समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label hindi story. Show all posts
Showing posts with label hindi story. Show all posts

Friday, June 5, 2009

बड़ा आदमी-लघुकथा

वह शिक्षित बेरोजगार युवक संत के यहां प्रतिदिन जाता था। उसने देखा कि उनके आशीर्वाद से अनेक लोगों की मनोकामना पूरी हो जाती हैं। एक दिन उसने संत के चरणों में सिर झुकाते हुए कहा-‘महाराज, अभी तक आपके चरणों में सिर झुकाता रहा पर कुछ मांगने का साहस नहीं हो सका। आज आपसे प्रार्थना करता हूं कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिये ताकि मैं भी बड़ा आदमी बन जाऊं।’
संत से मुस्कराकर पूछा-क्या बनना चाहते हो?
उस युवक ने कहा-‘महाराज, एक अंग्रेज विद्वान ने कहा है कि इस धरती पर सबसे बड़ा आदमी तो क्लर्क है। वही बना दीजिये।’
संत ने कहा-‘तथास्तु!
कुछ दिनों के बाद वह फिर संत के चरणों में आकर गिर पड़ा और बोला-‘महाराज क्लर्क बनने से मेरे रोजगार की समस्या तो दूर हो गयी पर बड़ा आदमी फिर भी नहीं बन सका। जो उपरी कमाई का हिस्सा बड़े क्लर्क को उसके डर के मारे देना पड़ता है। आप मुझे बड़ा क्लर्क बना दीजिये।’
संत ने कहा-तथास्तु!
वह बड़ा क्लर्क बना। फिर कुछ दिनों के बाद आया और बोला-‘महाराज, उससे भी बड़ा आदमी नहीं बन सका। उपरी कमाई का हिस्सा अफसर को उसके डर के मारे देना पड़ता है। आप तो मुझे अफसर बना दीजिये।’
संत ने कहा-‘तथास्तु!’
कुछ दिनों बाद वह फिर संत के चरणों में आकर गिर पड़ा और बोला-‘महाराज, अफसर से भी बड़ा वजीर है। आप तो वह बना दीजिये।’
संत ने कहा-‘तथास्तु!’
कुछ समय बाद वह फिर आया और बोला-महाराज, अब यह आखिरी बार मांग रहा हूं। वजीर से भी बड़ा राजा है। आप तो मुझे राजा बना दीजिये।’
संत ने कहा-‘तथास्तु!’
मगर एक दिन फिर आया और चरणों में गिर पड़ा-‘महाराज, राजा से भी बड़े आप हैं। यह मुझे वहां गद््दी पर बैठकर लगा क्योंकि आप जनता के हृदय में बसते हैं और इसलिये आपसे डरकर रहना पड़ता है। आप तो मुझे अपने जैसा संत बना दीजिये।’
संत ने कहा-‘तथास्तु।’
फिर वह कुछ दिन बाद आया और चरणों में गिर पड़ा तो संत ने कहा-‘अब यह मत कहना कि मुझे सर्वशक्तिमान बनाकर स्वर्ग में बिठा दो। यह मेरे बूते का नहीं है। इतना बड़ा मैं किसी को नहीं बना सकता।’
उसने कहा-‘महाराज, आपसे जो मांगा आपने दिया पर मैं लालची था जो किसी को कुछ नहीं दे सका बल्कि आपसे मांगता ही रहा। आपने आशीर्वाद देकर क्लर्क से संत तक बड़ा आदमी बनाया पर मैं हमेशा छोटा ही बना रहा क्योंकि मेरे मन में केवल अपनी कामनायें थीं जो केवल आदमी को छोटा बनाये रखती हैं।’
संत ने कहा-‘तुम आज बड़े आदमी हो गये क्योंकि तुमने सच जान लिया है।’
..................................
यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग
‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’
पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, May 29, 2009

