,
कान बजते रहें
गाना सुर में हो या बेसुर
गाना आना चाहिए।

अपने होश को
जिंदा रखो हमेशा
कर लो दुनियां मुट्ठी में
ज़माने को बेहोश करना आना चाहिए।
---------
चाहे जो भाव खरीदो
सपने बाजार में बिकतें,
मगर सच के आगे नहीं टिकते हैं,
सौदागर खेलते हैं जज़्बातों से
उनके मातहत कलमकार
दाम लेकर ही ख्वाब लिखते हैं।

पर्दे की हकीकत
जमीन पर नहीं आती
भले ही अरमान पूर होते दिखते हैं।
--------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Saturday, May 14, 2011

समाज सेवा कि आप सेवा-हिन्दी हास्य कवितायें (samaj seva ki aap seva-hindi hasya kavitaen)

देशभक्ति और जनकल्याण का
जिम्मा उठाया किसने,
अपने पेट और बैंक में जमा
अपनी रकम के आंकड़े बढ़ाने की
कसम खाई जिसने।
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कमरे के बाहर
लगा दिया उन्होंने
‘समाज सेवा’ का बोर्ड
अंदर काम घिनौने करने लगे,
जमाना भी अक्ल का अंधा
लोग केवल नारे पर ही यकीन कर
वाह वाह का शोर भरने लगे।

अंदर झांककर देखा
जब कुछ अक्लमंदों ने तो पाया
सजा था पूरा कमरा
गरीबों के खून की भरी बोतलों से,
कहीं शराब के छींटे थे
पलंग पर फैले चमकते बिस्तर लगे होटलों से,
खूबसूरत चेहरे
अपने गालों पर दाग लगाये,
बैठे थे प्यार की महफिल सजाये,
सभी अपनी जुबां से
‘आप सेवा’ के दावे करने लगे।’’
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Sunday, May 1, 2011

जंतर मंतर पर कोई भ्रष्टाचार निवारक देवता नहीं रहता-हिन्दी लेख (jantar mantar par bhrashtachar virodhi devata nahin rahata-hindi lekh on anti corruption movment)

