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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Sunday, May 17, 2015

ख्वाबों का शख्स-हिन्दी कविता(khawbon ka shakhsa-hindi poem)


हमदर्द बनकर
कोई हमें सहलाये
यह उम्मीद नहीं करना
यहां तो लोग
सताने के लिये
दुखती हुई रग ढूंढते हैं।

कहें दीपक बापू सभी सीना फुलाते हैं
 कमजोर पर प्रहार कर,
झुक जाते उनके सिर
दबंगों के उपहार पर,
 टक्कर ले सके अनाचारों से
ऐसा शख्स अब केवल
ख्वाबों में ही ढूंढते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर   

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, May 9, 2015

आम इंसान और इज्जतदार-हिन्दी कविता(aam insan aur izzatdar-hindi poem)


आम इंसानों को
हुकुमत के कायदे पर ही
चलना चाहिये।

हुकुम का मुंह पकड़े
अपनी ताकत से
ऐश के लिये
इंसान या जानवर का
करते शिकार
उन इज्जतदारों से  कभी
नहीं जलना चाहिये।

कहें दीपक बापू औकात का पैमाना
दौलत और शोहरत से
तय होता है
जब अपनी जान लो शून्य
तब करोड़ों के कीमती बुत देख
नहीं मचलना चाहिये।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, May 3, 2015

इश्क का भूत-हिन्दी कविता(ishq ka bhoot-hindi kavita,devil of love-hindi poem)

ज़माने पर इश्क का भूत
अब जितना चढ़ा
नफरत के किस्से भी
उतने ही बढ़े हैं।

बेतार से बढ़ा संवाद
लोगों के बीच जितना
रिश्ते तार तार होने के खतरे
उतने ही बढ़े हैं।

कहें दीपक बापू ख्वाबों के साथ
जीने की आदत
जितनी बढ़ी है इंसानों में
दिल टूटने के खतरे
उतने ही बढ़े हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Monday, April 27, 2015

इमारते और कवियों के शब्द-हिन्दी कविता(iamrten aur kaviyon ke shabda-hindi poem)


सीमेंट और ईंटों से बनी
इमारते कभी धरती के कोप से
ढह जाती हैं।

इससे तो बेहतर होती
कवियों की शब्द रचनायें
अमरत्व की धारा में
बह आती हैं।

कहें दीपक बापू जिस्म से
मांस या पत्थर के बुत
कभी हमेशा एक जैसे नहीं रहते,
रूप बदलते हुए
पतन के हमले सहते,
किसी के गिरने पर
रोना बेकार है
ज्ञान की अमर कहानियां
यही कह जाती हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Monday, April 20, 2015

इंसान मस्तिष्क घड़ा है-हिन्दी कविता(insanin mastishk ghada hai-hindi kavita)


बूंद बूंद से घड़ा
भरता है
ऐसा कहा जाता है।

छेद हो तो बूंद बूंद
घड़ा खाली भी होता
ऐसा नहीं कहा जाता है।

कहें दीपक बापू इंसानी मस्तिष्क भी घड़ा है
ज्ञान की बूंद बूंद से
भरता है
अहंकार के छेद से होता खाली
यह हमारा विचार है
ऐसा कहा नहीं जाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Monday, April 6, 2015

सावधान होकर सड़क पर चलना-हिन्दी कविता(sawdhan hokar sadak par chalana-hindi poem)


सावधान होकर सड़क पर चलना, शैतान भी विचरते हैं।
दौलतमंदों से बचकर रहना, जल्दी दिमाग से बिफरते हैं।

ढेर सारे दो पांव वाले पशु भी सड़क पर नज़र आयेंगे,
हादसे पर अकेले होगे, दर्शक मनोरंजन में ही सिहरते हैं।

इंसानों की भीड़ का शोर चारों तरफ नज़र आयेगा
कत्ल होती मानवता, सभी की जुबां में दांत बिखरते हैं

कहें दीपक बापू कातिल आज शेर समझे जाते हैं
 इंसानो को भेड़ बनाकर हांकते कायदे से निखरते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Thursday, April 2, 2015

अपनी रुंआसी तस्वीर बनाते-हिन्दी कविता(apni ruansi tasveer banate-hindi poem)


बहुत धन पाने का
सपना दिल में होता
टूटे जाने पर
जरूर आंसु बहाते।
राजपद की लालसा
दिमाग में होती
बिखर जाने पर
जरूर अपना दर्द बताते।

कहें दीपक बापू कलम का धनुष
शब्दों के तीर के साथ
हाथ में थामा था
जिंदगी की जंग जीतने के लिये
जारी है अभी तक
हार जाते तो
अपनी रुंआसी तस्वीर
स्वयं के हाथ से जरूर बनाते।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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