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Monday, May 20, 2013

विशेष रविवारीय लेख-क्रिकेट मैचों पर सट्टा लगाने वाले लोग मासूम नहीं special sandey article-cricket matchon par satta lagane wale log masoom nahin



         कभी भारतीय जनमानस के नायक रहे श्रीसंत ने अपने आचरण ने स्वयं को खलनायक के पद पर प्रतिष्ठत कर लिया है।  लोगों की याद्दाश्त कमजोर होती है पर लेखकों को अपने दिमाग में अनेक यादें संजोकर  रखनी पड़ती हैं ताकि कभी उनका उपयोग किया जा सके।  2009 में बीसीसीआई की क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड में बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता जीती थी। फाइनल में श्रीसंत ने पाकिस्तान के आखिरी खिलाड़ी मिसबा उल हक की चार रन के लिये उड़ती जा रही गेंद लपककर मैच जितवा दिया था। गेंद अगर बाहर जाती तो पाकिस्तान जीत जाता।  उस समय तक क्रिकेट मैचों का बीस ओवरीय प्रारूप भारत में लोकप्रिय नहीं था। इतना ही नहीं भारत में क्रिकेट खेल की प्रतिष्ठा भी कम होती जा रही थी।  उस कैच ने न केवल बीस ओवरीय प्रारूप को भारत में लोकप्रिय बनाया वरन् क्रिकेट खेल की प्रतिष्ठा भी वापस दिलवाई।  हमारे यहंा लोकप्रियता का पैमाना लोगों की आंखों में सम्मान से कम उनके खर्च करने वाले पैसों के आधार पर तय की जाती है।  फिल्म का नायक ज्यादा पैसा लेता तो वह नंबर वन होता है।  खिलाड़ी की  लोकप्रियता इस आधार पर तय होती है कि उसे प्रदर्शन पर  पैसा कितना मिलता है?  खेल की लोकप्रियता इस आधार पर तय होती है कि उस दाव कितना लोग लगाते हैं!
        बहरहाल श्रीसंत चेहरे से जहां सुंदर थे वहीं उनकी गेंदबाजी भी गजब की थी।  पता नहीं लोकप्रियता का मतलब उनकी नज़र मे क्या था?  उन्हें पता ही नहंी भारतीय जनमानस में उनकी प्रतिष्ठा कितनी थी?  अगर इसका विचार होता तो वह कभी उन आरोपों के शिकार नहीं होते जो उन पर लगे हैं।  श्रीसंत का खेल निरंतर गिरता जा रहा था।  फिर वह अनेक बार जब बीसीसीआई की टीम में नहीं दिखते तो हैरानी होती थी। कहा जाता था कि उनको चोटें परेशान कर रही हैं!  उनके प्रशंसकों  को लगता था कि उनके साथ अन्याय हो रहा है।  यह अब पता चला है कि वह अपनी प्रतिष्ठा का नकदीकरण करने लग गये थे। क्रिकेट में पाने के लिये अब उनके पास कुछ नहीं था!  विश्व कप जीतने वाले खिलाड़ी के लिये बाकी सारे मैच छोटे हो जाते हैं।  श्रीसंत निरंतर अच्छा खेलते तो उनके लिये कोई उपलब्धि विश्व कप से बड़ी नहीं होती।  शायद यही कारण है कि उनके लिये अब धन अधिक महत्वपूर्ण हो गया होगा।   पार्टियों में सुंदरियों के साथ नाचते हुए उनके फोटो इस बात का प्रमाण है कि उनका लक्ष्य केवल अपनी  विश्व कप विजेता की छवि भुनाना भर था।  सच बात तो यह है कि एक खिलाड़ी के रूप में अब उनके सामने अपने अस्तित्व का संकट है पर उनके प्रशंसकों के लिये तो दिल टूटने वाली स्थिति है। बीस ओवरीय प्रतियोगिता के फायनल में मिसबा उल हक का कैच लेकर उन्होंने जो प्रतिष्ठा कमाई थी वह इस तरह मिट्टी में मिल जायेगी यह कल्पना कौन कर सकता था?
