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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Thursday, January 25, 2018

नैतिकता की बात कर छिपाते अपने पाप-दीपकबापूवाणी (Naitika ki bat ka chhipate apna paap-DepakBapuwani)


भ्रष्टाचार में डूबे भलाई की बात करें, भुखमरी पर रोयें अपने मुख में मलाई साथ भरें।
‘दीपकबापू’ पांच साल में एक बार हाथ जोड़ते, फिर तो आमजन के सिर लात धरें।।
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नैतिकता की बात कर छिपाते अपने पाप, ज़माने के भ्रष्टाचार का करें विज्ञापन जाप।
‘दीपकबापू’ गणित पढ़ा समझा नहीं गुणा भाग, सत्ता के दलाल बने इ्र्रमानदार छाप।।
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रुपहले पर्दे पर जंग का समाचार सजा, कभी कभी धर्म संदेश का बाजा भी बजा।
‘दीपकबापू’ खौफ और इश्क से दूर रहते, वह लोग जिनके पास अंदर ही है मजा।।
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पहरेदारों के सामने जिंदा लोग लापता हो जाते, ज़माने के सामने फिर मुर्दा हो जाते।
‘दीपकबापू’ हथियार में डालते कातिल जज़्बात, कायर हाथ में लेकर बहादुर हो जाते।
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दोवास में  व्यापार का ढोल बजा है, दिल्ली में बाज़ार बंद दुकान से सजा है।
स्वदेश का जुमला भूल जाओ यारो, विदेशों में हमारे विकास का डंका बजा है।।
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मनोरंजन के नाम मरा इतिहास हैं पेले, महंगे भवन बन गये सभ्यता के ठेले।
‘दीपकबापू’ पढ़ते अपने अध्यात्मिक पावन ग्रंथ, नहीं भाते उनको ख्वाबी खेले।।
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Sunday, December 3, 2017

मन गुलाम फिर भी आजादी की चाह है-दीपकबापूवाणी


विकास अब धुंध बनकर खड़ा है,
सौम्य सुबह में धुआं जड़ा है।
‘दीपकबापू’ अंधे लेते रौशनी का ठेका
उनकी लगाई आग में शहर खड़ा है।
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मत पूछना हिसाब उनसे
उनके खाते बहुत बड़े हैं।
‘दीपकबापू’ तुम पड़े जमीन पर
वह दौलत के पहाड़ पर खड़े हैं।
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कोई कहता है ख्वाहिशें छोड़ दो,
कोई उकसाता दिल में नई जोड़ दो।
‘दीपकबापू’ चीजों के गुलाम कहें
नयी खरीदो पुरानी जल्दी तोड़ दो।
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मन गुलाम फिर भी आजादी की चाह है,
लालच का अवरोध बंद सभी राह है।
‘दीपकबापू’ तन से बुरा आलस मन का
योद्धा पूजे सोते शव को किसने सराह है।
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Wednesday, December 21, 2016

ईमानदारी नहीं बनती आदत-हिन्दी व्यंग्य कविता (Imandari Nahin Banti Adat-HindiSatirePoem)


सौदागर बेचते
मासूमों के बाजार में
ज़माने की भलाई।

सौदे में चीज
कभी देनी नहीं
मुंह में मिलती मलाई।

कहें दीपकबापू मधु का मेह
इतना हो गया है
फिर भी स्वाद
उनका मिटता नहीं
बेईमानों के लिये
ईमानदारी की आदत
कभी नहीं बनती दवाई।
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