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Tuesday, March 12, 2013

अपराध से प्रतिअपराध की तरफ-हिन्दी संपादकीय (apradha se prati apradh kee taraf-hindi editorial)

      राजधानी दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के एक आरोपी ने कारागार में खुदकुशी कर ली।  जब यह कांड हुआ था तब पीड़िता के न्याय के लिये पूरे देश में शोर मचा था। सभी अपराधियों को फांसी देने की मांग जबरदस्त उठी थी। पीड़िता जब तक इलाज के लिये अस्पताल में भर्ती थी तब तक तो यह मांग जोर पकड़ती रही कि हर बलात्कारी को फांसी दी जाये।  जब पीड़िता ने दम तोड़ दिया तब इस मांग का मतलब नहीं रहा था क्योंकि जघन्य हत्यांकाड के अपराध पर फांसी का दंड देने में सुविधा होती है। उस समय जब तक पीड़िता अस्पताल में रही तब तक प्रचार माध्यम उसके नाम पर अपना समय पास कर जमकर विज्ञापन चलाते रहे।  जमकर बहसें हुईं। देखा जाये तो देश में जो इस कांड के विरुद्ध जो निरंतरता रही उसका पूरा श्रेय भी इन्हीं प्रचार माध्यमों को ही दिया जाना चाहिये।  यह अलग बात है कि इस तरह के सनसनखेज विषय उनके विज्ञापन चलते रहने का एक अच्छा माध्यम बन जाते हैं।
          अब आरोपी की खुदकुशी पर फिर प्रचार माध्यमों में बहस होने लगी।  इस बहस में मृतक आरोपी का पिता और मां दोनों ही शामिल हुए।  पिता ने जो बातें कही गयी उनकी चर्चा करना लोगों को ठीक न लगे पर उनसे संदेश निकालने की कोशिश तो होनी ही चाहिये।  उसमें उन्होंने अपने दोनों पुत्रों के अपराध में शामिल होने के बाद जो उनकी दुर्दशा का जो बयान किया वह आगे के लोगों को चेतावनी के रूप में सुनाना बुरा नहीं है। हम इस विषय पर किसी के साथ सहानुभूति नहीं जताने जा रहे।  महत्वपूर्ण बात यह कि पिता अपराधजगत का अनुभवी आदमी रहा है। वह जेल भी जा चुका है इसलिये वह मानता है कि उसके पुत्र की मौत का सच सामने कभी नहीं आयेगा।  हालांकि वह मानता था कि उसका पुत्र इस अपराध के लिये फांसी और मौत का हकदार है पर वह साथ ही यह भी दावा कर रहा था कि  वह आत्महत्या नहीं कर सकता।  एक बात तय रही थी कि इस सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल लोगों से किसी की हमदर्दी नहीं हो सकती।  यहां तक कि मृतक के माता पिता भी अपने पुत्र के अपराध की वकालत नहीं कर सके।  यह बात तो निश्चित है कि हर माता पिता अपने पुत्र को चाहते हैं पर जब वह अपराध ऐसा कर बैठे कि सारे संसार के सामने शर्मिदंगी हो तब उसका सार्वजनिक समर्थन कठिन हो जाता है। बहरहाल विरोधाभासी बयानों के बीच उनके माता पिता के बयान उन लोगों के लिये सबक हैं जो ऐसे अपराध में संलिप्त होने की सोचते हैं।
          एक पुराने पत्रकार  ने एक अपराधी की सोच बताई थी जो उनसे कभी मिला था।  दुनियां में तमाम तरह के अपराध होते हैं पर पेशेवर या आदतन अपराधी बलात्कार और चोरी एकदम घटिया अपराध मानते हैं।  बलात्कार के अपराधी की हालत जेल में बुरी होती है यह बात पत्रकार  को उस अपराधी ने बताई थी।  उस पत्रकार  से मिले अपराधी की बात पर यकीन करें तो उसका कहना था कि इन दो अपराधों के अपराधियों की जेल में अन्य अपराधी समय मिलने पर बुरी गति करते हैं।  मृतक आरोपी के पिता ने जो हालत बयान की वह उस पुराने अपराधी के बयान को देखकर आश्चर्यजनक नहीं लगती।  सब जानते हैं कि जेल में डकैती, हत्या, लूट, ठगी, मारपीट और धोखाधड़ी के आरोपी भी रहते हैं। पत्रकार को उस पुराने अपराधी ने बताया था कि कारागार में   डकैती और हत्या के अपराधियों को दबदबा रहता है।  ऐसे बड़े अपराधी बलात्कार और चोरी को कायरों का अपराध मानते हैं। आमतौर से अनेक कामाग्नि में जल रहे लोग यह सोचते हैं कि किसी औरत के साथ जबरदस्ती करना बहादुरी है तो उन्हें मृतक आरोपी के पिता के बयान अवश्य दिखाये जाना चाहिये।  उसने अपने बयान में ऐसे वाक्य और शब्दों का उपयोग किया कि कार्यक्रम प्रसारित करने वाला पत्रकार भी कांप गया और उसे रोकने लगा।  यह वाक्य या शब्द किसी गंदी से गंदी फिल्म में भी उपयोग नहीं किये जा सकते। हमारा मानना है कि भले ही वाक्य या शब्द गंदे थे पर अगर किसी को व्यक्तिगत रूप से समझाना हो तो आपसी बातचीत में उनका उपयोग होता है।  उस दुःखी पिता ने भले ही अभद्र शब्दों का उपयोग किया पर हमें लगा कि कम से कम यह कार्यक्रम देखकर कभी उन्माद करने  के लिये तत्पर लोगों को डर अवश्य लगेगा। उस पिता ने यहां तक कहा कि उसके पुत्र के साथ बलात्कार किया गया होगा।  पता नहीं यह सच था या झूठ पर  हतप्रभ करने वाला यह वाक्य उन लोगों को दिखायें जो यह सोचते हैं कि किसी मासूम लड़की के साथ जबरदस्ती करने पर कोई सजा नहीं मिलती।
          इस सामूहिक हत्याकांड के आरोपियों की जेल में पिटाई की खबर उस समय समाचार चैनलों पर आयी थी जब यह मामला प्रचार में जोर पकड़े हुए था। अब मृतक आरोपी के वकील और माता पिता  बयान दे रहे हैं कि उनके साथ यह क्रम बाद में भी चलता रहा था।  उनका एक दूसरा भी बेटा है जो इसमें शामिल है।  वह उसके मरने की आशंका भी जता रहे थे।  उनका कहना था कि हम गरीब हैं इसलिये हमारे साथ ऐसा हो रहा है।  हमारा कहना है कि जब कोई गरीब होकर ऐसे जघन्य हत्याकांड में शामिल हो रहा है तो उसे यह मानना ही चाहिये कि उसका दंड बड़ा होगा।  अमीर लोग अपराध कर भी बच जाते हैं इस तर्क के आधार पर गरीब अपराधी के साथ सहानुभूति नहीं हो सकती।  अगर यह सच है तो फिर गरीब को अपराध में शामिल होने से ही बचना चाहिये।  हम तो यह कहते हैं कि गरीब के अपराध में शामिल होने पर उसका दंड अधिक भयानक होना चाहिये क्योंकि उसके सहने की क्षमता अधिक होती है।  अमीर में सहने की क्षमता नहीं होती यह बात तय है।  हम यहां अमीरों के अपराध में शामिल होने पर सहानुभूति नहीं जता रहे बल्कि गरीब होकर अपराध में सजा मिलने पर रुदन करने की प्रवृत्ति पर गुस्सा जता रहे हैं।
             मृतक आरोपी ने आत्महत्या की होगी पर उसके अपराध के कारण उस  पीड़िता का करुण क्रंदन यादकर उससे सहानुभूति खत्म हो जाती है जिसने अपनी जख्मों से लड़ते हुए दम तोड़ दिया।  अंत में हमारा यह कहना है कि मृतक आरोपी के पिता के वह बयान समाज में आपसी वार्तालाप में सुनाते रहें जिसमें उसने पुत्र पर अनाचार होने की बातें कही हैं ताकि महिलाओं को सस्ता समझने वालों में भय पैदा हो।  हो सकता है कि हमारी यह सोच गलत हो पर जिस तरह नारियों के प्रति अपराध इस देश में बढ़ रहे हैं उस पर गुस्सा आता है।  तब लगता है कि शैतानी प्रवृत्ति के लोगों को डराने के लिये उन्हें ऐसे संभावित खतरे का रूप दिखाना चाहिये।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Monday, December 6, 2010

विकीलीक्स के खुलासे में अभी तक मज़ा नहीं आया-हिन्दी व्यंग्य (vikileeks secreat is not for enterntainment-hindi vyangya

विकिलीक्स के खुलासों में मज़ा नहीं आ रहा है। जो खबरें आ रही हैं वह पहले भी आ चुकी हैं। आतंकवादी यह कर रहे हैं वह कर रहे हैं। पाकिस्तान यह योजना बना रहा है और वह छोड़ रहा है। भारत में यह खतरा या वह भय! यह सब पहले भी पढ़ चुके हैं। भारतीय प्रचार माध्यम कई बार ऐसी चीजें देकर अपने विज्ञापन चलाते हैं। कुछ अनोखा नहीं दिखाई या सुनाई नहीं पड़ रहा है।
उधर अमेरिकी सरकार उसके संस्थापक के पीछे पड़ी है। अगर यही खुलासे हैं तो समझ में नहीं आता कि अमेरिकी रणनीतिकार उससे इतने भयभीत क्यों हैं? अमेरिका की विदेश मंत्राणी का कहना है कि यह खुलासे केवल आपसी संवाद हैं और इनका उनके देश की नीति से कोई संबंध नहीं हैं। फिर इतना होहल्ला क्यों?
दरअसल अमेरिका की अर्थव्यवस्था एशियाई देशों पर आधारित है और इन खुलासों में कुछ ऐसा होने की संभावना है जो उन्हीं देशों से संबंधित है जहां के रणनीतिकारों के नाराज होने पर उसे इसके परिणाम भोगने पड़ते हैं।
संगठित प्रचार माध्यम केवल वहीं खबरे दें रहे हैं जिनका कोई महत्व नहीं है। ऐसे में भारत के हिन्दी या अंग्रेजी ब्लाग लेखकों से ही यह आसरा है जो कुछ असाधारण खोज करें। ढाई लाख दस्तावजों को देखना कोई आसान नहीं है। मतलब जो ब्लाग लेखक इधर से उधर भाग रही विकीलीक्स की वेबसाईट पर जायेंगे उनको अपने देश के लिये सामग्री ढूंढना आसान नहीं है। अगर ऐसी ही चलताऊ सामग्री ढूंढेंगे तो उसका कोई मतलब नहंी रह जायेगा। हिन्दी ब्लाग लेखकों के लिंक से वह वेबसाईट देखी थी और लगा कि अगर भारत से संबंधित कुछ ढूंढना है तो बहुत मेहनत करनी होगी। फिर उसमें भी कुछ ऐसा जिसमें भय, खतरा तथा सामान्य समाचार समाचार जैसा न हो। उसमें ऐसा क्या हो सकता है? केवल भारत के शिखर पुरुषों और उनके मातहतों के अमेरिका तथा अन्य देशों से संबंधित व्यवहार या संवाद की ऐसी जानकारी जो अभी तक छिपाई गयी हो। अब तो यह तय हो गया है कि राज्य में बैठे अनेक बड़े अधिकारी वह काम कर रहे हैं जो दुश्मन देश का जासूस भी नहीं कर सकता। ऐसे अनेक अधिकारी जेल मैं हैं और यह कहना ठीक नहीं होगा कि बाकी सब ठीक ठाक हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि देश में इस समय जो घोटालों पर माहौल बना है वह इसी विकीलीक्स में किसी रहस्य को उजागर होने से बचाने के लिये हैं। विकीलीक्स को शायद इधर उधर दौड़ाया भी इसलिये जा रहा है कि किसी भी एशियाई देश की जानकारी अब लोग न देख पायें।
हिन्दी ब्लाग लेखकों में कुछ गज़ब के हैं। इनमें से अनेक न केवल अंग्रेजी और हिन्दी में एक जैसा महारथ रखते हैं। इनमें कुछ का तो वेद और कुरान पर एक जैसा विशद अध्ययन है! इनमें से अनेक वेबसाईटें खंगालते रहते हैं। जब कुछ अपन भाषा वालों के लिये अच्छा लगता है उसका अनुवाद कर प्रस्तुत भी करते हैं। यह कुशल समूह विकीलीक्स पर नज़र नहीं रखता हो यह संभव नहीं है। संभव है यह पूरा दिन वहां कुछ न कुछ ढूढते हों क्योंकि इधर उनकी सक्रियता कम दिख रही है।
ऐसे में उनको करना यह चाहिए कि उन्हें अपनी सरसरी दृष्टि से काम करना चाहिए। अगर वेबसाईट उनके सामने हो तो तुरंत अपने देश से संबंधित सामग्री न होने पर आगे बढ़ जाना चाहिए। इसके अलावा जहां खतरा, भय या योजनाओं की बात हो जो वह पहले से जानते हों उसे छोड़ दें। उनको ढूंढना चाहिए ऐसे व्यवहार, संवाद तथा विचार की जिससे यहां तहलका मच जाये। अब पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री हों या राष्ट्रपति उनकी सोच से हमें क्या लेना देना? यह तो बुत भर हैं जो अमेरिका तथा विदेशी पूंजीपतियों द्वारा बिठाये गये हैं। सेना का हाल सभी को मालुम है। भारत के प्रति रवैया क्या है, यह जानने की जरूरत नहीं है। मुख्य बात है कि दोनों के बीच संपकों को लेकर अंदर क्या काला पीली होता है उसे जानना है। याद रखें कि कमरे के अंदर और बाहर की राजनीति अलग अलग होती है, वैश्विक उदारीकरण के इस इस दौर में दोस्ती और दुश्मनी भी क्रिकेट मैच की तरह फिक्स होती है। ऐसे हिन्दी ब्लाग लेखकों के ब्लाग पढ़ने में मजा भी आता है जो खोज परक जानकारी अपने ब्लाग पर देते हैं। वैसे अगर इनमें से कोई महारथी विकीलीक्स का भारतीय संस्करण बना डाले तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। भारत के आम पाठक इस बात का अनुमान नहीं कर सकते कि साफ्टवेयर में भारत का पूरे विश्व में लोहा माना जाता है और इसमें कुशल अनेक लोग ब्लाग भी लिखते हैं। उनके बारे में तभी अनुमान किया जा सकता है जब हिन्दी ब्लाग लेखन पर सक्रिय रहा जाये भले ही लेखक के रूप में नहीं एक पाठक के रूप में ही सही।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Sunday, October 17, 2010

दशहराःरावण के नये रूपों से लड़ने की जरूरत-हिन्दी लेख (dashahara:ravan ke naye roop se ladne ke jaroorata-hindi lekh)

