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Sunday, October 19, 2008

दोबारा जिंदा नहीं हो सकती ईमानदारी-हास्य क्षणिकाएं


नकली घी,खोवा और दूध से
हो रहा है बाज़ार गर्म
दीपावली का जश्न मनाने से पहले
अमृत के नाम पर विष पी जाने के
खौफ से छिद्र हो रहा है मर्म
बिना मिठाई के दीपावली क्या मजा क्या
पर पेट में जो भर दे विकार
ऐसे पेडे भी खाकर बीमार पड़ना क्या
कि जश्न मनाकर जोशीले तेवर
डाक्टर के सख्त सुई से पड़ जाएँ नर्म
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ईमानदारी की कसम खाकर
वह बेचते हैं मिलावटी सामान
क्योंकि अब तो वह मर मिट गयी है इस दुनिया से
चाहे जितनी क़समें खा लो उसके नाम की
दोबारा जिंदा नहीं हो सकती ईमानदारी
कितनी भी बेईमानी करने पर
पकड़ने के लिए किसी आदमी के कान

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2 comments:

neeshoo said...

अच्छा लिखा है बधाई ।

seema gupta said...

दोबारा जिंदा नहीं हो सकती ईमानदारी
कितनी भी बेईमानी करने पर
पकड़ने के लिए किसी आदमी के कान
"ha ha ha ha sach kha, "

Regards

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