समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label hindi editoiral. Show all posts
Showing posts with label hindi editoiral. Show all posts

Tuesday, December 22, 2009

अध्यात्म और अर्थशास्त्र-हिन्दी लेख (hindu adhyatm and life's economics-hindi article)

आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार सभी प्रकार के शास्त्रों का अध्ययन कर ही आर्थिक नीतियां बनायी जानी चाहिये। वैसे अर्थशास्त्र के अनुसार पागलों और सन्यासियों को छोड़कर सभी के क्रियाकलापों का ही अध्ययन किया जाता है । हालांकि इस बात का कहीं उल्लेख तो नहीं मिलता पर आधुनिक अर्थशास्त्र में संभवतः अध्यात्मिक ग्रंथों का उल्लेख नहीं किया जाता। अध्यात्म उस जीवात्मा का नाम है जो इस देह को धारण करती है और जब इस उसकी चेतना के साथ मनुष्य काम करता है तो उसकी गतिविधियां बहुत पवित्र हो जाती हैं जो अंततः उसकी तथा समाज की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। इस देह के साथ मन, बुद्धि और अहंकार तीनों प्रकृतियां स्वाभाविक रूप से अपना काम करती हैं और मनुष्य को अपने अध्यात्म से अपरिचित रखती हैं। आधुनिक अर्थशास्त्र उससे अपरिचित लगता है।
वैसे ही आज के सारे अर्थशास्त्री केवल बाजार, उत्पादन तथा अन्य आर्थिक समीकरणों के अलावा अन्य किसी पर तथ्य पर विचार व्यक्त नहीं कर पाते। कम कम से प्रचार माध्यमों में चर्चा के लिये आने वाले अनेक अर्थशास्त्रियों की बातों से से तो ऐसा ही लगता है। कहीं शेयर बाजार, महंगाई या राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विषय पर चर्चा होती है तो कथित रूप से अर्थशास्त्री सीमित वैचारिक आधार के साथ अपना विचार व्यक्त करते हैं जिसमें अध्यात्म तो दूर की बात अन्य विषयों से भी वह अनभिज्ञ दिखाई देते हैं। थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाये कि अध्यात्मिक ज्ञान का कोई आर्थिक आधार नहीं है तो भी आज के अनेक अर्थशास्त्री अन्य राजनीतिक, प्रशासनिक तथा प्रबंधकीय तत्वों को अनदेखा कर जाते हैं। यही कारण है कि महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, तथा खाद्य सामग्री की कमी के पीछे जो बाजार को प्रभावित करने वाले नीतिगत, प्राकृतिक भौगोलिक विषयों के अलावा अन्य कारण है उनको नहीं दिखाई देते हैं।

हम यहां आधुनिक अर्थशास्त्र की आलोचना नहीं कर रहे बल्कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित उन प्राचीन अर्थशास्त्रीय सामग्रियों का संकलित करने का आग्रह कर रहे हैं जो आज भी प्रासंगिक हैं। कौटिल्य का अर्थशास्त्र तो नाम से ही प्रमाणिक है जबकि चाणक्य नीति में भी आर्थिक विषयों के साथ जीवन मूल्यों की ऐसी व्याख्या है जिससे उसे भी जीवन का अर्थशास्त्र ही कहा जाना चाहिये- आधुनिक अर्थशास्त्र के अनुसार भी नैतिक शास्त्र का अध्ययन तो किया ही जाना चाहिये जिनको जीवन मूल्य शास्त्र भी कहा जाता है। आज की परिस्थतियों में यही नैतिक मूल्य अगर काम करें तो देश की अर्थव्यवस्था का स्वरूप एक ऐसा आदर्श सकता है जिससे अन्य राष्ट्र भी प्रेरणा ले सकते हैं।
आधुनिक अर्थशास्त्री अपने अध्ययनों में भारतीय अर्थव्यवस्था में ‘कुशल प्रबंध का अभाव’ एक बहुत बड़ा दोष मानते हैं। देश के कल्याण और विकास के लिये दावा करने वाले शिखर पुरुष नित्य प्रतिदिन नये नये दावे करने के साथ ही प्रस्ताव प्रस्तुंत करते हैं पर इस ‘कुशल प्रबंध के अभाव के दोष का निराकरण करने की बात कोई नहीं करता। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही इस दोष का परिणाम है या इसके कारण प्रबंध का अभाव है यह अलग से चर्चा का विषय है। अलबत्ता लोगों को अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे होने के कारण लोगों में समाज के प्रति जवाबदेही की कमी हमेशा परिलक्षित होती है।
हम चाहें तो जिम्मेदार पद पर बैठे लोगों की कार्यपद्धति को देख सकते हैं। छोटा हो या बड़ा हो यह बहस का विषय नहीं है। इतना तय है कि भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और लापरवाही से काम करने की प्रवृत्ति सभी में है। देश में फैला आतंकवाद जितना बाहर से आश्रय से प्रत्यक्ष आसरा ले रहा है तो देश में व्याप्त कुप्रबंध भी उसका कोई छोटा सहयोगी नहीं है। हर बड़ा पदासीन केवल हुक्म का इक्का बनना चाहता है जमीन पर काम करने वालों की उनको परवाह नहीं है। उद्योग और पूंजी ढांचों के स्वामी की दृष्टि में उनके मातहत ऐसे सेवक हैं जिनको केवल हुक्म देकर काम चलाया जा सकता है। दूसरी भाषा में कहें तो अकुशल या शारीरिक श्रम को करना निम्न श्रेणी का काम मान लिया गया है। हमारी श्रीमद्भागवत गीता इस प्रवृत्ति दसे खारिज करती है। उसके अनुसार अकुशल या शारीरिक श्रम को कभी हेय नहीं समझना चाहिये। संभव है कुछ लोगों को श्रीगीता की यह बात अर्थशास्त्र का विषय न लगे पर नैतिक और राष्ट्रीय आधारों पर विचार करें तो केवल हुक्म देकर जिम्मेदारी पूरी करवाने तथा हुक्म लेकर उस कार्य को करने वालों के बीच जो अहं की दीवार है वह अनेक अवसर परसाफ दिखाई देती है। किसी बड़े हादसे या योजनाओं की विफलता में इसकी अनुभूति की जा सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि उनका काम केवल हुक्म देना है और उसके बाद उनकी जिम्मेदारी खत्म हो जाती है मगर वह कार्य को अंजाम देने वालो लोगों की स्थिति तथा मनोदशा का विचार नहीं करते जबकि यह उनका दायित्व होता है। इसके अलावा किसी खास कार्य को संपन्न करने के लिये उसकी तैयारी तथा उसे अन्य जुड़े मसलों से किस तरह सहायता ली जा सकती है इस पर योजना बनाने के लिये जिस बौद्धिक क्षमता की आवश्यकता है वह शायद ही किसी में दिखाई देती है। सभी लोग केवल इस प्रयास में है कि यथास्थिति बनी रहे और इस भाव ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा अन्य क्षेत्रों में जड़ता की स्थिति पैदा कर दी है।
इसके अलावा एक बात दूसरी भी है कि केवल आर्थिक विकास ही जीवन की ऊंचाई का प्रमाण नहीं है वरन् स्वास्थ्य, शिक्षा तथा वैचारिक विकास भी उसका एक हिस्सा है जिसमें अध्यात्मिक ज्ञान की बहुत जरूरत होती है। इससे परे होकर विकास करने का परिणाम हमारे सामने है। जैसे जैसे लोगों के पास धन की प्रचुरता बढ़ रही है वैसे वैसे उनका नैतिक आधार सिकुड़ता जा रहा है।
ऐसे में लगता है कि कि हम पश्चात्य समाज पर आधारित अर्थशास्त्र की बजाय अपने ही आध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित सामग्री का अध्ययन करें। पाश्चात्य अर्थशास्त्र
वहां के समाजों पर आधारित जो अब हमारे ही देश के अध्यात्मिक ज्ञान पर अनुसंधान कर रहे हैं। यहां यह भी याद रखने लायक है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान भक्ति तक ही सीमित नहीं है और न ही वह हमें जीवन देने वाली उस शक्ति के आगे हाथ फैलाकर मांगने की प्रेरणा देता है बल्कि उसमें इस देह के साथ स्वयं के साथ ही परिवार, समाज तथा राष्ट्र के लिये अच्छे और बड़े काम करने की प्रेरणा भी है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग

लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर