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Saturday, December 6, 2008

खुशी हो या गम लोग सज जाते हैं-व्यंग्य कविता

फिल्में का असर कुछ हुआ है
इस तरह असर कि लोग
खुशी हो या गम सज जाते हैं
दिल में नहीं जज्बात
इसलिये चेहरे पर नहीं दिखते
पर फिर भी मौके पर
अपनी हाजिरी देने पहुंच जाते हैं
मत मांगो उनसे प्रमाण
अभिनय देखने के आदी हो गये है लोग
इसलिये खुद भी दिखाने पहुंच जाते हैं
...........................

दिल में हो या न हो जज्बात
दिखाने कहीं भी पहुंच जाओ
और खूब प्रचार पाओ
गम हो गया खुशी का मौका
इस पर मत डालो नजर
चेहरे पर आती नहीं वैसी लकीर
जैसे है सामने मंजर
पर फिर भी वहां दिख जाओ
अगर कहीं आ गये जमाने की नजर में
तो चमक जाओगे
हर जगह नाम पाओगे
सभी का यही है दस्तूर
मौका मिलने पर उसका फायदा उठाओ

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Tuesday, August 19, 2008

आदमी अपने दिल पर नकाब लगा लेता है-हिंदी शायरी

काम पर है तो घर की याद
और घर पर अपने काम की चिंता
आदमी हो गया है एकाकी
हर पल बस एक ही सोच
कोई काम न रह जाये बाकी

सब जानते हैं दुनियां उनके
दम पर नहीं चलतीं
पाल रहे हैं जो जिंदगियां
वह भी उनके सहारे नहीं पलती
जिनके मालिक कहलाते हैं
मुसीबत के साथ देंगे
कहां यह ख्याल कर पाते हैं
दुनियां चलती है
अपनी गति से
आदमी को यह खुशफहमी पालना
अच्छा लगता है कि
सब हो रहा है उसकी मति से
अंधी दौड़ मे दौड़ रहा है आदमी
कोई चीज मिलना न रह जाये बाकी

अपनी असलियत से बेखबर आदमी
अपने दिल पर ही नकाब लगा लेता है
किसी और को क्या देगा
अपने आप को दगा देता है
आसमान में उड़ता हुआ आदमी
जमीन की हकीकतों को
चाहता है भुलाना
भेजता है अपने तनाव को स्वयं बुलाना
शोर में करता शांति की तलाश
बीभत्स दृश्यों में कांति की आस
हर पल भाग रहा है आदमी
कहीं कुछ देखना न रह जाये बाकी
.............................................
दीपक भारतदीप

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