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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Friday, August 1, 2014

गुलामों ने पहन लिया उधार का ताज-हिन्दी कविताऐं(gulamon ne pahan liya udhar ka taaz-hindi peom's)



लिखे गये हिन्दी में
इतिहास में ऐसे मशहूर किस्से भी हो गये।
कहें दीपक बापू गुलामी का भूत
जिनके सिर पर  चढ़ा
आधुनिक दिखने की चाह में
अधकचड़े लोग अंग्रेजी के हिस्से हो गये।
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गुलामों ने पहन लिया उधार का ताज,
आकाओं की भाषा का चला रहे राज।
कहें दीपक बापू  अंधेरे में तीर चलाते,
देशी इतिहास में विदेशी पीर ढलाते,
गांव से चलकर वह शहर आये
फिर भी नहीं जाने मातृभूमि का सच
कर रहे हैं परदेसी गुलामी पर नाज।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Thursday, July 24, 2014

जिंदगी के अलग अलग रंग-हिन्दी कविता(zindagi ke alag alga rang the-hindi pome)



हम तो जोश से चले थे
अपनी मंजिल की तरफ
नहीं पहुंच पाये क्योंकि रास्ते बंद थे।

हमने तो अच्छी नीयत से
ज़माने से रिश्ता जोड़ा
नहीं निभा क्योंकि लोगों के दिल तंग थे।

घूम घूमकर दरियादिलों की तलाशी की
देखा लोग खुद ही बेहाल हैं
सभी के जिंदगी जीने के अपने ही रंग थे।

कहें दीपक बापू हालातों पर
सोचना हमने बंद कर दिया
क्योंकि अपने दिल दिमाग के ख्याल
ऐसे उड़ते और कटते जैसे पतंग थे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
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Sunday, July 13, 2014

छिपा खजाना-हिन्दी व्यंग्य कविताऐं(chipa khazana-hindi vyangya kavitaen)



कई बार सुना  वह लोग अमीर हो जाते हैं,
जिनके हाथ छिपे खजाने लग जाते हैं।
कहें दीपक बापू अब देखते हैं हम
छिपाते हैं जो अपना खजाना वही  अमीर कहलाते हैं।
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लुटेरों को अब कोई भय नहीं सताता है,
खजाने में पहरेदारों से ही हिस्सा मिल जाता है।
कहें दीपक बापू अपराधों का पैमाना ऊपर जाये तो जाये
रुपहले पर्दे पर ज़माने के हालात पर होती चर्चा
रोने वाला भी कमाई कर जाता है।
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किस जगह कौनसा सामान कब तक बचायें,
लुटने की फिक्र में जिंदगी कब तक दाव पर लगायें।
कहें दीपक बापू चिंता से बेहतर हैं चिंत्तन करना
सामानों का उपयोग करें पर दिल न लगायें।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Friday, July 4, 2014

इंसानों में देवता नहीं हो सकते-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(insanon mein devata nahin ho sakte-hindi satire poem's)



सूरज में जरूरत से ज्यादा आग है,
शीतल है चंद्रमा पर उसमें भी दाग है।
कहें दीपक बापू इंसानों में कभी नहीं हो सकता देवता
सभी की नीयत में छिपा कोई न कोई राग है।
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अपने ही जाल में फंसा इंसान वफा का करता वादा,
क्या निभायेगा वह जिसके दिल में मतलब पाने का ही है इरादा।
कहें दीपक बापू कई लोगों ने विज्ञापन से अपनी छवि बनाई है
वह सौदागर सपने के बन जाते न करना उम्मीद उनसे ज्यादा।
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आलीशान घर है पर उनके दिल में बुझे चिराग हैं,
शहर की उजाड़कर हरियाली पहरे में रखे उन्होंने बाग हैं।
कहें दीपक बापू  किस पर हंसे किस पर रोयें
शेर और हिरण चबा जायें इंसान के वेश में कई नाग हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, May 15, 2014

राजसिंहासन की जंग और जनता-तीन हिन्दी क्षणिकायें(rajsinhasan ki jung aur janta-three short hindi poem's)



इतिहास के मुताबिक राज सिहांसनों के लिये हमेशा जंग होती हैं,
तख्त पर बैठने वाले पहनते ताज जनता हमेशा तंग होती है।
कहें दीपक बापू तलवारों से धरती जीतने वाले बादशाह चाहे बने
दिल जीतने में जो माहिर हैं जनता उनके ही संग होती है।
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पद पैसा और प्रतिष्ठा के बोझ को हर इंसान नहीं उठां पाता है,
घमंड सिर चढ़कर  बोले दिल का अमन नहीं वह जुटा पाता है
कहें दीपक बापू  जिंदगी की जंग भी अजीब है
 कोई दौलत के पहाड़ पर कोई कण भी नहीं जुटा पाता है।
‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘‘
हर जगह विवाद खड़ा कर एकता की बात वह करते हैं,
भीड़ कहीं एक न हो यह सोचकर मन ही मन डरते हैं।
कहें दीपक बापू अमन का पैगाम देने वालों पर भरोसा नहीं
फसाद के इंतजार में अकेले बैठे  हमेशा आहें भरते है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, May 10, 2014

इश्क में दिल तो टूटना ही है-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(ishq mein dil to tootna hi hai-hindi vyangya kavitaen)