आज पूरे देश में त्रेतायुग में श्री राम की रावण पर युद्ध के समय हुई विजय के रूप में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की धूम मची हुई है। एक दिन के लिये खुशी से मनाये जाने वाले इस पर्व के मायने बहुत हैं यह अलग बात है कि लोग इसे समझना नहीं चाहते। दरअसल भगवान श्री राम और रावण दो ऐसे व्यक्तित्व थे जो अपने समय में सर्वाधिक शक्तिशाली और पराक्रमी माने जाते थे पर इसके बावजूद भगवान श्रीराम को अच्छाई तथा रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। रावण के बारे तो कहा जाता है कि उसमें विद्वता कूट कूट कर भरी हुई थी। जहां तक उसकी धार्मिक प्रवृत्ति का सवाल है तो उसने भगवान शिव की तपस्या कर ही अमरत्व का वरदान प्राप्त किया था। इसका मतलब यह है कि कम से कम वह भगवान शिव का महान भक्त था और वह उसके आराध्य देव थे जिनको आज भी भारतीय समाज बहुत मानता है। आखिर रावण में क्या दुर्गुण थे इस पर अवश्य विचार करना चाहिये क्योंकि कहीं न कहीं हम उनकी समाज में उपस्थिति देखते हैं और तब अनेक लोग रावण तुल्य लगते हैं।
अमरत्व के वरदान ने रावण के मन में अहंकार का भाव स्थापित कर दिया था। वह अपने अलावा अन्य सभी पूजा पद्धतियों का विरोधी था। उसे लगता था कि केवल तपस्या के अलावा अन्य सब पूजा पद्धतियां व्यर्थ है और वह यज्ञ और हवन का विरोधी था। दूसरा वह यह भी कि वह नहीं चाहता था कोई दूसरा तप या स्वाध्याय कर उस जैसा शक्तिशाली हो जाये। इसलिये ही उसने वनों में रहने वाले ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों के साथ उस समय के अनेक समृद्ध राजाओं को भी सताया था। देवराज इंद्र तक उससे आतंकित थे। वह यज्ञ और हवन करने वाले स्थानों पर उत्पात मचाने के लिये अपने अनुचर नियुक्त करता था जिनमें सुबाहु और मारीचि के साथ भगवान श्रीराम की मुठभेड़ ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर हुई थी। दरअसल यहीं से ही भगवान श्रीराम की शक्ति का परिचय तत्कालीन रावण विरोधी रणनीतिकारों को मिला जिससे वह भगवान श्री राम का रावण से युद्ध कराने के लिये जुट गये तो साथ ही रावण को भी यह संदेश गया कि अब उसका पतन सन्निकट है। जो लोग सीताहरण को ही भगवान श्रीराम और रावण का कारण मानते हैं वह अन्य घटनाओं पर विचार नहंीं करते। रावण ने श्रीसीता का हरण केवल भगवान श्रीराम को अपने राज्य में लाकर उनको मारने के लिये किया था। सूपर्णखा का नाक कान कटना भी भगवान श्रीराम के द्वारा रावण को चुनौती भेजने जैसा ही था।
एक भारतीय उपन्यासकार कैकयी को खलनायिका मानने की बजाय तत्कालीन कुशल रणनीतिकारों में एक मानते हैं। इसका कारण यह है कि वह स्वयं एक युद्ध विशारद होने के साथ ही कुशल सारथी थी। उसे एक युद्ध में राजा दशरथ के घायल होने पर उनका रथ स्वयं दूर ले जाकर उनको बचाया था जिसके एवज में तीन वरदान देने का वादा पति से प्राप्त किया जो अंततः भगवान श्रीराम के वनवास तथा भरत का राज्य मांगने के रूप में प्रकट हुए। रावण के समय में देवराज इंद्र उसके पतन के लिये बहुत उत्सुक थे। कैकयी को राम के वनवास के लिये उकसाने वाली मंथरा भी शायद इसलिये अयोध्या आयी थी। संभवत उसे देवताओं ने ही कैकयी को भड़काने या संदेश देने के लिये भेजा था जबकि प्रकटतः बताया जाता है कि सरस्वती देवी ने मंथरा की बुद्धि हर ली थी। कहा जाता है कि श्रीराम कके वनवास के बाद मंथरा फिर अयोध्या में नहीं दिखी जो इस बात का प्रमाण है कि वह केवल इसी काम के लिये आयी थी और कहीं न कहीं उस समय के धार्मिक रणनीतिकारों के दूत या गुप्तचर के रूप में उसने काम किया था। कैकयी स्वयं एक युद्ध और रणनीतिकविशारद थी इसलिये जानती थी कि ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर सुबाहु के वध और मारीचि के भाग जाने के परिणाम से रावण नाखुश होगा और वह भगवान श्रीराम से कभी न कभी लड़ेगा। ऐसे में अयोध्या में संकट न आये और भगवान श्रीराम सामर्थ्यवान होने के कारण राजधानी से दूर जाकर उसका वध करें इसी प्रयोजन से उसने भगवान श्रीराम को वन भेजने का वर मांगा होगा। रावण के विद्वान और आदर्शवादी होने की बात कैकयी जानती होंगी पर उनको यह अंदाज बिल्कुल नहीं रहा होगा कि वह श्रीसीता का हरण जैसा जघन्य कार्य करेगा। जब कैकयी भगवान श्री राम को वनवास का संदेश दे रही थीं तब वह मुस्करा रहे थे। इससे ऐसा लगता है वह सारी बातें समझ गये थे। इतना ही नहीं भगवान श्रीराम ने हमेशा ही अपने भाईयों को कैकयी का सम्मान करने का आदेश दिया जो इस बात को समझते थे कि वह अयोध्या के हितार्थ एक रणनीति के तहत स्वयं काम रही हैं या उनको प्रेरित किया जा रहा है। जब कैकयी ने भगवान श्रीराम और श्री लक्ष्मण के साथ श्रीसीता को भी वल्कल वस्त्र पहनने को लिये दिये तब वहां उपस्थिति पूरा जनसमुदाय हाहाकार कर उठा। दशरथ गुस्से में आ गये पर कैकयी का दिल नहीं पसीजा। इस घटना से पूर्व तक कैकयी को एक सहृदय महिला माना जाता था। उसकी क्रूरता का एक भी उदाहरण नहीं मिलता। तब यकायक क्या हो गया? कैकयी क समर्थन करने वाले यह भी सवाल उठाते हैं कि उसने 14 वर्ष की बजाय जीवन भर का वनवास क्यों नहीं मांगा क्योंकि भगवान श्रीराम 14 वर्ष बाद तो और अधिक बलशाली होने वाले थे। वनवास जाते समय तो नवयुवक थे और बाद में भी उनके बाहुबल और पराक्रम के साथ ही अनुभव में वृद्धि की संभावना थी। ऐसे में कैकयी जैसी बुद्धिमान महिला यह सोच भी नहीं सकती थी कि 14 वर्ष बाद राम अयोध्या का राज्य पुनः प्राप्त करने लायक नहीं रहेंगें।
कैकयी जानती थी कि देवता, ऋषि गण, तथा मुनि लोग भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध की संभावनाऐं ढूंढ रहे हैं। उन सभी के रणनीतिकार रावण के पतन के लिये भगवान श्रीराम की तरफ आंख लगाये बैठे हैं। ऐसे में भगवान श्रीराम अगर अयोध्या में राज सिंहासन पर बैठेंगे तो चैन से नहीं रह पायेंगे और इससे प्रजा पर भी कष्ट आयेगा। फिर रावण वध उस समय के सभी राजाओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और प्रमुख होने के कारण अयोध्या पर ही इसका दारोमदार था।
जब वनवास में भगवान श्री राम अपने भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम पर आये तो देवराज इंद्र उनको देखकर चले गये जो संभावित राम रावण युद्ध पर ही विचार करने वहां आये थे। वहीं अगस्त्य ऋषि ने उनको अलौकिक धनुष दिया जिससे रावण का वध हुआ।
अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिये जब ऋषि विश्वमित्र भगवान श्रीराम का हाथ मांगने दशरथ की दरबार में पहुंचे तो उनका पिता हृदय सौंपने को तैयार नहीं हुआ। तब गुरु वशिष्ठ ने उनको समझाया तब कहीं दशरथ ने भगवान श्रीराम को ऋषि विश्व मित्र के साथ भेजा। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि गुरु वशिष्ट ने विश्वमित्र ने अपनी पुरानी शत्रुता को इसलिये भुला दिया था क्योंकि उस समय समाज में रावण का संकट विद्यमान था जिसका निवारण आवश्यक था। इस तरह भगवान शिव की तपस्या से अवध्य हो चुके रावण की भूमिका तैयार हुई थी।
इससे एक संदेश मिलता है कि राज्य और समाज के उत्थान और रक्षा के लिये दूरगामी अभियान बनाने पड़ते हैं जिनके परिणाम में बरसो लग जाते हैं। केवल नारों और धर्म की रक्षा के लिये हिंसक संघर्ष का भाव रखने से काम नहीं चलता। दूसरी बात यह भी कि ऋषि विश्वमित्र, अगस्त्य, वशिष्ठ, भारद्वाज मुनि तथा अन्य अपने तपबल से रावण का अस्त्र शस्त्रों के साथ ही शाप देकर भी संहार करने में समर्थ थे पर तपस्या के कारण अहिंसक प्रवृत्ति के चलते उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनको रावण वध या पतन से मिलने वाली प्रतिष्ठा का लोभ नहीं था और उन्होंने उस समय के महान धनुर्धर भगवान श्रीराम को इस कार्य के लिये चुनकर समाज के लिये एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठत करने का रावण वध के साथ ही दूसरा अभियान प्रारंभ कर उसे पूरा किया जिसमें उस समय के देवराज इंद्र जैसे समृद्ध और पराक्रमी पुरुषों का भी सहयोग मिला। सीधी बात यह है कि ऐसे अभियानों के लिये नेता के रूप में एक शीर्षक मिल जाता है पर आवश्यक यह है कि उसके लिये सामूहिक प्रयास हों।
दशहरे पर रावण का पुतला जलाना अब कोई खुशी की बात नहीं रही। भ्रष्टाचार, बेईमानी, मिलावट, तथा महंगाई के रूप में यह रावण अब अनेक सिर लेकर विचर रहा है। इनसे लड़ने के लिये हर भारतीय में विवेक, संतोष, तथा सहकारिता के भाव का होना जरूरी है। अब बुद्धि को धनुष, विचार को तीर तथा संकल्प को गदा की तरह साथ रखना होगा तभी अब अदृश्य रूप से विचर रहे रावण के रूपों का संहार किया जा सकता है।
इस दशहरे के अवसर इसी पाठ के साथ इस ब्लाग लेखक के मित्र ब्लाग लेखकों तथा पाठकों इस पर्व की ढेर सारी बधाई। उनका भविष्य मंगलमय हो यही हमारी कामना है।
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लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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Thursday, February 4, 2010

हाकी के नये दर्शक अवतार-हिन्दी लेख (world cup hoicky tournament)

लगभग मृतप्रायः हो चुकी भारतीय हाकी को उबारने के लिये बल्ला और गेंद से खेलकर महान बन चुके भगवान अब दर्शक के रूप में अवतरित हो रहे हैं।
‘हमारे देश में हाकी         का विश्व कप हो रहा है, क्या उसे हम नहीं देखेंगे?’
‘मैं  अब खेलूगा नहीं बल्कि दर्शकों की तरह हाकी के मैच देखूंगा!’
‘अपने देश के हाकी खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ायें।’
इस तरह के नारे उस क्रिकेट खेल के खिलाड़ी दे रहे हैं जिसने राष्ट्रीय खेल कही जाने वाली हाॅकी को लगभग मृत स्थिति में पहुंचा दिया। अगर एतिहासिक उपलब्धियों की बात की जाये तो हाकी में भारत का खाता आज भी चमकदार है क्योंकि  ओलंपिक और विश्व कप उसके नाम पर दर्ज हैं जबकि क्रिकेट में केवल एक विश्व कप दर्ज है वह भी 1983 में मिला था।  उसके बाद भले ही बल्ले और बाल से खेलने  वाले धन कमाते रहे पर इस खाते में 2007 में एक बीस ओवरीय विश्व कप के अलावा कुछ अधिक नहीं जुड़ा।  हो सकता है कि देश के युवा क्रिकेट प्रेमी परीक्षण मैच-पांच दिवसीय, पचास ओवरीय तथा बीस ओवरीय-देखकर भले ही बहल जाते हों और खिलाड़ियों के विज्ञापनों से मिलने वाले प्रचार के साथ पैसे मिलने को देखकर युवा खेल प्रशंसिकायें उनकी दीवानी हो जाती हों पर सच यही है कि श्रेष्ठता के लिये वास्तविक पैमाना वैश्विक स्तर की प्रतियोगिताओं से ही प्रमाणित होता है।
हो सकता है कि अनेक युवा खेल   प्रशंसकों में कई ऐसे भी हों जिनको हाकी शब्द ही समझ में न आये।  कई युवाओं को यह खेल नया ईजाद किया हुआ भी लगा सकता है-क्योंकि उनकी स्मृति में हाकी का स्वर्णिम समय नहीं होगा। कुछ लोगो को यह भ्रम भी हो सकता है कि यही खिलाड़ी किकेट में तो अपनी टीम नहीं उबार सके पर शायद अब राष्ट्रीय खेल हाकी में कुछ जरूर कर दिखायेंगे।  देश की हाकी को इन दर्शक अवतारों के सहारे तारने की कोशिश हो रही है या उसके विश्व कप से जुड़ी विज्ञापन कंपनियों के लिये दर्शक जुटाने का यह प्रयास है, यह कहना कठिन है। 
पुराणों में कथा आती है कि जब जब प्रथ्वी पर संकट आता है तब वह सर्वशक्तिमान की दरबार में हाजिरी लगाकर अपना बोझ हल्का करने का आग्रह करती है और वह अवतार लेकर उसका उद्धार करते हैं। प्रथ्वी की सांसें शेष होती हैं इसलिये वह चलकर सर्वशक्तिमान के दरबार पहुंचती है।  यहां प्राणविहीन हाॅकी से यह आशा करना बेकार है कि उसने क्रिकेट के इन विज्ञापन  अवतारों के  ‘सजावट कक्ष’ में-अंग्रेजी में बोलें तो ड्रैसिंग रूम-में हाजिरी लगाई होगी।
मृतप्रायः हाकी समझकर कुछ लोग शायद समझें नहीं इसलिये यह बताना जरूरी है कि अगर यह विश्व कप भारत में नहीं हो रहा होता तो भारतीय टीम इसमें नहीं खेल सकती थी क्योंकि वह क्वालीफाइग दौर में बाहर हो चुकी थी-यानि इसमें भाग लेने का अवसर योग्यता के कारण नहीं बल्कि इसके आयोजन पर पैसा खर्च करने के कारण मिल रहा है। दूसरी भाषा में इसे कृपांक से पास होना भी कह सकते हैं-अपने यहां ऐसा भी होता है कि किसी कारण वश कहीं परीक्षा नहीं हो पाती तो सामूहिक रूप से विद्यार्थियों को पास कर दिया जाता है-यह भी इसी तरह का ही है।
ऐसा नहीं है कि भारतीय हाकी टीम की यह दुर्दशा केवल एक दिन में हुई है। बरसों से हाकी के प्रेमी और शुभचिंतक आर्त भाव से इसके कर्णधारों की तरफ देखते रहे, कुछ लोगों ने अपनी भावनायें अखबारों में भी व्यक्त की। हाॅकी के उद्धार करने के लिये कई महापुरुष प्रकट भी होते रहे पर नतीजा ढाक के तीन पात!

हाकी का विश्वकप कप होने की घोषणा भी कोई दो चार दिन पहले नहीं  हुई। चार साल पहले पता था-पर यह नहीं पता कि इसे जीतने के लिये क्या योजना बनी है? उल्टे कुछ दिन पहले खिलाड़ियों द्वारा वेतन तथा सुविधाऐं न मिलने की शिकायत करते हुए हड़ताल कर दी।  बड़ी हायतौबा मची।  इस देश में शिखर पर अभी भी सज्जन लोग हैं और वह भारतीय हाकी की मदद के लिये आगे भी आये।  अब यह मामला थम गया है पर भारतीय टीम किस स्थिति में है पता नहीं।
बाकी देशों का पता नहीं पर हमारे देश में अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताऐं केवल अपनी वैश्विक छबि बनाने के लिये आयोजित किये जाते हैं।  खेल तो जाये भाड़ में बस विश्व में सभ्य देश माना जाना चाहिये!  इस छबि का लाभ जिसे मिल सकता है वही उठा सकता है। जहां तक खिलाड़ियों का सवाल है तो जिसमें अपना दमखम हो खेल ले-अगर क्रिकेट के अलावा कोई अन्य खेल खेलता है तो अपने दम पर रोटी कमाये।  या फिर जिसे प्रचार चाहिये वह किसी भी अन्य खेल में आये और शिखर पुरुषों की जीहुजूरी कर टीम में स्थान बनाकर प्रचार प्राप्त करे-मतलब जिसे आत्मविज्ञापन की जरूरत हो वही दूसरा खेल खेले।  वैसे आजकल सभी प्रकार की खेल प्रतियोगितायें कंपनियों द्वारा ही प्रायोजित किये जाते हैं जिनको अपने विज्ञापन से मतलब होता है-आशय यह है कि हाकी खेल से अधिक कंपनियों के विज्ञापन महत्वपूर्ण है उसके लिये जरूरी है अधिक से अधिक लोग इसके मैचों को देखें।
अगले कुछ दिनों में हम देखेंगे कि अनेक ‘विज्ञापन नायक नायिकायें-फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियां और क्रिकेट के खिलाड़ी-हाकी के लिये अपने आपको विशिष्ट दर्शक के रूप में प्रस्तुत करते नज़र आयेंगे।  अब यह कहना कठिन है कि वह इन विज्ञापनों के लिये प्रत्यक्ष धन ले रहे हैं या ‘पुराने ग्राहकों’ के लिये उपहार स्वरूप अभिनय कर रहे हैं-अपने यहां पुराने व्यवसायिक संबंधो के आधार पर रियायत करने की पंरपरा है। अनेक बार दिवाली के अवसर पर अनेक चीजें बड़े व्यापारी छोटे व्यापारियों और ग्राहकों उपहार स्वरूप देते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हाकी के विश्व कप को आकर्षण प्रदान करने के लिये प्रयास हो रहे हैं जिसका खेल से कोई अधिक संबंध नहीं दिखता।
जो हाॅकी के खेल को जानते हैं उनको पता है कि अपनी टीम का मनोबल बहुत गिरा हुआ है। खिलाड़ियों का मनोबल बढ़ाने की बात कहकर केवल विज्ञापनों के लिये दर्शक जुटाना भर है।  आखिर हाकी की विश्व कप प्रतियोगिता के लिये प्रायोजक तैयार कैसे हुए? जबकि उनके पास क्रिकेट और टेनिस जैसे भी खेल हैं जहां उनके विज्ञापन देखने वाले दर्शक पहले से ही अधिक होते हैं, तब हाकी की तरफ उनका ध्यान क्यों गया? शायद वह यह सोचकर ही शामिल हुईं होंगी कि इस देश से खेलों के नाम पर बहुत कमाया है चलो ‘हाकी’ के माध्यम से दर्शकों  को थोड़ा उपहार दे दो।  अब यह देखने वाली बात होगी कि भारत में  आयोजित इस हाॅकी प्रतियोगिता को कितना जनसमर्थन मिलेगा? अब वह पहले वाली बात नहीं है कि हाकी का विश्व कहीं भी हो लोग उसका इंतजार ऐसे ही करते थे जैसे कि आजकल क्रिकेट का करते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, December 22, 2009

अध्यात्म और अर्थशास्त्र-हिन्दी लेख (hindu adhyatm and life's economics-hindi article)

आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार सभी प्रकार के शास्त्रों का अध्ययन कर ही आर्थिक नीतियां बनायी जानी चाहिये। वैसे अर्थशास्त्र के अनुसार पागलों और सन्यासियों को छोड़कर सभी के क्रियाकलापों का ही अध्ययन किया जाता है । हालांकि इस बात का कहीं उल्लेख तो नहीं मिलता पर आधुनिक अर्थशास्त्र में संभवतः अध्यात्मिक ग्रंथों का उल्लेख नहीं किया जाता। अध्यात्म उस जीवात्मा का नाम है जो इस देह को धारण करती है और जब इस उसकी चेतना के साथ मनुष्य काम करता है तो उसकी गतिविधियां बहुत पवित्र हो जाती हैं जो अंततः उसकी तथा समाज की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। इस देह के साथ मन, बुद्धि और अहंकार तीनों प्रकृतियां स्वाभाविक रूप से अपना काम करती हैं और मनुष्य को अपने अध्यात्म से अपरिचित रखती हैं। आधुनिक अर्थशास्त्र उससे अपरिचित लगता है।
वैसे ही आज के सारे अर्थशास्त्री केवल बाजार, उत्पादन तथा अन्य आर्थिक समीकरणों के अलावा अन्य किसी पर तथ्य पर विचार व्यक्त नहीं कर पाते। कम कम से प्रचार माध्यमों में चर्चा के लिये आने वाले अनेक अर्थशास्त्रियों की बातों से से तो ऐसा ही लगता है। कहीं शेयर बाजार, महंगाई या राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषय पर चर्चा होती है तो कथित रूप से अर्थशास्त्री सीमित वैचारिक आधार के साथ अपना विचार व्यक्त करते हैं जिसमें अध्यात्म तो दूर की बात अन्य विषयों से भी वह अनभिज्ञ दिखाई देते हैं। थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाये कि अध्यात्मिक ज्ञान का कोई आर्थिक आधार नहीं है तो भी आज के अनेक अर्थशास्त्री अन्य राजनीतिक, प्रशासनिक तथा प्रबंधकीय तत्वों को अनदेखा कर जाते हैं। यही कारण है कि महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, तथा खाद्य सामग्री की कमी के पीछे जो बाजार को प्रभावित करने वाले नीतिगत, प्राकृतिक भौगोलिक विषयों के अलावा अन्य कारण है उनको नहीं दिखाई देते हैं।

हम यहां आधुनिक अर्थशास्त्र की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित उन प्राचीन अर्थशास्त्रीय सामग्रियों का संकलित करने का आग्रह कर रहे हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो नाम से ही प्रमाणिक है जबकि चाणक्य नीति में भी आर्थिक विषयों के साथ जीवन मूल्यों की ऐसी व्याख्या है जिससे उसे भी जीवन का अर्थशास्त्र ही कहा जाना चाहिये- आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार भी नैतिक शास्त्र का अध्ययन तो किया ही जाना चाहिये जिनको जीवन मूल्य शास्त्र भी कहा जाता है। आज की परिस्थतियों में यही नैतिक मूल्य अगर काम करें तो देश की अर्थव्यवस्था का स्वरूप एक ऐसा आदर्श सकता है जिससे अन्य राष्ट्र भी प्रेरणा ले सकते हैं।
आधुनिक अर्थशास्त्री अपने अध्ययनों में भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘कुशल प्रबंध का अभाव’ एक बहुत बड़ा दोष मानते हैं। देश के कल्याण और विकास के लिये दावा करने वाले शिखर पुरुष नित्य प्रतिदिन नये नये दावे करने के साथ ही प्रस्ताव प्रस्तुंत करते हैं पर इस ‘कुशल प्रबंध के अभाव के दोष का निराकरण करने की बात कोई नहीं करता। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही इस दोष का परिणाम है या इसके कारण प्रबंध का अभाव है यह अलग से चर्चा का विषय है। अलबत्ता लोगों को अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होने के कारण लोगों में समाज के प्रति जवाबदेही की कमी हमेशा परिलक्षित होती है।
हम चाहें तो जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों की कार्यपद्धति को देख सकते हैं। छोटा हो या बड़ा हो यह बहस का विषय नहीं है। इतना तय है कि भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और लापरवाही से काम करने की प्रवृत्ति सभी में है। देश में फैला आतंकवाद जितना बाहर से आश्रय से प्रत्यक्ष आसरा ले रहा है तो देश में व्याप्त कुप्रबंध भी उसका कोई छोटा सहयोगी नहीं है। हर बड़ा पदासीन केवल हुक्म का इक्का बनना चाहता है जमीन पर काम करने वालों की उनको परवाह नहीं है। उद्योग और पूंजी ढांचों के स्वामी की दृष्टि में उनके मातहत ऐसे सेवक हैं जिनको केवल हुक्म देकर काम चलाया जा सकता है। दूसरी भाषा में कहें तो अकुशल या शारीरिक श्रम को करना निम्न श्रेणी का काम मान लिया गया है। हमारी श्रीमद्भागवत गीता इस प्रवृत्ति दसे खारिज करती है। उसके अनुसार अकुशल या शारीरिक श्रम को कभी हेय नहीं समझना चाहिये। संभव है कुछ लोगों को श्रीगीता की यह बात अर्थशास्त्र का विषय न लगे पर नैतिक और राष्ट्रीय आधारों पर विचार करें तो केवल हुक्म देकर जिम्मेदारी पूरी करवाने तथा हुक्म लेकर उस कार्य को करने वालों के बीच जो अहं की दीवार है वह अनेक अवसर परसाफ दिखाई देती है। किसी बड़े हादसे या योजनाओं की विफलता में इसकी अनुभूति की जा सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि उनका काम केवल हुक्म देना है और उसके बाद उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है मगर वह कार्य को अंजाम देने वालो लोगों की स्थिति तथा मनोदशा का विचार नहीं करते जबकि यह उनका दायित्व होता है। इसके अलावा किसी खास कार्य को संपन्न करने के लिये उसकी तैयारी तथा उसे अन्य जुड़े मसलों से किस तरह सहायता ली जा सकती है इस पर योजना बनाने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता है वह शायद ही किसी में दिखाई देती है। सभी लोग केवल इस प्रयास में है कि यथास्थिति बनी रहे और इस भाव ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य क्षेत्रों में जड़ता की स्थिति पैदा कर दी है।
इसके अलावा एक बात दूसरी भी है कि केवल आर्थिक विकास ही जीवन की ऊंचाई का प्रमाण नहीं है वरन् स्वास्थ्य, शिक्षा तथा वैचारिक विकास भी उसका एक हिस्सा है जिसमें अध्यात्मिक ज्ञान की बहुत जरूरत होती है। इससे परे होकर विकास करने का परिणाम हमारे सामने है। जैसे जैसे लोगों के पास धन की प्रचुरता बढ़ रही है वैसे वैसे उनका नैतिक आधार सिकुड़ता जा रहा है।
ऐसे में लगता है कि कि हम पश्चात्य समाज पर आधारित अर्थशास्त्र की बजाय अपने ही आध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित सामग्री का अध्ययन करें। पाश्चात्य अर्थशास्त्र
वहां के समाजों पर आधारित जो अब हमारे ही देश के अध्यात्मिक ज्ञान पर अनुसंधान कर रहे हैं। यहां यह भी याद रखने लायक है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान भक्ति तक ही सीमित नहीं है और न ही वह हमें जीवन देने वाली उस शक्ति के आगे हाथ फैलाकर मांगने की प्रेरणा देता है बल्कि उसमें इस देह के साथ स्वयं के साथ ही परिवार, समाज तथा राष्ट्र के लिये अच्छे और बड़े काम करने की प्रेरणा भी है।
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Monday, December 7, 2009

निर्जीव वस्तु के लिये शोक-हिन्दी व्यंग्य (bejan vastu ke liey shok-hindi vyangya)

आप कितने भी ज्ञानी ध्यानी क्यों न हों, एक समय ऐसा आता है जब आपको कहना भी पड़ता है कि ‘भगवान ही जानता है’। जब किसी विषय पर तर्क रखना आपकी शक्ति से बाहर हो जाये या आपको लगे कि तर्क देना ही बेकार है तब यह कहकर ही जान छुड़ाना पड़ती है कि ‘भगवान ही जानता है।’


अब कल कुछ लोगों ने छ दिसंबर पर काला दिवस मनाया। दरअसल यह किसी शहर में कोई विवादित ढांचा गिरने की याद में था। अब यह ढांचा कितना पुराना था और सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में इसका नाम क्या था, ऐसे प्रश्न विवादों में फंसे है और उनका निष्कर्ष निकालना हमारे बूते का नहीं है।
दरअसल इस तरह के सामूहिक विवाद खड़े इसलिये किये जाते हैं जिससे समाज के बुद्धिमान लोगों को उन पर बहस कर व्यस्त रखा जा सकें। इससे बाजार समाज में चल रही हेराफेरी पर उनका ध्यान न जाये। कभी कभी तो लगता है कि इस पूरे विश्व में धरती पर कोई एक ऐसा समूह है जो बाजार का अनेक तरह से प्रबंध करता है जिसमें लोगों को दिमागी रूप से व्यस्त रखने के लिये हादसे और समागम दोनों ही कराता है। इतना ही नहीं वह बहसें चलाने के लिये बकायदा प्रचार माध्यमों में भी अपने लोग सक्रिय रखता है। जब वह ढांचा गिरा था तब प्रकाशन से जुड़े प्रचार माध्यमों का बोलाबाला था और दृष्यव्य और श्रवण माध्यमों की उपस्थिति नगण्य थी । अब तो टीवी चैनल और एफ. एम. रेडियो भी जबरदस्त रूप से सक्रिय है। उनमें इस तरह की बहसे चल रही थीं जैसे कि कोई बड़ी घटना हुई हो।
अब तो पांच दिसंबर को ही यह अनुमान लग जाता है कि कल किसको सुनेंगे और देखेंगे। अखबारों में क्या पढ़ने को मिलेगा। उंगलियों पर गिनने लायक कुछ विद्वान हैं जो इस अवसर नये मेकअप के साथ दिखते हैं। विवादित ढांचा गिराने की घटना इस तरह 17 वर्ष तक प्रचारित हो सकती है यह अपने आप में आश्चर्य की बात है। बाजार और प्रचार का रिश्ता सभी जानते हैं इसलिये यह कहना कठिन है कि ऐसे प्रचार का कोई आर्थिक लाभ न हो। उत्पादकों को अपनी चीजें बेचने के लिये विज्ञापन देने हैं। केवल विज्ञापन के नाम पर न तो कोई अखबार छप सकता है और न ही टीवी चैनल चल सकता है सो कोई कार्यक्रम होना चाहये। वह भी सनसनीखेज और जज़्बातों से भरा हुआ। इसके लिये विषय चाहिये। इसलिये कोई अज्ञात समूह शायद ऐसे विषयों की रचना करने के लिये सक्रिय रहता होगा कि बाजार और प्रचार दोनों का काम चले।
बहरहाल काला दिवस अधिक शोर के साथ मना। कुछ लोगों ने इसे शौर्य दिवस के रूप में भी मनाया पर उनकी संख्या अधिक नहीं थी। वैसे भी शौर्य दिवस मनाने जैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि वह तो किसी नवीन निर्माण या उपलब्धि पर मनता है और ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता काला दिवस वालों का स्यापा बहुत देखने लायक था। हम इसका सामाजिक पक्ष देखें तो जिन समूहों को इस विवाद में घसीटा जाता है उनके सामान्य सदस्यों को अपनी दाल रोटी और शादी विवाह की फिक्र से ही फुरसत नहीं है पर वह अंततः एक उपभोक्ता है और उसका मनोरंजन कर उसका ध्यान भटकाना जरूरी है इसलिये बकायदा इस पर बहसें हुईं।
राजनीतिक लोगों ने क्या किया यह अलग विषय है पर समाचार पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनलों पर हिन्दी के लेखकों और चिंतकों को इस अवसर पर सुनकर हैरानी होती है। खासतौर से उन लेखको और चिंतकों की बातें सुनकर दिमाग में अनेक प्रश्न खड़े होते हैं जो साम्प्रदायिक एकता की बात करते हैं। उनकी बात पर गुस्सा कम हंसी आती है और अगर आप थोड़ा भी अध्यात्मिक ज्ञान रखते हैं तो केवल हंसिये। गुस्सा कर अपना खूना जलाना ठीक नहीं है।
वैसे ऐसे विकासवादी लेखक और चिंतक भारतीय अध्यात्मिक की एक छोटी पर संपूर्ण ज्ञान से युक्त ‘श्रीमद्भागवत गीता’ पढ़ें तो शायद स्यापा कभी न करें। कहने को तो भारतीय अध्यात्मिक ग्रथों से नारियों को दोयम दर्जे के बताने तथा जातिवाद से संबंधित सूत्र उठाकर यह बताते हैं कि भारतीय धर्म ही साम्प्रदायिक और नारी विरोधी है। जब भी अवसर मिलता है वह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान पर वह उंगली उठाते है। हम उनसे यह आग्रह नहीं कर रहे कि वह ऐसा न करें क्योंकि फिर हम कहां से उनकी बातों का जवाब देते हुए अपनी बात कह पायेंगे। अलबत्ता उन्हें यह बताना चाहते हैं कि वह कभी कभी आत्ममंथन भी कर लिया करें।
पहली बात तो यह कि यह जन्मतिथि तथा पुण्यतिथि उसी पश्चिम की देन है जिसका वह विरोध करते हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि न आत्मा पैदा होता न मरता है। यहां तक कि कुछ धार्मिक विद्वान तो श्राद्ध तक की परंपरा का भी विरोध करते हैं। अतः भारतीय अध्यात्मिक को प्राचीन मानकर अवहेलना तो की ही नहीं जा सकती। फिर यह विकासवादी तो हर प्रकार की रूढ़िवादिता का विरोध करते हैं कभी पुण्यतिथि तो कभी काला दिवस क्यों मनाते हैं?

सांप्रदायिक एकता लाने का तो उनका ढोंग तो उनके बयानों से ही सामने आ जाता है। उस विवादित ढांचे को दो संप्रदाय अपनी अपनी भाषा में सर्वशक्तिमान के दरबार के रूप में अलग अलग नाम से जानते हैं पर विकासवादियों ने उसका नाम क्या रखा? तय बात है कि भारतीय अध्यात्म से जुड़ा नाम तो वह रख ही नहीं सकते थे क्योंकि उसके विरोध का ही तो उनका रास्ता है। अपने आपको निष्पक्ष कहने वाले लोग एक तरफ साफ झुके हुए हैं और इसको लेकर उनका तर्क भी हास्यप्रद है कि वह अल्प संख्या वाले लोगों का पक्ष ले रहे है क्योंकि बहुसंख्या वालों ने आक्रामक कार्य किया है। एक मजे की बात यह है कि अधिकतर ऐसा करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के ही हैं।
इस संसार में जितने भी धर्म हैं उनके लोग किसी की मौत का गम कुछ दिन ही मनाते हैं। जितने भी धर्मो के आचार्य हैं वह मौत के कार्यक्रमों का विस्तार करने के पक्षधर नहीं होते। कोई एक मर जाता है तो उसका शोक एक ही जगह मनाया जाता है भले ही उसके सगे कितने भी हों। आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि किसी की उठावनी या तेरहवीं अलग अलग जगह पर रखी जाती हो। कम से कम इतना तो तय है कि सभी धर्मों के आम लोग इतने तो समझदार हैं कि मौत का विस्तार नहीं करते। मगर उनको संचालित करने वाले यह लेखक और चिंतक देश और शहरों में हुए हादसों का विस्तार कर अपने अज्ञान का ही परिचय ही देते हैं। । इससे यह साफ लगता है कि उनका उद्देश्य केवल आत्मप्रचार होता है।
आखिरी बात ऐसे ही बुद्धिजीवियों के लिये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से दूर होकर लिखने में शान समझते हैं। उनको यह जानकर कष्ट होगा कि श्रीगीता में अदृश्य परमात्मा और आत्मा को ही अमर बताया गया है पर शेष सभी भौतिक वस्तुऐं नष्ट होती हैं। उनके लिये शोक कैसा? यह प्रथ्वी भी कभी नष्ट होगी तो सूर्य भी नहीं बचेगा। आज जहां रेगिस्तान था वहां कभी हरियाली थी और जहां आज जल है वहां कभी पत्थर था। यह ताजमहल, कुतुबमीनार, लालाकिला और इंडिया गेट सदियों तक बने रहेंगे पर हमेशा नहीं। यह प्रथवी करोड़ों साल से जीवन जी रही है और कोई नहीं जानता कि कितने कुतुबमीनार और ताज महल बने और बिखर गये। अरे, तुमने मोहनजो दड़ो का नाम सुना है कि नहीं। पता नहीं कितनी सभ्यतायें समय लील गया और आगे भी यही करेगा। अरे लोग तो नश्वर देह का इतना शोक रहीं करते आप लोग तो पत्थर के ढांचे का शोक ढो रहे हो। यह धरती करोड़ों साल से जीवन की सांसें ले रही है और पता नहीं सर्वशक्तिमान के नाम पर पता नहीं कितने दरबादर बने और ढह गये पर उसका नाम कभी नहीं टूटा। बाल्मीकि रामायण में कहा गया है कि भगवान श्रीरामचंद्र जी के पहले भी अनेक राम हुए और आगे भी होंगे। मतलब यह कि राम का नाम तो आदमी के हृदय में हमेशा से था और रहेगा। उनके समकालीनों में परशुराम का नाम भी राम था पर फरसे के उपयोग के कारण उनको परशुराम कहा गया। भारत का आध्यात्मिक ज्ञान किसी की धरोहर नहीं है। लोग उसकी समय समय पर अपने ढंग से व्याख्या करते हैं। जो ठीक है समाज उनको आत्मसात कर लेता है। यही कारण है कि शोक के कुछ समय बाद आदमी अपने काम पर लग जाता है। यह हर साल काला दिवस या बरसी मनाना आम आदमी को भी सहज नहीं ल्रगता। मुश्किल यह है कि उसकी अभिव्यक्ति को शब्दों का रूप देने के लिये कोई बुद्धिजीवी नहीं मिलता। जहां तक सहजयोगियों का प्रश्न है उनके लिये तो यह व्यंग्य का ही विषय होता है क्योंकि जब चिंतन अधिक गंभीर हो जाये तो दिमाग के लिये ऐसा होना स्वाभाविक ही है
सबसे बड़ी खुशी तो अपने देश के आम लोगों को देखकर होती है जो अब इस तरह के प्रचार पर अधिक ध्यान नहीं देते भले ही टीवी चैनल, अखबार और रेडियो कितना भी इस पर बहस कर लें। यह सभी समझ गये हैं कि देश, समाज, तथा अन्य ऐसे मुद्दों से उनका ध्यान हटाया जा रहा है जिनका हल करना किसी के बूते का नहीं है। यही कारण है कि लोग इससे परे होकर आपस में सौहार्द बनाये रखते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि इसी में ही उनका हित है। वैसे तो यह कथित बुद्धिजीवी जिन अशिक्षितों पर तरस खाते हैं वह इनसे अधिक समझदार है जो देह को नश्वर जानकर उस पर कुछ दिन शोक मनाकर चुप हो जाते हैं। ऐसे में उनसे यही कहना पड़ता है कि ‘भई, नश्वर निर्जीव वस्तु के लिये इतना शोक क्यों? वह भी 17 साल तक!
हां, चाहें तो कुछ लोग उनकी हमदर्दी जताने की अक्षुण्ण क्षमता की प्रशंसा भी कर सकते हैं।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, November 13, 2009

