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Friday, May 29, 2009

स्वर्ग का दरवाजा-हास्य व्यंग्य

वहां सीधा शिखर था जिस पर आदमी सीधे स्वर्ग में पहुंच सकता था। शर्त यही थी कि उस शिखर पर बने उसी मार्ग से पैदल जाये तभी स्वर्ग का दरवाजा दिखाई देगा। ऐसा कहा जाता था कि उसी मार्ग से -जहां तक पहुंचना आसान नहीं था- जाने पर ही स्वर्ग का दरवाजा दिखाई देता है। उस शिखर पर कोई नहीं चढ़ सकता था। आसपास गांव वालों ने कभी कोशिश भी नहीं की क्योंकि उस शिखर पर चढने के लिये केवल जो इकलौता चढ़ाई मार्ग था उस तक पहुंचने के लिये बहुत बड़ी सीढ़ी चाहिये थी जो उनके लिये बनाना मुमकिन नहीं था। उसके बाद ही उसकी चढ़ाई आसान थी। उन ग्रामीणों ने अनेक लोगों को उनकी लायी सीढ़ी से ऊपर इस आशा में पहुंचाया था कि उसके बाद वह स्वयं भी चढ़ जायेंगे पर सभी लोग ऊपर पहुंचते ही सीढ़ी खींच लेते थे और ग्रामीण निराश हो जाते थे।
एक दिन एक बहुत धनीमानी आदमी सीधे स्वर्ग जाने के लिये वहां आया। उसके पास बहुत बड़ी सीढ़ी थी। इतनी लंबी सीढ़ी टुकड़ों में बनवायी और फिर वहां तक लाने के जाने के लिये उसने बहुत सारे वाहन भी मंगवाये। वहां पहुंचकर उसने उस सीढ़ी के सारे टुकड़े जुड़वाये। । वहां लाकर उसने गांव वालों से कहा-‘तुम लोग इसी सीढ़ी को पकड़े रहो। मैं तुम्हें पैसे दूंगा।’
गांव वालों ने कहा कि -‘पहले भी कुछ लोग आये और यहां से स्वर्ग की तरफ गये पर लौटकर मूंह नहीं दिखाया। इसलिये पैसे अग्रिम में प्रदान करो।’
उसने कहा कि‘पहले पैसे देने पर तुमने कहीं ऊपर चढ़ने से पहले ही गिरा दिया तो मैं तो मर जाऊंगा। इसलिये ऊपर पहुंचते ही पैसे नीचे गिरा दूंगा।’
तब एक वृद्ध ग्रामीण ने उससे कहा-‘मैं तुम्हारे साथ सीढ़ी चढ़ूंगा। जब तुम वहां उतर जाओगे तो पैसे मुझे दे देना मैं नीचे आ जाऊंगा।’
उस धनीमानी आदमी ने कहा-‘पर अगर तुम वहां उतर गये तो फिर नीचे नहीं आओगे। वैसे ही तुम मेरी तरह बूढ़े हो और स्वर्ग पाने का लालच तुम्हारी आंख में साफ दिखाई देता है। कहीं तुम उतर गये तो मुझे स्वर्ग जाने का दरवाजा नहीं मिलेगा। मैंने पढ़ा है कि आदमी को अकेले आने पर ही वहां पर स्वर्ग का दरवाजा मिलता है।
दूसरे ग्रामीण ने कहा-‘नहीं, यह हमारा सबसे ईमानदार है और इसलिये वैसे भी इसको स्वर्ग मिलने की संभावना है क्योंकि उस स्वर्ग के लिये कुछ दान पुण्य करना जरूरी है और वह कभी इसने नहीं किया। आप तो हमें दान दे रहे हो और इसलिये स्वर्ग का द्वारा आपको ही दिखाई देगा इसको नहीं। इसलिये यह पैसे लेकर वापस आ जायेगा।’