स्वर्ग का दरवाजा-हास्य व्यंग्य

वहां सीधा शिखर था जिस पर आदमी सीधे स्वर्ग में पहुंच सकता था। शर्त यही थी कि उस शिखर पर बने उसी मार्ग से पैदल जाये तभी स्वर्ग का दरवाजा दिखाई देगा। ऐसा कहा जाता था कि उसी मार्ग से -जहां तक पहुंचना आसान नहीं था- जाने पर ही स्वर्ग का दरवाजा दिखाई देता है। उस शिखर पर कोई नहीं चढ़ सकता था। आसपास गांव वालों ने कभी कोशिश भी नहीं की क्योंकि उस शिखर पर चढने के लिये केवल जो इकलौता चढ़ाई मार्ग था उस तक पहुंचने के लिये बहुत बड़ी सीढ़ी चाहिये थी जो उनके लिये बनाना मुमकिन नहीं था। उसके बाद ही उसकी चढ़ाई आसान थी। उन ग्रामीणों ने अनेक लोगों को उनकी लायी सीढ़ी से ऊपर इस आशा में पहुंचाया था कि उसके बाद वह स्वयं भी चढ़ जायेंगे पर सभी लोग ऊपर पहुंचते ही सीढ़ी खींच लेते थे और ग्रामीण निराश हो जाते थे।
एक दिन एक बहुत धनीमानी आदमी सीधे स्वर्ग जाने के लिये वहां आया। उसके पास बहुत बड़ी सीढ़ी थी। इतनी लंबी सीढ़ी टुकड़ों में बनवायी और फिर वहां तक लाने के जाने के लिये उसने बहुत सारे वाहन भी मंगवाये। वहां पहुंचकर उसने उस सीढ़ी के सारे टुकड़े जुड़वाये। । वहां लाकर उसने गांव वालों से कहा-‘तुम लोग इसी सीढ़ी को पकड़े रहो। मैं तुम्हें पैसे दूंगा।’
गांव वालों ने कहा कि -‘पहले भी कुछ लोग आये और यहां से स्वर्ग की तरफ गये पर लौटकर मूंह नहीं दिखाया। इसलिये पैसे अग्रिम में प्रदान करो।’
उसने कहा कि‘पहले पैसे देने पर तुमने कहीं ऊपर चढ़ने से पहले ही गिरा दिया तो मैं तो मर जाऊंगा। इसलिये ऊपर पहुंचते ही पैसे नीचे गिरा दूंगा।’
तब एक वृद्ध ग्रामीण ने उससे कहा-‘मैं तुम्हारे साथ सीढ़ी चढ़ूंगा। जब तुम वहां उतर जाओगे तो पैसे मुझे दे देना मैं नीचे आ जाऊंगा।’
उस धनीमानी आदमी ने कहा-‘पर अगर तुम वहां उतर गये तो फिर नीचे नहीं आओगे। वैसे ही तुम मेरी तरह बूढ़े हो और स्वर्ग पाने का लालच तुम्हारी आंख में साफ दिखाई देता है। कहीं तुम उतर गये तो मुझे स्वर्ग जाने का दरवाजा नहीं मिलेगा। मैंने पढ़ा है कि आदमी को अकेले आने पर ही वहां पर स्वर्ग का दरवाजा मिलता है।
दूसरे ग्रामीण ने कहा-‘नहीं, यह हमारा सबसे ईमानदार है और इसलिये वैसे भी इसको स्वर्ग मिलने की संभावना है क्योंकि उस स्वर्ग के लिये कुछ दान पुण्य करना जरूरी है और वह कभी इसने नहीं किया। आप तो हमें दान दे रहे हो और इसलिये स्वर्ग का द्वारा आपको ही दिखाई देगा इसको नहीं। इसलिये यह पैसे लेकर वापस आ जायेगा।’
उस धनीमानी आदमी ने कुछ सोचा और फिर वह राजी हो गया।