           क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिताओं में फिक्सिंग होती है यह चर्चा आम रही है।  लोग कह रहे हैं कि श्रीसंत की वजह से क्रिकेट कलंकित हुई है तो थोड़ा आश्चर्यजनक भी लगता है।  जो लोग इस पर सट्टा लगाकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करते हैं उनके बारे में भी तो कुछ कहना ही चाहिये।  ऐसा दिखाया जा रहा है कि सट्टा लगाने वाले आम लोग कोई मासूम हों! हैरानी होती है यह सब सुनकर! एक नहीं दस बार यही प्रचार माध्यम कह चुके हैं कि वहां फिक्सिंग वगैरह होती है।  इसके बावजूद क्या लोगों की अक्ल मारी गयी है? कहा जाता है कि भारत में क्रिकेट एक धर्म की तरह है! यह केवल कोरी बकवास है। हमने बरसों से क्रिकेट देखी है। बीसीसीआई को टीम से कभी बहुत लगाव रहा पर अब पता लगा कि वह तो एक निजी संस्था है।  फिर भी अनेक बार समय मिलने पर क्रिकेट मैच देखते हैं। किसी खिलाड़ी के प्रति लगाव होता है तो उसकी सफलता पर खुश होते हैं।  किसी खिलाड़ी से लगाव नहीं है तो फिल्म की तरह देखते हैं।  सट्टा लगाकर स्वयं खिलाड़ी बनेंगे तो फिर खेल का मजा क्या खाक लेंगे? सीधी बात कहें तो सट्टा लगाने वाले अपने लिये खेलते हैं।  वह दर्शक नहीं खिलाड़ी होते हैं। एक खिलाड़ी जब स्वयं खेलता है तो वह दूसरे का खेल नहीं देख पाता। खेल देखने के लिये दर्शक बनकर बैठना जरूरी है।  शायद क्रिकेट में बढ़ता सट्टा ही उसे धर्म के नाम से पुकारने के लिये प्रचार माध्यमों को मजबूर कर रहा है।  जैसे हर धर्म में कर्मकांड होता है वैसे ही क्रिकेट धर्म का कर्मकांड शायद मैच फिक्सिंग है।  क्लब स्तरीय प्रतियोगिता में छक्के चौके पर नर्तकिंया नृत्य करती हैं। नर्तकियों के भी दो झुंड होते हैं जो अपनी अपनी टीम की सफलता पर त्वरित नृत्य करती हैं।  हमने क्लब सुने हैं, बार सुने हैं जहां नर्तकिंया नृत्य कर आगंतुकों का मन बहलाती हैं पर उनकी स्थापना के लिये सरकारी लायसेंस जरूरी माना गया है।  क्लब स्तरीय प्रतियोगिताओं के नृत्य के लिये लायसेंस अनिवार्य नहीं है यह देखकर हैरानी होती है।
    अभी तो जांच एजेंसियों  ने मैच फिक्सिंग को लेकर कार्यवाही की है। कल को वह इस नृत्य कार्यक्रम के लिये लायसेंस न होने की बात कहकर भी कार्यवाही कर सकती है।  मगर ऐसा होगा नहीं क्योंकि क्रिकेट एक धर्म बनाकर प्रचारित किया जा रहा है। अगर उसमें नृत्य पर पुलिस कार्यवाही करती है तो कहा जायेगा कि सर्वशक्तिमान के अनेक रूप  के दरबार में भी तो नृत्य होते हैं तब वहां कार्यवाही क्यों नहीं करते? तय बात है कि धर्मनिरपेक्षता की दुहाई दी जायेगी।  देश का चालीस से पचास हजार करोड़ रुपये इस सट्टे की भेंट चढ़ता है।  ऐसे में मन में एक प्रश्न होता है कि क्या क्या गायों, भैंसों या बकरियों के पास पैसा है जो यह धन लगाती हैं। तय बात है कि मनुष्य ही सट्टा लगाते हैं।  जब क्रिकेट को धर्म बताने वाले प्रचार माध्यम ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस क्लब स्तरीय क्रिकेट प्रतियोगिता में सट्टा और मैच फिक्सिंग की बात कहते रहे हैं तो क्या हमारे देश के मनुष्य जातीय समाज को यह बात समझ में नहीं आ रही।
संत कबीर दास जी कह गये है कि
सांई इतना दीजिये, जा में कुटुंब समाय
आप भी भूखा न रहूं, अतिथि भी भूखा न जाये।
       शायद उन्होंने यह याचना इसलिये की थी कि अधिक धन आने पर मति मारी जाती है।  जिनकी मति मारी जाती है वह मनुष्य पशु समान होता है।  तब क्रिकेट मैचों पर सट्टा लगाकर बरबाद होने वाले मनुष्य के हमदर्दी समाप्त हो जाती है।  बहरहाल हम क्रिकेट मैचों के साथ ही उन पर बाहर हो रही चर्चा देखकर यह सोचते हैं कि हम किसमें दिलचस्पी दिखायें। मैचों पर या बहस में!  इधर मैच चल रहा है तो उधर बहस चल रही है।  बार बार टीवी का चैनल बदलते हैं।  न इधर के रहते हैं न उधर के!  तब हमें एक ही मार्ग बेहतर लगता है कि स्वयं ही कुछ लिख डालेें। यह लेख उसी विचार का परिणाम है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, May 4, 2013