           इधर केंद्रीय बोर्ड की परीक्षा का प्रश्न पत्र खुलेआम बिकने की खबर है और उधर जंतर मंतर पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध जुलूस निकाल कर प्रदर्शन करने की भी चर्चा है। ऐसा लगता है कि यह प्रदर्शन शाम को होगा जिसमें मोमबत्तियां भी जलाई जायेंगी। ऐसे में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का का अब तक बूंद भर प्रभाव न होने के लक्षण भी प्रकट हो रहे हैं। जो जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने वाले हैं वह अन्ना हजारे साहब के ही समर्थक हैं ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि क्या वह लोग अपने आंदोलन का परिणाम निकालने का सामर्थ्य रखते हैं या केवल प्रदर्शन कर प्रचार पाना ही उनका लक्ष्य हैं। अन्ना हजारे साहिब और उनके समर्थक दो अलग अलग धाराओं में स्थित हैं। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों ने केवल उनका चेहरा उपयोग में केवल प्रचार पाने के लिये किया है। यहां अब अन्ना साहिब की ईमानदारी नहीं बल्कि उनके समर्थक शीर्ष पुरुषों की क्षमता पर सवाल उठाया जा रहा है।
                   जब अन्ना साहिब का एजेंडा   मान लिया गया तब देश में उनके समर्थकों ने मोमबतियां जलाकर जश्न बनाया जिससे न आम लोगों में न केवल शिक्षित बल्कि अशिक्षित लोग भी आश्चर्यचकित रह गये थे। देश का हर आम और खास आदमी जानता है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लंबी लड़ाई लड़ी जानी है और मोमबतियां जलाना केवल आत्ममुग्धता की स्थिति है।
कुछ लोगों को लगता है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी बाज़ार के सौदागरों से प्रायोजित और उनके प्रचार प्रबंधकों से संरक्षित है। आखिर जो बाज़ार इस भ्रष्टाचार का लाभ उठा रहा है वह क्यों भ्रष्टाचार को प्रायोजित करेगा?
                     इसका उत्तर प्रमाणिक नहीं है पर अनुमानित होने के साथ विचारणीय भीे है। दरअसल विश्व में बाज़ार, अपराध तथा प्रचार जगत के शिखर पुरुषों का का एक गिरोह बन गया लगता है। मुश्किल यह है कि हर संगठन पर उनका वर्चस्व है। ऐसे में कुछ संगठन तथा व्यक्त्तियों की छवि साफ सुथरी बनाये रखना उनके लिये जरूरी है क्योंकि उनके बिना यह गिरोह विश्व समाज पर अपना नियंत्रण स्थापित नहीं सकता है। समाज पर नियंत्रण स्थापित करने के लिये साफ सुथरी छवि वाले लोग तथा पवित्र लगने वाले संगठनों का होना आवश्यक है। भले लोग साफ सुथरे न हो या संगठन पवित्र न हो पर उनकी छवि ऐसी होना आवश्यक है जिससे लोगों का व्यवस्था में विश्वास बना रहे।
                        पहले पुण्यात्मा लोग कहते थे कि इस संसार में पाप पूरी तरह मिट नहीं सकता क्योंकि उससे ही पुण्य की पहचान होती है। उसी तरह अब पापात्मा लोग कहते हैं कि इस संसार से पुण्य कभी मिट नहीं सकता क्योंकि पाप उसी की आड़ में छिप सकता है। सीधी बात कहें तो अब भले काम भी दुष्ट लोग करने लगे हैं। कहीं किसी धर्म, साहित्य, या संस्कृति से जुड़ा काम करना हो तो भले लोग दूर हो जाते हैं क्योंकि उसके लिये साधन जुटाना अब उनके बूते का काम नहीं रहा है। इसलिये बाहुबली और चालाक लोग उस काम को अंजाम देते हैं। तय बात है कि वह इसके लिये स्वच्छ छवि वाला आदमी साथ रखते हैं ताकि उनको पैसा मिले। फिर हमारे देश के सौदागरों ने विश्व में अपना स्थान बना लिया है मगर उनकी कोई इज्जत नहीं करता। बल्कि विदेशी सेठ आकर उनको जनकल्याण करने का उपदेश देते हैं। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबा हमारे भारत देश विश्व में बदनाम हो गया है। ऐसे में बाज़ार के सेठों को लगा होगा कि एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन इस देश में चलते रहना चाहिए ताकि विश्व में कुछ देश की छवि सुधरे तो उनका भी सम्मान बढ़े। भ्रष्टाचार तो मिटवाना नहीं है पर जंतर मंतर पर खालीपीली प्रदर्शन होते रहने से देश के इसके विरुद्ध सक्रिय रहने का संदेश तो विश्व में जाता ही है। फिर साफ सुथरी छवि वाले लोग हमारे देश में हैं यह बताने का भी अवसर मिलता है। सबसे बड़ी बात यह कि लोगों का ध्यान बंटा रहता है और सारे काम चलते रहते हैं। पहले आतंकवाद पर अधिक ध्यान था अब भ्रष्टाचार पर चला गया है। मतलब एक राक्षस की तरफ लोगों का ध्यान लगाये रहो। अनेक लोग शायद इस बात को न समझें पर ज्ञानी लोग इस ध्यान के खेल को जानते हैं जिसमें क्रिकेट एक विषय होता है। बहरहाल यह बात उन्हीं प्रचार माध्यमों-टीवी और समाचार पत्र पत्रिकाओं के प्रसारणों के आधार पर कही जा रही है जो कहीं न कहीं बाज़ार के बंधुआ बन गये हैं। हालांकि यह भी सच है कि इस तरह के प्रदर्शन दबाव बनाने के काम आते हैं।
