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Tuesday, June 19, 2018

शराबियों का भी बहुत नाम होता है-दीपकबापूवाणी (sharabiyon ka Bhi bahut nam nai-DeepakBapuwani)

अच्छी सोच के लिये अच्छा देखना है जरूरी, चलों जहां श्रृंगार से सजी सभा पूरी।
‘दीपकबापू’ बोतल का जिन्न बना न साथी, मयखानों में इलाज की आस रही अधूरी।।
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दिल चाहे औकात से ज्यादा पाने की, दिमाग सोचे ताकत से ज्यादा जाने की।
‘दीपकबापू’ भटक रहे अपनी ख्वाहिशें, खरीददारी जेब में रखे ज्यादा आने की।।
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शराबियों का भी बहुत नाम होता है, उनकी आसक्ति में भक्ति का काम होता है।
‘दीपकबापू’ हर कतरे पर नाम लिखा, शराब से मिला जल ग्लास में जाम होता है।।
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बिछड़े इंसान याद में रहें कई बरस, गुजरे पल फिर मिलने की सोच में रहे तरस।
‘दीपकबापू’ गुरुओं की शरण ने भुलाया नाम, अच्छा हो राम जपें दिल हो सरस।।
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जंग के लिये अपना सीना फुलायें हैं, कब होगी तारीख सबके सामने भुलाये हैं।
दीपकबापू शस्त्र विक्रताअें से निभाते दोस्ती, जनमानस को देशभक्ति में सुलायें हैं।।
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मुंह से दहाड़ कर बन रहे हैं शेर, कर्म के नाम पर लगा रहे शून्य के ढेर।
‘दीपकबापू’ पेड़ के नीचे करें शयनासन, पेट भरे तभी जब हवायें गिरातीं बेर।।
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Friday, June 1, 2018

मन में धन बसा मुख मे सजी भक्ति-दीपकबापूवाणी (Man mein Dhan bas mukh mein saji Bhakti-DeepakBapuWani)

जल का बोझ लादे बादल वर्षा लाते, गर्मी से तपते पेड़ बिना शुल्क आनद पाते।
‘दीपकबापू’ जनसेवा में बनाने लगे महल, बांट रहे कल्याण भारी शुल्क बनाते।।
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जिंदगी में चाहतें कभी पूरी नहीं होती, लालच में जलते पर आसं पूरी नहीं होती।
‘दीपकबापू’ हर सामान पर नज़रें लगाते, जरुरतें कभी खास पूरी नहीं होती।।
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मन में धन बसा मुख मे सजी भक्ति, दयावान बनने के लिये मांग रहे शक्ति।
‘दीपकबापू’ अध्यात्मिक यात्रा में बितायें बरसों, छोड़ न पाये विषयो में आसक्ति।।
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भरोसा किस पर करें शक के दायरे में सब, कौन वफा के नाम करे गद्दारी कब।
‘दीपकबापू’ दोस्तों की फेहरिस्त बड़ी है, पर अभी तक निभा रहा अपना ही रब।।
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थाली में जो मिला खुशी से खालो यार, मिलती नहीं घी में डूबी रोटी हर बार।
‘दीपकबापू’ सुख स्वाद में जिंदगी गुजारते, जुबान से करें सब पर शब्द से वार।।
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सेवक नाम बताकर राजा जैसे चलते, धंधे जैसे राज चलायें साथ परिवार पलते।
‘दीपकबापू’ बचपन में सिंहासन मिले, सदाबहार जवान रहें बुढ़ापे में नहीं ढलते।।
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विकास का मंत्र महंगाई बढ़ना बताते, सबका भला करने के बहाने सबको सताते।
‘दीपकबापू’ बड़ा लंगर चलाने का दावा, खाली सजी थालियां पक्का प्रमाण जताते।।
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तस्वीर में आना हर चेहरे की है चाहत, हर कोई अनाम रहने से है आहत।
‘दीपकबापू‘ अंदर कर लेते अपनी तलाश, उन्हें जिंदगी में अमन की है राहत।।
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Wednesday, May 23, 2018

हुकुम अब नाकाबिलों के हाथ है-दीपकबापूवाणी (Hukum naklabion ke haath hai-DeepakBapuWani)


