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Wednesday, July 31, 2013

चेहरे की असलियत का राज-हिन्दी कविता (chehre ki asliyat ka raj-hindi kavita)



रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे
मन उकता जाता है,
जब तक दूर थे आंखों से
तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,
दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,
अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,
चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,
अपने प्रचार की भूख से बेहाल
लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागर
हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत
इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,
चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर
सूरज की रौशनी में
रंग फीके हो ही जाते हैं,
मुख से बोलना है उनको रोज बोल,
नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,
मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,
कभी झुकना तो कभी इतराना है,
इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत
जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी
कभी कभी कोई हमाम में खड़े
वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,
एक झूठ सौ बार बोलो
संभव है सच लगने लगे
मगर चेहरों की असलियत का राज
यूं ही नहीं छिप पाता है।
------------------


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
--------------
आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
--------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Monday, December 6, 2010

विकीलीक्स के खुलासे में अभी तक मज़ा नहीं आया-हिन्दी व्यंग्य (vikileeks secreat is not for enterntainment-hindi vyangya

विकिलीक्स के खुलासों में मज़ा नहीं आ रहा है। जो खबरें आ रही हैं वह पहले भी आ चुकी हैं। आतंकवादी यह कर रहे हैं वह कर रहे हैं। पाकिस्तान यह योजना बना रहा है और वह छोड़ रहा है। भारत में यह खतरा या वह भय! यह सब पहले भी पढ़ चुके हैं। भारतीय प्रचार माध्यम कई बार ऐसी चीजें देकर अपने विज्ञापन चलाते हैं। कुछ अनोखा नहीं दिखाई या सुनाई नहीं पड़ रहा है।
उधर अमेरिकी सरकार उसके संस्थापक के पीछे पड़ी है। अगर यही खुलासे हैं तो समझ में नहीं आता कि अमेरिकी रणनीतिकार उससे इतने भयभीत क्यों हैं? अमेरिका की विदेश मंत्राणी का कहना है कि यह खुलासे केवल आपसी संवाद हैं और इनका उनके देश की नीति से कोई संबंध नहीं हैं। फिर इतना होहल्ला क्यों?
दरअसल अमेरिका की अर्थव्यवस्था एशियाई देशों पर आधारित है और इन खुलासों में कुछ ऐसा होने की संभावना है जो उन्हीं देशों से संबंधित है जहां के रणनीतिकारों के नाराज होने पर उसे इसके परिणाम भोगने पड़ते हैं।
संगठित प्रचार माध्यम केवल वहीं खबरे दें रहे हैं जिनका कोई महत्व नहीं है। ऐसे में भारत के हिन्दी या अंग्रेजी ब्लाग लेखकों से ही यह आसरा है जो कुछ असाधारण खोज करें। ढाई लाख दस्तावजों को देखना कोई आसान नहीं है। मतलब जो ब्लाग लेखक इधर से उधर भाग रही विकीलीक्स की वेबसाईट पर जायेंगे उनको अपने देश के लिये सामग्री ढूंढना आसान नहीं है। अगर ऐसी ही चलताऊ सामग्री ढूंढेंगे तो उसका कोई मतलब नहंी रह जायेगा। हिन्दी ब्लाग लेखकों के लिंक से वह वेबसाईट देखी थी और लगा कि अगर भारत से संबंधित कुछ ढूंढना है तो बहुत मेहनत करनी होगी। फिर उसमें भी कुछ ऐसा जिसमें भय, खतरा तथा सामान्य समाचार समाचार जैसा न हो। उसमें ऐसा क्या हो सकता है? केवल भारत के शिखर पुरुषों और उनके मातहतों के अमेरिका तथा अन्य देशों से संबंधित व्यवहार या संवाद की ऐसी जानकारी जो अभी तक छिपाई गयी हो। अब तो यह तय हो गया है कि राज्य में बैठे अनेक बड़े अधिकारी वह काम कर रहे हैं जो दुश्मन देश का जासूस भी नहीं कर सकता। ऐसे अनेक अधिकारी जेल मैं हैं और यह कहना ठीक नहीं होगा कि बाकी सब ठीक ठाक हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि देश में इस समय जो घोटालों पर माहौल बना है वह इसी विकीलीक्स में किसी रहस्य को उजागर होने से बचाने के लिये हैं। विकीलीक्स को शायद इधर उधर दौड़ाया भी इसलिये जा रहा है कि किसी भी एशियाई देश की जानकारी अब लोग न देख पायें।
हिन्दी ब्लाग लेखकों में कुछ गज़ब के हैं। इनमें से अनेक न केवल अंग्रेजी और हिन्दी में एक जैसा महारथ रखते हैं। इनमें कुछ का तो वेद और कुरान पर एक जैसा विशद अध्ययन है! इनमें से अनेक वेबसाईटें खंगालते रहते हैं। जब कुछ अपन भाषा वालों के लिये अच्छा लगता है उसका अनुवाद कर प्रस्तुत भी करते हैं। यह कुशल समूह विकीलीक्स पर नज़र नहीं रखता हो यह संभव नहीं है। संभव है यह पूरा दिन वहां कुछ न कुछ ढूढते हों क्योंकि इधर उनकी सक्रियता कम दिख रही है।
ऐसे में उनको करना यह चाहिए कि उन्हें अपनी सरसरी दृष्टि से काम करना चाहिए। अगर वेबसाईट उनके सामने हो तो तुरंत अपने देश से संबंधित सामग्री न होने पर आगे बढ़ जाना चाहिए। इसके अलावा जहां खतरा, भय या योजनाओं की बात हो जो वह पहले से जानते हों उसे छोड़ दें। उनको ढूंढना चाहिए ऐसे व्यवहार, संवाद तथा विचार की जिससे यहां तहलका मच जाये। अब पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री हों या राष्ट्रपति उनकी सोच से हमें क्या लेना देना? यह तो बुत भर हैं जो अमेरिका तथा विदेशी पूंजीपतियों द्वारा बिठाये गये हैं। सेना का हाल सभी को मालुम है। भारत के प्रति रवैया क्या है, यह जानने की जरूरत नहीं है। मुख्य बात है कि दोनों के बीच संपकों को लेकर अंदर क्या काला पीली होता है उसे जानना है। याद रखें कि कमरे के अंदर और बाहर की राजनीति अलग अलग होती है, वैश्विक उदारीकरण के इस इस दौर में दोस्ती और दुश्मनी भी क्रिकेट मैच की तरह फिक्स होती है। ऐसे हिन्दी ब्लाग लेखकों के ब्लाग पढ़ने में मजा भी आता है जो खोज परक जानकारी अपने ब्लाग पर देते हैं। वैसे अगर इनमें से कोई महारथी विकीलीक्स का भारतीय संस्करण बना डाले तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। भारत के आम पाठक इस बात का अनुमान नहीं कर सकते कि साफ्टवेयर में भारत का पूरे विश्व में लोहा माना जाता है और इसमें कुशल अनेक लोग ब्लाग भी लिखते हैं। उनके बारे में तभी अनुमान किया जा सकता है जब हिन्दी ब्लाग लेखन पर सक्रिय रहा जाये भले ही लेखक के रूप में नहीं एक पाठक के रूप में ही सही।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Friday, December 21, 2007

