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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
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आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Monday, December 27, 2010

इंसानी दुनियां का दस्तूर-हिन्दी शायरी (insani duniya ka dastur-hindi shayari)

गरीबों और मज़दूरों की
दर्दनाक हालत पर रोते हुए
वह बड़े ख्यालात के इंसान होने की
पदवी जुटाते हैं,
वही करते हैं उन बादशाहों की खिदमत
इसलिये इनामों से नवाजे जाते हैं।
इंसानी दुनियां का दस्तूर यही है
लफ्जों के जादूगर बहुत हुए
उनके अल्फाजों की चर्चा
चाहे कितनी भी हो जाये
ज़माने के हालात कभी नहीं बदल पाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Thursday, June 3, 2010

जगहंसाई-हिन्दी शायरी (jaghasai-hindi shayari)

किसी की दौलत और शौहरत देखकर
क्यों अपना दिल जला रहे हो,
अपने चिराग खुद जलाओ
दूसरों की रौशनी देखकर
अपनी आंखें क्यों गला रहे हो।

कह दिये किसी ने अपशब्द
भूल जाने में ही भलाई है,
रोकर सभी को दर्द बयान करने
व्यर्थ में ही जंगहंसाई है,
बोलने वाले को जलने दो
अपनी आग में
तुम क्यों याद कर
अपनी सोच को कांटों पर चला रहे हो।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Saturday, April 3, 2010

दौलत का किला-हिन्दी शायरी (daulat ka kila_hindi shayri)

कैसे यकीन करें
उनके वादों पर
खड़े कर लिये अपने रहने के लिये महल,
करते हैं गरीबों के लिये झुग्गियों की पहल,
लोहे के चलते किलें में करते हैं सफर,
टूटी सड़कों बनाने का वादा करते मगर,
हर बार चमकते हैं आंखों के सामने
जब वादों का मौसम आता है।
उनकी ईमानदारी की कसमों पर यकीन
कैसे करें
क्योंकि दौलत का किला तो
बेईमानी और छलकपट से ही तो बन पाता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
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Friday, January 29, 2010

जमाने के सरताज-हिन्दी क्षणिकाएँ (zamane ke sartaj-hindi shayri)

खजाना भरने  वालों को

भला कहां सम्मान मिल पाया,

चमके वही लोग

बिना मेहनत किये जिनके वह हाथ आया।

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शरीर से रक्त

बहता है पसीना बनकर

कांटों को बुनती हुई

हथेलियां लहुलहान हो गयीं

अपनी मेहनत से पेट भरने वाले ही

रोटी खाते बाद में

पहले खजाना  भर जाते हैं।

सीना तानकर चलते

आंखों में लिये कुटिल मुस्कराहट लेकर

लिया है जिम्मा जमाने का भला करने का

वही सफेदपोश शैतान उसे लूट जाते हैं।

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अब लुटेरे चेहरे पर नकाब नहीं लगाते।

खुले आम की लूट की

मिल गयी इजाजत

कोई सरेराह लूटता है

कोई कागजों से दाव लगाते।

वही जमाने के सरताज भी कहलाते।


कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Monday, January 25, 2010

ताजे खून के ढूंढ रहे गुमाश्ते-हिन्दी शायरी (taza khoon dhoondh rahe-hindi shayri)

कभी शिकायत नहीं की अपने दर्द की

शायद इसलिये उन्होंने बेकद्री का रुख दिखाया,

इशारों को कभी समझा नहीं

काम निकलते ही अपनों  से अलग परायों में बिठाया,

जब अपने मसले रखे उनके सामने

बागी कहकर, हमलावरों में नाम लिखाया

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नयी पीढ़ी को आगे लाने के वास्ते,

खोल रहे हैं सभी अपने रास्ते।

पुरानों को बरगलाना मुश्किल है

उनकी जेबें हैं खाली, बुझे दिल हैं

खून जल चुका है जिन बेदर्दो की तोहीन से

ताजे खून के लिये वही ढूंढ रहे गुमाश्ते।

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वह देश और समाज का भविंष्य

सुधारने के लिये उठाते हैं कसम,

जबकि अपनी आने वाले सात पुश्तों का

खाना जुटाने के लिये लगाते दम।

उनके काम पर क्या उठायें उंगली

आखें खुली है

पर अक्ल के पर्दै मिराये बैठे हम।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, September 27, 2009

मुख में राम, बगल में रावण का साया-हास्य व्यंग्य कविता (mukh men ram, pas me ravan-hasya vyangya kavita)

सुनते हैं मरते समय
रावण ने राम का नाम जपा
इसलिये पुण्य कमाने के साथ
स्वर्ग और अमरत्व का वरदान पाया।
उसके भक्त भी लेते
राम का नाम पुण्य कमाने के वास्ते,
हृदय में तो बसा है सभी के
सुंदर नारियों को पाने का सपना
चाहते सभी मायावी हो महल अपना
चलते दौलत के साथ शौहरत पाने के रास्ते,
मुख से लेते राम का नाम
हृदय में रावण का वैभव बसता
बगल में चलता उसका साया।
.........................
गरीब और लाचार से
हमदर्दी तो सभी दिखाते हैं
इसलिये ही बनवासी राम भी
सभी को भाते हैं।
उनके नायक होने के गीत गाते हैं।
पर वैभव रावण जैसा हो
इसलिये उसकी राह पर भी जाते हैं।

....................................
पूरा जमाना बस यही चाहे
दूसरे की बेटी सीता जैसी हो
जो राजपाट पति के साथ छोड़कर वन को जाये।
मगर अपनी बेटी कैकयी की तरह राज करे
चाहे दुनियां इधर से उधर हो जाये।
सीता का चरित्र सभी गाते
बहू ऐसी हो हर कोई यही समझाये
पर बेटी को राज करने के गुर भी
हर कोई बताये।
....................

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कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, July 10, 2009

आखिरी सच-व्यंग्य कविता (akhri sach-hindi vyangya kavita)

डरपोक लोगों के समाज में
बहादुर बाहर से किराये पर लाये जाते हैं.
किसी गरीब को न देना पड़े मुआवजा
इसलिए किसी की कुर्बानी
कहाँ दी गयी
इससे न होता उनका वास्ता
उधार के शहीदों के गीत
चौराहे पर गाये जाते हैं.

कमअक्लों की महफ़िल में
बाहरी अक्लमंदों के
चर्चे सुनाये जाते हैं
किसी कमजोर की पीठ थपथपाने से
अपनी इज्जत छोटी न हो जाए
इसलिए उनको दिए इसके दाम
सभी के सामने सुनाये जाते हैं.
घर का ब्राह्मण बैल बराबर
ओन गाँव का सिद्ध
यूंही नहीं कहा जाता
दौलतमंदों और जागीरदारों की चौखट पर
हमेशा नाक रगड़ने वाले समाज की
आज़ादी एक धोखा लगती है
फिर भी उसके गीत गाये जाते हैं.
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उसने कहा ''मैं आजाद हूँ
खुद सोचता और बोलता हूँ.''
उसके पास पडा था किताबों का झुंड
हर सवाल पर
वह ढूंढता था उसमें ज़वाब
फिर सुनाते हुए यही कहता कि
'वही आखिर सच है जो मैं कहता हूँ

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