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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
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आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Wednesday, May 18, 2011

पर्दे की हकीकत-हिन्दी शायरी (parde ki hakikat-hindi shayari)

इंसानों को भीड़ को
भेड़ों की तरह हांका जा सकता है,
सपने बेचना आना चाहिए।

लोगों की आंखें खुली रहें
पर देख न सकें,
कान बजते रहें
गाना सुर में हो या बेसुर
गाना आना चाहिए।

अपने होश को
जिंदा रखो हमेशा
कर लो दुनियां मुट्ठी में
ज़माने को बेहोश करना आना चाहिए।
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चाहे जो भाव खरीदो
सपने बाजार में बिकतें,
मगर सच के आगे नहीं टिकते हैं,
सौदागर खेलते हैं जज़्बातों से
उनके मातहत कलमकार
दाम लेकर ही ख्वाब लिखते हैं।

पर्दे की हकीकत
जमीन पर नहीं आती
भले ही अरमान पूर होते दिखते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Saturday, October 10, 2009

बेबस क्रंदन-व्यंग्य शायरी (Bebas-vyangya shayri)

वाशिंगटन हो या लंदन
मेलबोर्न हो वैलिंगटन
घिसा जाता है सभी जगह
अपने फायदे का चंदन।
अमन के लिये चारों तरफ नारे लगाये जाते
मगर डालरों में मोह में खुल जाते
दहशतगर्दों के बंधन।
बड़े लोग ढूंढ रहे सभी जगह अपने फायदे,
आम आदमी को काबू करने वास्ते बनाते वही कायदे,
अपनी दौलत शौहरत की रखवाली के लिये
अमीरों ने गरीबों को बनाया गुलाम
तय कर दिये, कागज पर शब्द लिखकर बंधन।
आग लगाकर बुझाने वालों से उम्मीद करना बेकार
न जाने जो हंसना, क्या जाने बेबस का क्रंदन।।

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Friday, October 2, 2009

पुतलों की पोल-हिंदी कविता (putlon ki pol-hindi kavita)

पर्दे के पीछे वह खेल रहे हैं
सामने उनके पुतले डंड पेल रहे हैं।
आत्ममुग्धता हैं जैसे जमाना जीत लिया
समझते नहीं भीड़ के इशारे
अपनी उंगलियों से पकड़ी रस्सी से
मनचाहे दृश्य वह मंच पर ठेल रहे हैं।
भीड़ में बैठे हैं उनके किराये के टट्टू
जो वाह वाही करते हैं
तमाम लोग तो बस झेल रहे हैं।
खेल कभी लंबा नहीं होता
कभी तो खत्म होगा
सच्चाई तो सामने आयेगी
जब उनके पुतलों की पोल खुल जायेगी
तब जवाब मांगेंगे लोग
हम भी यही सोचकर झेल रहे हैं।

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