उस धनीमानी आदमी ने कुछ सोचा और फिर वह राजी हो गया।
जब वह वृद्ध ग्रामीण उस धनीमानी आदमी के पीछे सीढ़ी पर चढ़ रहा था तब दूसरा ग्रामीण जो सिद्धांतवादी था और उसने सीढ़ी पकड़ने से इंकार कर दिया था, वह उस वृद्ध ग्रामीण से बोला-‘शिखर यह हो या कोई दूसरा, उस पर केवल ढोंगी पहुंचते हैं। तुम इस आदमी को पक्का पाखंडी समझो। कहीं यह तुम्हें ऊपर से नीचे फैंक न दे। वैसे भी जो लोग यहां से गये हैं वह अपनी सीढ़ी भी खींच लेते हैं ताकि कोई दूसरा न चढ़ सके। यही काम यह आदमी भी करेगा।’
एक अन्य ग्रामीण ने कहा-‘यह आदमी भला लग रहा है, फिर बूढ़ा भी है। इसलिये सीढ़ी नहीं खींच पायेगा। फिर जब पैसे नीचे आ जायेंगे तब हम भी जाकर देखेंगे कि स्वर्ग कैसा होता है।’
वृद्ध ग्रामीण और वह धनीमानी आदमी सीढ़ी पर चलते रहे। जब वह धनीमानी आदमी ऊपर पहुंचा तो उसने तत्काल उस सीढ़ी को हिलाना शुरु किया तो वह वृद्ध ग्रामीण चिल्लाया‘यह क्या क्या रहे हो? मैं गिर जाऊंगा।’
वह धनीमानी आदमी बोला-‘तुम अगर बच गये तो यहां आने का प्रयास करोगे। यह सीढ़ी मुझे ऊपर खींचनी है ताकि कोई दूसरा न चढ़ सके। यह भी मैं किताब में पढ़कर आया हूं। तुम पैसे लेने के लिये ऊपर आओगे पर फिर तुम्हें नीचे फैंकना कठिन है। इसलिये भाई माफ करना अपने स्वर्ग के लिये तुम्हें नीचे पटकना जरूरी है बाकी सर्वशक्तिमान की मर्जी। वह बचाये या नहीं।’
बूढ़ा चिल्लाता रहा पर धनीमानी सीढ़ी को जोर से हिलाता रहा। जिससे वह नीचे गिरने लगा तो सीढ़िया पकड़े ग्रामीणों ने उसे बचाने के लिये वह सीढ़ी छोड़ दी और धनीमानी ने उसे खींच लिया। वह ग्रामीण नीचे आकर गिरा। गनीमत थी कि रेत पर गिरा इसलिये अधिक चोट नहीं आयी।’
वह चिल्ला रहा था‘सर्वशक्तिमान उसे स्वर्ग का रास्ता मत दिखाना। वह ढोंगी है।’
दूसरे समझदार वृद्ध ग्रामीण ने कहा-‘तुम लोग भी निरे मूर्ख हो। आज तक तुम्हें यह समझ में नहीं आयी कि जितने भी स्वर्ग चाहने वाले यहां आये कभी उन्होंने अपनी सीढ़ी यहां छोड़ी या हमें पैसे दिये? दरअसल ऊपर कुछ नहीं है। मेरे परदादा एक बार वहां से घूम आये थे। वह एक धनीमानी आदमी को लेकर वहां गये जो चलते चलते मर गया। मेरे परदादा ने यह बात लिख छोड़ी है कि उस शिखर पर स्वर्ग का कोई दरवाजा वहां नहीं है जहां यह रास्ता जाता है। बल्कि उसे ढूंढते हुए भूखे प्यासे लोग चलते चलते ही मर जाते हैं और हम यहां भ्रम पालते हैं कि वह स्वर्ग पहुंच गये। कुछ तो इसलिये भी वापस लौटने का साहस नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि हमारा पैसा नहीं दिया और हम उनको मार न डालें।’