पद पैसे का बल सबकी गर्दन तनी है,
गोया दुनियां उनके साथ ही बनी है।
कहें दीपकबापू बंदे बहुत कम मिले
जिनकी वाणी ज्ञान में घनी है।
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न घर न दिल की गदगी हटायें,
स्वर्ग की चिंता में उम्र घटायें।
कहें दीपकबापू भक्ति का पाखंड
सोच यह कि धन के सौदे पटायें।
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रास्ते में कहीं धूप कहीं छांव,
साथी उदासी शहर हो या गांव।
कहें दीपकबापू क्यों बेजार दिल
जब चल रहे अपने ही दम पांव।
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हुकुम अब नाकाबिलों के हाथ है,
रहम अब बेदर्दों के साथ है।
कहें दीपकबापू करुण रस सूखा
उम्मीद भी पत्थर दिलों के हाथ है।
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भूख का दौर बार बार क्यों आता है,
रोटी का चेहरा इतना क्यों भाता है।
कहें दीपकबापू देने वाले राम
इंसान को चिंतायें क्यों गाता है।
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Wednesday, May 9, 2018

कौन भला जिस पर दाग नहीं-दीपकबापूवाणी (Kaun Bhala Jis par Daag nahin hai-DeepakBapuWani)


शिष्यों के मार्गदर्शक स्वयं भटके हैं,
गुरू कहलायें बंधनों में अटके हैं।
कहें दीपकबापू भक्त हैं कि नर्तक,
चीखों के साथ हाथ पांव पटके हैं।
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मन में ताप सड़क पर घूप है,
पांव जल रहे नीचे अग्नि कूप है।
कहें दीपकबापू रहो भक्तिलीन
धरा कभी मां कभी प्रलय रूप है।
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अब राजा वही जो झूठ बोले,
राजस्व लूट को छूट जैसे तोले।
कहें दीपकबापू लोकतंत्र है जनाब
जीते वही जो एकता में फूट घोले।।
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कौन भला जिस पर दाग नहीं,
कौन ज्ञानी जिसमें रोग नहीं।
कहें दीपकबापू सत्संगी बहुंत
कौन जिसमें लोभ की आग नहीं।
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सब कर रहे तरक्की के दावे,
पाले बाहुबली होने के छलावे।
कहें दीपकबापू धरा में है ऊर्जा
सबके घर स्वतः रोशनी आवे।
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Saturday, March 17, 2018

भूख से ज्यादा रोटी पकाने में हैं अटके-दीपकबापूवाणी (Bhookh se Jyada roti Pakane mein Atake-DeepakbapuWani)



जहां पेड़ पर पत्ते थे वहां लोहे के जंगलें लगे हैं, दीवाने दिल अब परायेपन के सगे हैं।
‘दीपकबापू’ दौलत की चमक से चक्षु दृष्टिहीन हुए, चालाक उनसे पूरी रौशनी ठगे हैं।।
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भूख से ज्यादा रोटी पकाने में हैं अटके, पांव से ज्यादा सिर के बाल हैं झटके।
‘दीपकबापू’ पैसा और पद पाकर हुए अंधे, नीचे गिरने के भय से ऊपर हैं अटके।।
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सत्ता के घोड़े पर सवार सभी पवित्र होते, भ्रष्टाचार रस में जो नहाये वही इत्र होते।
‘दीपकबापू’ राजधर्म निभा रहे कातिल बाज़ बड़े पाखंडी ही अब सच्चे जनमित्र होते।।
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दावे बहुत कातें राज करना आता नहीं, शास्त्र रटेते पर काज करना आता नहीं।
‘दीपकबापू’ सीना फुलाकर घूम रहे शहर में, ताकत पर नाज करना आता नहीं।।
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इष्ट जैसे ही भक्त भी हो जाते, गुण दोष न जाने पूजा में खो जाते।
‘दीपकबापू’ तस्वीरों के वादों पर फिदा, नारेबाजी का बोझ ढो जाते।।
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बाग़ के मीठे फल रखवाले स्वयं खायें, मालिक के मुंह कड़वा स्वाद चखायें।
‘दीपकबापू’ कलियुग का साथी लोकतंत्र, प्रजा का माल राजा अपना बखायें।।
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Sunday, March 4, 2018

राजाओं के खेल में प्रजा बनती खिलौना-दीपकबापूवाणी (RAJAON KE KHEL MEIN PRAJ BANTI KHILONA-DEEPAKBAPUWANI)

