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Saturday, December 28, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख-राज्यकर्म के लिये राजनीति का ज्ञान होना चाहिये(manu smriti -rajya karma ke liye rajneeti ka gyan ka hona chahiye)



            हमारे देश राजतंत्र समाप्त होने के बाद लोकतांत्रिक प्रणाली अपनायी गयी जिसमें चुनाव के माध्यम से  जनप्रतिनिधि चुने जाते हैं।  भारत एक बृहद होने के साथ भौगोलिक विविधता वाला देश है। लोकसभा राष्ट्रीय, विधानसभा प्रादेशिक, नगर परिषद तथा पंचायत स्थानीय स्तर पर प्रशासन की देखभाल करती हैं। देखा जाये तो राजतंत्र में राजा के चयन का आधार सीमित था इसलिये आम आदमी राजकीय कर्म में लिप्त होने की बात कम ही सोचता था। हालांकि इस संसार में अधिकतर लोग राजसी प्रवृत्ति के ही होते हैं पर राजतंत्र के दौरान क्षेत्र व्यापार, कला, धर्म तथा प्रचार के अन्य क्षेत्रों में स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने तक ही उनका प्रयास सीमित था। लोकतंत्र ने अब उनको आधुनिक राजा बनने की सुविधा प्रदान की है।  चुनावों में वही आदमी जीत सकता है जो आम मतदाता के दिल जीत सके।  बस यहीं से नाटकीयता की शुरुआत हो जाती है।  स्थिति यह है कि कला, पत्रकारिता, फिल्म, टीवी तथा धर्म के क्षेत्र में लोकप्रिय होता है वही चुनाव की राजनीति करने लगता है। वैसे राजनीति राजसी कर्म की नीति का परिचायक होती है जो अर्थोपार्जन की हर प्रक्रिया का भाग होता है।  राज्यकर्म तो इस प्रक्रिया का एक भाग होता है। राजनीति उस हर व्यक्ति को करना चाहिये जो नौकरी, व्यापार अथवा उद्योग चला रहा है।  केवल चुनाव ही राजनीति नहीं होती पर माना यही जाने लगा है।
            इससे हुआ यह है कि बिना राजनीति शास्त्र ज्ञान के लोग पदों पर पहुंच जाते हैं पर काम नहीं कर पाते। राजकीय कर्म की नीतियां हालांकि परिवार के विषय से अलग नहीं होती पर जहां परहित या जनहित का प्रश्न हो वहां शिखर पुरुषों को व्यापक दृष्टिकोण अपनाना पड़ता है।  इसलिये राजनीति शास्त्र का उनको आम इंसान से अधिक होना आवश्यक है।  भारत में आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्थाओं  से हमेशा ही लोगों में अंतर्द्वंद्व देखा गया है।  देखा यह गया है कि रचनात्मक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति लंबे समय तक अपना स्थान बनाये रखता है पर अनवरत अंतर्द्वंद्व की प्रक्रिया के बीच जब कोई विध्वंसक प्रवृत्ति का व्यक्ति खड़ा हो जाता है तो तनावग्रस्त समाज में उसकी छवि नायक की बन जाती है। दूसरी बात यह है कि जब लोग अपनी समस्याओं से जूझते हैं तब उनके बीच जोर से ऊंची आवाज में बगावत की बात कहने से लोकप्रियता मिलती है।  यही लोकप्रियता चुनाव जीतने का आधार बनती है।  इससे उन लोगों को जनप्रतिनिधि होने का अवसर भी  मिल जाता है जो बगावती तेवर के होते है पर उनमें रचनात्मकता का अभाव होता है।
मनु स्मृति में कहा गया है कि
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साम्रा दानेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक।
विजेतुः प्रयतेतारीन्न युद्धेन कदाचत्।।
            हिन्दी में भावार्थ-अपने राजनीतिक अभियान में सफलता की कामना रखने वाले पुरुष को साम, दाम तथा भेद नीतियों के माध्यम से पहले अपने अनुकूल बनाना चाहिये। जब यह संभव न हो तभी दंड का प्रयोग करना श्रेयस्कर है।
उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम।
बुत्तों च दैवे बुध्यते जयप्रेप्सुरपीतभीः।।
            हिन्दी में भावार्थ-राजनीतिक अभियान में पहले अपने विरोधी पक्ष के लालची लोगों को अपने पक्ष में करना चाहिये। उनसे अपने विरोधी पक्ष की नीति तथा कमजोरी का पता लगाकर अपने अभियान को सफल बनाने का प्रयास करना चाहिये।
            हमारे देश में अनेक प्रकार के राजनीतिक परिदृश्य देखने को मिले हैं।  अनेक संगठन बने और बिगड़े पर देश की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति यथावत रही।  नारे लगाकर अनेक लोग सत्ता के शिखर पर पहुंचे राजनीति तथा प्रशासन का ज्ञान न होने की वजह से वह प्रजाहित की सोचते तो रहे पर आपने कार्यक्रम क्रियान्वित नहीं कर सके। साहित्य, कला, फिल्म तथा पत्रकारिता के साथ ही जन समस्याओं के लिये जनआंदोलन करने वाले लोग जनमानस में लोकप्रियता प्राप्त कर चुनाव जीत जाते हैं पर जहां प्रशासन चलाने की बात आये वहां उनकी योग्यता अधिक प्रमाणित नहीं हो पाती।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Thursday, December 19, 2013

चुनाव और आंदोलन दोनों ही राजसी कर्म के परिचायक-हिन्दी लेख(chunav or election and andolna or agitation rajsi karma ke parichayak-hindi lekh or article)



