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Tuesday, March 12, 2013

अपराध से प्रतिअपराध की तरफ-हिन्दी संपादकीय (apradha se prati apradh kee taraf-hindi editorial)

      राजधानी दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के एक आरोपी ने कारागार में खुदकुशी कर ली।  जब यह कांड हुआ था तब पीड़िता के न्याय के लिये पूरे देश में शोर मचा था। सभी अपराधियों को फांसी देने की मांग जबरदस्त उठी थी। पीड़िता जब तक इलाज के लिये अस्पताल में भर्ती थी तब तक तो यह मांग जोर पकड़ती रही कि हर बलात्कारी को फांसी दी जाये।  जब पीड़िता ने दम तोड़ दिया तब इस मांग का मतलब नहीं रहा था क्योंकि जघन्य हत्यांकाड के अपराध पर फांसी का दंड देने में सुविधा होती है। उस समय जब तक पीड़िता अस्पताल में रही तब तक प्रचार माध्यम उसके नाम पर अपना समय पास कर जमकर विज्ञापन चलाते रहे।  जमकर बहसें हुईं। देखा जाये तो देश में जो इस कांड के विरुद्ध जो निरंतरता रही उसका पूरा श्रेय भी इन्हीं प्रचार माध्यमों को ही दिया जाना चाहिये।  यह अलग बात है कि इस तरह के सनसनखेज विषय उनके विज्ञापन चलते रहने का एक अच्छा माध्यम बन जाते हैं।
          अब आरोपी की खुदकुशी पर फिर प्रचार माध्यमों में बहस होने लगी।  इस बहस में मृतक आरोपी का पिता और मां दोनों ही शामिल हुए।  पिता ने जो बातें कही गयी उनकी चर्चा करना लोगों को ठीक न लगे पर उनसे संदेश निकालने की कोशिश तो होनी ही चाहिये।  उसमें उन्होंने अपने दोनों पुत्रों के अपराध में शामिल होने के बाद जो उनकी दुर्दशा का जो बयान किया वह आगे के लोगों को चेतावनी के रूप में सुनाना बुरा नहीं है। हम इस विषय पर किसी के साथ सहानुभूति नहीं जताने जा रहे।  महत्वपूर्ण बात यह कि पिता अपराधजगत का अनुभवी आदमी रहा है। वह जेल भी जा चुका है इसलिये वह मानता है कि उसके पुत्र की मौत का सच सामने कभी नहीं आयेगा।  हालांकि वह मानता था कि उसका पुत्र इस अपराध के लिये फांसी और मौत का हकदार है पर वह साथ ही यह भी दावा कर रहा था कि  वह आत्महत्या नहीं कर सकता।  एक बात तय रही थी कि इस सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल लोगों से किसी की हमदर्दी नहीं हो सकती।  यहां तक कि मृतक के माता पिता भी अपने पुत्र के अपराध की वकालत नहीं कर सके।  यह बात तो निश्चित है कि हर माता पिता अपने पुत्र को चाहते हैं पर जब वह अपराध ऐसा कर बैठे कि सारे संसार के सामने शर्मिदंगी हो तब उसका सार्वजनिक समर्थन कठिन हो जाता है। बहरहाल विरोधाभासी बयानों के बीच उनके माता पिता के बयान उन लोगों के लिये सबक हैं जो ऐसे अपराध में संलिप्त होने की सोचते हैं।
          एक पुराने पत्रकार  ने एक अपराधी की सोच बताई थी जो उनसे कभी मिला था।  दुनियां में तमाम तरह के अपराध होते हैं पर पेशेवर या आदतन अपराधी बलात्कार और चोरी एकदम घटिया अपराध मानते हैं।  बलात्कार के अपराधी की हालत जेल में बुरी होती है यह बात पत्रकार  को उस अपराधी ने बताई थी।  उस पत्रकार  से मिले अपराधी की बात पर यकीन करें तो उसका कहना था कि इन दो अपराधों के अपराधियों की जेल में अन्य अपराधी समय मिलने पर बुरी गति करते हैं।  मृतक आरोपी के पिता ने जो हालत बयान की वह उस पुराने अपराधी के बयान को देखकर आश्चर्यजनक नहीं लगती।  सब जानते हैं कि जेल में डकैती, हत्या, लूट, ठगी, मारपीट और धोखाधड़ी के आरोपी भी रहते हैं। पत्रकार को उस पुराने अपराधी ने बताया था कि कारागार में   डकैती और हत्या के अपराधियों को दबदबा रहता है।  ऐसे बड़े अपराधी बलात्कार और चोरी को कायरों का अपराध मानते हैं। आमतौर से अनेक कामाग्नि में जल रहे लोग यह सोचते हैं कि किसी औरत के साथ जबरदस्ती करना बहादुरी है तो उन्हें मृतक आरोपी के पिता के बयान अवश्य दिखाये जाना चाहिये।  उसने अपने बयान में ऐसे वाक्य और शब्दों का उपयोग किया कि कार्यक्रम प्रसारित करने वाला पत्रकार भी कांप गया और उसे रोकने लगा।  यह वाक्य या शब्द किसी गंदी से गंदी फिल्म में भी उपयोग नहीं किये जा सकते। हमारा मानना है कि भले ही वाक्य या शब्द गंदे थे पर अगर किसी को व्यक्तिगत रूप से समझाना हो तो आपसी बातचीत में उनका उपयोग होता है।  उस दुःखी पिता ने भले ही अभद्र शब्दों का उपयोग किया पर हमें लगा कि कम से कम यह कार्यक्रम देखकर कभी उन्माद करने  के लिये तत्पर लोगों को डर अवश्य लगेगा। उस पिता ने यहां तक कहा कि उसके पुत्र के साथ बलात्कार किया गया होगा।  पता नहीं यह सच था या झूठ पर  हतप्रभ करने वाला यह वाक्य उन लोगों को दिखायें जो यह सोचते हैं कि किसी मासूम लड़की के साथ जबरदस्ती करने पर कोई सजा नहीं मिलती।
          इस सामूहिक हत्याकांड के आरोपियों की जेल में पिटाई की खबर उस समय समाचार चैनलों पर आयी थी जब यह मामला प्रचार में जोर पकड़े हुए था। अब मृतक आरोपी के वकील और माता पिता  बयान दे रहे हैं कि उनके साथ यह क्रम बाद में भी चलता रहा था।  उनका एक दूसरा भी बेटा है जो इसमें शामिल है।  वह उसके मरने की आशंका भी जता रहे थे।  उनका कहना था कि हम गरीब हैं इसलिये हमारे साथ ऐसा हो रहा है।  हमारा कहना है कि जब कोई गरीब होकर ऐसे जघन्य हत्याकांड में शामिल हो रहा है तो उसे यह मानना ही चाहिये कि उसका दंड बड़ा होगा।  अमीर लोग अपराध कर भी बच जाते हैं इस तर्क के आधार पर गरीब अपराधी के साथ सहानुभूति नहीं हो सकती।  अगर यह सच है तो फिर गरीब को अपराध में शामिल होने से ही बचना चाहिये।  हम तो यह कहते हैं कि गरीब के अपराध में शामिल होने पर उसका दंड अधिक भयानक होना चाहिये क्योंकि उसके सहने की क्षमता अधिक होती है।  अमीर में सहने की क्षमता नहीं होती यह बात तय है।  हम यहां अमीरों के अपराध में शामिल होने पर सहानुभूति नहीं जता रहे बल्कि गरीब होकर अपराध में सजा मिलने पर रुदन करने की प्रवृत्ति पर गुस्सा जता रहे हैं।
             मृतक आरोपी ने आत्महत्या की होगी पर उसके अपराध के कारण उस  पीड़िता का करुण क्रंदन यादकर उससे सहानुभूति खत्म हो जाती है जिसने अपनी जख्मों से लड़ते हुए दम तोड़ दिया।  अंत में हमारा यह कहना है कि मृतक आरोपी के पिता के वह बयान समाज में आपसी वार्तालाप में सुनाते रहें जिसमें उसने पुत्र पर अनाचार होने की बातें कही हैं ताकि महिलाओं को सस्ता समझने वालों में भय पैदा हो।  हो सकता है कि हमारी यह सोच गलत हो पर जिस तरह नारियों के प्रति अपराध इस देश में बढ़ रहे हैं उस पर गुस्सा आता है।  तब लगता है कि शैतानी प्रवृत्ति के लोगों को डराने के लिये उन्हें ऐसे संभावित खतरे का रूप दिखाना चाहिये।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, January 27, 2012

बसंत पंचमी पर विशेष हिन्दी लेख-पहला काम अपने शरीर में ऊर्जा संचय का करें (basant panchami par vishesh hindi lekh or special hindi article-apni urja ka sanchaya karen save -self energy or power))

       बसंत पंचमी का दिन भारतीय मौसम विज्ञान के अनुसार समशीतोष्ण वातावरण के प्रारंभ होने का संकेत है। मकर सक्रांति पर सूर्य नारायण के उत्तरायण प्रस्थान के बाद शरद ऋतु की समाप्ति होती है। हालांकि विश्व में बदले हुए मौसम ने अनेक प्रकार के गणित बिगाड़ दिये हैं पर सूर्य के अनुसार होने वाले परिवर्तनों का उस पर कोई प्रभाव नहीं है। एक बार सूर्य नारायण अगर उत्तरायण हुए तो सर्दी स्वतः अपनी उग्रता खो बैठती है। यह अलग बात है कि धीमे धीरे यह परिवर्ततन होता है। फिर अपने यहां तो होली तक सर्दी रहने की संभावना रहती है। पहले दीवाली के एक सप्ताह के अंदर स्वेटर पहनना शुरु करते थे तो होली के एक सप्ताह तक उनको ओढ़ने का क्रम चलता था। अब तो स्थिति यह है दीवाली के एक माह बाद तक मौसम गर्म रहता है और स्वेटर भी तब बाहर निकलता है जब कश्मीर में बर्फबारी की खबर आती है।
         हमारी संस्कृति के अनुसार पर्वों का विभाजन मौसम के अनुसार ही होता है। इन पर्वो पर मन में उत्पन्न होने वाला उत्साह स्वप्रेरित होता है। सर्दी के बाद गर्मी और उसके बाद बरसात फिर सर्दी का बदलता क्रम देह में बदलाव के साथ ही प्रसन्नता प्रदान करता है। ऐसे में दीपावली, होली, रक्षाबंधन, रामनवमी, दशहरा, मकरसक्रांति और बसंतपंचमी के दिन अगर आदमी की संवेदनाऐं सुप्तावस्था में भी हों तब ही वायु की सुगंध उसे नासिका के माध्यम से जाग्रत करती है। यह अलग बात है कि इससे क्षणिक सुख मिलता है जिसे अनुभव करना केवल चेतनाशील लोगों का काम है।
         हमारे देश में अब हालत बदल गये हैं। लोग आनंद लेने की जगह एंजायमेंट करना चाहते हैं जो स्वस्फूर्त नहीं बल्कि कोशिशों के बाद प्राप्त होता है। उसमें खर्च होता है और जिनके पास पैसा है वह उसके व्यय का आनंद लेना चाहते है। तय बाद है कि अंग्रेजी से आयातित यह शब्द लोगों का भाव भी अंग्रेजियत वाला भर देता है। ऐसे में बदलती हवाओं का स्पर्श भले ही उसकी देह के लिये सुखकर हो पर लोग अनुभूति कर नहीं पाते क्योंकि उनका दिमाग तो एंजॉजमेंट पाने में लगा है। याद रखने वाली बात यह है कि अमृत पीने की केवल वस्तु नहीं है बल्कि अनुभूति करने वाला विषय भी है। अगर श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित विज्ञान को समझें तो यह पता लगता है कि यज्ञ केवल द्रव्य मय नहीं बल्कि ज्ञानमय भी होता है। ज्ञानमय यज्ञ के अमृत की भौतिक उत्पति नहीं दिखती बल्कि उसकी अनुभूति करनाी पड़ती है यह तभी संभव है जब आप ऐसे अवसरों पर अपनी देह की सक्रियता से उसमें पैदा होने वाली ऊर्जा को अनुभव करें। यह महसूस करें कि बाह्य वतावररण में व्याप्त सुख आपके अंदर प्रविष्ट हो रहा है तभी वह अमृत बन सकता है वरना तो एक आम क्षणिक अनुभूति बनकर रह जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि आपकी संवदेनाओं की गहराई ही आपको मिलने वाले सुख की मात्रा तय करती है। यह बात योग साधकों से सीखी जा सकती है।
           जब हम संवेदनाओं की बात करें तो वह आजकल लोगों में कम ही दिखती हैं। लोग अपनी इंद्रियों से व्यक्त हो रहे हैं पर ऐसा लगता है कि उथले हुए हैं। वह किसी को सुख क्या देंगे जबकि खुद लेना नहीं जानते। अक्सर अनेक बुद्धिजीवी हादसों पर समाज के संवेदनहीन होने का रोना रोते हैं। इस तरह रोना सरल बात है। हम यह कहते हैं कि लोग दूसरों के साथ हादसे पर अब रोते नहीं है पर हमारा सवाल यह है कि लोग अपने साथ होने वाले हादसों पर भी भला कहां ढंग से रो पाते है। उससे भी बड़ी बात यह कि लोग अपने लिये हादसों को खुद निमंत्रण देते दिखाई देते है।
       यह निराशाजनक दृष्टिकोण नहीं है। योग और गीता साधकों के लिये आशा और निराशा से परे यह जीवन एक शोध का विषय है। इधर सर्दी में भी हमारा योग साधना का क्रम बराबर जारी रहा। सुबह कई बार ऐसा लगता है कि नींद से न उठें पर फिर लगता था कि अगर ऐसा नहीं किया तो फिर पूरे दिन का बंटाढार हो जायेगा। पूरे दिन की ऊर्जा का निर्माण करने के लिये यही समय हमारे पास होता है। इधर लोग हमारे बढ़ते पेट की तरफ इशारा करते हुए हंसते थे तो हमने सुबह उछलकूद वाला आसन किया। उसका प्रभाव यह हुआ है कि हमारे पेट को देखकर लोग यह नहीं कहते कि यह मोटा है। अभी हमें और भी वजन कम करना है। कम वजन से शरीर में तनाव कम होता है। योग साधना करने के बाद जब हम नहाधोकर गीता का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि यही संसार एक बार हमारे लिये नवीन हो रहा है। सर्दियों में तेज आसन से देह में आने वाली गर्मी एक सुखद अहसास देती है। ऐसा लगता है कि जैसे हमने ठंड को हरा दिया है।
          यह अलग बात है कि कुछ समय बाद वह फिर अपना रंग दिखाती है पर क्रम के टूटने के कारण इतनी भयावह नहीं लगती। बहरहाल हमारी बसंत पंचमी तो एक बार फिर दो घंटे के शारीरिक अभ्यास के बाद ही प्रारंभ होगीं पर एक बात है कि बसंत की वायु हमारे देह को स्पर्श कर जो आंनद देगी उसका बयान शब्दों में व्यक्त कठिन होगा। अगर हम करें भी तो इसे समझेगा कौन? असंवदेनशील समाज में किसी ऐसे आदमी को ढूंढना कठिन होता है जो सुख को समझ सके। हालाकि यह कहना कि पूरा समाज ऐसा है गलत होगा। उद्यानों में प्रातः नियमित रूप से धूमने वालों को देखें तो ऐसा लगता है कि कुछ लोग ऐसे हैं जिनके इस तरह का प्रयास एक ऐसी क्रिया है जिसके लिये वह अधिक सोचते नहीं है। बाबा रामदेव की वजह से योग साधना का प्रचार बढ़ा है पार्कों में लोगों के झुड जब अभ्यास करते दिखते हैं तो एक सुखद अनुभूति होती है उनको सुबह पार्क जाना है तो बस जाना है। उनका क्रम नही टूटता और यही उनकी शक्ति का कारण भी बनता है। इस संसार में हम चाहे लाख प्रपंच कर लें पर हम तभी तक उनमें टिके रह सकते हैं जब तक हमारी शारीरिक शक्ति साथ देती है। इसलिये यह जरूरी है कि पहला काम अपने अंदर ऊर्जा संचय का करें बाकी तो सब चलता रहता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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