                      बाबा रामदेव ने एक बार कहा था कि उनसे काम कराने के लिये एक मंत्री ने पैसा मांगा था। उन्होंने नाम नहीं बताया। लोग अब भी पूछते हैं कि पर वह यह कहकर टाल देते हैं कि हमारी लड़ाई भ्रष्टाचारी से नहीं बल्कि उसकी प्रकृति से है। फिर हमें व्यवस्था में बदलावा लाना है जिससे कि भ्रष्टाचार मिटे।
उनका यह विचार सही है पर सच बात तो यह है कि व्यवस्था में बदलाव तभी संभव है जब यथास्थितिवादियों के साथ आमने सामने की लड़ाई लड़ी जाये। जब देश में दो बड़े लोग इतना बड़ा आंदोलन चला रहे हैं तब भी केंद्रीय बोर्ड की परीक्षा का पेपर सरेआम छह लाख रुपये में बिक जाता है। कम से कम उत्तर प्रदेश पुलिस की इस बात की प्रशंसा तो करना चाहिए कि उसने यह मामला पकड़ा। ऐसे में यह सवाल भी आता है कि क्या केवल पुलिस के भरोसे ही सारा काम सौंप देना चाहिए। समाज की अपनी क्या भूमिका हो, इस बात पर भी विचार करना चाहिए। वरना तो भ्रष्टाचार मिटने से रहा।
                 भ्रष्टाचार विरोधी लोग केवल सड़कों पर बिना लक्ष्य के ही प्रदर्शन करते रहें तो उससे क्या लाभ होने वाला है? चूंकि अब हम देख रहे हैं कि देश में कुछ शिखर पुरुष अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने की ठान चुके हैं-ऐसा लगता है कि प्रत्यक्ष रूप से वह इसलिये नहीं आना चाहते क्योंकि अंततः वह कहीं न कहीं बाज़ार की ताकत को जानते हैं। दूसरे जब कानून व्यवस्था बनाने वाले संगठन अब अधिक सक्रिय हो रहे हैं तो समाज में सुधार लाने वाले आंदोलन अब अपनी शैली बदलें ताकि सरकार और समाज का आपसी समन्वय बढ़े।
               इसके लिये उपाय यह है कि
              1. जहां जहां भ्रंष्टाचार व्याप्त है सामाजिक संगठन वहां अपने कार्यकर्ता प्रदर्शन के लिये भेजें। जिन व्यक्तियों पर भ्रष्टाचार का शक प्रमाणित है तो उसके घर पर भी प्रदर्शन करने का विचार करें। एक बात या रखें कि भ्रष्ट आदमी की कमाई वह अकेले नहीं खाता। उसके परिवार और रिश्तेदार भी न केवल खाते हैं बल्कि प्रेरक भी वही होते हैं। याद रखें ऐसे प्रदर्शनों में हिंसा कतई नहीं होना चाहिए क्योंकि वह सारा लक्ष्य बिगाड़ देती है। जो कानून के शिकंजे में है उनका सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए।
           2. जो बड़े पदों पर हैं और उनकी आय और संपत्ति भ्रष्टाचार से बनी हो उनका सम्मान कतई न करें। जिन पत्रकारों, समाजसेवकों और ब्लाग लेखकों को लगता है कि किसी ने गलत काम से पैसे बनाये हैं उसका उल्लेख नाम लेकर करें। आप किसी पर सीधे भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा सकते क्योंकि तब कानून आपका साथ नहीं देगा पर प्रत्यक्ष रूप से दिखने वाली आय से अधिक संपत्ति की चर्चा तो कर ही सकते हैं। इतना ही नहीं कुछ लोग तो ऐसे हैं जो दूसरे के नाम से यह छद्म नाम से संपत्ति भी लेते हैं। इसकी छानबीन करना जरूरी है। अभी कुछ प्रकरणों में जांच एजेंसियों ने ही ऐसे तथ्य उजागर किये जो प्रचार माध्यमों में दिखाई दिये।
                 3. अगर आपको मालुम है कि अमुक व्यक्ति भ्रष्ट है तो उसका आमंत्रण किसी रूप में न स्वीकारें।
एक बात तय रही है कि भ्रष्टाचार किसी का निजी विषय नहीं है। हम यह नहीं कह सकते कि अमुक व्यक्ति हमारा मित्र है इसलिये उससे संबंध रखना पड़ता है भले ही भ्रष्ट गतिविधियों में वह लिप्त है। यह उसका निजी मामला है। 
                 कहने का अभिप्राय यह है कि आपको सामूहिक प्रयास करने तथा हवाई लक्ष्य रखने के साथ ही निजी संघर्ष करते हुए निजी लक्ष्य भी ढूंढने होंगे। वैसे इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले कुछ महीनों से भ्रष्टाचार के विरुद्ध सरकारी और गैरसरकारी तौर पर जो प्रयास हुए हैं उससे एक संदेश तो समाज में चला ही गया है कि दौलत, शौहरत, उच्च पद तथा बाहुबल होने से ही इंसान सब कुछ नहीं हो जाता। ऐसा अगर होता तो अनेक बड़े लोग जेल नहीं पहुंच गये होते। हालांकि यह हैरानी की बात है कि इसके बावजूद भी पेपर आउट जैसी घटनायें हो रही है। मतलब भ्रष्ट लोगों के अंदर डर अभी तक पैदा नहीं हुआ। ऐसे में यह कहना पड़ता है कि अभी आगे और लड़ाई है जिससे सरकार के साथ समाज को मिलकर जूझना होगा। जंतर मंतर पर कोई ऐसा भ्रष्टाचार विरोधी देवता नहीं रहता जो इससे मुक्ति दिला सके।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
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Wednesday, April 27, 2011