धीरज रखो वह दिन भी आयेंगे, सबके ब्लोग हिट हो जायेंगे

इस समय हिन्दी जगत में चार चौपालें हैं-नारद, ब्लोगवाणी, चिट्ठा जगत और हिन्दी ब्लोग। एक ब्लोगर के रूप में मैं इनमें सभी के प्रति एक जैसा भाव रखता हूँ और जो अन्य ब्लोगर हैं उनको भी यह सुझाव देता हूँ की वह चारों पर बराबर चहलकदमी करें ताकि इसके कर्णधारों और तकनीशियनों का मनोबल बना रहे। ऐसा नहीं है कि इनमें किसी का महत्व कम है। जब हम एक साथ यहाँ लिख रहे हैं तो आत्मीय भाव बनता ही है और किसी के प्रति कम और अधिक हो सकता है पर इसका यह आशय कदापि नहीं है कि हम सार्वजनिक रूप से उसे प्रदर्शित करें।
मैं कंप्यूटर तकनीकी के बारे में अधिक नहीं जानता पर अंतर्जाल पर निरंतर घूमते- फिरते कई ऐसी चीजें दिखाईं देती हैं जो कई तरह के नये आभास देती हैं। इनके आधार पर मैं कह सकता हूँ कि इन चारों की आपस में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। चारों में बस एक ही समानता है वह यह कि हिन्दी के ब्लागर इनसे जुडे हैं और वह इनके साथ भानात्मक रूप से लगाव अनुभव करते हैं । वैसे इन सबके मार्ग अलग-अलग हैं और उनके सामने चुनौतियां भी अलग हैं। मेरा ब्लोग कई और जगह भी है फिर मैं इन चौपालों की बात ही क्यों कर रहा हूँ। इन चौपालों का महत्व मैं समझता हूँ। आपने देखा की ब्लोगर ने वेबसाईट बना ली पर इन चौपालों पर बने हुए हैं। इसका कारण यहाँ बने रहने का मतलब है कि आपकी ब्लोग भी वेब साईट जैसी ताकत रखते हैं। इन चौपालों के कार्य और परिणाम अलग-अलग है पर उस पर मैं अभी प्रकाश नहीं डालूँगा क्योंकि इस समय कई ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अब इन सबको जो सामूहिक चुनौती मिलने वाली है।
चिट्ठाजगत के कर्णधार ने कल चिट्ठजगत पर एक वेबसाईट डाली थी और बताया था कि वह उनके सामने परेशानी पैदा करने आ जाती है-और यह नये परिवर्तन करने के बाद आ रही हैं। वह इसका मतलब जो भी समझे पर मैं कुछ और ही समझ रहा हूँ। चिट्ठजगत से मेरा संवाद रहा है और मैंने उनको साहित्य और आध्यात्म की श्रेणी का विचार बताया था। उनका जवाब था कि हमारी श्रेणियां अंतर्राष्ट्रीय मानक के अनुसार हैं। मेरी बताई श्रेणियों में में मेरी दिलचस्पी नहीं है क्योंकि उनमें मेरे ब्लोग स्वत: हे चहलकदमी कर रहे हैं पर यह अंतराष्ट्रीय मानक ज़रा विचार का विषय था। क्या चिट्ठजगत की श्रेणियां दूसरी वेबसाईटों पर भी हैं और वह क्या नहीं चाहतीं की कोई चौपाल इसका उपयोग करे। याद रखना इन श्रेणियों का मतलब यह है कि हमारे ब्लोग वहाँ होंगे और हो सकता है वह किसी को चुनौती देते हों। मेरे अपने ब्लोगों की पोस्टें सवा सौ से ऊपर श्रेणियों में हैं और वह उतनी जगह प्रकट होती हैं वेब साईटों के बाद। कहीं-कहीं तो अकेले ही मेरी पोस्टें धक्के खातीं हैं। चिट्ठाजगत के वेब साईट है और वह अपनी श्रेणियों के साथ चलकर कई वेब साईटों को चुनौती दे सकता है पर उनका यह संकट अकेले का नहीं है। बाकी चौपालें भी ऐसे संकटों का सामना कर सकती हैं। वजह हिन्दी के ब्लागर यहाँ है तो पाठक भी यहाँ आ रहे हैं और आयेंगे।
