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Thursday, August 23, 2012

सौदागरों से हमदर्दी की आशा बेकार-हिंदी कविता (saudagron se hamdardi kee asha-hindi kavita)

कभी न करना दिल देने का करार-हिन्दी कविता
महलों में रहने,
हवाई जहाज में बैठने,
और अपनी जिंदगी का बोझ
गुलामों के कंधों पर रखने वालों से
हमदर्दी की आशा करना है बेकार,
जिन्होंने दर्द नहीं झेला
कभी अपने हाथ काम करते हुए
ओ मेहनतकश,
 उनसे दाद पाने को न होना बेकरार।
कहें दीपक बापू
चौराहों पर चाहे जितनी बहस कर लो,
अपना दर्द बाजार में बेचने के लिये भर लो,
मगर भले के सौदागरों से न करना कभी
इलाज के बदले दिल देने का करार।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, November 28, 2008

कशमकश-हिंदी शायरी

जब हकीकतें होती बहुत कड़वी
वह मीठे सपनों के टूटने की
चिंता किसी को नहीं सताती
जहां आंखें देखती हैं
हादसे दर हादसे
वहां खूबसूरत ख्वाब देखने की
सोच भला दिमाग में कहा आती

दर्द से लड़ते आंसू सूख गये है जिसके
हादसों पर उसकी हंसी को मजाक नहीं कहना
उसकी बेरुखी को जज्बातों से परे नही समझना
कई लोग रोकर इतना थक जाते
कि हंसकर ही दर्द से दूर हो पाते
जिक्र नहीं करते वह लोग अपनी कहानी
क्योंकि वह हो जाती उनके लिये पुरानी
रोकर भी जमाना ने क्या पाता है
जो लोग जान जाते हैं
अपने दिल में बहने वाले आंसू वह छिपाते हैं
इसलिये उनकी कशकमश
शायरी बन जाती
शब्दों में खूबसूरती या दर्द न भी हो तो क्या
एक कड़वे सच का बयान तो बन जाती
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Monday, September 1, 2008

फिर भी अंधों में काने राजा की तरह सज जाते-व्यंग्य कविता

किताबों में स्याही से लिखे शब्द

तब तक ज्ञान नहीं हो जाते

जब तक पढ़ नहीं जाते

पढ़े गये शब्द भी तब तक ज्ञान नहीं होते

जब तक उसके अर्थ समझे नहीं जाते

अर्थ समझने का मतलब भी

ज्ञान का आना नहीं

जब तक उन पर अमल नहीं कर पाते

ढेर सारी किताबों पढ़कर भी

कोई ज्ञान के सिंहासन पर नहीं बैठ जाता

भले ही कितना भी इतराता

जब आंखों से पढ़े

और कानों से सुने जाते हैं

अगर उन पर मनन नहीं करता आदमी तो

कुछ शब्द बाहर बह जाते

कुछ अंदर ही कीचड़ की तरह जम जाते

इसलिये लोग आधे अधूरे ज्ञान को ही

पूरा समझ जाते


इसलिये अहंकार की खाई से कभी नहीं निकल पाते

पर फिर भी अंधों में काने राजा की तरह सज जाते

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Friday, August 29, 2008

अपने मतलब होते गहरे-हिंदी शायरी

उनके हैं सुंदर चेहरे

पर दिल पर हैं काली नीयत के पहरे

मुस्कराती आंखों के पीछे हैं

कुटिल भाव ठहरे

तुम्हारी सुनते लगते हैं

पर कान हैं उनके बहरे

लच्छेदार बातों से मन बहलाते हैं

सपने दिखाते महलों में बसाने के

तरीके बताते हैं जिंदगी में

चालाकियों के दांव आजमाने के

संवारने का दावा करते हैं जिंदगी

आ जाते हैं बहुत करीब

जैसे पितृपुरुष हों

पर उनके अपने मतलब होते गहरे

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Sunday, August 24, 2008

समय से पहले चेत जाओ-हिंदी शायरी

शब्दों के शोर का आतंक मचाओ
दूसरे की गल्तियों को अपराध न बताओ
तुम्हारी आवाज को मिल गयी है
आजादी के साथ दौलत की ताकत
पर उस पर इतना न इतराओ

शिकायतों का पुलिंदा साथ लिये घूमते हो
पर अपनी गल्तियों को मजबूरी कहकर चूमते हो
नक्कारखाने से निकल आये हो
अपनी तूती में दूसरों के लिये
चुभने वाले तीर क्यों ढूंढते हो
अपनी कलम के तलवार हो जाने का जश्न न मनाओ

कब तब बहलाओगे
झूठ को सच बनाओगे
अपने दृष्टा होने के अहसास को
सृष्टा की तरह मत समझाओ
जमाने में कई लाचार है
जिनसे तुम्हारी तरह गल्तियां हो जाती हैं
पर छिपने के लिये वरदहस्त के अभाव में
सभी के सामने आ जाती हैं
उन पर तुम अपनी रोटी न पकाओ

जमाने में खून की होली खुले में खेलने वाले बहुत हैं
उनसे अपनी दृष्टि न छिपाओ
बढ़ सकते हैं उनके हाथ तुम्हारी तरफ भी
शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गरदन रेत में न छिपाओ
दूसरों की इज्जत से खेलने वाले खबरफरोशों
जब तक उसके पर्दे का सहारा है
लोग सह जाते हैं
अपना दर्द पी जाते हैं
तुम उन्हें मत डराओ
जमाना जब डरता है
तब ख्यालों से मरता है
कौम अगर शब्दों के शोर के आतंक तले
इस तरह मरती रही
तुम्हारी खबरें बेअसर हो जायेंगी
अनसुनी और अनदेखी कर दी जायेंगी
अपने आजादी के हथियार की धार को
बेजा इस्तेमाल कर उसे कुंद मत करो
नहीं तो फिर जुर्म पसंद दौलतमंदों के गुलाम हो जाओगे
समय से पहले चेत जाओ

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Friday, August 22, 2008

पालता है अन्न पत्थर नहीं-व्यंग्य क्षणिकायें

पद पुजता है आदमी नहीं
चमकती है प्रतिष्ठा देह नहीं
पालता है अन्न पत्थर नहीं
ओ! जमाने को उसूलों के बयां करने वालों
आकाश से कोई चीज जमीन पर
आकर टपकती नहीं
धरती पर उगती नहीं
उन चीजों की शौहरत को ही
असली सच बताकर
मत बहलाओ भोले लोगों को
जो बनती बिगड़ती हैं यहीं
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दुनियां में जितने खिलौने हैं
जब तक खेलें उनके साथ ठीक
बिगड़्र जायें तो खुद को ही ढोने हैं
खुद से ही बहलायें दिल तो कितना अच्छा
काटें हम अपने अंदर ही बेहतर फसल
ऐसे ही बीज हमको बोने हैं

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Saturday, August 9, 2008

अपने हाथ से पिए जहर की शिकायत नजर नहीं आती है-हिन्दी शायरी

सांप काटे से आदमी के मरने की
खबर ज़माने भर में
सनसनी फैला जाती है
उसके जहर को शौहरत दिला जाती है
पर पेट्रोल और गैस से निकला जहर
शराब और अफीम के नशे का कहर
पूरे समाज को डस रहा है धीरे धीरे
इसे लोगों की भीड़ जानते हुए भी
अपने से छिपा जाती है
दूसरों के मरने का दर्द होता है कम
पर शोक जताकर जमाने को बताया जाता है
संवेदनाएं का अहसास दिलाया जाता है
जहर है उसी का नाम जो पिए आदमी खुद
अपने हाथों से
पर जाहिर न करे बातों से
मर जाता है अपने ही

हाथ से फैलाए जहर से आदमी
पर उसके शिकायत कहीं नजर नहीं आती है
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