                        एक बात समझ में नहीं आती कि हमारे भारत में राजनीति का आशय हमेशा ही चुनाव के माध्यम से राजकीय पद प्राप्त करने की प्रक्रिया से ही क्यों जोड़ा जाता है। हम संदर्भ अन्ना हजारे जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से ही ले रहे है क्योंकि वह वर्तमानकाल में अधिक प्रासंगिक लगता है।  अन्ना हजारे कहते हैं कि मेरा आंदोलन गैर राजनीतिक है। अन्ना हजारे से संबंधित कुछ उनके भक्तों ने एक राजनीतिक दल का गठन किया तो कहा गया कि वह राजनीति में आ गये हैं।  ऐसा लगता है कि भारत में पश्चिमी आधार पर चलने वाले चिंत्तक राजनीति शब्द के मायने का  संकीर्ण अर्थ ले रहे हैं। 
            अगर हम श्रीमद्भागवत गीता के कर्म विभाग का अध्ययन करें तो सात्विक, राजस तथा तामस तीन प्रकार के कर्म होते हैं।  सात्विक कर्म में लगे लोगों का एक ही नियम होता है कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ। ऐसे लोग समाज के लिये स्वयं बढ़कर काम नहीं करते पर अगर सामने आ जाये तो मुख नहीं मोड़ते।  अलबत्ता वह समाज में संकट खड़ा नहीं करते इसलिये वह प्रशंसा के पात्र होते हैं। तामसी कर्म में लगे लोगों आलस्य, प्रमाद तथा धीमी गति से काम करने वाले होते हैं इसलिये उनसे भी समाज के परोपकार की आशा करना ही  व्यर्थ है।  सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य राजसी कर्म है जिसकी पहचान है काम, क्रोध, मोह, लोभ, तथा अहंकार  जैसे गुणों के रूप में होती है।  सकारात्मक रूप से यह गुण ही है नकारात्मक रूप से ही इन्हें दुर्गुण कहा जाता है। जिनकी मूल प्रवृत्ति ही राजसी है वह सदा प्रतिफल की आशा से काम करते हैं जो राजसी कर्म की पहचान है।  अपने हितों के मोह में प्रतिफल पाने का लोभ मनुष्य को सक्रिय रखता है। उसके न मिलने पर उसे क्रोध आता ही है। मिल जाये तो वह उससे भरपूर सुविधायें जुटाने की कामना भी वही करता है।  न मिले तो क्रोध और मिल जाये तो अहंकार आता ही है। सात्विक लोग अपनी सुविधानुसार राजसी कर्म करते ही हैं क्योंकि इसके बिना उनका गुजारा नहीं होता। तामसी प्रवृत्ति के लोग भी येनकेन प्रकरेण यह करने के लिये बाध्य होते हैं। किसी भी राजसी कर्म करने के लिये नीतिगत रूप से काम करना ही राजनीति है। कहने का अभिप्राय यह है कि न केवल राज्य कर्म के लिये वरन् व्यक्तिगत राजसी कर्म के लिये भी राजसी प्रवृत्ति में लिप्त होना ही होता है।
            पहले तो हम लोकतंत्र की बात करें जिसमें जिस तरह चुनाव उसका भाग होते हैं। इसी लोकतंत्र में जहां जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले सरकार बनाते है तो ऐसे लोग भी होते है जो अपनी मांगों के लिये आंदोलन चलाते हैं।  यह चुनाव और आंदोलन दोनों ही आज की लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था का भाग हैं। अन्ना हजारे स्वयं सात्विक प्रवृत्ति के हैं पर उनकी छवि राजसी कर्मों में श्रेष्ठता के कारण है।  अन्ना हजारे साहब का आंदोलन अब दो भागों में बंट गया है एक चुनाव की तरफ आया तो दूसरा आंदोलन को ही देश के बदलाव का मार्ग मानकर वहीं डटा है।  जहां प्रजा हित का प्रश्न हो वहां राजा को छल कपट, धोखा तथा राजनीतिक स्वार्थपरायणता के लिये तत्पर रहना चाहिये यह राजनीति शास्त्र कहता है।  सात्विक मनुष्य चूंकि यह काम नहीं कर सकते इसलिये ही राज्यकर्म से दूर ही रहते हैं।  अगर राजसी कर्म में कोई श्रेष्ठ व्यक्ति हो तो वह सात्विक से कम नहीं होता मगर शर्त यह है कि उसे अपने काम की प्रकृत्ति का ज्ञान होना चाहिये।  राजसी कर्म करते समय श्रेष्ठ करते समय सात्विक दिखना तो चाहिये पर उससे दूर होना ही लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकता है।
            अन्ना से अलग हुए लोगों ने चुनाव के क्षेत्र में कदम रखा है। उन्हें सफलता तो मिली है पर वह स्थाई नहीं हो सकती।  आंदोलन चलाना और सरकार चलाने में अंतर होता है। आंदोलन दमदार हो तो सरकार को झुकना पड़ता है पर अगर सरकार दमदार हो तो आंदोलन की हवा भी निकाल सकती है। एक बात तय रही कि राजसी कर्म स्वार्थ से परे नहीं हो सकते। दूसरी बात यह कि राजसी कर्म करते हुए अगर किसी ने अपने लिये संपन्नता नहीं अर्जित की तो उसे समाज बड़ी दयनीय दृष्टि से देखता है।  अन्ना हजारे के चंद भक्त उनसे अलग होकर चुनाव के माध्यम से समाज में बदलाव का जो लक्ष्य सामने रख रहे हैं उनकी नीयत पर हमें संदेह नहीं है पर मुख्य बात यह है कि उनके अनुयायी भी उनकी तरह ही होंगे इस पर संदेह है। कुछ समय के लिये उनको युवाओं का उत्साही वर्ग अवश्य मिल जाये पर कालांतर में राज्य सुख उनको वैसा ही ईमानदार बने रहने देगा इसमें संदेह है जैसा कि प्रारंभ में होंगे।  बहरहाल अभी तो यह कहना कठिन है कि अन्ना हजारे के उनसे अलग हुए पुराने भक्त कि चुनाव के माध्यम से समाज में कितना बदलाव ला पायेंगे पर एक बात तय है कि उन्होंने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा देने का प्रयास तो किया है। आगे देखें क्या होता है। 


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Thursday, November 7, 2013

हम मोर नहीं है-हिन्दी व्यंग्य कविता(ham more nahin hain-hindi vyangya kavita)



पटाखों के शोर से
फटते कान,
धुऐं से जलती आंखें,
प्रदूषित हवा से भरती हुई छाती
दीपावली के उत्साह में
दिल  अब ज्यादा साथ नहीं देता
पीड़ाओं के बीच खुशी कहीं
खो जाती है।
कहें दीपक बापू
कोई ऐसा दीपक जलाओ
जिससे अंदर का अंधेरा मिट जाये
ऐसे जश्न मनाने से कोई फायदा नहीं
जिससे अपनी तबियत बिगड़े
हम कोई मोर नहीं
नाचने के बाद  अपने पांव देखकर
जिसकी सूरत रोनी हो जाती है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Monday, October 14, 2013

अस्पताल स्वर्ग, डाक्टर देवता और दवायें अमृत रूप-हिन्दी व्यंग्य(hospital swarg,doctor devta aur dawayen amrit roop-hindi vyangya or satire article)



                         हम अगर देश के वर्तमान कथित सभ्रांत वर्ग के लोगों की शारीरिक, मानसिक, वैचारिक तथा बौद्धिक स्थिति पर दृष्टिपात करें तो चिकित्सालय स्वर्ग, चिकित्सक देवता, दवायें, अमृत, गोलियां मिष्ठान और बीमारी दर्शन बन गयी है।  कहीं भी शादी या गमी में युवावस्था के ंअंतिम दौर में चलने वाले, बड़ी आयु या वृद्ध लोगों की बैठक हो वहां बीमारियों को लेकर चर्चा जरूर  होती है।  कभी कभी तो लगता है कि सिवाय बीमारियों पर चर्चा को लेकर उनके पास दूसरा कोई विषय नहीं है।  इतना ही नहीं कुछ लोग राजनीतिक विषय पर बात करते हुए बीमारियों पर बात करने लगते हैं।
                        चलते चलते लोग एक दूसरे को टोकने लगते हैं-‘‘आपने शुगर चेक कराई।’’
                        अगर कोई जवाब दे नहीं तो फिर उससे कहा जाता है कि हर महीने चेक कराया करो। आजकल बीमारियों का पता नहीं चलता। अमुक आदमी की मधुमेह से किडनी खराब हो गयी अमुक का लीवर फट गया।  इस प्रकार के ब्रह्मवाक्य सुनने को मिलते है।  जिनको डायबिटीज है उनके लिये हमराही बहुत सारे हो जाते हैं। कभी कभी तो लगता है कि बीमार लोग अपने चिकित्सक से अधिक  जानते हैं।  अगर अध्यात्मिक दृष्टि से कहें तो क्षेत्रज्ञ वही है जो बीमार्री झेल रहा है।
                        उस दिन हम शहर के एक बड़े पार्क घूमने गये। वहां पर एक पुराने परिचित मिल गये। उनका घर पास ही था इसलिये वहां अक्सर वह शाम को आते थे।  हमें देखकर उन्होंने हालचाल पूछे और बताने लगे कि उनका कुछ दिन पहले ही पथरी का आपरेशन हुआ है।
                        हमने पूछा-‘‘आपकी अब तबियत कैसी है?’’
                        वह तपाक से बोले-‘‘अब तो बढ़िया है।  मैंने अपना इलाज जिस डाक्टर से कराया वह बहुत बड़ा विशेषज्ञ है। उसका निजी अस्पताल भी जोरदार है। एकदम स्वर्ग जैसा।  उसकी दवाओं ने अमृत जैसा काम किया। पैसा हमारा जरूर खर्च किया पर लगता है कि स्वर्ग भोगकर लौटे हैं। अब तो सावधानी रखनी है। डाक्टर ने बताया कि अगर अब तबियत बिगड़ी तो किडनी निकालनी पड़ेगी।’’
                        हमने कहा-‘‘हां, आप अब सावधानी रखा करें।
                        वह बोले-‘‘आप भी अपना चेकअप करा लो। खासतौर से पथरी का पता जरूर करो।  इसका शुरु में पता नहीं चलता अगर चेकअप करा लें तो बुरा नहीं है। अगर पहले ही पता लग जाये तो बिना आपरेशन के ठीक हो जाओगे।’’
                        हमने कहा-‘‘हां, हम करा लेंगे।
                        वह बोले-‘‘डायबिटीज का भी चेकअप करा लो।  ऐसा क्यों नहीं करते, हमारे वाले चिकित्सक के पास जाकर सारे टेस्ट करा लो। उनके सामने मेरा नाम लेना। अब मेरी उस डाक्टर से दोस्ती हो गयी है।’’
                        उन्होंने उस चिकित्सक की ढेंर सारी प्रशंसा की गोया कि इस धरती पर विचरने वाले कोई देवता हों। वैसे हमारे यहां कहा जाता है कि डाक्टर भगवान का रूप है।  हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर सवाल यह है कि यह डाक्टर लोग अपनी अमृतमय दवायें लिखकर वाहवाही तेा बटोरते हैं साथ में परहेज रखने की हिदायत भी देते हैं। ऐसे में हम जैसे क्षेत्र ज्ञान साधक के लिये यह समझना कठिन होता है कि मरीज दवा से ठीक होता है या परहेज से उसका स्वास्थ्य पूर्ववत होता है। अगर दवा से ठीक होता है तो परहेज क्यों बताते हैं, और परहेज से ठीक होता है तो फिर दवा की जरूरत क्या है?
                        कहा जाता है कि कम खाओ, गम खाओ, हमेशा स्वास्थ्य पाओ। हमारी पुरावनी कहावतें और मुहावरे अनेक रहस्यमय बातें एक पंक्ति में कह जाते हैं।  वैसे भी कहा जाता है कि हमारे देश में भुखमरी है पर फिर भी लोग यहां भूख से कम मरते हैं जबकि अधिक खाकर दुःख उठाने वालों की संख्या अधिक होती है।
                        उस दिन मधुमेह का एक पर्चा देखा। उसमें बकायदा बीमारों के लिये मीनू लिखा हुआ था। यह खायें, यह कभी नहीं और यह कभी कभी कम मात्रा में खायें।  हमारे सामने एक महिला दूसरी महिला को यह मीनू नोट करवा रही थी।  दोनों को ही मधुमेह ने घेर रखा था और बातचीत में एक दूसरे को वह अपना अनुभव सुना रही थीं।  जब बीमारी की चर्चा हो तो चिकित्सालय, चिकित्सक, दवायें और खान पान की चर्चा न हो यह संभव नहीं है। अमुक चिकित्सक ज्यादा होशियार है अमुक कम अनुभवी है। उसकी दवा लगती है उसकी नहीं।  जिस तरह फलों का आम और  सब्जियों का आलू राजा होता है उसी तरह मधुमेह उस बीमारी का नाम है जो बीमारियों की रानी है।
                        बहरहाल अगर आप स्वस्थ हों तो भी अपने से मिलने जुलने वालों के सामने इसकी चर्चा न करें।  डायबिटीज, एसिडिटी, उच्च रक्तचाप, और थाइराइड के शिकार लोगों की संख्या इतनी अधिक है कि अब स्वस्थ लोगों को ढूंढना पड़ता है।  ऐसे में अगर बीमारी का शिकार कोई मिल जाये तो उसके सामने कभी अपने स्वास्थ्य का बखान न करें। जब किसी बीमार को पता लगता है कि अमुक आदमी बड़ी आयु होने पर भी स्वस्थ है तो वह उसे जांच की सलाह देता है।  अगर कोई योग साधना या प्रातःकाल घूमता है तो भी बीमार लोग उससे कहते हैं कि घूमने से कुछ नहीं होता। बीमारियों का पता नहीं चलता। जांच कराया करो।
                        अगर आप स्वस्थ दिख रहे हैं और बीमारों के सामने यह दावा  करते हैं कि आपको कोई बीमारी नहीं है तो पूछा जायेगा कि आपने चेकअप कराया है।
                        आप कहेंगे नहीं तो नाकभौं सिकोड़ कर कहा जायेगा‘-ऊंह, फिर यह दावा कैसे कर रहे हो कि तुम स्वस्थ हो।’’
                        वहां अपने व्यायाम, सैर सपाटे या योगसाधना की चर्चा न करें वरना ऐसे लोगों की सूची भी बतायी जायेगी जो यह सब करते हुए भी बीमार हों।  यह अलग बात है कि ऐसे बीमार नियम से यह नहीं करते पर दावा यही करते है जिसका प्रचार दूसरे बीमार यह साबित करने के लिये करते हैं कि उन बीमारियों से बचना कठिन है।
                        वैसे भी हमारे चाणक्य महाराज कहते हैं कि अपना धन तथा स्वास्थ्य छिपाकर रखना चाहिये।  इसका सीधा मतलब यही है कि  धन पर किसी दुष्ट की नजर पड़ गयी तो वह वक्रदृष्टि डालेगा और अगर स्वास्थ्य कि चर्चा आप किसी बीमार के सामने करते हैं तो  आह भरते हुए मन ही मन कह सकता है कि हे भगवान, इसे भी मेरी वाली बीमारी लग जाये  कहा भी जाता है कि गरीब और बेबस की आह लग जाती है।  अगर कोई कहे कि अस्पताल में स्वर्ग, डाक्टर में देवता, दवा में अमृत और गोलियों में शहद बसता है तो मान लीजिये। यह जीवन में सहज बने रहने का एक सबसे बेहतर उपाय है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Sunday, September 22, 2013

कातिल ही फरिश्ते बने-हिन्दी व्यंग्य कविता (Qatil bane farishey-hindi satire poem)




जंग के लिये जो अपने  घर में हथियार बनाते हैं,
बारूद का सामान बाज़ार में  लोगों को थमाते हैं।
दुनियां में उठाये हैं वही शांति का झंडा अपने हाथ
खून खराबा कहीं भी हो, आंसु बहाने चले आते हैं।
कहें दीपक बापू, सबसे ज्यादा कत्ल जिनके नाम
इंसानी हकों के समूह गीत वही दुनियां में गाते हैं।
पराये पसीने से भरे हैं जिन्होंने अपने सोने के भंडार
गरीबों के भले का नारे वही जोर से सुनाते हैं।
अपनी सोच किसको कब कहां और  कैसे सुनायें
चालाक सौदागरों के जाल में लोग खुद ही फंसे जाते हैं।
खरीद लिये हैं उन्होंने बड़े और छोटे रुपहले पर्दे
इसलिये कातिल ही फरिश्ते बनकर सामने आते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Saturday, September 14, 2013

आस्तीन के सांप-हिन्दी व्यंग्य कविता(asteen ke saanp-hindi vyangya kavita)

आस्तीनों में कभी सांप पलते नहीं देखे हैं,
शायद इंसानों की बही में दर्ज
अपनी कारनामों के ऐसे ही लेखे हैं,
जिनके लिये भले आदमी ने की दुआ
शिखर पर चढ़ने के लिये लिये
उसके कंधे पर पांव रखकर बढ़ गये,
उनके नाम के स्तंभ जमीन पर गढ़ गये,
इतना होता तो ठीक था
दुआ करने वालों ने कुछ पाया नहीं,
सिवाय वादों के कुछ उनके हिस्से में आया नहीं।
कहें दीपक बापू
क्यों परेशान हो
खजूर के पेड़ों से
खडे़ किये तुमने
क्षमा करो और भूल जाओ
बड़ा होना लिखा रहता है  उनकी किस्मत में
बांटने का बल आया नहीं,
इसलिये उनके  हिस्से में कभी
फल होता नहीं
साथ निभाती छाया नहीं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
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Saturday, July 13, 2013

कभी कभी दूरदर्शन की भी याद आती है-हिन्दी लेख (kabhi kabhi doosrdarshan kee bhee yaad aati hai-hindi lekh or article ot editorial)



          जब देश के प्रचार माध्यमों पर आकाशवाणी तथा दूरदर्शन का एकमात्र शासन था तब देश के बुद्धिजीवी उसे सरकारीवाणी या कर्कशवाणी कहते हुए थकते नहीं थे। उसकी बदनामी के  चलते देश में निजी क्षेत्र में टीवी के मनोरंजन चैनलों का आगमन हुआ।  प्रारंभ में कुछ चैनलों परं मनोरंजन के साथ ही दूरदर्शन की तरह समाचार भी आते थे।  जब दूरदर्शन ने अपना  प्रथक से समाचार चैनल प्रारंभ किया तो निजी क्षेत्र ने भी उसका अनुसरण किया।  उदारीकरण ने ऐसी स्थिति ला दी कि बाज़ार के स्वामी खेल, प्रचार, कला तथा मनोरंजन में भी अपना वर्चस्प बनाने में सफल रहे। यह सब ठीक माना जाता अगर इन टीवी चैनलों ने दूरदर्शन को अपने प्रसारणों के आधार पर परास्त किया होता। 
       कम से कम एक बात तो है कि दूरदर्शन जब अपने मनोरंजक  कार्यक्रम प्रसारित कर रहा था तब उसमें हास्य, श्रंृगार तथा करुणा रस से भरे कार्यक्रमों का एक स्तर था पर इन निजी चैनलों ने अपनी प्रसारित सामग्री में इस पर कतई ध्यान नहीं दिया।  दूसरी बात तो यह कि हिन्दी समाचार चैनलों ने कभी दूरदर्शन की तरह अपने प्रसारणों में अपनी व्यवसायिक मर्यादा का पालन नहीं किया। दुनियां भर की खबरें दस मिनट में सुनाते हैं पर बाकी समय उनका मनोरंजन चैनलों के कार्यक्रमों के प्रचार पर खर्च होता है। कभी कॉमेडी तो कभी सामाजिक धारावाहिकों के अंश दिखाकर वह अगर उन्हें समाचार का उसे समाचार का भाग जताना चाहते हैं तो यह उनकी व्यवसायिक लापरवाही का ही प्रमाण है। वैसे हम उनको क्या कहें? हमारे देश मेें व्यवसायिक प्रबंध तथा प्रवृत्ति दोनों का अभाव माना जाता है।  जो कमाई कर रहा है उसे बुद्धिमान तथा पेशेवर मान लिया जाता है। हमारे देश के बुद्धिमान लोगों ने हमेशा ही अंग्रेजों की नकल की है पर उन जैसा पेशेवराना अंदाज नहीं अपना सके। यही कारण है कि फिल्म और धारावाहिकों की शैलियां भी उन्हें अमेरिका और ब्रिटेन के मनोरंजक क्षेत्रों से नकल करनी पड़ती है। हिन्दी के खाने वाले हमारे मनोरंजक व्यवसायी कहानियां भी उनसे ही लेते हैं।  देश में हिन्दी लेखकों और पटकथाकारों को आगे लाने में उनकी कोई रुचि नहीं हैं।  यही कारण है कि कॉमेडी के नाम फूहड़पन दिखाते हैं।   पता नहीं लोगों को उनके मनोरंजन में कितनी रुचि है? पर एक बात तय है कि भारतीय जनमानस को ऐसा फूहड़पन भाता नहीं है। जिन सामाजिक धारावाहिकों में वास्तव में कहानी रही उनको भारतीय जनमानस ने हृदय से सराहा है।  हास्य धारावाहिकों में अनेक स्तरीय कार्यक्रम लोकप्रिय रहे हैं। कम से कम एक तो यह है कि भारतीय जनमानस मनोरंजन की दृष्टि से भी स्वाद जानता है।  यही कारण है कि मनोंरजन व्यवसाय भारत में अभी वैसा सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं कर सका जिसका दावा प्रचार माध्यम करते रहे हैं।  यह अलग बात है कि मलाई की जगह बासी खिचड़ी बेचने वाले इन मनोरंजक व्यवसायियों को कुछ मन के भूखे मिल जाते हैं पर यह संख्या अधिक भी हो सकती है यदि वह भारतीय तरीके से चलें।  मुश्किल यह है कि ऐसी सामग्री की कल्पना करने वाला लेखक चाहिये और वह आसानी से वह नहीं मिलने वाला। जो इन मनोरंजक व्यवसायियों के यहां चक्कर लगाते हैं वह लिपिकनुमा लेखक है। उससे ही यह लोग काम चला रहे हैं और उनकी अधिकतर समाग्रियां घटिया स्तर की बन रही है।
            उससे भी बुरी बात यह है कि यह प्रचार माध्यम  अपने देशी एजेंडे का ध्यान नहीं रखते हुए जाने अनजाने में विदेशी एजेंडे की तरफ बढ़ गये हैं।  फिल्म हो या धारावाहिक इन पर अगर दृष्टिपात करें तो भारत में एक ऐसे समाज निर्माण का प्रयास हो रहा है जो आर्थिक दृष्टि से आधारहीन, वैचारिक दृष्टि से स्तरहीन और आचरण की दृष्टि से मर्यादाहीन हो।  दूसरी बात यह भी है कि प्रचार व्यवसाय का अर्थशास्त्र कहीं न कहीं विदेशी भूमि से जुड़ा है।  पश्चिम तथा मध्यएशिया देशों में भारतीय प्रचार माध्यम अपने लिये प्रायोजन के लिये धन  के साथ  वहां से दर्शक जुटाने का प्रयास भी  करते हैं।  यही कारण है कि धारावाहिकों तथा फिल्मों की कहानियों में कहीं न कहीं ऐसी सामग्री शामिल अवश्य होती है जिससे विदेशों में बेचा जा सके। विदेशी नायके लिये देशी खलनायक चुना जाता है जो अप्रगतिशील आधारों पर चलता हो।  इतना ही नहीं अभिनेता और अभिनेत्रियों के व्यक्तिगत जीवन से जुड़े गॉसिपों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।  जिन लोगों को अपने देश का ज्ञान है और यह मानते हैं कि हमारा समाज प्रगतिशील है उनको इस बात पर ध्यान देना चाहिये कि हम भले ही विकास की धारा के पोषक हैं पर विश्व समाज में एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल इसका दावा भर करता है और प्रचार माध्यमों में उसकी संकीर्णता को छिपाया जाता है।  विश्व समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन्मादी, शोषक तथा हिंसा न करते दिखता है पर कहीं न कहीं वह उसका पोषक है।  आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक तथा राजनीतिक साम्राज्यवाद की ललक भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई समाजों में है पर वह संगीत, साहित्य और कला की आड़ में उसे छिपाने की करता है।  उसके लिये धर्म एक व्यक्तिगत विषय नहीं राज्य प्राप्त करने का शस्त्र है। हमारे भारतीय समाज में दो व्यक्तियों का धर्म प्रथक हो सकता है पर विश्व समाज के अनेक भागों में यह स्वीकार्य नहीं है। इस सत्य से आंखें फेरते हुए भारतीय मनोरंजक व्यवसायी कथित वैश्विक एकता वाली सामग्री प्रसारित करते हुए यह दिखाते हैं कि उनकी मानसिकता विकसित है।
     इस विषय में हम पाकिस्तान का उदाहरण देंगे।  हम यह तो मानते हैं कि  पाकिस्तान की जनता में सभी भारत विरोधी नहीं है पर इतना तय है कि एक बहुत बड़ा हिस्सा हमारी स्थिति से घृणा करता है। समाजों के आपसी रिश्तों को प्रगाढ़ बनाने के लिये हमारे मनोरंजक व्यवसायी पाकिस्तान से कलाकार लाते हैं।  कई कहानियों में पाकिस्तान का लड़का या लड़की का प्रेम होता दिखाते हैं। विवाह भी दिखाते हैं पर उनको यह पता नहीं कि विवाह का अर्थ संस्कारों का मेल भी होता है।  विवाह पूर्व जब धर्मिक और सामाजिक संस्कारों को निभाने की बात आती है तब लड़की को ससुराल की बात माननी पड़ती है। विवाह एक सामाजिक अनुबंध है और तय बात है कि इसका विरोध किया भी नहीं सकता कि लड़की को लड़के के परिवार के संस्कारों को मानना चाहिये। जिनको सामाजिक संस्कारों से परहेज हो उन्हें विवाह बंधन भी त्याग देना चाहिये क्योंकि यह मानव सभ्यता  को समाज  की देन है पर मनोरंजन व्यवसायियों के लिये यह संभव नहीं है क्योकि उनकी कहानी का आधार ही प्रेम कहानी का विवाह के रूप में परिवर्तित होते दिखाना है।  बहरहाल एक बात तय है कि जब तक पाकिस्तान अस्तित्व में है तब तक भारत से उसकी कभी बननी नहीं है।  वह एक उपनिवेश है जिसका उपयोग भारतीय समाज के दर्शन, साहित्य और कला का प्रतिरोध करने के लिये किया जाता है। उससे भी बड़ी एक अजीब बात यह है कि क्रिकेट में पाकिस्तान से भारत के संबंध नहीं है फिर भी भारत के चैनल उसके कमेंटटरों को बुलाता है तो मैचों के आयोंजक उसके अंपायरों को आमंत्रित करते हैं।  तय बात है कि इसके लिये राजनीतिक दबाव कम विदेशों का आर्थिक दबाव अधिक रहता होगा कि पाकिस्तान को किसी न किसी रूप में भारतीय खेल तथा मनोरंजन व्यवसाय से जोड़कर रखा जाये। इस पर भारतीय मनोरंजक व्यवसायियों के आर्थिक स्तोत्रों की भूमि मध्य एशिया में जो कि पाकिस्तान के सहधर्मी राष्ट्र हैं जिनके लिये कभी कभी वह उपनिवेश का भी काम करता है, उसकी वजह से पाकिस्तान का साथ वह निभाते हैं।  कोई समाचार चैनल कभी इसे स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि कहीं न कहीं वह उन्हीं मनोरंजन व्यवसायियों के स्वामित्व है या फिर वह उनके विज्ञापनदाता हैं।
             बहरहाल अपने आर्थिक गुणा भाग में माहिर इन टीवी चैनलों के प्रबंधक अपने कार्यक्रमों का स्तर बनाये रखने में सफल नहीं रहे बल्कि हम जैसे लोगों को अनेक बार दूरदर्शन की याद दिलाते हैं। यह अलग बात है कि आजकल दूरदर्शन भी इन्हीं व्यवसायिक चैनलों की शैली अपना रहा है हालांकि सरकारी होने की वजह से अपनी मार्यादायें छोड़ना उसके लिये संभव नहीं है। यही कारण है कि वह विदेशी एजेंडे को लागू नहीं करता।  यह एक अच्छी बात है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, May 4, 2013

भारतीय योग संस्थान के शिविर में जाने पर कुछ सीखने को मिलता ही है-विशिष्ट रविवारीय हिन्दी लेख (bhartiya yoga sansthan ke shivir mein jane par kucch seekhne ko milta hee hai-special sanday hindi article,visheh ravivariya hindi lekh)



    
भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविर का दृश्य
जब कभी भारतीय योग संस्थान के विशेष शिविरों में जाने का अवसर मिलता है तब हमें यह देखकर प्रसन्नता होती है कि वहां विद्वानों के विचार सुनकर कुछ न कुछ नया विचार मिलता है। दरअसल अगर यह कहें कि कोई नया विचार मिलता है तो स्वयं को अजीब लगता है क्योंकि उनके विचार हमारे दिमाग मेंकहीं न कहीं  हमेशा रहते हैं।  बस
, उनको सार्वजनिक रूप से कहने का अवसर नहीं मिलता या हम उनहें  ढूंढते नहीं है।  अपने ब्लॉग पर अक्सर हमने भारतीय योग विद्या के बारे में लिखा है।  उसके लाभों की चर्चा करते हुए हमने अनेक पाठ लिखे हैं।  इन शिविरों में जाने पर हर विचार हमें नया लगता ही है चाहे भले ही वह कभी हमारे अंतर्मन में स्थित होकर विचरता रहा हो।  एक तरह से कहें तो मस्तिष्क में चल रहा विचार जब पुष्ट होता है तो वह नवीन हो जाता है। दूसरी बात यह भी है कि  शब्दों तथा उनको व्यक्त करने की शैली भी उसे नया बना देती है।
          आज हमें अपने ही ग्वालियर शहर के भारतीय योग संस्थान के  दो दिवसीय शिविर में जाने का अवसर मिला।  हम उसमें नियमित रूप से तो शामिल होने में असमर्थ थे पर अपने शिविर के बाहरी साधकों से मिलकर उनको जानने की जिज्ञासा हमें कुछ देर के लिये वहां ले ही गयी।  ऐसे अवसरों पर स्वयं मौन रहकर बहुत सीखा जा सकता है।  सबसे पहले तो उन निष्काम प्रवृत्ति के विद्वानों की सराहना करने का मन करता है जो अपने अनुभव तथा विचार वहां व्यक्त कर रहे थे।  उनके विचार सुनने के साथ ही हम उनके हाव भाव के साथ ही शब्दों पर भी अपना ध्यान रखे हुए थे। 
         आमतौर से पेशेवर धार्मिक तथा योग शिक्षक कामना भाव के कारण पारंगत होकर श्रोताओं को प्रभावित करते हैं पर निष्काम भाव से भी लोगों को प्रभावित किया जा सकता है, यह बात भारतीय योग संस्थान को देखकर सीखी जा सकती है।  भारतीय योग विज्ञान का प्रचार करने की शपथ लेने वाले इन विद्वानों के चेहरे पर तेज टपकता है तो वाणी से निकले शब्द योगरस में नहाये लगते हैं।  वहां मौजूद योग साधकों पर भी दृष्टिपात किया।  भारतीय योग संस्थान में निष्कामी विद्वानों और हमारे बीच तब थोड़ा मार्ग अलग हो जाता है जब हम अपनी गीता ज्ञान की दृष्टि जमाकर विचार करते हैं।  हमारे हिसाब से योगी भी भक्त है जिनके भक्तों की तरह चार प्रकार  होते हैं-ज्ञानी, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा आर्ती।  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि हजारों में कोई एक मुझे भजेगा और उन हजारों में भी कोई मुझे एक पायेगा। फिर वह कहते हैं कि ज्ञानी मेरा ही रूप है और वही मुझे पाता है।  वहां एक विद्वान ने यह भी माना कि हमारा काम है लोगों को बताना। सभी अमल नहीं करेंगे पर कुछ तो उसका असर होगा। 
       वहां लोगों को दो घंटे का मौन रखकर तप करने के लिये कहा गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। हम तो देरी से पहुंचे थे। वहां लोगों से बात की पर उनके मौन तप के भंग में हमारा कोई योगदान नहीं है क्योंकि वह सभी तो पहले से वार्तालाप में लगे हुए थे। संभव है कुछ लोगों को वह शिविर बोर करने वाला लगे पर इतना तय है कि जिनके मन में योग को लेकर जिज्ञासायें वहां उनके निराकरण के पूरे अवसर हैं।
   अगर योग साधक की अपनी श्रेणी की बात करें तो हम अभी तक स्वयं को अर्थाथी श्रेणी का मानते हैं।  जहां तक प्रचारक के रूप में माने तो वह भी इसी श्रेणी में आता है। इस पर लिखने से हमारे मन की भूख शंात होती है।  यह हम अपने बारे में स्वयं मानते हैं इसका श्रेय श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन को जाता है जिसके प्रति हमारा निष्काम भाव है।  इन शिविरों में जिज्ञासु बनकर जाते हैं। योग साधना की शरण हमने आर्त भाव से ली थी।  जहां तक ज्ञानी का प्रश्न है उसका निर्णय तो हमारे जीवनकाल में तो होना ही नहीं है इसलिये चिंता छोड़ दी है।
         एक महत्वपूर्ण बात यह देखने को मिलती है कि हम जिन विद्वानों को सुनते हैं ऐसा लगता है कि वह हमारे मन की बात कह रहे हैं।  अच्छा लगता इसलिये क्योंकि वह वही बात कह रहे हैं जो हम सुनना चाहते है।  ऐसे में वक्ता और श्रोता का अंतर हमारे अंदर नहीं रहता।  ऐसा लगता है कि हम अपने से ही बात कर रहे हैं। दूसरी बात यह भी लगती है कि निरंतर योग साधना करने वाले अगर किसी दूसरे की बात न भी सुने तो भी उनके अंदर वैसे ही विचार योग साधना करते हुए स्वतः  एक जैस  हो जायेंगे जो अन्य विद्वानों के हैं।  कोई भी  व्यक्ति नियमित योगाभ्यास से क्षेत्रज्ञ बन जाता है।  वह न केवल अपनी देह बल्कि प्रकृति और अंतरिक्ष की संरचना को भी समझ सकता है।  इसलिये नियमित योग साधकों और शिक्षकों के विचार एक ही मार्ग पर आ जाते हैं। 
      हमने अनेक बार लिखा है कि योग तो हर मनुष्य करता है।  अंतर इतना है कि आम मनुष्य चंचल मन, मुख और मस्तिष्क को इंद्रियों के वश में रखकर असहज योग के मार्ग पर चलता है जबकि योग साधक सहज योग की तरफ जाते हैं।  असहज योग के अनेक मार्ग है पर सहज योग का मार्ग एक ही है। कोई आगे चलते हुए किसी पड़ाव पर आया और उसने उस उस स्थान ं का ज्ञान प्राप्त किया। दूसरा पीछे है और जब वह उसी पड़ाव पर आयेगा तो वह भी वैसा ही ज्ञान प्राप्त करता है।  एक ही मार्ग होने के कारण  सहज योगियों के विचारों में साम्यता होती है जबकि असहज योगी अनेक मार्गों के कारण हमेशा ही संशय में पड़े होते हैं।  असहज योगी को पता ही नहीं कि उसकी देह के विकारों का जनक कौन है? इसके लिये वह अनेक तरह के परीक्षण करता फिरता है।  असहज योगियों के बीच बीमारियों की दवाओं और चिकित्सकों के ही चर्चे होते हैं। जबकि सहज योग प्रवृत्ति और निवृत्ति का मार्ग जानते हैं इसलिये पहले तो विकार पैदा होने ही नहीं देते और हो भी जायें तो उनको निकालना भी जानते हैं।
        आखिर में हमें  यह कहना है कि  कि एक विद्वान ने कहा कि हमें योग संस्थान के प्रचार करना चाहिये। भारतीय योग संस्थान की प्रशिक्षण शैली ऐसी है कि किसी साधक को योग साधन करते  देखकर ही पता चल जाता है कि उसने वहीं से सब सीखा है।  सभी को यह बताना चाहिये कि भारतीय योग संस्थान ही इस विषय में सबसे श्रेष्ठ संगठन है।  हमें यह सुनकर हैरानी हुई क्योंकि यह बात तो हमने अनेक पाठों में पहले ही लिखी है।  यही इस बात का प्रमाण है कि सहज योगियों के आपस में बिना मिले भी एक जैसे विचार हो जाते हैं।     

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Friday, February 15, 2013

संगम-हिन्दी कविता (sangam-hindi kavita)


पर्वत से निकली नदी
घर से चली नाली
नाले ने दोनों का संगम करा दिया,
पवित्र जल  पीयें या नहायें
आंखें बंद कर श्रद्धा से फूल चढ़ायें,
धर्म की धरती पर अधर्म का घर भरा दिया।
कहें दीपक बापू
कचड़े में कांति नहीं होती,
अशांत मन लेकर चलें
कभी साथ शांति नहीं होती,
उठती हैं ख्वाहिशें
सुंदर नजारे देखने के लिये
आदमी मचल जाता है,
काली दुनियां हैं उनके पीछे
खबर नहीं लेता कोई
धर्म का सौदागर छल कर जाता है।
जल गया है जल
जहरीला हो गया फल
इसलिये जिस धरा पर बैठे हो
वहीं ध्यान कर
ज्ञान में स्नान कर
कर अपने पर विश्वास
कर दे अपने से दूर उस ख्वाब को
जिसने ज़माने को डरा दिया है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, February 5, 2013

यह फिक्सिंग मिक्सिंग-हिन्दी व्यंग्य चिंतन (yah fising mixing-hindi vyangya chinttan satire thought)

              फुटबाल में फिक्सिंग होती होगी इसका शक हमें पहले से ही था।  इसका कारण यह है की हमारे देश में व्यसाय, खेल, फिल्म तथा अन्य क्षेत्रों में पूरी तरह से पश्चिमी संस्कृति घर कर चुकी है।  ऐसे में हमारे देश के व्यवसाई  और खिलाड़ी कोई ऐसा काम नहीं कर सकते जो पश्चिम वाले नहीं करें।  पश्चिम वाले जो काम करें वह हमारे देश के लोग भी हर हाल में करेंगे यह भी निश्चित है।  एक बात तय है कि सांसरिक विषयों में कोई मौलिक रूप के हमारे  देश में अब होना संभव नहीं है। विश्व में हमारा देश आध्यात्मिक गुरु माना जाता है पर सांसरिक विषयों के मामले में तो पिछड़ा हुआ है।  यह अलग बात है कि इन सांसरिक विषयों में भी हमारे अनेक प्राचीन सिद्धांत हैं जिनको अब लोग भूल चुके है ।  बात फुटबाल की हो रही है तो हम अपने क्रिकेट खेल को भी जोड़ लेते हैं।  पूरी तरह व्यवसायिक हो चुके क्रिकेट खेल में फिक्सिग नहीं  होती हो अब इस बात पर संदेह बहुत कम लोग को रह गया है।  दूसरी बात यह कि मनोरंजन की दृष्टि से इस देखने वालों की संख्या अधिक है खेलने वाले बहुत कम दिखते हैं।  फिर आजकल मनोरंजन के साधन इतने हो गये हैं कि क्रिकेट खेल के प्रतिबद्ध दर्शक अत्यंत कम रह गये हैं।  अनेक विशेषज्ञ तो इस बात पर हैरान है कि भारत में चलने वाली क्लब स्तरीय प्रतियोगिता आखिर किस तरह के आर्थिक स्त्रोत पर चल रही है? अभी कल ही इस खेल के खिलाड़ियों की नीलामी हुई।  अनेक खिलाड़ियों की कीमत देखकर अनेक विशेषज्ञों के मुंह खुले रह गये। एक विदेशी खिलाड़ी ने तो अपनी कीमत पर खुद ही माना है कि वह उसके लिये कल्पनातीत या स्वपनातीत है। ।
               फुटबॉल चूंकि भारत में अधिक नहीं खेला जाता इसलिये उसके मैचों में फिक्सिंग का अनुमान किसी को नहीं है पर देश जो खेलप्रेमी इन फुटबॉल मैचों को देखते हैं उनको अनेक बार ऐसा लगता है कि कुछ खिलाड़ी अनेक बार अपने स्तर से कम प्रदर्शन करते हैं या फिर कोई पूरी की पूरी टीम अप्रत्याशित रूप से हार जाती है।  अभी कुछ समय पहले संपन्न फुटबॉल विश्व के दौरान अनेक मैच शुकशुबहे का कारण बने।  क्रिकेट हो या फुटबॉल इन खेलों में अब जमकर पैसा बरस रहा है। यह पैसा खेल से कम उससे इतर गतिविधियों के कारण अधिक है।  अनेक खिलाड़ियों को कंपनियां अपना ब्रांड एम्बेसेडर बना लेती है।  भारत में तो अनेक खिलाड़ी ऐसे भी हैं जिन्होंने बीसीसीआई की कथित राष्ट्रीय टीम का मुंह तक नहीं देखा पर करोड़पति हो गये हैं।  अनेक खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग की वजह से प्रतिबंध लगाया गया है जो कि इस बात का पं्रमाण है कि फिक्सिंग होती है। यहां यह भी बता दें कि जिन खिलाड़ियों पर यह प्रतिबंध लगे वह प्रचार माध्यमों के ‘स्टिंग ऑपरेशन’ की वजह से लगे न कि बीसीसीआई की किसी संस्था की जांच में वह फंसे। इसका मतलब यह कि जिनका ‘स्टिंग ऑपरेशन’ नहीं हुआ उनके भी शुद्ध होने की पूरी गांरटी नहीं हो सकती।  सीधी बात यह कि जो पकड़ा गया वह चोर है और जिस पर किसी की नज़र नहीं है वह साहुकार बना रह सकता है।
   हमारा मानना है कि खेलों में फिक्सिंग अब रुक ही नहीं सकती।  इसका कारण यह है कि एक नंबर और दो नंबर दोनों तरह के धनपति इसमें संयुक्त रूप से शामिल हो गये हैं।  दोनों में एक तरह से मूक साझोदारी हो सकती है कि तुम भी कमाओ, हम भी कमायें।  यह भी संभव है कि दो नंबर वाले एक नबर वालों का चेहरा आगे कर चलते हों और एक नंबर वाले भी अपनी सुरक्षा के लिये उनका साथ मंजूर करते हों।  क्रिकेट से कहीं अधिक महंगा खेल फुटबॉल है। उसमें शक्ति भी अधिक खर्च होती है।  दूसरी बात  यह कि दुनियां में कोई भी व्यवसाय क्यों न हो कुछ सफेद और काले रंग के संयोजन से ही चलता है। अब चूंकि भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात तो कोई करता नहीं इसलिये हम अंग्रेज लेखक जार्ज बर्नाड शॉ के इसी सूत्र को दोहराते हैं कि इस दुनियां में कोई भी आदमी दो नंबर का काम किये बिना अमीर नहीं हो सकता।  साथ ही यह भी जो सेठ साहुकार फुटबॉल या अन्य खेलों के खिलाड़ियों को पाल रहे हैं वह उनके खेल को अपने अनुसार प्रभावित न करते हों यह संभव नहीं है।  इस तरह की फिक्सिंग के सबूत मिलना संभव नहीं है पर मैच देखकर परिणाम पूरी की पूरी कहानी बयान कर ही देता है।  




लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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