जिंदगी और मौत में पैसे की ताकत-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (zindagi aur maut mein paise ki takat-hindi vyangya kavitaen)

उनकी अर्थी 
डोली की तरह सजाई गयी
जिन्होंने उम्र भर
गरीबों के दर्द बांटने का
दावा करते हुए बिताया,
इंसानियत की करते रहे सेवा
पाया जमकर मेवा
इसलिये उनके मिट्टी हो चुके जिस्म को
चमकते हुए दिखायाा।
अमीर की जिंदगी और मौत
हमेशा खास होती है,
गरीब का कभी भाग्य उदय नहीं होता
और देह भी गरीबी में सोती है,
आखिर में यही संदेश सिखाया।
-----------
उन्होने अपनी पूरी जिंदगी
लोगों को यही सिखाया,
दौलत मरने पर साथ नहीं चलती है,।
मगर जब उनकी पार्थिव देह को
चेलों ने कांच के महल में सजाया,
मिट्टी हो चुकी देह को फिर चमकाया,
गरीबों का भला करने वाले जिस्म को
देवताओं जैसा मिला मान
दर्द बांटने में पूरा ज़माना महसूस कर रहा था शान,
तब लगा कि
गरीब की अर्थी तो कफन को तरसती है,
मगर उसकी जिंदगी के भला करने वालों पर
दौलत कुछ यूं बरसती है,
उनकी अर्थी पर भी
देशी घी के चिरागों से रौशनी जलती है,
------------

जिंदगी भर लोगों को
सादगी बरतने का संदेश वह देते रहे,
मगर उनकी अर्थी
शहंशाहों की तरह सजायी गयी।
कहते थे वह
‘मरने के बाद
संसार के दौलत साथ नहीं चलती’
मगर उनके कफन की
कीमत ऊंची थी,
कहते हैं उनको चमत्कारी पुरुष थे,
जो पलट सकते थे संसार कई कायदे
इसलिये उनकी अर्थी भी
रत्नों के साथ डोली की तरह सजायी गयी।
पैसे की ताकत जिंदगी से ज्यादा यूं बतायी गयी।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Friday, April 22, 2011

भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन-हास्य कविता (bhrashtachar ke virodh mein andolan or anti corruption movement-hasya kavita)

समाज सेवक ने अपने चेले को
बुलाकर डांटते हुए कहा
‘‘ यह अखबार में मैंने खबर पढ़ी है
तुम्हारी बीवी भ्रष्टाचार के विरोध में
चौराहे पर आंदोलन लिये खड़ी है,
उसे जाकर बताना
मेरे ही दम पर तुम्हारी रोटी बनाने वाली आग जल रही है
मेरे ही पैसे से खरीदे मेकअप के सामान से
उसकी खूबसूरत शक्ल पल रही है,
उससे कहो भ्रष्टाचार का विरोध छोड़कर,
आंदोलनकारियों से नाता तोड़कर,
अपना घर संभाले
या फिर यहां से होकर विदा तुम संभालो।’

चेला बोला
‘महाराज,
लगता है कि
आप नयी राजनीति समझ नहीं पाये,
इसलिये आपके विरोधी सभी जगह छाये,
आजकल भ्रष्टाचार का विरोध बन गया फैशन,
नहीं उसका रिश्वत रोकने से कोई कनेक्शन,
इधर समाज सेवा संभालने के लिये
पैसा जरूरी है
तो गरीब से भी नहीं रखना दूरी है,
अगर समाज पर काबू रखना है,
प्रसिद्धि और पैसे की मलाई चखना है,
तो आम लोगों के लिये
भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन चलाकर
उनका मन भी बहलाना है,
अपनी हरकतें छिपाने के लिये
उनका समर्थन करने का भी करना जरूरी बहाना है,
कुछ ईमानदार दिखने वाले चेहरे
आंदोलन में सजाये गये हैं,
सोच से पैदल हैं पर विद्वान बताये गये हैं,
मैं आपका सेवक हूं वहां नहीं जा सकता,
वरना मेरे साथ आपका भी नाम
बदनामी की दलदल में फंसता,
इसलिये बीवी को वहां भेजकर
आपका अस्तित्व वहां बचाया है,
इससे हम चाहे जैसे आंदोलन को मोड़ देंगे
मन में आया तो तोड़ देंगे,
इसलिये आप बेफिक्र रहो
अपना घर भी भरते रहो, हमें भी पालो।’’
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Saturday, April 16, 2011

दिल का घाती-हिन्दी हाइकु (dil ka ghati hai-hindi haiku)

(1)
मुख में हंसी
दिल रखे खंज़र
बने थे मित्र।
(2)
ज़ंग शुरू की
मतलब फँसते
बदला चित्र।
__________
(1)
आँखें नम हैं
दिल में रख विष
ढोंगी साथी हैं।
(2)
हमराह है
मगर मित्र नहीं
दिल का घाती है
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Monday, April 4, 2011

नकली कप की खुशी भी नकली-हिन्दी व्यंग्य लेख (nakli cup ki khushi bhi nakli-hindi vyangya lekh)

मुंबई में संपन्न विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 के फायनल या अंतिम मुकाबले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम की जीत पर नकली कप दिया जाना कोई बिना सोची समझी बात नहीं थी अब इस पर विश्वास करना कठिन है। कप लाने वाले जानते थे कि उसे कस्टम वाले रोक लेंगे। अधिकारियों के टीवी चैनलों पर दिये गये बयान की बात माने तो उसे वापस लेने के कोई प्रयास नहीं किये गये। उनको शुल्क मुक्त के लिये कोई आवेदन भी नहीं मिला। आईसीसी का बयान है कि उस नकली कप को अब वह दुबई में अपने मुख्यालय ले जायेगी। इसका मतलब कि कोई ऐसी चाल है जिसका पता नहीं चल पा रहा।
यह सही है कि वह कप भारत में नहीं  रहना था। केवल प्रतीक के रूप में कप्तान को दिया जाना था। यह नियम भी है कि असली कप एक बार कप्तान अपने हाथ में लेता है और अपने खिलाड़ियों से मिलकर फोटो खिंचवाता है। फिर उसे वापस करने दूसरा कप दिया जाता है जो विजेता देश के पास रह जाता है। जो कप मिल गया वही मिलना था पर सवाल है कि औपचारिकता क्यों नहंी निभाई गयी?
इस विषय पर लिखे गये लेख का सर्च इंजिन पर पीछा करते हुए गये तो पता चला कि पाकिस्तान के कुछ लोगों ने एसएमएस अभियान चला रखा है। मतलब वहां खुशी का माहौल है कि भारतीयों को नकली कप मिला। वह निहायत मूर्ख हैं, उनको यह मालुम नहीं कि यह घटना भी उनको खुश करने के लिये प्रायोजित की गयी हो सकती है। पाकिस्तान सेमीफायनल में भारत से हारा जो कि विश्वकप मुकाबलों में उसकी पांचवीं हार है। बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता का मैच जोड़ा जाये तो यह उनकी छठवीं हार है। अब यह अलग बात है कि वह स्वयं अपने खिलाड़ियों पर ही हार फिक्स करने का आरोप लगाते हैं। यह नकली कप भी फिक्सिंग का मामला लगता है। यह असली है या नकली यह अलग विषय है पर पाकिस्तान की हार एक सच है जो वहां के लोगों को माननी ही पड़ेगी।
आईसीसी का मुख्यालय दुबई में हैं जहां के शिखर पुरुषों की पाकिस्तान से हमदर्दी जगजाहिर है। पाकिस्तान में बैठे भारत विरोधियों को मिलने वाला उनका संरक्षण भी किसी से छिपा नहीं है। क्रिकेट को काला करने में दुबई के धनपतियों का हाथ रहा है और भारत इसी कारण उनके यहां मैच नहीं खेलता। कहीं न कहीं यह बात दुबई के धनपतियों को अखरती है। फिर पाकिस्तान में बैठे कुछ लोगों को भारत की हार से चिंता है क्योंकि वह भारत विरोध के कारण ही वहां रह रहे हैं। कहीं न कहीं क्रिकेट की फिक्सिंग में भी उनका नाम आता है। ऐसे में संभव है कि गोरे अंग्रेजों के साथ मिलकर उन्होंने भारत की खिल्ली उड़ाने की यह घटिया योजना बनाई हो हालांकि इससे इतिहास पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। भारत का विश्व कप जीतना उनके लिये असहनीय घटना है। फिर क्रिकेट का भारत सबसे बड़ा धनदाता है पर धनपतियों के तार कहीं न कहीं दुबई और पाकिस्तान से भी निकलते हैं।
यकीनन यह प्रचार में स्कोर का मामला है। इस विश्व कप में पाकिस्तान पिट गया, संयुक्त अरब अमीरात की टीम को शामिल होने का अवसर ही नहीं मिला। दुबई में धनपतियों को अपने दो नंबर के धंधे चलाने हैं। सो यह दुबई और पाकिस्तान के लोगों को खुश करने के लिये किया गया नाटक लगता है कि भारत को नकली कप थमा दिये जाने का समाचार रचा गया। सच यह है कि इसे नकली कप नहीं कहा जा सकता। मिलना तो यही था अलबत्ता औपचारिकता वश आईसीसी का मूल कप न दिया जाना अच्छी बात नहीं है। मगर यह इतनी भी नहीं कि इसे तूल देकर विरोधियों को खुश किया जाये। अलबत्ता असली बात सामने नहीं आ पायेगी क्योंकि हमारे देश में क्रिकेट और उसका व्यापार अलग अलग अभी तक नहीं माने गये पर सच यही है कि क्रिकेट के व्यापारी सभी को खुश रखने का प्रयास कर रहे हैं। व्यापारी आदमी सभी को खुश करता है। वह यहां भी देता है वहां भी देता है। यहां भी लोगों को खुश करता है वहां भी करता है। पाकिस्तान के लोगों को हिन्दी देवनागरी नहीं आती और हम रोमन में लिखने वाले नहीं है जैसा कि वह लिख रहे हैं। वह हम पर हंस सकते हैं पर ऐसा करके हमेें भी अपने पर हंसने का अवसर दे रहे हैं। अगर कोई पाकिस्तानी इसे रोमन में पढ़े तो यह जान ले कि इस पाठ का लेखक प्रतिदिन सुबह हास्यासन करता है और अगले कुछ दिन तक पाकिस्तानी एक विषय रहेंगे। वैसे उन्हें भी खुश होने का हक है भले ही वह नकली कारण से क्यों न हो?
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