चोट खाने और पैसा न मिल पाने के बावजूद वह वृद्ध ग्रामीण उस समझदार से कहने लगा-‘तुम कुछ नहीं जानते। ऊपर स्वर्ग का दरवाजा है। आखिर लोग यहां आते हैं। जब ऊपर पहुंचकर लौटते ही नहीं है तो इसका मतलब है कि स्वर्ग ऊपर है।’
एक अन्य ग्रामीण बोला-‘ठीक है। इंतजार करते हैं कि शायद कोई भला आदमी यहां आये और हमें सीढ़ी नसीब हो।’
समझदार ग्रामीण ने कहा-‘भले आदमी को तो स्वर्ग बिन मांगे ही मिल जाता है इसलिये जो यहां स्वर्ग पाने आता है उसे ढोंगी ही समझा करो।’
मगर ग्रामीण नहीं माने और किसी भले आदमी की बाट जोहने लगे।
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Wednesday, May 20, 2009

ईमानदारी दिवस-हास्य व्यंग्य

दुनियां के दिग्गजों की बैठक हो रही थी। विषय था कि कोई ‘दिवस’ चुनकर प्रस्तुत किया जाये ताकि दुनियां उसे मना सके। वहां एक युवा अंग्रेज विद्वान आया। दुर्भाग्यवश वह भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों के न केवल अंग्रेजी अनुवाद पढ़ चुका था बल्कि भारत की स्थिति के बारे में भी जान चुका था। अनेक लोगों ने अनेक प्रकार के दिवस बताये। सभी विद्वान यह जरूर कहते थे कि कोई दिवस भी तय किया जाये उसका प्रभाव भारत पर अधिक पड़ना चाहिए ताकि अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के उत्पाद आसानी से बिक सकें। साथ ही यह भी कहते थे कि दिवस ऐसा हो जिसमें युवक युवतियों की अधिकतम भूमिका हो। बच्चे,बूढ़े और अधेड़ किसी प्रकार की भागीदारी लायक नहीं है।
जब उस अंग्रेज विद्वान की बारी आयी तो वह बोला-‘हम ईमानदारी दिवस घोषित करें। भारत एक महान देश है पर वहां पर इस समय बौद्धिक भटकाव है। वहां के युवक युवतियों को इस बात के लिये प्रेरित करना है कि वह अपना जीवन ईमानदारी से गुजारेें। आज के बूढ़े और अधेड़ों ने तो जैसे तैसे बेईमानी से जीवन गुजारा और देश का बंटाढार किया पर युवक युवतियों को अब जागरुक करना जरूरी है। भारतीय युवक युवतियों को माता दिवस, पिता दिवस और प्रेम दिवस मनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उनका अध्यात्मिक दर्शन इस बारे में पर्याप्त शिक्षा देता है।’
वह अंग्रेज युवक विद्वान एकाग्रता के साथ बोलता चला जा रहा था और उसे इस बात का आभास ही नहीं हुआ कि सारे विद्वान उसकी पहली लाईन के बाद ही सभाकक्ष से ऐसे फरार हो गये जैसे कछुआ छाप अगरबत्ती जलने से मच्छर भाग जाते हैं।

उसने भाषण खत्म कर सामने नजर डाली तो पूरा हाल खाली था। बस एक अधेड़ अंग्रेज विद्वान वहां सो रहा था। वह युवा विद्वान आया और उसने उस आदमी को झिंझोरा और बोला-‘क्या बात है भाई साहब, यहां इतने सारे लोग अंतधर््यान कैसे हो गये। आप यहां कैसे बचे हैं। मैं तो खैर एक भारतीयों के प्रिय सर्वशक्तिमान का भक्त हूं उसकी वजह से बच गया आप भी क्या मेरे जैसे ही हैं।’
उस अधेड़ विद्वान ने उस युवा विद्वान को देखा और कहा-‘नहीं। तुमने जैसे ही ईमानदारी दिवस की बात की सभी भाग गये, मगर मैं यह सदमा बर्दाश्त नहीं कर सका और यहीं गिर पड़ा। तुम क्या यह फालतू की बात लेकर बैठ गये। दरअसल हम यहां इसीलिये एकतित्र हुए थे ताकि अंतर्राष्ट्रीय मंदी दूर करने के लिये कोई ऐसा दिवस घोषित करें जिससे कि हमें प्रायोजित करने वाली कंपनियों के उत्पाद बिक सकें। अगर हमने सर्वशक्तिमान की कसम खाकर ईमानदारी से जीवन जीने का पाठ भारत में पढ़ाया तो वह उत्पाद कौन खरीदेगा? फिर वहां सभी ईमानदारी हो गये तो अपने यहां पैसा कहां से आयेगा? तुम्हें किसने यहां बुलाया था। उसकी तो खैर नहीं!
उसी अंग्रेजी युवा ने उससे कहा-‘पर हम सफेद चमड़ी वाले ईमानदार माने जाते हैं न! हमें तो अपनी बात ईमानदारी से रखना चाहिऐ।’
वह अधेड़ विद्वान चिल्ला पड़ा-‘यकीनन तुमने भारतीयों से दोस्ती कर रखी है! वरना ऐसा भ्रम तुम्हें और कौन दे सकता था? बेहतर है तुम भारतीय लोगों से दोस्ती के साथ उनकी किताबें पढ़ना भी छोड़ दो? बड़ा आया ईमानदारी दिवस मनाने वाला!
वह युवक कुछ कहना चाहता था पर वह विद्वान चिल्ला पड़ा-‘शटअप! नहीं तो अगर मुझे अगला दौरा पड़ा तो मैं मर ही जाऊंगा। मैं एक कंपनी से पैसा लेकर यहां आया था और उसका काम नहीं हुआ तो मुझे उसके पैसे वापस करने पड़ेंगे।’
वह अधेड़ विद्वान चला गया और युवा विद्वान अंग्रेज उसे देखता रहा।
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