जो इस समय ब्लोगर हैं वह अपने श्रम की वजह से हैं वरना क्या जरूरत पडी हैं कि ब्लोगर अपनी पोस्टों पर लिखकर एक-दूसरे को सिखाते हैं? क्या वह लिखने में श्रम नहीं लगता। जैसे हिन्दी चौपालों पर रौनक बढेगी उसमें अपने लिए लाभ तलाशने वाले आयेंगे। दूसरी बात यह है कि यहाँ पाठक बने तो उसे अपने यहाँ खींचने की प्रतियोगिता शुरू होगी। जो लोग आर्थिक लाभ उठाते हैं वह अपनी तरफ से कोई नया स्त्रोत नहीं बनाते बल्कि पहले मौजूद स्त्रोतों का उपयोग करते हैं। हमारे ब्लोगरों ने अपने श्रम से जो ढांचा खडा किया है उसका दोहन करने के लिए लोग सक्रीय होंगे। वहाँ श्रीश शर्मा, सागर चंद नाहर, रवि रतलामी, उन्मुक्त और देवाशीष की तरह कोई सिखाने वाला नहीं है बल्कि इनके सिखाये का अपने हित के लिए उपयोग करनी की उन लोगों में इच्छा होगी।
मुझे यहाँ लोगों ने सिखाया है पर कई चीजों का उन्हें भी अंदाजा नहीं है और है तो जाहिर नहीं कर रहे हों। अपने मेरे कुछ ब्लोगों पर ऐसे नोट देखे होंगे जिसमें मैंने केवल ब्लोगर को ही अपने ब्लोग लिंक करने की छूट दी है। ब्लोगर में वह चौपालें भी जहाँ मैं पंजीकरण कराता हूँ। इसके बावजूद कुछ वेब साईट जिन पर विज्_ंजापन भी है मेरे ब्लोग लिंक कर रहीं हैं। अभी अधिक व्युज नहीं है पर हो सकता है कि मैं उन पर आगे चलकर आपत्ति उठाऊँ। बहरहाल अभी आपस में मतभेद हों कोई बात नही पर मनभेद मत करना। इन चौपालों के ब्लोगरों को अपना पाठक बनाने के लिए कई प्रयास होंगे पर उन्हें कोई आथिक फायदा हो यह सिर्फ चौपालों की सहायता से संभव होगा-क्योंकि तकनीकी और व्यवसायिक जानकारी हमें यहीं से मिल सकती है। मैं आपसी टकराव में कोई हित नहीं देखता। चौपालों के कर्णधार भी यह समझें कि उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है और ज़रा-ज़रा सी बात पर कोई कड़ी कार्यवाही करना कोई उचित नहीं है। वह ऐसे ब्लोग आन्दोलन की सफलता से अपने हाथ धो बैठेंगे जिसे बडे परिश्रम से शुरू किया है। चौपाल को बनाने मैं कितनी मेहनत होती हैं वह जानते हैं और मैं परिश्रमी लोगों को देखता हूँ तो सोचता हूँ कि उनको अधिक से अधिक लाभ हो क्योंकि मुझे आज दिमागी और शारीरिक दोनों दृष्टि से परिश्रम करना पड़ता है और यही कहना कि धीरज रखो अपने दिन भी आयेंगे, जब सबके ब्लोग हिट हो जायेंगे।

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