मार खाने का खेल-हिंदी व्यंग्य (mar khane ka khel-hindi vyangya)

एक चीनी ने अपना ऐसा धंधा प्रारंभ किया है जो यकीनन अनोखा है। ऐसा अनोखा धंधा तो कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। वह यह कि उसने दूसरे घरों में परेशान औरतों को गुस्सा अपने पर उतारने के लिये स्वयं को प्रस्तुत करता है। वह पिटने की फीस लेता है। अगर समाचार को सही माने तो उसका व्यवसाय चल भी रहा है।
वाकई समय के साथ दुनियां बदल रही है और बदल रहे हैं रिश्ते। दूसरा सच यह है कि इस दुनियां में दो ही तत्व खेलते हैं सत्य और माया। इंसान की यह गलतफहमी है कि वह खेल रहा है। पंाच तत्वों से बने हर जीवन में मन बुद्धि और अहंकार की प्रकृत्तियां भी होती है। वही आदमी से कभी खेलती तो कभी खिलवाड़ करती हैं।
यहां एक बात याद रखने वाली है कि संस्कार और संस्कृति के मामले में चीन हमसे पीछे नहीं है-कम से कम उसे अपने से हल्का तो नहीं माना जा सकता। पूर्व में स्थित यह देश अनेक मामलों में संस्कृति और संस्कारों में हमारे जैसा है। हां, पिछले पचास वर्षों से वहां की राजनीतिक व्यवस्था ने उसे वैसे ही भौतिकवादी के जाल में लपेटा है जैसे कि हमारे यहां की अर्थव्यवस्था ने। अगर हमारा देश अध्यात्मिक रूप से संपन्न नहीं होता तो शायद चीनी समाज हमसे अधिक बौद्धिक समाज कहलाता। वहां बुद्ध धर्म की प्रधानता है जिसके प्रवर्तक महात्मा गौतम बुद्ध भारत में ही उत्पन्न हुए थे।
माया का अभिव्यक्त रूप भौतिकतावाद ही है। इसमें केवल आदमी की देह उसकी आवश्यकतायें दिखती हैं और कारों, रेलों, तथा सड़क पर कम वस्त्र पहने युवतियां ही विकास का पर्याय मानी जाती है। विकास का और अधिक आकर्षक रूप माने तो वह यह है कि नारियां अपना घर छोड़कर किसी कार्यालय में नौकरी करते हुए किसी बौस का आदेश मानते हुए दिखें। उससे भी अधिक आकर्षक यह कि नारी स्वयं कार्यालय की बौस बनकर अपने पुरुष मातहतों को आदेश देते हुए नजर आयें। घर का काम न करते हुए बाहर से कमाकर फिर अपने ही घर का बोझ उठाती महिलायें ही उस मायावी विकास का रूप हैं जिसको लेकर आजकल के अनेक बुद्धिजीवी जूझ रहे हैं। बोस हो या मातहत हैं तो सभी गुलाम ही। यह अलग बात है कि किसी गुलाम पर दूसरा गुलाम नहीं होता तो वह सुपर बोस होता है। यह कंपनी प्रणाली ऐसी है जिसमें बड़े मैनेजिंग डाइरेक्टर एक सेठ की तरह व्यवहार करते हैं पर इसके लिये उनको राजकीय समर्थन मिला होता है वरना तो कंपनी के असली स्वामी तो उसके शेयर धारक और ऋणदाता होते हैं। कंपनी पश्चिम का ऐक ऐसा तंत्र हैं जिसमें गुलाम को प्रबंधक निदेशक के रूप में स्वामी बना दिया जाता है। पैसा उसका होता नहीं पर वह दिखता ऐसा है जैसे कि स्वामी हो। इसे हम यूं कह सकते हैं कि गुलामों को स्वामी बनाने का तंत्र हैं कंपनी! जिसमें गुलाम अपनी चालाकी से स्वामी बना रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई स्त्री कंपनी की प्रबंध निदेशक है तो वह अपने धन पर नहीं शेयर धारकों और ऋणदाताओं के कारण है। फिर उसके साथ तमाम तरह के विशेषज्ञ रहते हैं जो अपनी शक्ति से उसे बनाते हैं। कंपनी के प्रबंध निदेशक तो कई जगह मुखौटे होते हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि किसी स्त्री का शिखर पर पहुंचना अपनी बुद्धि और परिश्रम के कारण है या अपने मातहतों के कारण।
बहरहाल स्त्री का जीवन कठिन होता है। यह सभी जानते हैं कि कोई भी स्त्री अपनी ममता के कारण ही अपनी पति और पुत्र की सेवा करने में जरा भी नहीं झिझकती। पिता अपनी संतान के प्रति मोह को दिखाता नहीं है पर स्त्री की ममता को कोई धीरज का बांध रोक नहीं सकता।
ऐसे में जो कामकाजी औरते हैं उनके लिये दोहरा तनाव होता है। यह तनाव अनेक तरह की बीमारियों का जनक भी होता है।
ऐसे में उन चीनी सज्जन ने जो काम शुरु किया है पता नहीं चल कैसे रहा है? कोई औरत कितनी भी दुःखी क्यों न हो दूसरे को घूंसा मारकर खुश नहीं हो सकती। भारी से भारी तकलीफ में भी वह दूसरे के लिये अपना प्यार ही व्यक्त करती है। अब यह कहना कठिन है कि कथित आधुनिक विकास ने-मायावी विकास का चरम रूप इस समय चीन में दिख रहा है-शायद ऐसी महिलाओं का एक वर्ग बना दिया होगा।
आखिरी बात यह है कि उस व्यक्ति ने अपने घर पर यह नहीं बताया कि उसने दूसरी महिलाओं से पिटने काम शुरु किया है। वजह! अरे, घर पर पत्नी ने मारा तो पैसे थोड़े ही देगी! जब गुस्से में होगी तो एक थप्पड़ मारेगी, पर जिस दिन धंधा मंदा हुआ तो पता लगा कि इस दुःख में अधिक थप्पड़ मार रही है कि पति के कम कमाने के कारण वह बड़ गया। फिलहाल भारत में ऐसे व्यवसाय की सफलता की संभावना नहीं है क्योंकि भारतीय स्त्रियां भले ही मायावी विकास की चपेट में हैं पर सत्य यानि अध्यात्मिक ज्ञान अभी उनका लुप्त नहीं हुआ है। वैसे जब पश्चिम का मायावी विकास कभी इसे खत्म कर देगा इसमें संदेह नहीं है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, October 31, 2009

अंधेरे उजाले का द्वंद्व-हिंदी लघु व्यंगकथा (andhera aur ujala-hindi labhu katha)

वैसे तो उन सज्जन की कोई इतनी अधिक उम्र नहीं थी कि दृष्टिदोष अधिक हो अलबत्ता चश्मा जरूर लगा हुआ था। एक रात को वह स्कूटर से एक ऐसी सड़क से निकले जहां से भारी वाहनों का आवागमन अधिक होता था। वह एक जगह से निकले तो उनको लगा कि कोई लड़की सड़क के उस पार जाना चाहती है। इसलिये उन्होंने अपने स्कूटर की गति धीमी कर ली थी। जब पास से निकले तो देखा कि एक श्वान टांग उठाकर अपनी गर्दन साफ कर रहा था। उन्हें अफसोस हुआ कि यह क्या सोचा? दरअसल सामने से एक के बाद एक आ रही गाड़ियों की हैडलाईट्स इतनी तेज रौशन फैंक रही थी कि उनके लिये दायें बायें अंधेरे में हो रही गतिविधि को सही तरह से देखना कठिन हो रहा था।
थोड़ी दूर चले होंगे तो उनको लगा कि कोई श्वान वैसी ही गतिविधि में संलग्न है पर पास से निकले तो देखा कि एक लड़की सड़क पार करने के लिये तत्पर है। अंधेरे उजाले के इस द्वंद्व ने उनको विचलित कर दिया।
अगले दिन वह नज़र का चश्मा लेकर बनाने वाले के पास पहुंचे और उसे अपनी समस्या बताई। चश्में वाले ने कहा‘ मैं आपके चश्में का नंबर चेक कर दूसरा बना देता हूं पर यह गारंटी नहीं दे सकता कि दोबारा ऐसा नहीं होगा क्योंकि कुछ छोटी और बड़ी गाड़ियों की हैड्लाईटस इतनी तेज होती है जिन अंधेरे वाली सड़कों से गुजरते हुए दायें बायें ही क्या सामने आ रहा गड्ढा भी नहीं दिखता।’
वह सज्जन संतुष्ट नहीं हुए। दूसरे चश्मे वाले के पास गये तो उसने भी यही जवाब दिया। तब उन्होंने अपने मित्र से इसका उपाय पूछा। मित्र ने भी इंकार किया। वह डाक्टर के पास गये तो उसने भी कहा कि इस तरह का दृष्टिदोष केवल तात्कालिक होता है उसका कोई उपाय नहीं है।
अंततः वह अपने गुरु की शरण में गये तो उन्होंने कहा कि ‘इसका तो वाकई कोई उपाय नहीं है। वैसे अच्छा यही है कि उस मार्ग पर जाओ ही नहीं जहां रौशनी चकाचौध वाली हो। जाना जरूरी हो तो दिन में ही जाओ रात में नहीं। दूसरा यह कि कोई दृश्य देखकर कोई राय तत्काल कायम न करो जब तक उसका प्रमाणीकरण पास जाकर न हो जाये।
उन सज्जन ने कहा‘-ठीक है उस चकाचौंध रौशनी वाले मार्ग पर रात को नहीं जाऊंगा क्योंकि कोई राय तत्काल कायम न करने की शक्ति तो मुझमें नहीं है। वह तो मन है कि भटकने से बाज नहीं आता।’
गुरुजी उसका उत्तर सुनकर हंसते हुए बोले-‘वैसे यह भी संभव नहीं लगता कि तुम चका च ौंधी रौशनी वाले मार्ग पर रात को नहीं जाओ। वह नहीं तो दूसरा मार्ग रात के जाने के लिये पकड़ोगे। वहां भी ऐसा ही होगा। सामने रौशनी दायें बायें अंधेरा। न भी हो तो ऐसी रौशनी अच्छे खासे को अंधा बना देती है। दिन में भला खाक कहीं रौशनी होती है जो वहां जाओगे। रौशनी देखने की चाहत किसमें नहीं है। अरे, अगर इस रौशनी और अंधेरे के द्वंद्व लोग समझ लेते तो रौशने के सौदागर भूखे मर गये होते? सभी लोग उसी रौशनी की तरफ भाग रहे हैं। जमाना अंधा हो गया है। किसी को अपने दायें बायें नहीं दिखता। अरे, अगर तुमने तय कर लिया कि चकाचौंध वाले मार्ग पर नहीं जाऊंगा तो फिर जीवन की किसी सड़क पर दृष्टिभ्रम नहीं होगा।सवाल तो इस बात का है कि अपने निश्चय पर अमल कर पाओगे कि नहीं।’’
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, October 23, 2009

कंप्यूटर पर भाषा सौंदर्य का ध्यान रखना कठिन-आलेख (computer and hindi bhasha-a hindi article)

कंप्यूटर पर लिखना इतना आसान काम नहीं है जितना समझा जाता है। दरअसल कंप्यूटर पर विचारों के क्रम के अनुसार अपनी सभी उंगलियां सक्रिय रखनी पड़ती हैं और उससे रचना सामग्री में भाषा सौंदर्य बनाये रखना सहज नहीं रह जाता। अगर वाक्य लंबा हो तो अनेक बार ‘होता है’, ‘रहता है’, ‘आता है’ तथा ‘जाता है’ जैसी क्रियाओं का दोहराव दिखने लगता है। इसका कारण यह है कि कंप्यूटर पर दिमाग तीन भागों में बांटना संभव नहीं लगता। एक तो आप विषय सामग्री पर चिंतन करते हैं दूसरी तरफ अपनी उंगलियों पर नियंत्रण का भी प्रयास करना होता है। ऐसे में भाषा सौंदर्य की सोचने की प्रक्रिया में लिप्त होना संभव नहीं है। फिर अगर आप अंतर्जाल पर कार्य कर रहे हैं और उससे आपको कोई आय नहीं है तो एक तरह से उन्मुक्तता का भाव उत्पन्न होकर नियंत्रित होने की शर्त से मुक्त कर देता है। यही कारण है कि अंतर्जाल पर आम तौर से भाषा सोंदर्य का अभाव दिखाई देता है। यही कारण अंतर्जाल पर गंभीर लेखन को प्रोत्साहित न करने के लिये जिम्मेदार है।
गंभीर लेखन के लिये एक तो स्थितियां अनुकूल नहीं है। आप किसी विषय पर बहुत गंभीरता से लिखें पर उसका उपयोग करने वाले आपका नाम तक न डालें या आपके विचार से प्रभावित होकर उसे अपने नाम से रखें तब निराशा उत्पन्न होती है। ऐसे में गंभीर लेखन की धारा प्रभावित होगी। साथ ही अगर गंभीर लेखक अगर केवल इसलिये लिखे कि उसका नाम चलता रहे तो वह उथली रचनायें लिखने में भी नहीं हिचकेगा।