भारतीय योग संस्थान के शिविर में जाने पर कुछ सीखने को मिलता ही है-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी लेख (bhartiya yoga sansthan ke shivir mein jane par kucch seekhne ko milta hee hai-special sanday hindi article,visheh ravivariya hindi lekh)



    
भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविर का दृश्य
जब कभी भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविरों में जाने का अवसर मिलता है तब हमें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि वहां विद्वानों के विचार सुनकर कुछ न कुछ नया विचार मिलता है। दरअसल अगर यह कहें कि कोई नया विचार मिलता है तो स्वयं को अजीब लगता है क्योंकि उनके विचार हमारे दिमाग मेंकहीं न कहीं  हमेशा रहते हैं।  बस
, उनको सार्वजनिक रूप से कहने का अवसर नहीं मिलता या हम उनहें  ढूंढते नहीं है।  अपने ब्लॉग पर अक्सर हमने भारतीय योग विद्या के बारे में लिखा है।  उसके लाभों की चर्चा करते हुए हमने अनेक पाठ लिखे हैं।  इन शिविरों में जाने पर हर विचार हमें नया लगता ही है चाहे भले ही वह कभी हमारे अंतर्मन में स्थित होकर विचरता रहा हो।  एक तरह से कहें तो मस्तिष्क में चल रहा विचार जब पुष्ट होता है तो वह नवीन हो जाता है। दूसरी बात यह भी है कि  शब्दों तथा उनको व्यक्त करने की शैली भी उसे नया बना देती है।
          आज हमें अपने ही ग्वालियर शहर के भारतीय योग संस्थान के  दो दिवसीय शिविर में जाने का अवसर मिला।  हम उसमें नियमित रूप से तो शामिल होने में असमर्थ थे पर अपने शिविर के बाहरी साधकों से मिलकर उनको जानने की जिज्ञासा हमें कुछ देर के लिये वहां ले ही गयी।  ऐसे अवसरों पर स्वयं मौन रहकर बहुत सीखा जा सकता है।  सबसे पहले तो उन निष्काम प्रवृत्ति के विद्वानों की सराहना करने का मन करता है जो अपने अनुभव तथा विचार वहां व्यक्त कर रहे थे।  उनके विचार सुनने के साथ ही हम उनके हाव भाव के साथ ही शब्दों पर भी अपना ध्यान रखे हुए थे। 
         आमतौर से पेशेवर धार्मिक तथा योग शिक्षक कामना भाव के कारण पारंगत होकर श्रोताओं को प्रभावित करते हैं पर निष्काम भाव से भी लोगों को प्रभावित किया जा सकता है, यह बात भारतीय योग संस्थान को देखकर सीखी जा सकती है।  भारतीय योग विज्ञान का प्रचार करने की शपथ लेने वाले इन विद्वानों के चेहरे पर तेज टपकता है तो वाणी से निकले शब्द योगरस में नहाये लगते हैं।  वहां मौजूद योग साधकों पर भी दृष्टिपात किया।  भारतीय योग संस्थान में निष्कामी विद्वानों और हमारे बीच तब थोड़ा मार्ग अलग हो जाता है जब हम अपनी गीता ज्ञान की दृष्टि जमाकर विचार करते हैं।  हमारे हिसाब से योगी भी भक्त है जिनके भक्तों की तरह चार प्रकार  होते हैं-ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा आर्ती।  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हजारों में कोई एक मुझे भजेगा और उन हजारों में भी कोई मुझे एक पायेगा। फिर वह कहते हैं कि ज्ञानी मेरा ही रूप है और वही मुझे पाता है।  वहां एक विद्वान ने यह भी माना कि हमारा काम है लोगों को बताना। सभी अमल नहीं करेंगे पर कुछ तो उसका असर होगा। 
       वहां लोगों को दो घंटे का मौन रखकर तप करने के लिये कहा गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हम तो देरी से पहुंचे थे। वहां लोगों से बात की पर उनके मौन तप के भंग में हमारा कोई योगदान नहीं है क्योंकि वह सभी तो पहले से वार्तालाप में लगे हुए थे। संभव है कुछ लोगों को वह शिविर बोर करने वाला लगे पर इतना तय है कि जिनके मन में योग को लेकर जिज्ञासायें वहां उनके निराकरण के पूरे अवसर हैं।
   अगर योग साधक की अपनी श्रेणी की बात करें तो हम अभी तक स्वयं को अर्थाथी श्रेणी का मानते हैं।  जहां तक प्रचारक के रूप में माने तो वह भी इसी श्रेणी में आता है। इस पर लिखने से हमारे मन की भूख शंात होती है।  यह हम अपने बारे में स्वयं मानते हैं इसका श्रेय श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन को जाता है जिसके प्रति हमारा निष्काम भाव है।  इन शिविरों में जिज्ञासु बनकर जाते हैं। योग साधना की शरण हमने आर्त भाव से ली थी।  जहां तक ज्ञानी का प्रश्न है उसका निर्णय तो हमारे जीवनकाल में तो होना ही नहीं है इसलिये चिंता छोड़ दी है।
         एक महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलती है कि हम जिन विद्वानों को सुनते हैं ऐसा लगता है कि वह हमारे मन की बात कह रहे हैं।  अच्छा लगता इसलिये क्योंकि वह वही बात कह रहे हैं जो हम सुनना चाहते है।  ऐसे में वक्ता और श्रोता का अंतर हमारे अंदर नहीं रहता।  ऐसा लगता है कि हम अपने से ही बात कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी लगती है कि निरंतर योग साधना करने वाले अगर किसी दूसरे की बात न भी सुने तो भी उनके अंदर वैसे ही विचार योग साधना करते हुए स्वतः  एक जैस  हो जायेंगे जो अन्य विद्वानों के हैं।  कोई भी  व्यक्ति नियमित योगाभ्यास से क्षेत्रज्ञ बन जाता है।  वह न केवल अपनी देह बल्कि प्रकृति और अंतरिक्ष की संरचना को भी समझ सकता है।  इसलिये नियमित योग साधकों और शिक्षकों के विचार एक ही मार्ग पर आ जाते हैं। 
      हमने अनेक बार लिखा है कि योग तो हर मनुष्य करता है।  अंतर इतना है कि आम मनुष्य चंचल मन, मुख और मस्तिष्क को इंद्रियों के वश में रखकर असहज योग के मार्ग पर चलता है जबकि योग साधक सहज योग की तरफ जाते हैं।  असहज योग के अनेक मार्ग है पर सहज योग का मार्ग एक ही है। कोई आगे चलते हुए किसी पड़ाव पर आया और उसने उस उस स्थान ं का ज्ञान प्राप्त किया। दूसरा पीछे है और जब वह उसी पड़ाव पर आयेगा तो वह भी वैसा ही ज्ञान प्राप्त करता है।  एक ही मार्ग होने के कारण  सहज योगियों के विचारों में साम्यता होती है जबकि असहज योगी अनेक मार्गों के कारण हमेशा ही संशय में पड़े होते हैं।  असहज योगी को पता ही नहीं कि उसकी देह के विकारों का जनक कौन है? इसके लिये वह अनेक तरह के परीक्षण करता फिरता है।  असहज योगियों के बीच बीमारियों की दवाओं और चिकित्सकों के ही चर्चे होते हैं। जबकि सहज योग प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग जानते हैं इसलिये पहले तो विकार पैदा होने ही नहीं देते और हो भी जायें तो उनको निकालना भी जानते हैं।
        आखिर में हमें  यह कहना है कि  कि एक विद्वान ने कहा कि हमें योग संस्थान के प्रचार करना चाहिये। भारतीय योग संस्थान की प्रशिक्षण शैली ऐसी है कि किसी साधक को योग साधन करते  देखकर ही पता चल जाता है कि उसने वहीं से सब सीखा है।  सभी को यह बताना चाहिये कि भारतीय योग संस्थान ही इस विषय में सबसे श्रेष्ठ संगठन है।  हमें यह सुनकर हैरानी हुई क्योंकि यह बात तो हमने अनेक पाठों में पहले ही लिखी है।  यही इस बात का प्रमाण है कि सहज योगियों के आपस में बिना मिले भी एक जैसे विचार हो जाते हैं।     

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Sunday, April 14, 2013

मनुस्मृति से संदेश-जल में गंदगी नहीं बहाना चाहिये (manusmriti se sandesh-jal mein gandagi nahin bahana chahiye)

            भारतीय उपमहाद्वीप में को पूरे विश्व में समशीतोष्ण क्षेत्र माना जाता हैं। यहां गर्मी, सर्दी और बरसात हमेशा ही प्रचुर मात्रा में अपना प्रभाव दिखाती है।  प्रकृति की अनुकंपा के रूप  में अनेक ऐसी नदियां यहां विद्यमान रही हैं जिन्होंने यहां जल का प्रवाह सदियों से जीवन को प्रफुल्लित बनाये रखा है। इसके बावजूद गर्मी के दिनों में यहां पानी का अभाव हो जाता है।  आधुनिक प्रबंधकीय व्यवस्था के चलते अनेक नदियों पर बड़े बांध भी बनाये गये।  कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े बांधों की बजाय छोटे बांध बनाने चाहिये। हमारे देश में प्रचुर मात्रा में बरसात होती है। देवराज इंद्र की कृपा इस देश पर कभी कम हो ऐसा देखा नहीं गया। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्षा के जल का संचय करने के लिये छोटे छोटे बांध बनाकर देश में किसी वर्ष अवर्षा की स्थिति पैदा होने पर उससे निपटा जा सकता है। इतना ही नहीं अब तो हार्वेस्ट के माध्यम से घरों में भी जल सुरक्षा की प्रणाली भी प्रचलन में आ गयी है।
     बढ़ती जनसंख्या की दृष्टिगत जिस प्रकार के जलप्रबंधन की आवश्यकता थी वह किया गया नहीं गया जिससे देश में ग्रीष्मकाल के दौरान पानी के लिये अनेक स्थानों पर त्राहि त्राहि मची रहती है। यह संकट तब तक चलता है जब तक वर्षा नहीं हो जाती। वर्षा होने के बाद फिर बाढ़ का प्रकोप भी सामने आता है। इस बाढ़ में नदियां ही नाले भी उफनते हुए अपना जल घरों में ले आते हैं। सच बात तो यह कहें कि परमात्म की कृपा भारत देश पर अधिक हुई इसलिये यहां जल की प्रचुर मात्रा में है पर यहां के जनमानस में जल के प्रति जरा भी सम्मान का भाव नहीं है। कहा जाता है कि जिस चीज की उपलब्धता अधिक होती है उसकी मांग घट जाती है पर जल कोई वस्तु नहीं जीवन है। यही बात लोगों की समझ में नहीं आती।
               
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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नाप्सु मूत्रं पुरीषं वाष्ठीवनं वा समुत्सृजेत्।
अमेध्यमलिप्तमन्द्वा लोहतं वा विषाणि वा।
       हिन्दी में भावार्थ-जल में मल मूत्र, कूड़ा, रक्त तथा विष आदि नहीं विसर्जित करना चाहिये। इससे पानी प्रदूषित हो जाता है।
    लोग नदियों और नालों में ही बिना विचारे गंदगी का विसर्जन करते हैं। सबसे हैरानी बात तो यह कि कारखानों के कचड़े का रुख भी उन नदियों और नालों की तरफ कर दिया गया है जिनमें जीवन के लिये जल प्रवाहित होता है। लोग तथा पशु पक्षी उनमें नहाते हैं।  अभी हाल ही में इलाहाबाद कुंभ के दौरान अनेक टीवी चैनलों पर नदियों के प्रदूषित होने के विषय पर  बहस आ रही थी।  उसमें भाग लेने वाले साधु संतों ने देश की पवित्र नदियों प्रदूषित होने पर जो टिप्पणियां कीं वह समाज की आंखें खोलने के लिये काफी थी।  जो साधु संत इन नदियों के जल पवित्र होने पर उनमें  नहाना धर्म मानते हैं वही  बता रहे थे कि ऐसा करना शरीर के लिये कष्टकारक है।  अनेक साधु संतों ने यह जानकारी भी दी कि  इन नदियों में उनके उद्गम  स्त्रोत से निकला पानी पानी आना तो दूर बरसात का पानी भी बहकर नहीं आता। बड़े बांधों में उनका पानी रोका जाता है और बड़े शहरों का गंदा पानी बहकर नदियों का नाम जीवित किये हुए है।
      जल का ऐसा अपमान हो रहा है। उसका परिणाम यह है कि देश में गर्मी के ऋतु में जलसंकट लोगों की हालत खराब कर देता है।  इसलिये जहां तक हो सके जल के प्रति पवित्र संकल्प रखना चाहिये। जहां तक हो सके जल को प्रदूषित करने से बचाना चाहिये। यह जल ही  हमारे जीवन का आधार है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Tuesday, March 12, 2013

अपराध से प्रतिअपराध की तरफ-हिन्दी संपादकीय (apradha se prati apradh kee taraf-hindi editorial)

      राजधानी दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के एक आरोपी ने कारागार में खुदकुशी कर ली।  जब यह कांड हुआ था तब पीड़िता के न्याय के लिये पूरे देश में शोर मचा था। सभी अपराधियों को फांसी देने की मांग जबरदस्त उठी थी। पीड़िता जब तक इलाज के लिये अस्पताल में भर्ती थी तब तक तो यह मांग जोर पकड़ती रही कि हर बलात्कारी को फांसी दी जाये।  जब पीड़िता ने दम तोड़ दिया तब इस मांग का मतलब नहीं रहा था क्योंकि जघन्य हत्यांकाड के अपराध पर फांसी का दंड देने में सुविधा होती है। उस समय जब तक पीड़िता अस्पताल में रही तब तक प्रचार माध्यम उसके नाम पर अपना समय पास कर जमकर विज्ञापन चलाते रहे।  जमकर बहसें हुईं। देखा जाये तो देश में जो इस कांड के विरुद्ध जो निरंतरता रही उसका पूरा श्रेय भी इन्हीं प्रचार माध्यमों को ही दिया जाना चाहिये।  यह अलग बात है कि इस तरह के सनसनखेज विषय उनके विज्ञापन चलते रहने का एक अच्छा माध्यम बन जाते हैं।
          अब आरोपी की खुदकुशी पर फिर प्रचार माध्यमों में बहस होने लगी।  इस बहस में मृतक आरोपी का पिता और मां दोनों ही शामिल हुए।  पिता ने जो बातें कही गयी उनकी चर्चा करना लोगों को ठीक न लगे पर उनसे संदेश निकालने की कोशिश तो होनी ही चाहिये।  उसमें उन्होंने अपने दोनों पुत्रों के अपराध में शामिल होने के बाद जो उनकी दुर्दशा का जो बयान किया वह आगे के लोगों को चेतावनी के रूप में सुनाना बुरा नहीं है। हम इस विषय पर किसी के साथ सहानुभूति नहीं जताने जा रहे।  महत्वपूर्ण बात यह कि पिता अपराधजगत का अनुभवी आदमी रहा है। वह जेल भी जा चुका है इसलिये वह मानता है कि उसके पुत्र की मौत का सच सामने कभी नहीं आयेगा।  हालांकि वह मानता था कि उसका पुत्र इस अपराध के लिये फांसी और मौत का हकदार है पर वह साथ ही यह भी दावा कर रहा था कि  वह आत्महत्या नहीं कर सकता।  एक बात तय रही थी कि इस सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल लोगों से किसी की हमदर्दी नहीं हो सकती।  यहां तक कि मृतक के माता पिता भी अपने पुत्र के अपराध की वकालत नहीं कर सके।  यह बात तो निश्चित है कि हर माता पिता अपने पुत्र को चाहते हैं पर जब वह अपराध ऐसा कर बैठे कि सारे संसार के सामने शर्मिदंगी हो तब उसका सार्वजनिक समर्थन कठिन हो जाता है। बहरहाल विरोधाभासी बयानों के बीच उनके माता पिता के बयान उन लोगों के लिये सबक हैं जो ऐसे अपराध में संलिप्त होने की सोचते हैं।
          एक पुराने पत्रकार  ने एक अपराधी की सोच बताई थी जो उनसे कभी मिला था।  दुनियां में तमाम तरह के अपराध होते हैं पर पेशेवर या आदतन अपराधी बलात्कार और चोरी एकदम घटिया अपराध मानते हैं।  बलात्कार के अपराधी की हालत जेल में बुरी होती है यह बात पत्रकार  को उस अपराधी ने बताई थी।  उस पत्रकार  से मिले अपराधी की बात पर यकीन करें तो उसका कहना था कि इन दो अपराधों के अपराधियों की जेल में अन्य अपराधी समय मिलने पर बुरी गति करते हैं।  मृतक आरोपी के पिता ने जो हालत बयान की वह उस पुराने अपराधी के बयान को देखकर आश्चर्यजनक नहीं लगती।  सब जानते हैं कि जेल में डकैती, हत्या, लूट, ठगी, मारपीट और धोखाधड़ी के आरोपी भी रहते हैं। पत्रकार को उस पुराने अपराधी ने बताया था कि कारागार में   डकैती और हत्या के अपराधियों को दबदबा रहता है।  ऐसे बड़े अपराधी बलात्कार और चोरी को कायरों का अपराध मानते हैं। आमतौर से अनेक कामाग्नि में जल रहे लोग यह सोचते हैं कि किसी औरत के साथ जबरदस्ती करना बहादुरी है तो उन्हें मृतक आरोपी के पिता के बयान अवश्य दिखाये जाना चाहिये।  उसने अपने बयान में ऐसे वाक्य और शब्दों का उपयोग किया कि कार्यक्रम प्रसारित करने वाला पत्रकार भी कांप गया और उसे रोकने लगा।  यह वाक्य या शब्द किसी गंदी से गंदी फिल्म में भी उपयोग नहीं किये जा सकते। हमारा मानना है कि भले ही वाक्य या शब्द गंदे थे पर अगर किसी को व्यक्तिगत रूप से समझाना हो तो आपसी बातचीत में उनका उपयोग होता है।  उस दुःखी पिता ने भले ही अभद्र शब्दों का उपयोग किया पर हमें लगा कि कम से कम यह कार्यक्रम देखकर कभी उन्माद करने  के लिये तत्पर लोगों को डर अवश्य लगेगा। उस पिता ने यहां तक कहा कि उसके पुत्र के साथ बलात्कार किया गया होगा।  पता नहीं यह सच था या झूठ पर  हतप्रभ करने वाला यह वाक्य उन लोगों को दिखायें जो यह सोचते हैं कि किसी मासूम लड़की के साथ जबरदस्ती करने पर कोई सजा नहीं मिलती।
          इस सामूहिक हत्याकांड के आरोपियों की जेल में पिटाई की खबर उस समय समाचार चैनलों पर आयी थी जब यह मामला प्रचार में जोर पकड़े हुए था। अब मृतक आरोपी के वकील और माता पिता  बयान दे रहे हैं कि उनके साथ यह क्रम बाद में भी चलता रहा था।  उनका एक दूसरा भी बेटा है जो इसमें शामिल है।  वह उसके मरने की आशंका भी जता रहे थे।  उनका कहना था कि हम गरीब हैं इसलिये हमारे साथ ऐसा हो रहा है।  हमारा कहना है कि जब कोई गरीब होकर ऐसे जघन्य हत्याकांड में शामिल हो रहा है तो उसे यह मानना ही चाहिये कि उसका दंड बड़ा होगा।  अमीर लोग अपराध कर भी बच जाते हैं इस तर्क के आधार पर गरीब अपराधी के साथ सहानुभूति नहीं हो सकती।  अगर यह सच है तो फिर गरीब को अपराध में शामिल होने से ही बचना चाहिये।  हम तो यह कहते हैं कि गरीब के अपराध में शामिल होने पर उसका दंड अधिक भयानक होना चाहिये क्योंकि उसके सहने की क्षमता अधिक होती है।  अमीर में सहने की क्षमता नहीं होती यह बात तय है।  हम यहां अमीरों के अपराध में शामिल होने पर सहानुभूति नहीं जता रहे बल्कि गरीब होकर अपराध में सजा मिलने पर रुदन करने की प्रवृत्ति पर गुस्सा जता रहे हैं।
             मृतक आरोपी ने आत्महत्या की होगी पर उसके अपराध के कारण उस  पीड़िता का करुण क्रंदन यादकर उससे सहानुभूति खत्म हो जाती है जिसने अपनी जख्मों से लड़ते हुए दम तोड़ दिया।  अंत में हमारा यह कहना है कि मृतक आरोपी के पिता के वह बयान समाज में आपसी वार्तालाप में सुनाते रहें जिसमें उसने पुत्र पर अनाचार होने की बातें कही हैं ताकि महिलाओं को सस्ता समझने वालों में भय पैदा हो।  हो सकता है कि हमारी यह सोच गलत हो पर जिस तरह नारियों के प्रति अपराध इस देश में बढ़ रहे हैं उस पर गुस्सा आता है।  तब लगता है कि शैतानी प्रवृत्ति के लोगों को डराने के लिये उन्हें ऐसे संभावित खतरे का रूप दिखाना चाहिये।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, February 15, 2013

संगम-हिन्दी कविता (sangam-hindi kavita)


पर्वत से निकली नदी
घर से चली नाली
नाले ने दोनों का संगम करा दिया,
पवित्र जल  पीयें या नहायें
आंखें बंद कर श्रद्धा से फूल चढ़ायें,
धर्म की धरती पर अधर्म का घर भरा दिया।
कहें दीपक बापू
कचड़े में कांति नहीं होती,
अशांत मन लेकर चलें
कभी साथ शांति नहीं होती,
उठती हैं ख्वाहिशें
सुंदर नजारे देखने के लिये
आदमी मचल जाता है,
काली दुनियां हैं उनके पीछे
खबर नहीं लेता कोई
धर्म का सौदागर छल कर जाता है।
जल गया है जल
जहरीला हो गया फल
इसलिये जिस धरा पर बैठे हो
वहीं ध्यान कर
ज्ञान में स्नान कर
कर अपने पर विश्वास
कर दे अपने से दूर उस ख्वाब को
जिसने ज़माने को डरा दिया है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Tuesday, February 5, 2013

यह फिक्सिंग मिक्सिंग-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (yah fising mixing-hindi vyangya chinttan satire thought)

              फुटबाल में फिक्सिंग होती होगी इसका शक हमें पहले से ही था।  इसका कारण यह है की हमारे देश में व्यसाय, खेल, फिल्म तथा अन्य क्षेत्रों में पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति घर कर चुकी है।  ऐसे में हमारे देश के व्यवसाई  और खिलाड़ी कोई ऐसा काम नहीं कर सकते जो पश्चिम वाले नहीं करें।  पश्चिम वाले जो काम करें वह हमारे देश के लोग भी हर हाल में करेंगे यह भी निश्चित है।  एक बात तय है कि सांसरिक विषयों में कोई मौलिक रूप के हमारे  देश में अब होना संभव नहीं है। विश्व में हमारा देश आध्यात्मिक गुरु माना जाता है पर सांसरिक विषयों के मामले में तो पिछड़ा हुआ है।  यह अलग बात है कि इन सांसरिक विषयों में भी हमारे अनेक प्राचीन सिद्धांत हैं जिनको अब लोग भूल चुके है ।  बात फुटबाल की हो रही है तो हम अपने क्रिकेट खेल को भी जोड़ लेते हैं।  पूरी तरह व्यवसायिक हो चुके क्रिकेट खेल में फिक्सिग नहीं  होती हो अब इस बात पर संदेह बहुत कम लोग को रह गया है।  दूसरी बात यह कि मनोरंजन की दृष्टि से इस देखने वालों की संख्या अधिक है खेलने वाले बहुत कम दिखते हैं।  फिर आजकल मनोरंजन के साधन इतने हो गये हैं कि क्रिकेट खेल के प्रतिबद्ध दर्शक अत्यंत कम रह गये हैं।  अनेक विशेषज्ञ तो इस बात पर हैरान है कि भारत में चलने वाली क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आखिर किस तरह के आर्थिक स्त्रोत पर चल रही है? अभी कल ही इस खेल के खिलाड़ियों की नीलामी हुई।  अनेक खिलाड़ियों की कीमत देखकर अनेक विशेषज्ञों के मुंह खुले रह गये। एक विदेशी खिलाड़ी ने तो अपनी कीमत पर खुद ही माना है कि वह उसके लिये कल्पनातीत या स्वपनातीत है। ।
               फुटबॉल चूंकि भारत में अधिक नहीं खेला जाता इसलिये उसके मैचों में फिक्सिंग का अनुमान किसी को नहीं है पर देश जो खेलप्रेमी इन फुटबॉल मैचों को देखते हैं उनको अनेक बार ऐसा लगता है कि कुछ खिलाड़ी अनेक बार अपने स्तर से कम प्रदर्शन करते हैं या फिर कोई पूरी की पूरी टीम अप्रत्याशित रूप से हार जाती है।  अभी कुछ समय पहले संपन्न फुटबॉल विश्व के दौरान अनेक मैच शुकशुबहे का कारण बने।  क्रिकेट हो या फुटबॉल इन खेलों में अब जमकर पैसा बरस रहा है। यह पैसा खेल से कम उससे इतर गतिविधियों के कारण अधिक है।  अनेक खिलाड़ियों को कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसेडर बना लेती है।  भारत में तो अनेक खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिन्होंने बीसीसीआई की कथित राष्ट्रीय टीम का मुंह तक नहीं देखा पर करोड़पति हो गये हैं।  अनेक खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग की वजह से प्रतिबंध लगाया गया है जो कि इस बात का पं्रमाण है कि फिक्सिंग होती है। यहां यह भी बता दें कि जिन खिलाड़ियों पर यह प्रतिबंध लगे वह प्रचार माध्यमों के ‘स्टिंग ऑपरेशन’ की वजह से लगे न कि बीसीसीआई की किसी संस्था की जांच में वह फंसे। इसका मतलब यह कि जिनका ‘स्टिंग ऑपरेशन’ नहीं हुआ उनके भी शुद्ध होने की पूरी गांरटी नहीं हो सकती।  सीधी बात यह कि जो पकड़ा गया वह चोर है और जिस पर किसी की नज़र नहीं है वह साहुकार बना रह सकता है।
   हमारा मानना है कि खेलों में फिक्सिंग अब रुक ही नहीं सकती।  इसका कारण यह है कि एक नंबर और दो नंबर दोनों तरह के धनपति इसमें संयुक्त रूप से शामिल हो गये हैं।  दोनों में एक तरह से मूक साझोदारी हो सकती है कि तुम भी कमाओ, हम भी कमायें।  यह भी संभव है कि दो नंबर वाले एक नबर वालों का चेहरा आगे कर चलते हों और एक नंबर वाले भी अपनी सुरक्षा के लिये उनका साथ मंजूर करते हों।  क्रिकेट से कहीं अधिक महंगा खेल फुटबॉल है। उसमें शक्ति भी अधिक खर्च होती है।  दूसरी बात  यह कि दुनियां में कोई भी व्यवसाय क्यों न हो कुछ सफेद और काले रंग के संयोजन से ही चलता है। अब चूंकि भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात तो कोई करता नहीं इसलिये हम अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शॉ के इसी सूत्र को दोहराते हैं कि इस दुनियां में कोई भी आदमी दो नंबर का काम किये बिना अमीर नहीं हो सकता।  साथ ही यह भी जो सेठ साहुकार फुटबॉल या अन्य खेलों के खिलाड़ियों को पाल रहे हैं वह उनके खेल को अपने अनुसार प्रभावित न करते हों यह संभव नहीं है।  इस तरह की फिक्सिंग के सबूत मिलना संभव नहीं है पर मैच देखकर परिणाम पूरी की पूरी कहानी बयान कर ही देता है।  




लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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