इश्क के अफसाने  में एक शिकार दूसरा होता शिकारी,
जिस्म की हवस ऐसी कि दौलतमंद को भी बना देती  भिखारी।
अखबारों में छपे है किस्से कई आशिक बने ज़माने के लिये कातिल,
कामयाब हुए वह भी अपनी गृहस्थी चलाते हुए गये हिल।
कहें दीपक बापू इंसान से इश्क जिस्मानी भूख की है पहचान,
कहते पुराने लोग सर्वशक्तिमान मे दिल लगाये वही आशिक महान।
दुनियावी इश्क में इधर या उधर किसी को रूठना ही है,
कहीं  आशिक माशुक तो कहीं ज़माने का दिल टूटना ही है।
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जिस्मानी इश्क का भूत जब किसी के सिर चढ़ जाता है,
वह शिकारी बेझिझक शिकार की तरफ बढ़ जाता है।
कहें दीपक बापू कोई जिस्मानी इश्क में भूत बनकर आशिक
लड़ता जहान से कभी अपनी तबाही की तरफ भी बढ़ जाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, April 27, 2014

अपनी अपनी सोच-हिन्दी व्यंग्य कविता(apni apni soch-hindi vyangya kavita)



अपने दोष लोगों को दिखते नहीं
दूसरों के गिरेबां में लोग झांकते हैं,
गैरों धवल कपड़ों पर दाग लगते देखने की चाहत है
अपनी कमीज पर सोने के बटन टांकते हैं।
कहें दीपक बापू हर जगह तमाम विषयों होती बहस
निष्कर्ष कहीं से मिलता नहीं है,
हर कोई जमा है अपनी बात पर
तयशुदा इरादे से हिलता नहीं है,
कान बंद कर लिये अक्लमंदों ने
मौका मिलते ही जुबां से  अपनी अपनी फांकते है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, April 19, 2014

जब भी किया हिसाब-हिन्दी लघु व्यंग्य कविता(jab bhi kiya hisab-hindi laghu vyangya kavita)



जिंदगी का हिसाब जब लगाते हैं तब होता है अहसास
कुछ सपने साकार खुद-ब-खुद साकार होते गये,
कुछ रिश्ते समय ने बदले कुछ मतलब निकलते ही खोते गये।
कहें दीपक बापू  पेटी में खजाना भरने की कोशिश
कभी हमने की नहीं,
इधर से आई माया उधर बह गयी कहीं,
जब भी किया हिसाब दिमाग हमारा गड़बड़ाया,
देना कभी भूले नहीं लेना याद नहीं आया,
रोकड़ बही लिखने का बोझ हम बेकार ढोते रहे।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Friday, April 11, 2014

उतरा जो नकाब-हिन्दी कविता(utara jo nakab-hindi poem)



जब तक तक उनके चेहरे पर नकाब था
उनकी सुंदरता के अहसास से ही
दिल में हलचल मची थी
उतारा तो हमारी आंखें ही उदास हो गयीं
ख्यालों में बसी उनकी तस्वीरें कहीं खो गयीं।
कहें दीपक बापू मिट्टी से बने रंग बिरंगे खिलौने
सजावट में घर की शोभा बढ़ाते हैं,
टूटे तो हम उनके लिये बेकद्री जताते हैं,
इंसान तोड़ते हैं जब भरोसा खिलौने की  तरह
तब टूटते हैं हम खुद
फिर ढूंढते अपनी दूसरी जगह आशायें
जो दिल में कही सो गयीं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, April 5, 2014

खबरों की असलियत-हिन्दी व्यंग्य कविता(khabron ki asaliyat-hindi vyangya kavita)



कुछ खबरे बनती हैं कुछ बनायी जाती हैं,

बताते हैं खुद खबरची कुछ ढूंढते हैं हम मसाला

बनाते हैं चाट की तरह खबर

मिर्ची सनसनी के लिये

मिलाई जाती हैं।

कहें दीपक बापू पर्दे  हो या कागज

प्रचार की धारा में बहने के लिये विज्ञापन की नाव जरूरी है,

अपने चेहरे को लोकप्रियता के समंदर में

पार लगाने वालों की  यही मजबूरी है,

नशा करते हैं जो पढ़ने सुनने का

उनको खबर की किस्म का हो जाता है अहसास

बयान करने के अंदाज से अपनी वह असलियत बताती है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, March 30, 2014

शब्दों से सिंहासन हिल जाते हैं-हिन्दी व्यंग्य कवितायें(shabodn se sinhasan hil jate hain-hindi vyangya kavita)



किसको बढ़ती महंगाई की फिक्र है,
सभी की जुबान पर अपनी कामयाबी का जिक्र है,
जहान की परेशानियों से कुछ लोग बहुत  हैरान है।
कहें दीपक बापू दर्द झेलने वाले
कहीं अपने इलाज की भीख मंागने नहीं जाते
 फिर भी हमदर्दी के सौदागर बेचते अपनी चिंता
 जेब में रखते इनाम
चेहरा ऐसा दिखाते जैसे जहान के गम से वह परेशान है।
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न पेड़ लगते न पत्ते लहराते
फिर भी कागजों पर ढेर सारे गुलाब खिल जाते हैं,
यहां कोई फरिश्ता नहीं दिखता
फिर भी नारे लगाने वाले बहादुरों के पीछे
बहुत सारे लोगों के दिल जाते हैं।
कहें दीपक बापू यहां जुबानी जंग लड़ने के
अच्छे दाम लेकर अक्लमंद संभालते मैदान
 कोई मसला नहीं सुलझता यहां
चर्चा यह कि शब्दों से सिंहासन हिल जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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