वह बड़े दिखते क्योंकि आंखों से परे हैं, प्रचार के नायक मानो सिर पर बोझ धरे हैं।
‘दीपकबापू’ विज्ञापनों से भ्रमित हो जाते, वीर पद पर विराजे लोग तो रोगों से भरे हैं।।
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पर्दे के नायकों के घर भी मन रहता है, नकली हंसी आंसुओ से वहां धन बहता है।
‘दीपकबापू’ अपने अंदर नहीं झांकते कभी, परायी अदाओं पर वाह हर जन कहता है।।
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भीड़ बहुत दिखती फिर भी होता सन्नाटा, चीखती आवाजों को खामोशी से पाटा।
दीपकबापू स्वार्थियों से खरीद लेते परोपकार, जिनके सौदे में कभी नहीं होता घाटा।।
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विकास क्रम में मंगल पर हम पहुंच गये, धरती पर खोद डालते गड्ढे रोज नये।
‘दीपकबापू’ रुपये का मोल गिराते जा रहे, डॉलर की आशिकी में बर्बाद हो गये।।
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राजाओं के खेल में प्रजा बनती खिलौना, तख्त पर बैठ चरित्र का हो जो बौना।
‘दीपकबापू’ घर का आश्रम मन ही मंदिर बनाते, लगाते तख्ती हम बाबा मौना।।
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शोर के बीच मजा तलाशते हुए लोग, बाहर ढूंढते दवा अंदर स्वयं पालते रोग।
‘दीपकबापू’ त्यागी ढूंढते दरबार में जाकर, जहां पाखंडी सजाते नये भिन्न भोग।।
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गैर को पापी कहकर स्वयं धर्म धारा में बहें, अपने स्वार्थ का काम परमार्थ कहें।
भीड़ में शोर मचाकर ले रहे नाम, ‘दीपकबापू’ सोने से र्घर भरकर उदासीन रहें।।
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अच्छे दिन की प्रतीक्षा में सब जन खड़े, चढ़ना है बस वादों के पहाड़ बड़े बड़े।
‘दीपकबापू’ आंखें खोलकर इधर उधर देखते, सपनों के घर बेबसी के ताले जड़े।।
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Thursday, February 22, 2018

खजाना लूटकर लेते दुनियां का मजा-दीपकबापूवाणी (Khazana lootkar lete duniyab ka Maza-DeepakBapuWani)

राजकाज में व्यस्त दौलत के दलाल, पाखंड पर नहीं करते कभी मलाल।
‘दीपकबापू’ भलाई की दुकान खोले बैठे, बेचते हमदर्दी की छाप में बवाल।।
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जनधन लूटकर साहूकार भी बड़े हो गये, सरकार के कदम उनके द्वार खड़े हो गये।
‘दीपकबापू’ सत्ता की दलाली में हाथ सभी के काले, लुटेरे भी सेठ जैसे बड़े हो गये।।
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खजाना लूटकर लेते दुनियां का मजा, सब मिल बांटकर खाते कौन देगा सजा।
‘दीपकबापू’ तिजोरी से लूटे सोने के सिक्के, पहरेदारों के कान में घंटा देर से बजा।।
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न सत्संग किया न कभी ध्यान लगाया, पढ़ किताब बाज़ार मे चेलों का मेला लगाया।
‘दीपकबापू’ ज्ञान की बातें सब जगह करें, जोगी ने अपना मन माया संग्रह में लगाया।।


इंसानी नाम के साथ काम भी बोले, कभी काम भी बुरे नाम का खाता खोले।
‘दीपकबापू’ अपने नाम पर इतराने से डरें, जिंदगी कभी नीचे कभी ऊपर डोले।।
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ताज पहनते ही हर सिर पर घमंड चढ़े, इंसान दिखना चाहते फिर भगवान से बढ़े।
‘दीपकबापू’ दरबार की जुबान पर नहीं करें भरोसा, चाटुकारों जहां लालच से खड़े।।
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Saturday, May 14, 2016

अनमोल रत्न-हिन्दी कविता (Anmol Ratna-Hindi Poem)

सभी भव्य इमारतें
आम इंसान का 
निवास नहीं होती।

रसीले गुरुओं के आश्रम
कुशल चिकित्सकों की दुकान
भव्यता में कम नहीं होती।

कहें दीपकबापू अनमोल रत्न
प्यास नहीं बुझा पाते
फिर भी इंसान में
अमीर बनने की इच्छा
कभी कम नहीं होती।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Monday, April 25, 2016

दिल का इरादा-हिन्दी कविता(Dil ka Irada-Hindi Kavita)

कभी कभी प्रेम भरे
शब्द भी प्रयोग कर लेते हैं
भले दिल का इरादा न हो।

जिंदगी का खेल
व्यापार बन गया है
भले फायदा ज्यादा न हो।

कहें दीपकबापू दिल की बात
अब बाहर लाना ठीक नहीं
हल्दी लेकर चूहे बने वज़ीर
देते चालाकी की नज़ीर
शायद ही कोई शब्द हो
जिसमें झूठा वादा न हो।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, April 14, 2016

नैतिकता की दीवार-हिन्दी कविता (Natikta ki Deewar-Hindi Kavita)

इतनी सस्ती नहीं है
इंसानी  जिंदगी
जितनी समझ रहे हो।

खौफनाक हवाओं से
बचाती नैतिकता की दीवार
कीमत उतनी नहीं
जितनी समझ रहे हो।

कहें दीपकबापू तिनके से
सहारा लेकर पार हुए
सवारों से पूछो
कमजोर की मदद
उतनी छोटी नहीं
जितनी समझ रहे हो।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, February 16, 2016

पेशेवर अक्लमंद-हिन्दी कविता(Peshewar Aklamand-HindiKavita)


घर रौशन करने के लिये
कहीं से भी
चुरा लेंगे चिराग।

पानी पकड़ लेंगे
बुझाने भेजा गया हो
जो प्यासे गले की आग।

कहें दीपकबापू भरोसे से
नाता दिखा रहे हैं
पेशेवर अक्लमंद
जिनके इतिहास में
वफा के लगे काले दाग।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, January 23, 2016

जाये वहीं आदमी देखे जहां माल-दीपकबापू वाणी (jaye vahin aadmi dekhe jahan mal-DeepakBapuWani)

पहनावा अच्छा मुंह बंद सभी भद्र, जब बोलें शब्द निकले अभद्र।
‘दीपकबापू डटे संस्कार पर बहस में, कान काटें चले जीभ का वज्र।।
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असल से ज्यादा नकल जचे, अकलबंद पांव नशे  में नचे।
‘दीपकबापू’ तस्वीर में बने शेर, बकरी के शिकार से बचे।।
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फरिश्ते दिखेंगे सुबह से शाम, रात हाथ में होता उनके जाम।
‘दीपकबापू’ दोगले फन में माहिर, सभी मजे में होकर बदनाम।।
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जाये वहीं आदमी देखे जहां माल, पक्षी जैसी बुद्धि देखे न जाल।
दीपकबापू धन की चाहत में फंसे, भूख से डराये खाने का थाल।।
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सौदागर रुपहले पर्दे सजाते, प्रायोजित जाल में दर्शक फसाते।
‘दीपकबापू’ बेजार बाज़ार में, अपने ख्वाब भूल कर लोग आते।।
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जिनके पद कभी धरा पर नहीं पड़ते, आकाश की सोच लेकर लड़ते।
दीपकबापू धोखे से हो गये सफल, अक्ल में अकड़ का ताला जड़ते।।
--------------
राजपथ पर विचरने का विचार, इंसानी दिल को बहुत लुभाता।
पांव फटे माथे पर बहे  पसीना, ‘दीपकबापू’ इरादों को चुभाता।।
..................................
चलते चलते थका देता काजपथ, दिल में नहीं आता कभी राजपथ।
‘दीपकबापू डरें बेलगाम चौपायों से, लोहागाड़ी हो या लकड़ी का रथ।।
-------------------
लोहे के सामान की दिखाते तस्वीर, प्रचारित करें इंसान की तकदीर।
दीपकबापू योग से दूर भोग के पास, नृत्य कर रहे कागज के वीर।।
.....................

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Tuesday, January 5, 2016

ज्ञानी वही बन जाते हैं-हिन्दी कविता(Gyani vahi ban jate hain-Hindi Kavita)

कभी दर्द जिनको हुआ नहीं
जहान में हमदर्द
वही बन जाते हैं।

जंग कभी लड़ी नहीं
तलवार खरीदकर
वही वीर बन जाते हैं।

कहें दीपकबापू वाणी से
पराक्रमी शब्द बघारते
अज्ञानियों की भीड़ में
ज्ञानी वही बन जाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, December 27, 2015

मनुष्य के विचार-हिन्दी कविता(Manushya ke Vichar-Hindi Kavita)


हृदय के सद्भाव का
शब्दों में प्रदर्शन करना
मुश्किल लगता है।

मन में पलता दर्द
संकेतों में समझाना
मुश्किल लगता है।

कहें दीपकबापू भावना से
प्रशंसा करें
समझी जाये चमचागिरी
आलोचना करने पर
दिखायें दादागिरी
तेज हवाओं से अधिक
मनुष्य के विचार समझना
मुश्किल लगता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, December 17, 2015

रक्त जलाने वाले भोग-हिन्दी कविता(Rakt jalane wale Bhog-Hindi Kavita)

सर्वशक्तिमान के दरबार में
ढोल बजाकर भी
चैन नहीं पाते लोग।

पंचसितारा अस्पतालों की
परिक्रमा करते हुए भी
पीछा नहीं छोड़ते रोग।

कहें दीपकबापू एकांत में
साधना का तरीका
जानते नहीं
ज्ञान से संबंध मानते नहीं
महलों में रक्त जलाने वाले
ढूंढते नित नये भोग।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Tuesday, December 8, 2015

दिल का हाल-हिन्दी कविता(Dil ka hal-hindi kavita)

अपनी जिंदगी फंसी दी
बेकार के मसलों में
हल का उठाते सवाल।

 अपना मतलब निकले
सब ठीक लगता
वरना करते बवाल।

कहें दीपकबापू अकविता
लिखना कठिन कविता से
द्रवित शब्द नहीं ढूंढते ताल
आंखों से पढ़कर ही
कभी कोई समझे दिल का हाल।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, November 30, 2015

महंगाई से लाचार-हिन्दी कविता(Mahangai se lachar-HindiPoem)

इंसान से टूटी उम्मीद
काबलियत पर
सवाल उठाती है।

ताकत से पूजा भले ही होती
मगर दिल पर लगी ठेस
बवाल लुटाती है।

कहें दीपकबापू दौलतमंदों से
कमजोर जनता की
नाराजगी के खतरे बहुत
खुशियों के सौदे का दाम चुकाती
महंगाई से लाचार होते ही
बदले का जाल जुटाती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, November 21, 2015

ध्यान में आनंद-हिन्दी कविता (Dhyan mein Anand-Hindi kavita)


कोई घर नहीं मिलता
जहां दर्द का
बसेरा नहीं पाते।

भीड़ में मिलता नहीं
एक भी इंसान
इर्दगिद जिसके तनाव का
घेरा नहीं पाते।

कहें दीपकबापू घ्यान में
आनंद का मिले ऐसा प्रकाश
वैसा सवेरा भी नहीं पाते।
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हिन्दी और ट्विटर-व्यंग्य कविता
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हिन्दी में लेते चुटकी
कुछ मजा आता
अंग्रेजी में तुम
लिखने के मजे लूट लो
पाठक को नहीं भाता।
कहें दीपकबापू
ट्विटरिस्ट बंधुओ
हिन्दी टूल से लिखना
तुम्हें क्यों नहीं भाता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, November 10, 2015

जिंदगी का सफर-हिन्दी कविता(Zindagi ka Safar-Hindi Kavita)

जिंदगी के सफर में
कभी पर्वत पर चढ़े
कभी पांव खाई में आये।

कहीं मित्रों ने मुंह फेरा
कहीं अजनबी
दर्द की दवा लाये।

कहें दीपकबापू चलते रहो
अपने कदमों का हिसाब
आंखों से न देखो
न रखो खोये पाये का लेखा देखो
अमीर महलों में कैदी होते देखे
गरीब भी बिन पैसे मजे पाये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Monday, November 2, 2015

चालाकी ठगी जाती है-हिन्दी व्यंग्य कविता(Chalaki Thagi jaati hai-Hindi Satire Poem)

दर्द भोगते इंसान की
कमियां गिनाते हुए
भीड़ लग ही जाती है।

क्षणिक खुशी के मेले में
भीड़ के बीच खड़े अकेले में
किसी की किस्मत
जग ही जाती है।

कहें दीपकबापू जिंदगी की राह में
कर्म करते फल की चाह में
किसी ने पाई कामयाबी
किसी की चालाकी भी
ठगी जाती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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