एक आदमी ने रुंआसा होकर
अपने दोस्त को बताया
‘यार, लुटा हुआ महसूस कर रहा हूं
जब से वह फिल्म देखकर आया,
बहुत शोर मचा था
मैं भी उसके जाल में फंसा था
नायक ने ऐसा वैसा कोई दिया था बयान,
विरोधियों ने अपने तीर लिये तान,
पता नहीं फिल्म कैसे बीच में आ गयी
मुफ्त में प्रचार पा गयी
दो सौ रुपया खर्च कर
खराब फिल्म देखकर आया
पूरी फिल्म देखी पर समझ में कुछ नहीं आया।’
दोस्त ने रुमाल जेब से निकाला
उसके आंसु पोंछते हुए बोला
‘ले सौ रुपये रख ले,
दर्द कम करने के लिये
आधी हमदर्दी चख ले,
मगर इसे दोस्ती का अहसान मत समझना,
इसे मदद मानने की गलती मत करना,
सौदागरों, समाज सेवकों और प्रचारकों के
इस मेल से मैं भी भ्रमित हो गया था,
क्योंकि यह चक्कर एकदम नया था,
तुमने फिल्म की कहानी बताकर
मेरी आंखें खोल दी,
अब वहां मेरा जाना नहीं होगा
जो तुमने खराब फिल्म बोल दी,
इसलिये तुम्हारे बयान पर
आधा खर्च बांटने का विचार मेरे मन में आया।’
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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