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Wednesday, March 31, 2010

खूनखराबे का खेल-हिन्दी शायरी (khoonkharabe ka khel-hindi shayri)

उनकी जिंदगी की गाड़ी
केवल वादे पर ही चलती है,
नारों तक ही उनकी सोच की बती जलती है।
रोज यकीन कर खाते हो धोखा
तरस तुम्हारी अक्ल पर आता है
उसमें उनकी क्या गलती है।
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तोहफे अब प्यार के जज़्बात में
बहकर नहीं दिये जाते हैं,
सौदागरों देते हैं पहले अग्रिम की तरह
फिर जिस्म नौचते हैं
या फिर दिल से खिलवाड़ कर जाते हैं।
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ताकतवर हैं वह
इसलिये उनके गुनाहों पर पर्दा पड़ जाता है,
जमाने भर के कसूर करे जो
उसका कद भी लोगों की नज़र में बढ़ जाता है।
उनको क्या दोष दें
लोगों की नज़रें ढूंढ रही हैं
खूनखराबे का खेल
अपना दिल बहलाने के लिये
इसलिये जिनको आदत है कत्ल करने की
उनको भी उसका नशा चढ़ जाता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
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Monday, January 25, 2010

ताजे खून के ढूंढ रहे गुमाश्ते-हिन्दी शायरी (taza khoon dhoondh rahe-hindi shayri)

कभी शिकायत नहीं की अपने दर्द की

शायद इसलिये उन्होंने बेकद्री का रुख दिखाया,

इशारों को कभी समझा नहीं

काम निकलते ही अपनों  से अलग परायों में बिठाया,

जब अपने मसले रखे उनके सामने

बागी कहकर, हमलावरों में नाम लिखाया

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नयी पीढ़ी को आगे लाने के वास्ते,

खोल रहे हैं सभी अपने रास्ते।

पुरानों को बरगलाना मुश्किल है

उनकी जेबें हैं खाली, बुझे दिल हैं

खून जल चुका है जिन बेदर्दो की तोहीन से

ताजे खून के लिये वही ढूंढ रहे गुमाश्ते।

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वह देश और समाज का भविंष्य

सुधारने के लिये उठाते हैं कसम,

जबकि अपनी आने वाले सात पुश्तों का

खाना जुटाने के लिये लगाते दम।

उनके काम पर क्या उठायें उंगली

आखें खुली है

पर अक्ल के पर्दै मिराये बैठे हम।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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