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Friday, August 22, 2008

पालता है अन्न पत्थर नहीं-व्यंग्य क्षणिकायें

पद पुजता है आदमी नहीं
चमकती है प्रतिष्ठा देह नहीं
पालता है अन्न पत्थर नहीं
ओ! जमाने को उसूलों के बयां करने वालों
आकाश से कोई चीज जमीन पर
आकर टपकती नहीं
धरती पर उगती नहीं
उन चीजों की शौहरत को ही
असली सच बताकर
मत बहलाओ भोले लोगों को
जो बनती बिगड़ती हैं यहीं
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दुनियां में जितने खिलौने हैं
जब तक खेलें उनके साथ ठीक
बिगड़्र जायें तो खुद को ही ढोने हैं
खुद से ही बहलायें दिल तो कितना अच्छा
काटें हम अपने अंदर ही बेहतर फसल
ऐसे ही बीज हमको बोने हैं

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यह कविता दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका पर लिखा गया है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, August 20, 2008

चिंतन में अमरत्व की तलाश-हास्य कविता

चिंतन कुछ उन्होंने इस तरह किया
सारी चिंताओं ने उन्हें घेर लिया
उठाकर घूम रहे बोझा अपने सिर पर
न काम याद आता न घर
किया जब किसी ने उनसे सवाल तो बोले
‘बस, चिंतन करते हुए यह निष्कर्ष निकाला
किसी तरह होना है मुझे अमर’
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एक ने कहा
‘चलो चिंतन सम्मेलन में चलें
अपने विचार इस तरह रखें कि
लोग हमारी बौद्धिकता पर जलें
मुझे तो कुछ आता नहीं
तुम ही कुछ बोल देना
याद रखना लोग कुछ न समझें
बस, हैरान परेशान हो जायें’

दूसरे ने कहा
‘अपनी चिंताओं का बोझ उठाये
भला मैं क्या बोल पाऊंगा
लोग समझें नहीं
हैरान और परेशान हो जायें
इस सोच से ही मैं घबड़ा जाता हूं
अपने को बेबस पाता हूं
ऐसे चिंतन से क्या फायदा जो
चिंताओं को बुलाकर अपने ही हाथ मलें
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यह कविता दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका पर लिखा गया है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

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