जब वह वृद्ध ग्रामीण उस धनीमानी आदमी के पीछे सीढ़ी पर चढ़ रहा था तब दूसरा ग्रामीण जो सिद्धांतवादी था और उसने सीढ़ी पकड़ने से इंकार कर दिया था, वह उस वृद्ध ग्रामीण से बोला-‘शिखर यह हो या कोई दूसरा, उस पर केवल ढोंगी पहुंचते हैं। तुम इस आदमी को पक्का पाखंडी समझो। कहीं यह तुम्हें ऊपर से नीचे फैंक न दे। वैसे भी जो लोग यहां से गये हैं वह अपनी सीढ़ी भी खींच लेते हैं ताकि कोई दूसरा न चढ़ सके। यही काम यह आदमी भी करेगा।’
एक अन्य ग्रामीण ने कहा-‘यह आदमी भला लग रहा है, फिर बूढ़ा भी है। इसलिये सीढ़ी नहीं खींच पायेगा। फिर जब पैसे नीचे आ जायेंगे तब हम भी जाकर देखेंगे कि स्वर्ग कैसा होता है।’
वृद्ध ग्रामीण और वह धनीमानी आदमी सीढ़ी पर चलते रहे। जब वह धनीमानी आदमी ऊपर पहुंचा तो उसने तत्काल उस सीढ़ी को हिलाना शुरु किया तो वह वृद्ध ग्रामीण चिल्लाया‘यह क्या क्या रहे हो? मैं गिर जाऊंगा।’
वह धनीमानी आदमी बोला-‘तुम अगर बच गये तो यहां आने का प्रयास करोगे। यह सीढ़ी मुझे ऊपर खींचनी है ताकि कोई दूसरा न चढ़ सके। यह भी मैं किताब में पढ़कर आया हूं। तुम पैसे लेने के लिये ऊपर आओगे पर फिर तुम्हें नीचे फैंकना कठिन है। इसलिये भाई माफ करना अपने स्वर्ग के लिये तुम्हें नीचे पटकना जरूरी है बाकी सर्वशक्तिमान की मर्जी। वह बचाये या नहीं।’
बूढ़ा चिल्लाता रहा पर धनीमानी सीढ़ी को जोर से हिलाता रहा। जिससे वह नीचे गिरने लगा तो सीढ़िया पकड़े ग्रामीणों ने उसे बचाने के लिये वह सीढ़ी छोड़ दी और धनीमानी ने उसे खींच लिया। वह ग्रामीण नीचे आकर गिरा। गनीमत थी कि रेत पर गिरा इसलिये अधिक चोट नहीं आयी।’
वह चिल्ला रहा था‘सर्वशक्तिमान उसे स्वर्ग का रास्ता मत दिखाना। वह ढोंगी है।’
दूसरे समझदार वृद्ध ग्रामीण ने कहा-‘तुम लोग भी निरे मूर्ख हो। आज तक तुम्हें यह समझ में नहीं आयी कि जितने भी स्वर्ग चाहने वाले यहां आये कभी उन्होंने अपनी सीढ़ी यहां छोड़ी या हमें पैसे दिये? दरअसल ऊपर कुछ नहीं है। मेरे परदादा एक बार वहां से घूम आये थे। वह एक धनीमानी आदमी को लेकर वहां गये जो चलते चलते मर गया। मेरे परदादा ने यह बात लिख छोड़ी है कि उस शिखर पर स्वर्ग का कोई दरवाजा वहां नहीं है जहां यह रास्ता जाता है। बल्कि उसे ढूंढते हुए भूखे प्यासे लोग चलते चलते ही मर जाते हैं और हम यहां भ्रम पालते हैं कि वह स्वर्ग पहुंच गये। कुछ तो इसलिये भी वापस लौटने का साहस नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि हमारा पैसा नहीं दिया और हम उनको मार न डालें।’

चोट खाने और पैसा न मिल पाने के बावजूद वह वृद्ध ग्रामीण उस समझदार से कहने लगा-‘तुम कुछ नहीं जानते। ऊपर स्वर्ग का दरवाजा है। आखिर लोग यहां आते हैं। जब ऊपर पहुंचकर लौटते ही नहीं है तो इसका मतलब है कि स्वर्ग ऊपर है।’
एक अन्य ग्रामीण बोला-‘ठीक है। इंतजार करते हैं कि शायद कोई भला आदमी यहां आये और हमें सीढ़ी नसीब हो।’
समझदार ग्रामीण ने कहा-‘भले आदमी को तो स्वर्ग बिन मांगे ही मिल जाता है इसलिये जो यहां स्वर्ग पाने आता है उसे ढोंगी ही समझा करो।’
मगर ग्रामीण नहीं माने और किसी भले आदमी की बाट जोहने लगे।
..........................................
यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग
‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’
पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, October 1, 2008

घायल और हमदर्द-लघुकथा

वह हादसे में घायल होकर सड़क पर गिर पड़ा ह था। उसके चारों और लोग आकर खड़े हो गये। वह चिल्लाया-‘मेरी मदद करो। मुझे इलाज के लिये कहीं ले चलो।’
लोग उसकी आवाज सुन रहे थे पर बुतों की तरह खड़े थे। उनमें चार अक्लमंद भी थे। एक ने कहा-‘पहले तो तुम अपना नाम बताओ ताकि धर्म,जाति और भाषा से तुम्हारी पहचान हो जाये।

वह बोला-‘मुझे इस समय कुछ याद आ नहीं आ रहा है। मैं तो केवल एक घायल व्यक्ति हूं और अपने होश खोता जा रहा हूं। मुझे मदद की जरूरत है।
एक अक्लमंद बोला-‘नहीं! तुम्हारो साथ जो हादसा हुआ है वह केवल तुम्हारा मामला नहीं है। यह एक राष्ट्रीय मसला है और इस पर बहस तभी हो पायेगी जब तुम्हारी पहचान होगी। तुम्हारा संकट अकेले तुम्हारा नहीं बल्कि तुम्हारे धर्म, जाति और भाषा का संकट भी है और तुम्हें मदद का मतलब है कि तुम्हारे समाज की मदद करना। इसके लिये तुम्हारी पहचान होना जरूरी है।’

यह सुनते हुए उस घायल व्यक्ति की आंखें बंद हो गयीं। कुछ लोगों ने उसकी तरफ मदद के लिये हाथ बढ़ाने का प्रयास किया तो उनमें एक अक्लमंद ने कहा-‘नहीं, जब तक यह अपना नाम नहीं बताता तब तक इसकी मदद करो। हम मदद करें पर यह तो पता लगे कि किस धर्म,जाति और भाषा की मदद कर रहे हैं। ऐसी मदद से क्या फायदा जो किसी व्यक्ति की होती लगे पर उसके समाज की नहीं।

उसी भीड़ को चीरता हुए एक व्यक्ति आगे आया और उस घायल के पास गया और बोला-‘चलो घायल आदमी! मैं तुम्हें अपनी गाड़ी में बिठाकर अस्पताल लिये चलता हूं।’
उस घायल ने आंखें बंद किये हुए ही उस आदमी के कंधे पर हाथ रखा और उठ खड़ा हुआ। अक्लमंद ने कहा-‘तुम इस घायल की मदद क्यों कर रहे हो? तुम कौन हो? क्या इसे जानते हो?’

उस आदमी ने कहा-‘मैं हमदर्द हूं। कभी मैं भी इसी तरह घायल हुआ था तब सारे अक्लमंद मूंह फेर कर चले गये थे पर तब कोई हमदर्द आया था जो कहीं इसी तरह घायल हुआ था। घायल की भाषा पीड़ा है और जाति उसकी मजबूरी। उसका धर्म सिर्फ कराहना है। इसका इलाज कराना मुझ जैसे हमदर्द के लिये पूजा की तरह है। अब हम दोनों की पहचान मत पूछना। घायल और हमदर्द का समाज एक ही होता है। आज जो घायल है वह कभी किसी का हमदर्द बनेगा यह तय है क्योंकि जिसने पीड़ा भोगी है वही हमदर्द बनता है। भलाई और मदद की कोई जाति नहीं होती जब कोई करने लगे तो समझो वह सौदागर है।’
ऐसा कहकर उसको चला गया।
-------------------------
यह हिंदी लघुकथा मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’ पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर