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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Friday, August 22, 2008

पालता है अन्न पत्थर नहीं-व्यंग्य क्षणिकायें

पद पुजता है आदमी नहीं
चमकती है प्रतिष्ठा देह नहीं
पालता है अन्न पत्थर नहीं
ओ! जमाने को उसूलों के बयां करने वालों
आकाश से कोई चीज जमीन पर
आकर टपकती नहीं
धरती पर उगती नहीं
उन चीजों की शौहरत को ही
असली सच बताकर
मत बहलाओ भोले लोगों को
जो बनती बिगड़ती हैं यहीं
...................................

दुनियां में जितने खिलौने हैं
जब तक खेलें उनके साथ ठीक
बिगड़्र जायें तो खुद को ही ढोने हैं
खुद से ही बहलायें दिल तो कितना अच्छा
काटें हम अपने अंदर ही बेहतर फसल
ऐसे ही बीज हमको बोने हैं

...................................
यह कविता दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका पर लिखा गया है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
कवि एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, July 16, 2008

घड़ी की सुई जब तक तय न करे-हिंदी शायरी

जो दिल में बसते हैं
ऐसे लोगों की याद अकेले में
बहुत तरसाती है
उनसे मिलन की चाह सताती है
पर भला किसका बस चला है
इस समय पर
जो आदमी की जरूरतों को पास लाकर
अपनो से दूर कर देता है
जिंदगी भर के सपने गुजारने के सपने
एक पल में चूर कर देता है
इसलिये वादों पर क्या भरोसा करें
जो समय के पाबंद होते हैं
आदमी अपनी जुबाने से
चाहे कितने भी बात कर ले
घड़ी की सुई जब तक तय न करे
कोई ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाती है
.........................................
दीपक भारतदीप

Wednesday, April 2, 2008

चिड़िया का घरौंदा-हिन्दी शायरी

तिनका-तिनका मूंह में दबाकर
मेरे कमरे में ला रही है
चिडिया अपना घरौंदा बनाने के लिये
कभी पंखे पर रखती है
कभी रोशनदान पर ही रख देती
पंखा चलाने पर
बिखर जाता है घरौंदा
फिर ले आती है तिनके
कहीं दूसरी जगह घरौंदा बनाने के लिये

कई बार चिडिया पंखे से
टकराकर कर गिर जाती है
जिनको बचा सकता हूं
बचाने की कोशिश करता हूं
उसका संघर्ष विचलित किये रहता है कि
कहीं मेरी गलती से
बिखर न जाये उसका घरौंदा
कई बार उसके घरौंदे
उठाकर दूसरी
सुरक्षित जगह पहुंचा देता हूं
पर वह तैयार नहीं होती इसके लिये
हमेशा चुनती है वही जगह
जो मेरी दृष्टि में उसके लिये असुरक्षित हैं
पर मैं नहीं समझा पाता उसे
वह तो चलती है
अपने पथ पर अपने इरादे लिये
............................................

Monday, March 31, 2008

वह ज्ञानी-लघुकथा

वह ज्ञानी थे और अभी प्रवचन कार्यक्रम कर लौटे थे। मेरे से उनकी मुलाकात उनके यजमान के घर पर जो कि मेरे मित्र थे के घर पर हुई जहां मै किसी काम से गया था।

मित्र ने मुझसे कहा कि ‘‘तुम प्रवचन कार्यक्रम में क्यों नहीं आये? आना चाहिए भई। यह ठीक है कि तुम आजकल योग साधना कर रहे हो पर कभी-कभी सत्संग भी सुना करो।’’

वह प्रवचनकर्ता कोई साधु संत नहीं थे बल्कि गृहस्थ थे पर ऐसे ही उनका नाम हो गया था तो लोग समय पास करने के लिये उनका बुला लेते थे। मैं मित्र की बात सुनकर हंस पड़ा तो वह सज्जन बोले-‘‘हां इस दुनियां में सुबह बहुत तेजी से सांस लेने वाले भी कई योगी न रहे। कबीरदास जी यही कहते हैं इसलिये भगवान भजन में मन लगाना चाहिये। योग साधना से क्या होता है।’’

मैं थोड़ा जोर से हंसा तो वह बोले-‘‘आप इसे मजाक मत समझिये मैं आपको सही ज्ञान की बात बता रहा हूं।’’

इसी बीच मेरे मित्र की पत्नी भी एक थाली में फल और मिठाई रखकर आ गयी तो वह उसे देखते हुए बोले-‘‘मिठाई तो अभी नहीं खाउंगा। एक सेव अभी खा लेता हूं बाकी थैले में रख दो घर ले जाता हूं।

मैं भी मुस्कराते हुए उन्हें देख रहा था। मेरा मित्र होम्योपैथी का डाक्टर था और अधिक प्रसिद्ध न होने के बावजूद उसका काम ठीक चल रहा था और अपने मोहल्ले की तरफ के वह इस कार्यक्रम का मुख्य कर्ताधर्ता था।

वह सेव खाते हुए उससे बोले-‘भाई, हमें कम से कम महीने भर की दवाई दे दो ताकि हमारी और पत्नी की डायबिटीज कंट्रोल में रहे।’’

मेरा मित्र दवाई लेने चला गया तो उसकी पत्नी भी वहंा से चली गयी। तब वह मुझसे बोले-योगसाधना से कोई सिद्ध नही होता। यह कहने की बात है। इसलिये आप भगवान में मन लगाया करो। उनकी भक्ति से सब ठीक हो जाता है।’’


मैने उनसे कहा-‘यह मेरा मित्र डाक्टर है और पोच वर्ष पूर्व उच्च रक्तचाप की शिकायत के कारण इलाज कराने आया था । तब इसने मुझे खूब डांटा था। इसके पास अब कभी मरीज का तरह दवाई नहीं लेने न आना पड़े इसलिये ही योगसाधना करता हूं। यकीन करिये केवल उसके बाद दो वर्ष पहले बुखार की शिकायत लेकर आया था यह अलग बात है कि यह उस दिन घर पर नहीं था तो इसके पोर्च में पलंग पर सो गया और मेरा बुखार चला गया। इससे बचने के लिये ही मैं योगसाधना, ध्यान और मंत्रजाप करता हूं।’’

तब तक मेरा मित्र कमरे के अंदर आ गया था और मैने उसके सामने ही कहा-‘‘एक डाक्टर के रूप में मुझे इसकी शक्ल पसंद नहीं है।’’

उनका मूंह उतरा हूआ था। उन्होंने अपना मिठाई और फल को थैला उठाया और वहंा से चले गये। जाते वक्त उन्होंने मेरे मित्र और उसकी पत्नी से बात की पर मेरी तरफ देखा भी नहीं। उनके जाने के बाद मैने अपने मित्र से पूछा-‘‘कौन सज्जन थे ये?’’

वह बोला-‘‘कोई अधिक प्रसिद्ध तो नहीं है मेरे मरीज है और मोहल्ले के लोगों ने कहा कि सत्संग कराना है। सो बुलवा लिया। वैसे बहुत ज्ञानी हैं।’’
तुम्हें कैसे लगे?’

मित्र और मेरे बीच अनेक बार अध्यात्म पर जोरदार बहसें सुन चुकी उसकी पत्नी को मेरे से इस उत्तर की आशा नहीं थी। इसलिये उसने हंसते हुए पूछा-‘‘क्या सोच बोल रहे हैं या हमारा मन रख रहे हैं।’’

वह गलत नहीं थी पर मैं मित्र द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण कागज के लिफाफे को लेकर वहां से बाहर निकल गया। पीछे से मेरा मित्र मुझसे कह रहा था-सच बोलना। क्या तुंम हमारा दिल रखने के लिये मान रहे हो कि वह वास्तव में ज्ञानी हैं।’’

मैने पलटकर उसे मुस्कराते हुए देख और वहां से बिना उत्तर दिये चला आया।

Tuesday, December 25, 2007

प्यार की सप्लाई में कट

इंटरनेट पर चैट करते हुए
दोनों के बीच शुरू हो गया प्रेम
कई दिनों तक चला यह
साइबर पर लव गेम
अचानक प्रेमिका के शहर
और घर में शुरू हो गया
बिजली का संकट

इधर प्रेमी सन्देश पर सन्देश भेजता
उधर प्रेमिका कभी घर के कमरे में
तो कभी छत पर टहलते हुए
झेलती घोषित पावर कट
बिजली आती तो वह इंटरनेट पर आती
पर उधर प्रेमी के घर पर
परिवार वाले लगा देते थे
कंप्यूटर पर काम करने में कट

आखिर प्रेमी के कहने पर
एक जनरेटर से चलने वाले
साइबर कैफे में जाने लगी
फिर उनकी प्रेम कहानी पटरी पर आने लगी
पर प्रेमी की खुशी ज्यादा दिन नहीं रही
प्रेम सन्देश अचानक मिलने हो गए बंद
उसकी हो गई हालत विकट

कई सन्देश उसने भेजे पर जवाब नहीं आया
आखिर उसने आत्महत्या की धमकी देते हुए
अपने ईमेल का बटन दबाया
दिल रहा था फट

उधर प्रेमिका के नये प्रेमी ने भी उसे पढा
और भेजा जवाब
'यार, पावर कट की वजह से
हम दोनों साइबर कैफे में आये
वह तुमसे बात करती
मैं अपनी दोस्त से
करता था चैट
एक दिन हो गए इससे मेरी भेंट
हम दोनों के लिए किश्तों में प्रेम
करना कठिन हो गया था
दोनों के यहाँ बिजली की आने-जाने का
समय एक हो गया था
दोनों का दर्द एक जैसा था
और दिल में प्यार भी वैसा ही था
एक दूसरे की हालत देखकर
दोनों का दिल गया फट
एक दूसरे का दुख बांटते हुए
हम एक-दूजे के हो गए
हमें दोष न देना
पावर कट ने ही किया
तुम्हारे प्यार की सप्लाई में कट

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