कंप्यूटर पर लिखना आसान नहीं है और समस्या यह है कि इसके बिना अब काम भी नहीं चलने वाला। उस दिन एक अध्यात्मिक प्रकाशन की मासिक पत्रिका देखने को मिली। उत्सुकतावश उसे पढ़ा तो अनेक बार ऐसा लगा जैसे कि उसकी विषय सामग्री को गेय करने में बाधा आ रही है। उसका कारण उसमें एक ही वाक्य में क्रियाओं का अनावश्यक रूप से दोहराव था। अगर लेखक चाहता तो संपादन के समय एक ही वाक्य में कम से कम दस से पंद्रह शब्द कम कर सकता था। यह केवल एक जगह नहीं बल्कि उस पत्रिका के समस्त लेखों में दिखाई दिया। ऐसा लगता ँँथा कि प्रकाशकों का उद्देश्य केवल पत्रिका प्रकाशित करना था। वैसे उसके पाठकों का भी यही आलम होगा कि वह पत्रिका केवल पुण्य प्राप्त करने के लिये मंगवाते होंगे न कि पढ़ने के लिये-ऐसी पत्रिकाओं ने भी व्यवसायिक हिंदी पत्र पत्रिकाओं का कबाड़ा किया है इसमें संदेह नहीं है।
ऐसे लेख अनेक जगह पढ़कर लगता है कि लिखने वाले का उद्देश्य सीमित विचारों को अधिक शब्दों के सहारे विस्तार देना है। इसके अलावा लिखने वाले ने उसे सीधे कंप्यूटर पर ही लिखा होगा। कंप्यूटर पर लिखने के बाद उसे दोबारा पढ़ना एक उबाऊ काम है। इसलिये सीधे ही प्रकाशित करना या कहीं भेजने में उतावली करना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। फिर हिंदी लेखकों को अभी भी व्यवसायिक स्तर पर कोई अधिक सफलता नहीं मिल पायी-खासतौर से मौलिक और स्वतंत्र लिखने वालों की तरफ तो कोई झांकता भी नहीं है। ऐसे में हिंदी का लेखन प्रसिद्धि नहीं प्राप्त कर सका तो उसमें आश्चर्य क्या है।
हाथ से लिखते समय अपने विचारों के क्रम के साथ ही भाषा से सुरुचिपूर्ण शब्दों का प्रवाह स्वतः चला आता है क्योंकि उस समय कलम पकड़े हाथों की उंगलियां मशीनीढंग से कार्यरत होती और उनको निर्देश देने में मस्तिष्क को प्रयास नहीं करना पड़ता-एक तरह से दोनों ही एक दूसरे का भाग होते हैं। हिंदी लिखने वाले कई ऐसे लोग इस देश में होंगे जिनको प्रकाशित होने के अवसर नहीं प्राप्त कर सके। हिंदी में अभी तक संगठित क्षेत्र-समाचार पत्र पत्रिकाओं और व्यवसाय प्रकाशकों के अधीन लेखन-का ही वर्चस्व रहा है। ऐसे में प्रतिबद्ध लेखन की धारा ही प्रवाहित होती रही है और स्वतंत्र मौलिक विषय सामग्री मार्ग अवरुद्ध होता है इधर अंतर्जाल पर लग रहा था कि स्वतंत्र और मौलिक लेखकों को प्रोत्साहन मिलेगा पर प्रतीत होता है कि संगठित क्षेत्र के प्रचार माध्यम उस पर पानी फेर सकते हैं। वही क्या अंतर्जाल पर ही सक्रिय कुछ तत्व दूसरे की रचनाओं से नकल कर लिख रहे हैं और उनमें इतनी सौजन्तया नहीं दिखाते कि लेखक का नाम लें। यह नकल केवल शब्दों की नहीं वरना विचारों की भी है। वह दूसरे से विचार लिखकर ऐसे लिखते हैें जैसे कि उनके मौलिक विचार हों। यह सही है कि विचारों में समानता हो सकती है पर शैली में बदलाव रहेगा यह निश्चित है-उससे यह तो पता लगता है कि विचार कहां से लिये गये हैं।
अंतर्जाल पर कुछ लोग गजब का लिख रहे हैं। उनके लिखे को पढ़ने से यह पता लगता है कि उनके विचारों में संगठित क्षेत्र के लेखकों जैसी कृत्रिमता का भाव नहीं है। समस्या यह है कि अंतर्जाल पर स्वतंत्र और मौलिक लेखन का तात्पर्य है जेब से पैसे खर्च करने के साथ ही श्रम साध्य कार्य में उलझना। इस पर संगठित क्षेत्र के लेखकों का रवैया ब्लाग लेखकों के प्रति कितना उपेक्षापूर्ण है यह देखकर दुःख होता है। ओबामा को नोबल और गांधीजी पर इस लेखक के दो पाठों से एक अखबार के स्तंभकार ने कई पैरा कापी कर अपने लेख में छापे। उसका लेख बढ़ा था और ऐसा लगता था कि उसने अन्य जगह से भी उसकी नकल की होगी। संभव है उसने स्वयं भी लिखा हो। क्या होता अगर वह अपने लेख में इस लेखक का नाम भी उद्धृत कर देता। इससे वह क्या छोटा हो जाता? संभवतः संगठित क्षेत्र के लेखकों पर जल्दी सफलता का भूत सवार है और ब्लाग लेखक उनके लिये फालतू व्यक्ति है या वह उसी तरह गुलाम है जैसे कि वह अपने संगठनों के हैं।
संगठित क्षेत्रों में घुसे लोग भी क्या करें? वेतन या शुल्क से ही उनके घर चलते हैं। इसलिये उनको जहां से जैसा मिलता है वैसा ही वह अपने नाम से कर लेते हैं। यकीनन वह कंप्यूटर पर ही काम करते हैं और इंटरनेट की सुविधा होने से उनके लिये लिखने में अधिक समय नहीं लगता क्योंकि केवल कापी ही तो करनी है? यह लेखक शिकायत नहीं कर रहा है बल्कि उस लेख में अपने अंशों को पढ़ने से ही यह पता लगा कि उसमें क्रियाओं का दोहराव था जो कि गुस्सा कम दुःख अधिक दे रहे थे। वह आईना दिखा रहे थे कि ‘देखों क्या कचड़ा लेखन करते हो?‘
संयोगवश एक दो दिन बाद ही अध्यात्मिक पत्रिका पर नजर पडी तब पता लगा कि हमारा लिखा पढ़ने में कितना तकलीफदेह है। कभी कभी तो इच्छा होती है कि अपने हाथ से लिखकर ही टाईप करें फिर लगता है कि ‘यार, कौनसा यहां पैसा मिल रहा है।’ वैसे इस लेखक ने अपने जीवन की शुरुआत ही एक अखबार में आपरेटर के रूप में कंप्यूटर पर अपनी कविता लिखने से की थी। आज से तीस साल पहले। हां, एक बात लगती है कि चूंकि यह लेखक घर पर ही कंप्यूटर पर लिखने का काम करता है तब बीच में अन्य काम भी करने पड़ते हैं। कोई आ जाता है तो मिलना पड़ता है। कहीं स्वयं जाना पड़ता है। ऐसे में बड़े लेख एक बैठक में टाईप नहीं होते। फिर घर में बैठे अनेक प्रकार के अन्य विचार भी आते हैं। यह भी किसी से नहीं कहा जा सकता कि ‘हम कोई काम कर रहे हैं।’ अगर कहें तो पूछेंगे कि इसमें आपको मिलता क्या है? फिर कभी कभी तबियत खराब हो जाये तो कहते हैं कि यह सब कंप्यूटर की वजह से हुआ है।
वैसे दुनियां ही फालतू कामों में लगी है पर लेखक का लिखना उनके लिये तब तक फालतू है जब तक उससे कुछ नहीं मिलता हो। ऐसे में लगता है कि अंतर्जाल पर हिंदी में लिखकर कोई असाधारण लिखकर भी नाम और नामा नहीं कमा सकता अलबत्ता उसका लिखे विचार और विषयों की कापी कर संगठित क्षेत्र के लेखक ही बल्कि अंतर्जाल के लेखक भी अपनी रचना सामग्री सजायेंगे। कम से कम अभी तो यही लगता है। आगे क्या होगा कहना मुश्किल है।

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Monday, September 21, 2009

ब्लॉग का bounce % भी देखना जरूरी-आलेख ( a article on hindi blog)

किसी ब्लॉग की लोकप्रियता का एक आधार यह भी है कि उसका bounce % क्या है. जब यह कहा जाता है कि केवल एक आदमी ही ब्लॉग पढता है तब अपने ब्लॉग पर अनेक पाठक देखकर भ्रम पालना ठीक नहीं लगता है. इसलिए गूगल विश्लेषण को अपने ब्लॉग से अवश्य जोड़ना चाहिए.
यह bounce % प्रतिशत जितना कम होगा उतनी ही लोकप्रियता प्रमाणिक होगी. इस ब्लॉग लेखक के अनेक ब्लॉग हैं उनमें हिंदी पत्रिका का bounce % 56 जो कि अलेक्सा द्वारा बताया गया है. यह वर्ड प्रेस का ब्लॉग है और सच तो यह है कि ब्लागस्पाट से अधिक वर्डप्रेस के ब्लॉग की पाठकों तक अधिक पहुँच का प्रमाण कि उनका bounce % कम होना ही है. गूगल विश्लेषण में इस बात की सुविधा है कि वह आपको bounce % बताकर वास्तविकता से अवगत कराता है.
हमारे अन्दर सफलता का भ्रम में रहना नहीं चाहिए क्योंकि असफलता के कड़वे सच का सामना करने से ही आत्मविश्वास आता है. हिंदी पत्रिका अन्य ब्लॉग से बहुत आगे बढ़ता जा रहा है. अलेक्सा की इस पर नज़र है, इसका प्रमाण यह है कि इस लेखक के केवल इसी ब्लॉग की भारतीय रैकिंग बताते हुए उस पर भारतीय झंडे का चिह्न लगा दिया है. भारतीय रैकेंग में भी यह ब्लॉग १३१०० से ऊपर है. इसके बावजूद अलेक्सा पर विश्वास करना कठिन है क्योंकि उसके निर्माण और सुधार का काम चल रहा है. चूंकि गूगल विश्लेषण वर्डप्रेस पर काम नहीं कर रहा है, इसलिए अलेक्सा के bounce % प्रतिशत पर दृष्टिपात करना बुरा नहीं है.
bounce % में भी एक कमी दिखाई देती है. वह यह कि उसमें अगर किसी पाठक ने केवल एक ही पृष्ठ देखा है तो वहां bounce % १०० आ जाता है, यानी की पाठक ने देखा पर रुका नहीं यही कारण है कि हिंदी के ब्लॉग एक जगह दिखने वाले फोरमों से bounce % कभी कम नहीं होता. संभव है आपको इन फोरमों पर दस पाठकों ने पढा हो पर bounce % १०० हो, पर अन्यत्र कहीं २ ने पढ़ा हो और वहां bounce % ४० हो. bounce का मतलब वही है जो चेक bounce होने का है. अंतर यह है चेक 100 % bounce होता है पर ब्लॉग में यह घटता बढ़ता है.
यहाँ स्पष्ट कर दें कि यह लेखक कोई तकनीक विशेषज्ञ नहीं है पर bounce % का अवलोकन करने से यही निष्कर्ष निकलता है. हिंदी पत्रिका शुरू में हिंदी फोरमों पर पंजीकृत नहीं थी पर उसने हमेशा ही अग्रता ली. इसका कारण यह था कि फोरमों पर न दिखने के कारण उस पर अनेक बार अन्य ब्लॉग से उठाकर पाठ सुधार कर रखे गए. सर्च इंजिनों पर पहुँचने के लिए सर्वाधिक प्रयोग उस पर करने के साथ ही उस पर अच्छे पाठ भी उस समय रखे गए जब वह ब्लोगवाणी पर दिखता था. यह गूगल की पेज रैंक ४ से नीचे तीन पर कैसे आया पता नहीं क्योंकि इसने पाठकों के मामले में उतरोत्तर प्रगति की है. वैसे तो इस लेखक के तीन ब्लॉग को इस समय चार की रैंक मिली है पर हिंदी पत्रिका और ईपत्रिका जिस तरह चार से तीन पर आये उससे गूगल पेज रैंक पर भी संदेह होने लगा है-क्योंकि इस लेखक के यही दो ब्लॉग निरंतर आगे बढ़ते जा रहे हैं. हिंदी पत्रिका का bounce % ५६ होने का आशय यह है कि वहां पाठक सबसे अधिक रुक रहे हैं और एक पाठ के बाद दूसरे पाठों को भी क्लिक कर रहे हैं. 100 % पाठक गूगल से आ रहे हैं. बिना फोरमों के सहायता के वहां २१५ पाठकों (पाठ पढने की संख्या ५०० से ऊपर) का आना इस बात का प्रमाण है कि हिंदी में अब खोज होने लगी है. इस खोज में विविधता है इसलिए यह कहना कठिन है कि किस तरह के लोग ढूंढ रहे हैं. अलबता लोग चर्चित विषयों को पसंद करते हैं क्योंकि उनके हिट्स बहुत होते हैं.इस लेखक का ब्लागस्पाट का अग्रता प्राप्त ब्लॉग शब्दयोग सारथि पत्रिका है जिसका bounce % 60.40 बाकी सभी ८० का ८५ के बीचे में हैं.
कुल मिलाकर जिन लोगों को अपने ब्लॉग का स्तर सही रूप से देखना हो उनको यह भी देखना चाहिए कि उनका bounce % कितना है. अगर वह १०० है तो वह ठीक नहीं है पर यह दावा करना इसलिए भी कठिन है क्योंकि वह के पाठक द्वारा एक ही पृष्ठ देखने पर bounce % 100 बताता है. हालांकि हमारा मानना है कि अगर वह १०० है तो इसका अर्थ यह है कि हमें उस ब्लॉग पर मेहनत करने की आवश्यकता है. आखरी बात यह कि यह अंतर्जाल है इसलिए दावे से कोई बात नहीं कही जा सकती, पर अपना विचार लिखना भी बुरा नहीं है. खासतौर से जब लिखने से कमाई नहीं हो तब इस तरह के खेल को बुरा भी नहीं कहा जा सकता, जो कि गूगल विश्लेषण से पता लगता है.
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Friday, August 7, 2009

पूरी गिनती 0 से ९ होती है, यार-हास्य व्यंग्य (ginti 0 to 9-hasya vyangya

आज की तारीख में एक समय था जो एक से लेकर नौं तक की पंक्ति बना रहा था-1 2 3 4 5 6 7 8 9। इस बात का जोर शोर से प्रचार हुआ।
अब इसे इस तरह कह सकते हैं कि 12 बजकर 34 मिनट 56 सैकंड तारीख सात माह 8 वर्ष 9। इस कथित एतिहासिक समय को खूब देखने और सुनने का अवसर मिला। एक लड़की बता रही थी कि उसके पास एक कोई एस.एम.एस आया है। इधर एक लड़का ओरकुट पर भी इसी प्रकार की विषय सामग्री पढ़े होेन की बात कह रहा था। हमने भी इधर उधर पढ़ा और देखा। कमाल है क्या गजब है कि बाजार को हर रोज कोई न कोई अवसर मिल ही नहीं जाता है।
खैर, इस समय में क्या खास था यह समझ में नहीं आता। याद रखिये गिनती के दस अंक होते हैं या यूं कहें कि गिनती 0 से 9 तक होती है।
कमबख्त यह जीरो भी अजीब है। अगर आंकड़े के पीछे लगे तो संख्या की ताकत बढ़ा देता है और पहले लगे तो कोई फायदा नहीं देता। अगर बाजार का बस हो तो वह एक को जीरो लगाकर एक करोड़ बना दे पर अगर उसे लगे कि इस जीरो से खतरा है या कोई उम्मीद नहीं है तो उसे भुला दे। इतना ही गणित की गिनती से ही जीरो निकालकर लोगों को भरमा दे। तारीखों और समय की उलटपुलट का सवाल है। पहले समय आना चाहिये या तारीख! बाजार ने अपनी सुविधा से समय को पहले चुना। जरूरत पड़ेगी तो तारीख को पहले चुनेगा।
फिर एक मजे की चीज है कि यह सब अंग्रेजी कैलेंडर के मुताबिक है। यही बाजार जब हिन्दी संवत् में देखेगा तो शायद उसे भुनाने का भी प्रयास करे। इतनी सी छोटी बातों को बड़े स्तर पर प्रचार करने का आशय यह है कि बाजार अब बहुत ताकतवर हो चुका है। दूरसंचार से जुड़े व्यवसायियों के लिये छोटे मोटे अवसर भी कमाने का अवसर बनते जा रहे हैं। इधर देश टीवी चैनलों पर नित प्रतिदिन दूध, घी, ,खोवे तथा अन्य वस्तुओं में मिलावट की जानकारी। असली जैसे लगने वाले नकली नोटों का प्रचलने बढ़ने से प्रशासन की चिंताओं की चर्चा देखकर दिल की धड़कने बढ़ने लगती हैं।
याद रखिये यह अपराध भी उसी विकास यात्रा पर आ रहे हैं जहां अपनी अर्थव्यवस्था के चलने का दावा देश के आर्थिक विशेषज्ञ करते हैं। उपभोक्ता प्रवृत्तियों का बढ़ाना बाजार के लिये अच्छा संकेत हो सकता है पर ऐसे अपराधों मेें-जिनसे पूरा समाज अप्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूप से प्रभावित होता है-वृद्धि भी भयानक संकेत दे रही है। कभी कभी तो लगता है कि ऐसी छोटी बातों का प्रचार कर हम किसे भरमा रहे हैं? इस तरह अपने को खुश करना चाहते हैं या विदेशों को यह बताना चाहते हैं कि अब आधुनिक सभ्य समाज का एक अंग बन गये हैं।

कभी कभी मन निराश हो जाता है। प्रचार माध्यमों पर प्रस्तुत समाचारों, धारावाहिकों और अन्य कार्यक्रमों को देखते हैं तो एक आकर्षक समाज दिखता है पर जहां हमारे पांव खड़े हैं वहां उसकी चमक एक सपना दिखाई देती है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम समाज की मूल धारा से अलग ही लेखक हैं क्योंकि जो दूसरे लेखक लिख रहे हैं उससे हमारी सोच अलग दिखती है। हालांकि लीक से हटकर यह एक अच्छी बात हो सकती है पर विषय सामग्री के तत्व निरंतर अन्य लेखकों से विपरीत दिखने लगें तो स्वयं की सोच पर भी संदेह हो जाता है। हां क्यों न होगा! सभी गिनती एक से नौ तक ही कर रहे हैं और हमारा स्मृति कोष यह मानने को तैयार ही नहीं है कि वह 0 से नौ तक की नहीं होती और यह भी कि लोगों को चमत्कृत करने के लिये जीरो का होना जरूरी था। वैसे इस प्रचार को अधिक भाव शायद इसलिये मिला भी नहीं।
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Sunday, July 19, 2009

संगीत बन गया है सोच का अपहरण करने वाला अस्त्र-आलेख(music in hindi film and tv)

किसी समय फिल्मों में पाश्र्व संगीत की सहायता से दृश्यों को भावपूर्ण बनाया जाता था। सामान्य स्थिति में दो व्यक्तियों के मध्य केवल संवाद होने पर तीसरा व्यक्ति उन पर सहजता से ध्यान देता है। अगर उनके वार्तालाप में कुछ बात अपने समझने लायक हो तो उस पर अपनी राय भी देता है। अगर वार्तालाप का विषय उसे प्रिय न हो तो वह अनसुना भी कर सकता है। चूंकि फिल्मों में दर्शक को बांधे रखना जरूरी है इसलिये उसमें संगीत इस तरह डाला जाता है कि बेकार का संवाद भी प्रभावपूर्ण हो जाता है क्योंकि जो भाव अभिनेत्री अभिनेत्री के शब्द और सुर नहीं उभार सकते वह काम संगीत कर देता है। निर्देशक इस संगीत को मसाले की तरह सजाता है ताकि दर्शक एक मिनट भी अपने दिमाग में जाकर विचार न करे।
अगर किसी संवाद में विरह रस इंगित करना है तो उसी तरह का संगीत जोड़ दिया जाता है जिससे दर्शक या श्रोता उसमें बह जाये। अगर कहीं वीभत्स रस भरना है तो उसी तरह का भयानक शोर वाला संगीत प्रस्तुत किया जाता है। कहीं करुणा का भाव है तो संगीत को इस तरह जोड़ा जाता है कि संवाद और पात्र के सुर प्रभावी न हों तो भी आदमी अपनी जज्बातों की धारा में बह जाये। जैसे जैसे मनोरंजन के साधनों का विस्तार हुआ तो रेडियो और टीवी चैनलों में भी इसका प्रयोग होने लगा है। एक तरह से पाश्र्व संगीत आम आदमी के निजी भावों का अपहरण करने वाला साधन बन गया है।
टीवी चैनलों में सामाजिक धारावाहिकों में वीभत्स सुर का खूब प्रयोग हो रहा है। कहीं सास, कहीं बहु तो कहीं ननद जब अपने मन में किसी षड्यंत्र का विचार करती दिखाई देती है तो उसके पाश्र्व में दनादन संगीत का शोर मचा रहता है जिसमें संवाद न भी सुनाई दे तो इतना तो लग जाता है कि वह कोई भला काम नहीं करने जा रही। करोड़पति बनाने वाला कार्यक्रम सभी को याद होगा। अगर उसमें संगीत के उतार चढ़ाव नहीं होता तो शायद इतने दर्शक उससे प्रभावित नहीं होते।
यह केवल टीवी चैनल ही उपयोग नहीं कर रहे बल्कि अनेक संत अपने प्रवचनों में भी अपनी बात के लिये इसका उपयोग कर रहे हैं। उस दिन एक संत देशभक्ति की बात करते हुए भावुक हो रहे थे। वह शहीदों की कुर्बानी को याद करते हुए आंखों में आंसु बहाते नजर आये। उस समय पाश्र्व में करुण रस से सराबोर संगीत बज रहा था। स्पष्टतः यह व्यवसायिकता का ही परिणाम था।
सच कहें तो यह पाश्र्व संगीत एक तरह से पैबंद की तरह हो गया है। धारावाहिकों और फिल्मों में अभिनेता अभिनेत्रियों के अभिनय से अधिक उनकी उससे अलग गतिविधियों की चर्चा अधिक होती है। हमारे अभिनेता और अभिनेत्रियां खूब कमा रहे हैं पर फिर भी उनको विदेशी कलाकारों से कमतर माना जाता है। सिफारिश के आधार पर ही लोग फिल्मों और धारावाहिकों में पहुंच रहे हैं। कहने को कलाकार हैं पर कला से उनका कम वास्ता कमाने से अधिक है। कुछेक को छोड़ दें तो अनेक हिंदी में काम करने वाले कलाकारों को तो हिंदी भी नहीं आती। अक्सर लोग यह सोचते हैं कि यह कलाकार अंग्रेजी में बोलकर हिंदी का अपमान करते हैं पर यह एक भ्रम लगता है क्योंकि उनकी पारिवारिक और शैक्षिक प्रष्ठभूमि इस बात को दर्शाती है कि उनको हिंदी का ज्ञान नहीं है। इतना ही नहीं अनेक गायक और गायिकायें ऐसे भी हैं जो केवल इसी पाश्र्व संगीत के कारण चमक जाते हैं।
देश में अनेक विवादास्पद धारावाहिकों को लेकर चर्चा होती है अगर आप गौर करें तो पायेंगे कि वह पाश्र्व संगीत के सहारे ही लोगों के जज्बातों को उभारते हैं। अगर उनमें संगीत न हो तो शायद आदमी इतना प्रभावित भी न हो और उनकी चर्चा भी न करे। यह तो गनीमत है कि समाचारों के साथ ऐसे ही किसी पाश्र्व संगीत की कोई प्रथा विदेश में नहीं है वरना हमारे समाचार चैनल उसका अनुकरण जरूर करते। अलबत्ता वह सनसनी खेज रिपोर्टों में वह इसका उपयोग खूब करते हैं तभी थोड़ी सनसनी फैलती नजर आती है। इसके अलावा वह ऐसे ही संगीतमय धारावाहिकों का प्रचार अपने कार्यक्रमों में कर संगीत की कमी को पूरा कर लेते हैं। सच कहा जाये तो पाशर्व संगीत आदमी की सोच को अपहरण करने वाला अस्त्र बन गया है।
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Thursday, July 2, 2009

हिंदी भाषा के वीभत्स शब्दों पर भरोसा-व्यंग्य आलेख (hasya vyangya in hindi)

समलैंगिकों को कानूनी अधिकार क्या मिला इस देश में एक ऐसी बहस चली पड़ी है जिसका आदि या अंत फिलहाल नजर नहीं आता। यहां हम समलैंगिकों के अधिकारों या उनकी मनस्थिति पर विचार न कर यही देखें कि इस पर तर्क क्या दिया जा रहा है?
ऐसा लगता है कि आज थोड़ा हिंदी के उस वीभत्स रूप पर जरा गौर करें जो समलैंगिकों को डरा सकता है। यह डर है गालियों का। अधिकतर शिक्षित लोग गालियां न देते हैं न सुनने का उनमें सामथ्र्य होता है। कुछ लोग देते हैं पर सुनने की हिम्मत नहीं करते।
समलैंगिक एक आकर्षक शब्द लगता है पर यह केवल बड़े शहरों में रहने वाले मनोविकारी लोगों को ही सुहा सकता है। छोटे शहरों और गांवों में अगर समलैंगिक अगर पहुंच जाये तो उसे जो शब्द अपने लिये सुनने को मिलेगा उसे वह समझेगा नहीं और सच बात तो यह है कि उस शब्द का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि आशय ही समलैंगिकता के अधिक निकट है। समलैंगिक संबंध वही बनायेगा जिसने उस शब्द को कभी सुना नहीं होगा।
जब हिंदी के वीभत्य रूप का विचार आया तो यह प्रश्न भी उठा कि क्या जितने भयानक शब्द हिंदी-जिसे विश्व की सर्वाधिक मधुर और वैज्ञानिक भाषा भी अब माना जाने लगा है-में होते हैं उतने किसी अन्य भाषा में भी शायद ही होते होंगे। कम से कम अंग्रेजी में तो नहीं होते होंगे क्योंकि अपने यहां अंग्रेजी में बोलने वाले हेकड़ हमेशा ही गालियों के लिये हिंदी का जिस सहारा लेते हैं उससे तो यही लगता है।
बात से बात यूं निकली कि एक विद्वान ने कहा कि समलैंगिक संबंध बीमारी नहीं है-यह बात विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है। अगर यह सच है तो पश्चिम और पूर्व की संस्कृति में जमीन आसमान का अंतर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उससे अधिक तो अंतर तो मानवीय सोच में है। अगर इस तरह की सोच ही सभ्यता का प्रतीक है तो हम भारतीय असभ्य भले मगर विश्व के अध्यात्मिक गुरु कहे जाने वाले अपने भारत देश में विश्व संगठन की यह राय कतई स्वीकारी नहीं जा सकती।
अगर हमारे देश के विद्वानों का यह मानना है कि जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन बीमारी नहीं मानता तो उसे हम भी नहीं मानेंगे तो कुछ कहना व्यर्थ है। इस देश के विद्वानों और प्रचार माध्यमों का कहना ही क्या? स्वाईन फ्लू के देश में कुल सौ मरीज भी नहीं है पर आप उसके बारे में पढ़ेंगे और सुनेंगे तो लगेगा कि जैसे पूरा देश ही स्वाईन फ्लू की चपेट में हैं जबकि उससे हजार गुना लोग तो टीवी, पीलिया आंत्रशोध और मलेरिया से पीड़ित हैं उससे बचाव के तरीकों का प्रचार अधिक नहीं होता क्योंकि उसकी दवायें तो ऐसे ही बिक जाती हैं पर स्वाइन फ्लू को एक विज्ञापन की जरूरत है जो जागरुकता पैदा करने के नाम पर ही चलता है। हम तो आज तक यही नहीं समझ पाये कि हेपेटाइटिस और पीलिया में अंतर क्या है? आखिर हैपेटाइटिस के टीके लगते हैं पर वह पीलिया से किस तरह अलग हमें पता नहीं।
बात हम करें समलैंगिक संबंधों की तो उसके लिये जो हिंदी में शब्द है वह इतना वीभत्स है कि हमारा बूता तो यहां लिखने का नहीं हैं। अक्सर एक पुरुष जब दूसरे से नाराज होता है तो वही शब्द कहता है और फिर झगड़ा अधिक बढ़ जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन को उस गाली के बारे में नहीं मालुम होगा! अंग्रेजी में गिटिर पिटिर करने वालों को नहीं पता कि मंकी (बंदर) शब्द उनके लिये जिस तरह नस्लवाद का प्रतीक है वैसे ही पुरुष समलैंगिक संबंधों के लिये ऐसा शब्द हिंदी में है जिस पर कोई भला लेखक तो लिख ही नहीं सकता।
अंतर्जाल पर एक लेखक ने उस भयानक लगने वाले शब्द को अपने ब्लाग पर लिखा था। हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरम पर जब हमने उसे पढ़ा तो पूरा दिन उस फोरम का रुख नहीं किया। इतना ही नहीं उस फोरम ने बाद में उस लेखक का ब्लाग का लिंक ही अपने यहां से हटा लिया। उससे मन इतना खराब हुआ कि दो आलेख और तीन व्यंग्य कवितायें जब तक नहीं लिख डाली तब चैन नहीं आया। नहीं लिखा तो वह शब्द।
हिंदी वार्तालाप करने वाले सामान्य लोगों में बहुत से लोग गालियों का उपयोग करते हैं। हां, अब शिक्षित होते जाने के साथ ही गालियों का आद्यक्षर कर लिया है जैसे कि अंग्रेजी का संक्षिप्त नाम लिखते हैं। सभ्य लोग इन्ही आद्यक्षरों के सहारे काम चलाकर अपने गुस्से का इजहार कर लेते हैं। इसकी एक दिलचस्प घटना याद आ रही है। आस्ट्रेलिया के साथ एक मैच में एक भारतीय खिलाड़ी ने आस्ट्रेलियो के खिलाड़ी को मंकी (बंदर) कह डाला। इस पर भारी हायतौबा मची। भारतीय खिलाड़ी पर प्रतिबंध भी लगा। आरोप लगाया कि यह तो सरासर नस्लवाद है। भारत में इस पर जमकर विरोध हुआ। कहा गया कि ‘भारतीय कभी नस्लवादी नहीं होते।’

सच कहा होगा। आप तो जानते हैं कि चाय के ठेलों, विद्वानों की बैठकों और बाजारों में ऐसे घटनाओं पर खूब चर्चा होती है। एक सज्जन ने कहा-‘हम भारतीय बहुत सज्जन हैं। विदेश में जाकर ऐसी हरकतें करें यह संभव नहीं है। फिर गुस्से में बंदर कहें यह तो संभव ही नहीं है। बंदर तो यहां प्यार से कहा जाता है। हां, यह संभव है कि भारतीय सभ्य खिलाड़ी ने क्रोध में आकर उस गाली का आद्यक्षर प्रयोग किया हो जिसका स्वर मंकी (बंदर) के रूप में सुनाई दिया हो।’
पता नहीं उस आदमी का यह कहना सही था या गलत पर जो लोग उसे सुन रहे थे उनका मानना था कि ऐसा भी हो सकता है।
जब हमने एक विद्वान सज्जन द्वारा समलैंगिकता को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा उसे बीमारी न मानने की बात सुनी तब लगा कि अब हमारे देश के लोग उस हर चीज और विचार पर फिर से दृष्टिपात करें जो उन्होंने अपनाया है। एक भयानक मनोविकार अगर बीमारी नहीं है तो फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन किस आधार पर यह कहता है कि ‘इस दुनियां में चालीस फीसदी से अधिक लोग मनोविकारों का शिकार है पर उनको पता नहीं है।’
अगर वह इसे मानसिक रोग नहीं मानता तो उसे जाकर बतायें कि हिंदी में इसके लिये विकट शब्द है जो बहुत भड़काने वाला है। यह शब्द उस मंकी शब्द से अधिक विस्फोटक है जिसे वह लोग नस्लवाद का प्रतीक मानते हैं।
वैसे जब चालीस फीसदी मनोरोगियों के होने की बात विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कही थी तब हमने सोचा कि वह संख्या कम ही बता रहा है क्योंकि इंसान जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उससे तो यह संख्या पचास से अधिक ही लगती है और यह वह लोग हैं जिनके पास धन, प्रतिष्ठा और पद की ताकत है, वह मदांध हो रहा है। किसी को कुचलकर वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहता है। बाकी पचास फीसदी तो गरीब हैं जिनके पास ऐसा कुछ नहीं है जो ऐसे मनोविकार पाल सकें।
अगर हमारी बात पर यकीन न हो तो इस विषय पर टीवी पर चर्चायें सुन लो। अखबार पढ़ लेना। कुछ लोग समलैंगिक अधिकार मिलने पर नाच रहे हैं तो कुछ विरोध में धर्म और संस्कृति की दुहाई दे रहे हैं। जो नाच रहे हैं उनके मनोरोगी होने पर हम क्या कहें? मगर जो विरोध कर रहे हैं वह मनोरोगी हैं या भावनाओं के व्यापारी यह भी देखने वाली बात है।
कह रहे हैं कि
1.इससे समाज भ्रष्ट हो जायेगा।
2.क्या इस देश में माता पिता चाहेंगे कि उनके बच्चे समलैंगिक बन जायें।
3.यह तो पूरी प्रकृति के लिये खतरा है
उनके सारे तर्क हास्यास्पद हैं। हमें तो अपनी मातृभाषा के हिंदी शब्द कोष में अदृश्य रूप से मौजूद वीभत्स शब्दों के साथ ही अपने देश के युवकों और युवतियों में अध्यात्मिकता की तरफ बढ़ते रुझान पर पूरा भरोसा है। बड़े शहरों का पता नहीं छोटे शहरों तथा गांवों में रहने वाले युवक भी उन शब्दों का उपयोग करते हैं और अच्छी तरह जानते हैं कि समलैंगिक शब्द के लिये कौनसा शब्द है? वैसे भी हमारे महापुरुष कहते हैं कि असली भारती गांवों में बसता है। समलैंगिकता भी वैसा ही रोग है जैसा स्वाईन फ्लू-दिखेगा कम पर प्रचार माध्यमों में चर्चित अधिक होगा। चंद समलैंगिक लोगों की वजह से देश की युवा पीढ़ी को अज्ञानी मान लेना हमें स्वीकार्य नहीं है। इस देश के युवक युवतियां पश्चिमी देशों से अधिक चेतनशील हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वहां पहुंचकर अपनी योग्यता का लोहा नहीं मनवाते। यह योग्यता मनोविकारी नहीं अर्जित कर सकते।
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Tuesday, June 30, 2009

(article on savita bhabhi hindi) बात बेबात की-आलेख (hindi article)

सविता भाभी नाम की एक पौर्न साईट को बैन कर दिया गया है। बैन करने वालों का इसके पीछे क्या ध्येय है यह तो पता नहीं पर बैन के बाद इसे समाचार पत्र पत्रिकाओं में खूब स्थान मिला उससे तो लगता है कि इसके चाहने वालों की संख्या बढ़ेगी। पता नहीं इस पर बैन का क्या स्वरूप है पर कैसे यह संभव है कि बाहर लोग इससे भारत में न देख पायें।
यह साइट कैसे है यह तो पता नहीं पर अनुमान यह है कि यह किसी विदेशी साईट का देसी संस्करण होगी। गूगल, याहू, अमेजन और बिंग आदि सर्च इंजिनों तो सर्वव्यापी हैं और इन पर जाकर कोई भी इसे ढूंढ सकता है। यह अलग बात है कि इनके पास कोई ऐसा साफ्टवेयर हो जो भारतीय प्रयोक्ताओं को इससे रोक सके। तब भी सवाल यह है कि अगर विदेशों में अंग्रेजी में जो पोर्न वेबसाईटें हैं उनसे क्या भारतीय प्रयोक्ताओं को रोकना संभव होगा।
इस लेखक को तकनीकी जानकारी नहीं है इसलिये वह इस बात को नहीं समझ सकता है कि आखिर इस पर यह बैन किस तरह लगेगा?
लोगों को कैसे रहना है, क्या देखना है और क्या पहनना है जैसे सवालों पर एक अनवरत बहस चलती रहती है। कुछ बुद्धिजीवी और समाज के ठेकेदार उस हर चीज, किताब और विचार प्रतिबंध की मांग करते हैं जिससे लोगों की कथित रूप से भावनायें आहत होती हैं या उनके पथभ्रष्ट होने की संभावना दिखती है। अभी कुछ धर्माचार्य समलैंगिकता पर छूट का विरोध कर रहे हैं। कभी कभी तो लगा है इस देश में आवाज की आजादी का अर्थ धर्माचार्यों की सुनना रह गया है। इस किताब पर प्रतिबंध लगाओ, उस चीज पर हमारे धर्म का प्रतीक चिन्ह है इसलिये बाजार में बेचने से रोको।
हमारा धर्म, हमारे संस्कार और हमारी पहचान बचाने के लिये यह धर्माचार्य जिस तरह प्रयास करते हैं और जिस तरह उनको प्रचार माध्यम अपने समाचारों में स्थान देते हैं उससे तो लगता है कि धर्म और बाजार मिलकर इस देश की लोगों की मानसिक सोच को काबू में रखना चाहते है।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में वह शक्ति है जो आदमी को स्वयं ही नियंत्रण में रखती है इसलिये जो भी व्यक्ति इसका थोड़ा भी ज्ञान रखता है वह ऐसे प्रयासों पर हंस ही सकता है। दरअसल धर्म, भाषा, जाति, और नस्ल के आधार पर बने समूहों को ठेकेदार केवल इसी आशंका में जीते हैं कि कहीं उनके समूह की संख्या कम न हो जाये इसलिये वह उसे बचाने के लिये ऐसे षडयंत्र रचाते हैं जिनको वह आंदोलन या योजना करार देते हैं। सच बात तो यह है कि अधिक संख्या में समूह होने का कोई मतलब नहीं है अगर उसमें सात्विकता और दृढ़ चरित्र का भाव न हो।
इस लेखक ने कभी ऐसी साईटें देखने का प्रयास नहीं किया पर इधर उधर देखकर यही लगता है कि लोगों की रुचि इंटरनेट पर भी इसी प्रकार के साहित्य में है। इंटरनेट पर ही नहीं बल्कि कहीं भी यौन साहित्य से मस्तिष्क और देह में विकास उत्पन्न होते हैं यह बात समझ लेना चाहिये। ऐसा साहित्य वैसे भी बाजार में उपलब्ध है और इंटरनेट पर एक वेबसाईट पर रोक से कुछ नहीं होगा। फिर दूसरी शुरु हो जायेगी। समाज के कथित शुभचिंतक फिर उस पर उधम मचायेंगे। इस तरह उनके प्रचार का भी काम चलता रहेगा। समस्या तो जस की तस ही रह जायेगी। इस तरह का प्रतिबंध दूसरे लोगों के लिये चेतावनी है और वह ऐसा नहीं करेंगे पर भारत के बाहर की अनेक वेबसाईटें इस तरह के काम में लगी हुई हैं उनको कैसे रोका जायेगा?
इसलिये प्रयास यह होना चाहिये कि समाज में चेतना लायी जाये पर ऐसा कोई प्रयास नहीं हो रहा है। इसके बनिस्बत केवल नारे और वाद सहारे वेबसाईटें रोकी जा रही है पर लोगों की रुचि सत्साहित्य की तरफ बढ़े इसके लिये कोई प्रयास नहीं हो रहा है।

कुतर्कों को तर्क से काटना चाहिये। एक दूसरी बात यह भी है कि जब आप कोई सार्वजनिक रूप से किसी व्यक्ति, किताब, दृश्य या किताब को बहुत अच्छा कहकर प्रस्तुत करते हैं तो उसके विरुद्ध तर्क सुनने की शक्ति भी आप में होना चाहिये। न कि उन पर की गयी प्रतिकूल टिप्पणियों से अपनी भावनायें आहत होने की बात की जानी चाहिये। इस मामले में राज्य का हस्तक्षेप होना ही नहीं चाहिये क्योंकि यह उसका काम नहीं है। अगर ऐसी टिप्पणियों पर उत्तेजित होकर कोई व्यक्ति या समूह हिंसा पर उतरता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही होना चाहिये न कि प्रतिकूल टिप्पणी देने वाले को दंडित करना चाहिये। हमारा स्पष्ट मानना है कि या तो आप अपने धर्म, जाति, भाषा या नस्ल की प्रशंसा कर उसे सार्वजनिक मत बनाओ अगर बनाते हो तो यह किसी भी व्यक्ति का अधिकार है कि वह कोई भी तर्क देकर आपकी तारीफ की बखिया उधेड़ सकता है।
यह लेखक शायद ऐसी बातें नहीं कहता पर अंतर्जाल पर लिखते यह एक अनुभूति हुई है कि लोग पढ़ते और लिखते कम हैं पर ज्ञानी होने की चाहत उन्हें इस कदर अंधा बना देती है कि वह उन किताबों के लिखे वाक्यों की निंदा सुनकर उग्र हो जाते हैं। इस लेखक द्वारा लिखे गये अनेक अध्यात्म पाठों पर गाली गलौच करती हुई टिप्पणियां आती हैं पर उनमें तर्क कतई नहीं होता। हैरानी तो तब होती है कि विश्व की सबसे संपन्न भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा से जुड़े होने का दावा करने वाले लोग भी पौर्न साईटों, बिना विवाह साथ रहने तथा समलैंगिकता का विरोध करते हैं। बिना विवाह के ही लड़के लड़कियों के रहने में उनको धर्म का खतरा नजर आता है। यह सब बेकार का विरोध केवल अपनी दुकानें बचाने का अलावा कुछ नहीं है। ईमानदारी की बात तो यह है कि समाज में चेतना बाहर से नहीं आयेगी बल्कि उनके अंदर मन में पैदा करने लगेगी। कथित पथप्रदर्शक अपने भाषणों के बदल सुविधायें और धन लेते हैं पर जमीन पर उतर कर आदमी से व्यक्तिगत संपर्क उनका न के बराबर है।
कहने को तो कहते हैं कि आजकल की युवा पीढ़ी इनको महत्व नहीं देती पर वास्तविकता यह है कि लड़के लड़कियां विवाह करते ही इसी सामजिक दबाव के कारण हैं। कई लड़कियां धर्म बदल कर विपरीत संस्कार वाले लड़कों से विवाह कर बाद में पछताती हैं। कई लड़के और लड़कियां धर्म बदल कर विपरीत संस्कार वाले लड़कों से विवाह कर बाद में पछताते हैं। धर्म बदलकर विवाह करने पर उनको ससुराल पक्ष के संस्कार मानने ही पड़ते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि उन संस्कारों को उसकी ससुराल में ही बाकी लोग महत्व नहीं देते पर उसे मनवाकर अपनी धार्मिक विजय प्रचारित किया जाता है। विवाह एक संस्कार है इसे आखिर नई पीढ़ी तिलांजलि क्यों नहीं दे पाती? इसकी वजह यही है कि जाति, धर्म, भाषा और नस्ल के आधार पर बने समाज ठेकेदारों के चंगुल में इस कदर फंसे हैं कि उनसे निकलने का उनके पास कोई चारा ही नहीं है। आप अगर देखें। किस तरह लड़का प्यार करते हुए लड़की को उसके जन्म नाम को प्यार से पुकारता है और विवाह के लिये धर्म के साथ नाम बदलवाकर फिर उसी नाम से बुलाता है। इतना ही नहीं बाहर समाज में अपनी पहचान बचाने रखने के लिये लड़की भी अपना पुराना नाम ही लिखती है। समाज से इस प्रकार का समझौता एक तरह से कायरता है जिसे आज का युवा वर्ग अपना लेता है।

बात मुद्दे की यह है कि मनुष्य का मन उसे विचलित करता है तो नियंत्रित भी। उसे विचलित वही कर पाते हैं जो व्यापार करना चाहते हैं। फिर मनुष्य को एक मित्र चाहिये और वह ईश्वर में उसे ढूंढता है। अभी हाल ही में पश्चिम के वैज्ञानिकों ने बताया कि मनुष्य जब ईश्वर की आराधना करता है तो उसके दिमाग की वह नसें सक्रिय हो जाती हैं जो मित्र से बात करते हुए सक्रिय होती हैं। इसका मतलब साफ कि दिमाग की इन्हीं नसों पर व्यापारी कब्जा करते हैं। ईश्वर के मुख से प्रकट शब्द बताकर रची गयी किताबों को पवित्र प्रचारित किया जाता है। इसकी आड़ में कर्मकांड थोपते हुए धर्माचार्य अपने ही धर्म, जाति और समूहों की रक्षा का दिखावा करते हुए अपना काम चलाते हैं। मजे की बात है कि आधुनिक युग के समर्थक बाजार भी अब इनके आसरे चल रहा है। वजह यह है कि धर्म की आड़ में पैसे का लेनदेन बहुत पवित्र माना जाता है जो कि बाजार को चाहिये।
निष्कर्ष यह है कि कथित पवित्र पुस्तकों के यह कथित ज्ञानी पढ़ते लिखते कितना है यह पता नहीं पर उनकी व्याख्यायें लोगों को भटकाव की तरफ ले जाती हैं। आम व्यक्ति को समाज के रीति रिवाजों और कर्मकांडों का बंधक बनाये रखने का प्रयास होता रहा है और अगर कोई इनको नहीं मानता तो उसकी इसे आजादी होना चाहिये। यह आजादी कानून के साथ ही निष्पक्ष और स्वतंत्र बुद्धिजीवियों द्वारा भी प्रदान की जानी चाहिये।
किसी को बिना विवाह के साथ रहना है या समलैंगिक जीवन बिताना है या किसी को नग्न फिल्में देखना है यह उसका निजी विचार है। यह सब ठीक नहीं है और इसके नतीजे बाद में बुरे होते हैं पर इस पर कानून से अधिक समाज सेवी विचारक ही नियंत्रण कर सकते हैं। धर्म भी नितांत निजी विषय है। जन्म से लेकर मरण तक धर्म के नाम पर जिस तरह कर्मकांड थोपे जाते हैं अगर किसी को वह नापसंद है तो उसे विद्रोही मानकर दंडित नहीं करना चाहिये। कथित रूप से पवित्र पुस्तक की आलोचना करने वालों को अपने तर्कों से कोई धर्मगुरु समझा नहीं पाता तो वह राज्य की तरफ मूंह ताकता है और राज्य भी उसके द्वारा नियंत्रित समूह को अपनी हितैषी मानकर इन्हीं धर्माचार्यों को संरक्षण देता है और यही इस देश के मानसिक विकास में बाधक है।
इस लेखक का ढाई वर्ष से अधिक अंतर्जाल पर लिखते हुए हो गया है पर पाठक संख्या नगण्य है। देश में साढ़े सात करोड़ इंटरनेट प्रयोक्ता है फिर भी इतनी संख्या देखकर शर्म आती है क्योंकि अधिकतर लोग इन्हीं पौर्नसाईटों पर अपना वक्त बिताते हैं पर फिर भी अफसोस जैसी बात नहीं है। एक लेखक के रूप में हम यह चाहते हैं कि लोग हमारा लिखा पढ़ें पर स्वतंत्रता और मौलिकता के पक्षधर होने के कारण यह भी चाहते हैं कि वह स्वप्रेरणा से पढ़ें न कि बाध्य होकर। अपने प्राचीन ऋषियों. मुनियों, महापुरुषों तथा संतों ने जिस अक्षुण्ण अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन किया है वह मनुष्य मन के लिये सोने या हीरे की तरह है अगर उसे दिमाग में धारण किया जाये तो। अपनी बात कहते रहना है। आखिर आदमी अपने दैहिक सुख से ऊब जाता है और यही अध्यात्मिक ज्ञान उसका संरक्षक बनता है। हमने कई ऐसे प्रकरण देखे हैं कि आदमी बचपन से जिस संस्कार में पला बढ़ा और बड़े होकर जब भौतिक सुख की वजह से उसे भूल गया तब उसने जब मानसिक कष्ट ने घेरा तब वह हताश होकर अपने पीछे देखने लगता है। उसे पता ही नहीं चलता कि कहां से शुरु हुआ और कहां पहुंचा ऐसे में सब कुछ जानते हुए भी वह लौट नहीं पाता। जैसे कर्म होते हैं वैसे ही परिणाम! अगर देखा जाये तो समाज को डंडे के सहारे चलाने वाले कथित गुरु या धर्माचार्यों से बचने की अधिक जरूरत है क्योंकि वह तो अपने हितों के लिये समाज को भ्रमित करते हैं। मजे की बात यह है कि यह बाजार ही है जो कभी नैतिकता, धर्म और संस्कार की बात करता है और फिर लोगों के जज्बात भड़काने का काम भी करता है।
यह आश्चर्य की बात है कि इस देश के शिक्षित वर्ग का मनोरंजन से मन नहीं भरता। दिन भर टीवी पर अभिनेता और अभिनेत्रियों को देखकर वह बोर होता है तो कंप्यूटर पर आता है पर फिर वहां पर उन्हीं के नाम डालकर सच इंजिन में डालकर खोज करता है। यही हाल यौन साहित्य का है। टीवी और सीडी में चाहे वह कितनी बार देखता है पर कंप्यूटर में भी वही तलाशता है। ऐसे समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है। बाजार फिर उसका पैसा बटोरने के लिये कोई अन्य वेबसाईट शुरु कर देगा। इसलिये सच्चे समाज सेवी यह प्रयास प्रारंभ करें जिससे लोगों के मन में सात्विकता के भाव पुनः स्थापित किये जा सकें।
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Saturday, June 27, 2009

बरसात के लिये प्रार्थना-हिंदी व्यंग्य (hindi vyangya)

अध्यात्म नितांत एक निजी विषय है पर जब उसकी चौराहे पर चर्चा होने लगे तो समझ लो कि कहीं न कहीं उसकी आड़ में कोई अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ा रहा है तो कोई अपना व्यवसाय कर रहा है। जब कहीं सार्वजनिक रूप से प्रार्थनायें सभायें होती हैं तब यह लगता है कि लोग दिखावा अधिक कर रहे हैं। आज के संचार युग में तो यह कहना कठिन है कि धर्म का बाजार लग रहा है या बाजार ही धर्म बना रहा है। ऐसा लगता है कि पहले लोगों के पास मनोरंजन के अधिक साधन नहीं थे इसलिये धार्मिक पात्रों की व्याख्या करना ही धर्म प्रचार मान लिया गया। इस आड़ में तमाम तरह के कर्मकांड और अंधविश्वास सृजित किये गये ताकि उनकी आड़ में धरती पर उत्पन्न अनावश्यक भौतिक साधान बिक सकें जिसके माध्यम से आदमी की जेब से पैसा निकाला जाये।
अब तो प्रचार युग आ गया है और लोग अध्यात्मिक आधार पर इसलिये अपना अस्तित्व बनाये रखना चाहते है ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा वैचारिक संगठनों में अपनी छबि बनाकर पुजते रहें। वह आधुनिक बाजार में आधुनिक अध्यात्मिक व्यापारी बनकर चलना चाहते हैं पर उनकी दुकान सामान उनका बरसो पुराना ही है जिसमें केवल धार्मिक प्रतीक और कर्मकांड ही हैं। जब कहीं हिंसा हो तो वहां लोग शांति के लिये सामूहिक प्रार्थनायें करने के लिये एकत्रित होते हैं। उनको प्रचार माध्यमों में बहुत दिखाया जाता है। जब यह कहना कठिन हो जाता है कि बाजार को ऐसी खबरें चाहिये इसलिये यह सब हो रहा है या सभी विचारधारा के ज्ञानियों को प्रचार चाहिये इसलिये वह इस तरह की सामूहिक प्रार्थनायें करते हैं।
हमारा अध्यात्मिक दर्शन तो साफ कहता है कि पूजा, भक्ति या साधना तो एकांत में ही परिणाम देने वाली होती है।’ इसलिये जब इस तरह के सामूहिक कार्यक्रम होते हैं तो वह दिखावा लगते हैं। आजकल अनेक स्थानों पर बरसात बुलाने के लिये प्रार्थना सभायें हो रही हैं। हर तरह की धार्मिक विचाराधारा के स्वयंभू ज्ञानी लोगों से बरसात के लिये सामूहिक प्रार्थनाऐं आयोजित कर रहे हैं। प्रचार भी उनको खूब मिल रहा है। हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर अपने जैसे लोगों से अपनी बात करने का एक अलग ही मजा है। कुछ लोग है जो इसमें हो रही चालाकियों को देखते हैं।
हम जरा इस बरसात के मौसम पर विचार करें तो लगेगा कि उसका आना तय है। देश के कुछ इलाकों में उसका प्रवेश हो चुका है और अन्य तरफ मानसून बढ़ रहा है।

उस दिन मई की एक शाम बाजार में तेज बरसात से बचने के लिये हम एक मंदिर में बैठ गये। उस समय तेज अंाधी के साथ बरसात हो रही थी। हालांकि गर्मी कम नहीं थी और बरसात से राहत मिली पर एक शंका मन में थी कि यह मानसून के लिये संकट का कारण बन सकता है। प्रकृत्ति का अपना खेल है और उस पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मनुष्य यह चाहता है कि प्रकृति उसके अनुरूप चले पर पर उसके साथ खिलवाड़ भी करता है। मई में उस दिन हुई बरसात के अगले कुछ दिनों में ही अखबारों में हमने पढ़ा कि बरसात देर से आयेगी। विशेषज्ञों ने बरसात कम होने की भविष्यवाणी की है-औसत से सात प्रतिशत कम यानि 93 प्रतिशत होने का अनुमान है।

ऐसा नहीं है कि बरसात हमेशा समय पर आती हो-कभी विलंब से तो कभी जल्दी भी आती है-पिछली बार कीर्तिमान भंजक वर्षा हुई थी। बरसात जब तक नहीं आती तब आदमी व्यग्र रहता है। ऐसे में उसके जज्बातों से खेलना बहुत सहज होता है। उसका ध्यान गर्मी पर है तो उसे भुनाओ। कहने के लिये तो कह रहे हैं कि हम सर्वशक्तिमान को बरसात भेजने के लिये पुकार रहे हैं। पर उसका समय पर चर्चा नहीं करते। जब बरसात आने के संकेत हो चुके हैं तब ऐसी प्रार्थनाओं के समाचार खूब आ रहे हैं। वैसे तो फरवरी के आसपास भी ऐसे समाचार आ गये थे कि इस बार बरसात देर से आयेगी और कम होगी। तब ऐसी प्रार्थना सभायें क्यों नहीं की गयी। उस समय नहीं तो मई में ही कर लेते।
सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के चेले चालाक हैं। उस समय करते तो कौन लोग उनको याद रखते। जब एक दो दिन या सप्ताह में बरसात आने वाली तब ऐसी प्रार्थना सभायें इसलिये कर रहे हैं ताकि जब हों तो लोग माने कि उनके ‘ज्ञानियों’ को कितनी सिद्धि प्राप्त है। बहरहाल हम देख रहे हैं कि बाजार के प्रबंधक और सर्वशक्तिमान के यह आधुनिक दूत एक जैसे चालाक हैं। टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकाऐं तो व्यवसायिक हैं पर सर्वशक्तिमान के सभी रूपों के यह ज्ञानी चेले भी क्या व्यवसायी है? उनकी इस तरह की चालाकियों से तो यही लगता है?
प्रसंगवश याद आया एक पाठक ने अपनी टिप्पणी में पूछा था कि ‘आपके लेखों से यह पता ही नहीं लगता कि आप किस धर्म या भगवान की बात कर रहे हैं?
दरअसल इसका कारण यह है कि हम सभी तरह की विचारधाराओं पर अपने विचार रखते हैं। किसी एक का तयशुदा नाम लेने पर लोग कहते हैं कि तुम उनके नाम पर लिखो तो जाने। जहां तक हमारी जानकारी सर्वशक्तिमान शब्द किसी भी खास विचारधारा से नहीं जुड़ा यही स्थिति उसके ठेकेदार शब्द ं की भी है। इसलिये कोई यह नहीं कह सकता कि हमारी बात करते हो उनकी करके देखो तो जानो।
अगर सभी विरोध करने लगें तो हम भी कह सकते हैं कि तुम सर्वशक्तिमान और ठेकेदार शब्द से अपने को क्यों जोड़ते हो? दरअसल हमने देखा कि यह समाजों के ठेकेदारो का काम ही चालाकी पर चल रहा है और लोगों को जज्बात से भड़काने और बहलाने के काम में यह सब सक्षम होते हैं। हम इसलिये अपनी बात व्यंजना विधा में कहते हैं। हां, बरसात की पहली बूंदों का इंतजार हमें भी है। अब यह गर्मी सहना कठिन हो गया है। कभी कभी आकाश में बिना बरसते बादल देखते हैं तो भी गुस्सा आता है कि यह हमारी धरती की गर्मी नष्ट कर रहे हैं जो कि बरसात को खींचती है।
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Tuesday, June 16, 2009

यह सब बकवास है-हास्य व्यंग्य

अगर यह पहले पता होता कि इंटरनेट पर लिखते हुए पाठकों को त्वरित प्रतिक्रिया का अधिकार देना पड़ेगा और उसका वह उपयोग अपना गुस्सा निकालने के लिये कर सकते हैं तो शायद ब्लाग/पत्रिका पर लिखने का विचार ही नहीं करते-मन में यह डर पैदा होता कि कहीं ऐसा वैसा लिख तो लोग अंटसंट सुनाने लगेंगे। कुछ अनाम टिप्पणीकार हैं जो लिख ही देते हैं बकवास या फिर यह सब बकवास।
रोमन लिपि में उनके लिये यह लिखना कोई कठिन काम नहीं होता। एक दो नाम जेहन में हैं। उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दोहराई है। तब मन में सवाल आता है कि एक बार जब पता चल गया कि यह लेखक बकवास लिखता है तो पढ़ने आते ही क्यों हो? अरे, भई हमने तो अपने ब्लाग पर ही अपना नाम लिख दिया ताकि नापसंद करने वालों को मूंह फेरने में असुविधा न हो। उस पर हर पाठ के साथ लिख देते हैं कविता, कहानी, आलेख और हास्य व्यंग्य ताकि जिनको उनसे एलर्जी हो वह भी मूंह फेर ले। फिर काहे चले आते हो यह बताने के लिये कि यह सब बकवास है।’
हम भी क्या करें? प्रति महीने सात सौ रुपये का इंटरनेट का बिल भर रहे हैं। अपने अंदर बहुत बड़े साहित्यकार होने का बरसों पुराना भ्रम है जब तक वह नहीं निकलेगा लिखना बंद नहीं करेंगे। फिर पैसा भी तो वसूल करना है।
उस पर हमने बकवास लिखा है तो तुम ही कुछ ऐसा लिखो कि हम लिखना छोड़ पढ़ना शुरु कर दें। हम भी क्या करें? डिस्क कनेक्शन और समाचार पत्र पत्रिकाओं पर भी बराबर पैसा खर्च करते हैं पर उनमें भी मजा नहीं आता। हम लिखते कैसा हैं यह तो बता देते हो कि वह बकवास है पर हम भी यह बता दें कि मनोरंजन और साहित्य पाठन की दृष्टि से हमारी पंसद बहुत ऊंची है। टीवी में हमारी पसंद कामेडी धारावाहिक ‘यस बोस’ और ताड़क मेहता का उल्टा चश्मा है तो किताबों की दृष्टि से अन्नपूर्णा देवी का स्वर्णलता प्रेमचंद का गोदान और श्री लालशुक्ल का राग दरबारी उपन्यास हमें बहुत पंसद है। उसके बाद हमारी पसंद माननीय हरिशंकर परसाईं, शरद जोशी और नरेंद्र कोहली हैं। जब पढ़ने का समय मिलता है तब समाचार पत्र और पत्रिकाओं में अच्छी सामग्री ढूंढते हैं। नहीं मिलती तो गुस्सा आता है इसलिये ही लिखने बैठ जाते हैं तब बकवास ही लिखी जा सकती है यह हमें पता है।
हो सकता है कुछ लोग न कहें पर देश में आम आदमी की मानसिकता की हमें समझ है। पहले थोड़ा कम थी पर इंटरनेट पर लिखते हुए अधिक ही हो गयी है। सर्च इंजिनों में हिंदी फिल्म के अभिनेता और अभिनेत्रियों की अधिक तलाश होती है। उसके बाद पूंजीपति और किकेट खिलाड़ी भी अधिक ढूंढे जाते हैं। अगर हम क्रिकेट खिलाड़ी होते तो हमारा ब्लाग लाखों पाठक और हजारों टिप्पणियां जुटा लेता। फिल्मों में होते तो ब्लाग पर दस लाख पाठक और दस बीस हजार कमेंट एक पाठ पर आ जाते। क्रिक्रेट या फिल्मों पर गासिप लिखते पर क्या मजाल कोई लिख जाता कि बकवास। वहां तो लोग ऐसे कमेंट लगाते हैं जैसे कि उनके श्रद्धेय खिलाड़ी या अभिनेता की नजरें अब इनायत होती हैं। किसी पूंजीपति का ब्लाग होता तो प्रशंसा वाली कमेंट भी डालने में घबड़ाते कि कहीं लिखते हुए गलती होने पर फंस न जायें क्योंकि तब तो माफी की गुंजायश भी नहीं होती।


लब्बोलुआब यह है कि अधिकतर हिंदी पाठक केवल इसी बात की ताक में रहते हैं कि खास आदमी ने क्या लिखा है। उसका गासिप भी उनके लिये पवित्र संदेश होता है। जिनके पहनने, ओढ़ने, बाल रखने के तरीके के साथ चलने और नाचने की अदाओं को नकल करते हैं उनके बारे में ही पढ़ने में उनकी रुचि है। दोष भी किसे दें। पौराणिक हों या नवीन कथाओं में हमेशा ही माया के शिखर पर बैठने वालों को ही नायक बनाकर प्रस्तुत किया गया या फिर ऐसे लोगों को ही त्यागी माना गया जिन्होंने घरबार छोड़कर समाज की सेवा के लिये तपस्या की। पहले मायावी शिखर पुरुषों की संख्या कम थी इसलिये उनके किस्से पवित्र बन गये पर अब तो जगह जगह माया के शिखर और उस पर बैठे ढेर सारे लोग। पहले तो शिखर पुरुषों को आदमी अपने पास ही देख लेता था क्योंकि आतंकवाद का खतरा नहीं था। अब तो शिखर पुरुषों के आसपास कड़ी सुरक्षा होती है और द्वार के बाहर खड़ा उनका सेवक भी सम्मान पाता है। आम आदमी की हिम्मत नहीं होती कि उनके घर के सामने से निकल जाये।

इतने सारे आधुनिक शिखर पुरुषों की सफलता की कहानी पढ़ने के लिये समय चाहिये। उनके चेहरे टीवी, फिल्म, और पत्र पत्रिकाओं में रोज दिखते हैं। लोग देखते ही रह जाते हैं ऐसे में उनके बोले या लिखे शब्दों पर लोग मर मिटने को तैयार हैं। किसी समय आम आदमियों में चर्चा होती तो कुछ ज्ञानी लोग रहीम,कबीर तंुलसीदास के दोहे आपसी प्रसंगों में सुनाते थे अब धारावाहिकों और फिल्मों के डायलोग सुनाते हैं-वह आधुनिक विद्वान भी है जो फिल्म और क्रिकेट पर गासिप लिख और सुना सकता है। ‘जय श्री राम’ के मधुर उद्घोष से अधिक ‘अरे, ओ सांभा’ जैसा कर्णकटु शब्द अधिक सुनाई देता है।
हम ठहरे आम आदमी। आम आदमी होना ही अपने आप में बकवास है। न बड़ा घर, न कार, न ही कोई प्रसिद्धि-ऐसे में संतोष के साथ जीना कई लोगों को पड़ता है पर उसमें चैन की सांस लेकर मजे से लिखें या पढ़ें यह हरेक का बूता नहीं है। हर आम आदमी की आंख खुली है कि कहीं से माल मिल जाये पर उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो कभी कभी अपनी आंख वहां से हटाकर सृजनात्मक काम में लगाते हैं तब उनको भी यह पता होता है कि वह कोई खास आदमी नहीं बनने जा रहे। हम ऐसे ही जीवों में हैं।

पहले लिखते हुए कुछ मित्र मिले जो आज तक निभा रहे हैं। अब अंतर्जाल पर भी बहुत सारे मित्र हैं। हम सोचते हैं कि इस तरह उनसे संपर्क बना रहे इसलिये लिखते हैं। हो सकता है कि वह भी यही सोचते हों कि ‘सब बकवास है’ पर कहते नहीं । इससे हमारा भ्रम बना हुआ है और दोस्ती बनी रहे इसलिये वह ऐसी बात लिखते भी नहीं।
सच बात तो कहें कि हम लिखते हैं केवल अपने जैसे आम आदमी के लिये जो खास आदमी के सामने पड़कर अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहता या फिर उन तक पहुंचने का अवसर उसे नहीं मिलता। ऐसे में वह स्वयंभू लेखक होने का भ्रम पाकर लिखता चला जाता है। वैसे भ्रम में तो वह लोग भी है जो खास आदमी को अवतारी पुरुष समझकर उसकी तरफ झांकते रहते हैं कि कब उसकी दृष्टि पड़े तो हम अपने को धन्य समझें। उसकी दृष्टि पड़ जाये तो क्या हो जायेगा? सभी की देह पंचतत्वों से बनी है और एक दिन उसको मिट्टी में मिलना है।
सो जब तक जीना है तब तक अपने स्वाभिमान के साथ जियो। एक लेखक होने पर कम से कम इतना तो आदमी ही करता ही है कि वह अपने आसपास से जो आनंद प्राप्त करता है उसके बदले में वह अपने शब्द दाम के रूप में चुकाता है भले ही वह कुछ को विश्वास तो कुछ को बकवास लगते हैं पर बाकी दूसरे लोग तो बस जुटे हैं आनंद बटोरने में। कहीं उसकी कीमत नहीं चुकानी। कभी क्रिकेट तो कभी फिल्म-धारावाहिक की कल्पित कहानियों में मनोरंजन ढूंढता है अपने अंदर कुब्बत पैदा कर दूसरे का मनोरंजन करे ऐसा साहस कितने कर पाते है। बस अब इतनी ही बकवास ठीक है क्योंकि लिखने वालों को तो बस एक ही शब्द लिखना है तो हम क्यों इससे अधिक शब्द प्रस्तुत करें।
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Monday, June 8, 2009

वफादारी-हिन्दी लघुकथा

वह दोनों एक ही कार्यालय में काम करते थे पर बोस की नजरों में इनमें एक पहला नंबर और दूसरा दो नंबर कहलाता था। पहला नंबर हर काम को जल्दी कर अपने बास के पास पहुंच जाता और अपनी प्रशंसा पाने के लिये दूसरे की निंदा करता। बोस भी उसकी हां मां हा मिलाता और दूसरे नंबर वाले को डांटता।
दूसरे नंबर का कर्मचारी चुपचाप उसकी डांट सुनता और अपने काम में लगा रहता था।
एक दिन पहले नंबर वाले कर्मचारी ने दूसरे नंबर वाले से कहा-‘यार, तुम्हें शर्म नहीं आती। रोज बोस की डांट सुनते हो। जरा ढंग से काम किया करो। तुम्हें तो डांट पड़ती है बोस तुम्हारे पीछे मुझसे ऐसी बातें कहता है जो मैं तुमसे कह नहीं सकता।’
दूसरे कर्मचारी ने कहा-‘तो मत कहो। जहां तक काम का सवाल है तुम केवल फोन से आयी सूचनायें और चिट्ठियां इधर उधर पहुंचाने का काम करते हो। तुम बोस की चमचागिरी करते हो। उसके घर के काम निपटाते हो। बोस तुम्हारे द्वारा दी गयी सूचनायें और पत्रों के निपटारे का काम मुझे देता है और हर प्रकरण पर दिमाग लगाकर काम करना पड़ता है। कई पत्र लिखकर स्वयं टाईप भी करने पड़ते हैं तुम तो बस उनकी जांच ही करते हो पर उससे पहले मुझे जो मेहनत पड़ती है वह तुम समझ ही नहीं सकते। कभी कुछ ऊंच नीच हो जायेगा तो इस कंपनी से बोस भी नौकरी से जायेगा और मैं भी।’
पहले कर्मचारी ने कहा-‘उंह! क्या बकवास करते हो। यह काम मैं भी कर सकता हूं। तुम कहो तो बोस से कहूं इसमें से कुछ खास विषय की फाइलें मुझे काम करने के लिये दे। अपने जवाबों को टाईप भी मैं कर लिया करूंगा। मुझे हिंदी और अंग्रेजी टाईप दोनों ही आती हैं।’
दूसरे कर्मचारी ने कहा-‘अगर तुम्हारी इच्छा है तो बोस से जाकर कह दो।’
पहले कर्मचारी ने जाकर बोस को अपनी इच्छा बता दी। बोस राजी हो गया और उसने दूसरे कर्मचारी का कुछ महत्वपूर्ण काम पहले नंबर वाले को दे दिया।
पहले कर्मचारी ने बहुत दिन से टाईप नहीं किया था दूसरा वह पिछले तीन वर्षों से बोस की चमचागिरी के कारण कम काम करने का आदी हो गया था और दूसरे कर्मचारी के बहुत सारे महत्वपूर्ण कामों के बारे में जानता भी नहीं था-उसका अनुमान था कि दूसरे कर्मचारी के सारे काम बहुत सरल हैं जिनको कर वह बोस को प्रसन्न करता है।

उसके सारे पूर्वानुमान गलत निकले। वह न तो पत्रों के जवाब स्वयं तैयार कर पाता न ही वह दूसरे कर्मचारी की तरह तीव्र गति से टाईप कर पाता। काम की व्यस्तता की वजह से वह बोस की चमचागिरी और उसके घर का काम नहीं कर पाता।
बास की पत्नी के फोन उसके पास काम के लिये आते पर उनको करने का समय निकालना अब उसके लिये संभव नहीं रहा था। इससे उसका न केवल काम में प्रदर्शन गिर रहा था बल्कि बास की पत्नी नाराजगी भी बढ़ रही थी और एक दिन बास ने कंपनी के अधिकारियों को उसके विरुद्ध शिकायतें की और उसका वहां से निष्कासन आदेश आ गया।
वह रो पड़ा और दूसरे वाले कर्मचारी से बोला-‘यह मैंने क्या किया? अपने ही पांव पर कुल्हाड़ी मार ली। अब क्या कर सकता हूं?’
दूसरे कर्मचारी ने कहा-‘तुम चिंता मत करो। कंपनी के उच्चाधिकारी मेरी बात को मानते हैं। मैं उनसे फोन पर बात करूंगा। बस तुम एक बात का ध्यान रखना कि यहां अपने साथियों से वफादारी निभाना सीखो। याद रखो अधिकारी के अगाड़ी और गधे के पिछाड़ी नहीं चलना चाहिए।’
दूसरे कर्मचारी के प्रयासों से पहला कर्मचारी बहाल हो गया। दूसरे कर्मचारी की शक्ति देखकर बोस ने उसे तो डांटना बंद कर दिया पर पहले वाले को तब तक परेशान करता रहा जब तक स्वयं वह वहां से स्थानांतरित होकर चला नहीं गया।
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