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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Tuesday, January 1, 2013

कोई अगर कहें ‘हैप्पी न्यू ईयर तो क्या उससे लड़ने लगें-हिन्दी चिंत्तन लेख (agar koye kahe "happay new year' to usse kaya ladne lagen-hind chittan lekh)

               वर्ष 2013 आ गया। अनेक लोगों का कहना है की हम भारतीयों   को यह अंग्रेजी वर्ष नहीं मनाना   चाहिए।   खासतौर से यह बात हिन्दू धर्म को कट्टरता से मानने का दावा करने  वालों  की तरफ से कही  जाती है।  मगर इन लोगों का कोई प्रभाव नहीं होता।  आखिर क्यों?  सच बात तो यह है  कि अनेक लोगों की तरह हम भारतीय अध्यात्मवादी लोग  भी उनकी बात को महत्व देते रहे हैं ।  अब लगने लगा है कि  वेलेन्टाईन डे, क्रिस्मस  और न्यू ईयर जैसे अंग्रेजी पर्व भी अब भारतीय समाज का ऐसा हिस्सा बन  गए हैं, जिन्हें अलग करना अब संभव नहीं है।  दरअसल जिन लोगों ने इन पर्वों को हमेशा ही वक्र दृष्टि से देखते हुए अपने धर्म पर दृढ़ रहने का मत व्यक्त किया है वह सामाजिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं।  उन्होंने धार्मिक रूप से कभी अपने देश का अध्ययन नहीं किया।  हालांकि यह लोग अं्रग्रेजी शैली के समर्थक हैं पर वैसा सोच नहीं है। 
         कम से कम एक बात माननी पड़ेगी कि अंग्रेजों ने हमारे समाज को जितना समझा उतने अपने ही लोग नहीं समझ पाये।  इन्हीं अंग्रेजों के अखबार ने एक मजेदार बात कही जो यकीनन हम जैसे चिंतकों के लिये रुचिकर थी।  अखबार ने  कहा कि भारत के धर्म पर आधारित संगठन और उनके शिखर पुरुष अपने भक्तों को वैसे ही अपने साथ जोड़े रखते हैं जैसे कि व्यवसायिक कंपनियां। वह अपने संगठन कंपनियों की तरह चलाते हैं कि उनके भक्त समूह बने रहें।
         हमने उनके नजरिये को सहज भाव से लिया।  हम यह तो पहले से मानते थे कि भारत में धर्म के नाम पर व्यापार होता है पर इससे आगे कभी विचार नहंी किया था।  जब यह नजरिया सामने आया तो फिर हमने उसी के आधार पर इधर उधर नजर दौड़ाई।  तब भारतीय धार्मिक संगठनों में वाकई यह गजब की व्यवसायिक प्रवृत्ति दिखाई दी।  जिस तरह देशी विदेशी कंपनियां अपने उत्पादों के विक्रय करने के लिये नयी पीढ़ी को  विज्ञापनों के  माध्यम से आकर्षित करने के अनेक तरह के उपक्रम करती हैं वैसे ही भारतीय धार्मिक संगठन और उनके शिखर पुरुष भी यही प्रयास करते हैं।  भले ही बड़े व्यवसायिक समूहों ने प्रचार माध्यमों से युवा पीढ़ी में  वेलेन्टाईन डे, क्रिस्मस  और न्यू ईयर जैसे अंग्रेजी पर्व अपने लाभ के लिये प्रचलित करने में योगदान दिया है पर भारतीय धार्मिक संगठन और उनके शिखर पुरुष भी इन्हीं पर्वों का उपयोग अपने भक्त समूह को बनाये रखने के लिये कर रहे हैं।  यही आकर इन्हीं पर्वों के विरोधी सामाजिक संगठन तथा कार्यकताओं के लिये ऐसी मुश्किल खड़ी होती है जिसे पार पाना संभव नहीं है।  अनेक मंदिरों में नर्ववर्ष पर विशेष भीड़ देखी जा सकती है।  इतना ही नही मंदिरों में  खास सज्जा भी देखी जा सकती है।  हम जैसे नियमित भक्त तो दिनों के हिसाब से मंदिरों में जाते रहते हैं-जैसे कि सोमवार को शंकर जी तो शनिवार को नवग्रह और मंगलवार को हनुमान जी-अगर कोई खास सज्जा न भी हो तो भी भक्तों को इसकी परवाह नहीं है।  परवाह तो किसी भक्त को नहीं है पर जो लोग इन मंदिरों के सेवक या स्वामी है उन्हें लगता है कि कुछ नया करते रहें ताकि युवा पीढ़ी उनकी तरफ आकर्षित रहे।  वह समाज में कोई नया भाव पैदा करने की बजाय उसमें मौजूद भाव का ही उपयोग करना चाहते हैं।   इतना ही नही इन मंदिरों में जाने पर केाई परिचित अगर बोले कि हैप्पी न्यू इयर तो भला भगवान की दरबार में हाजिरी का निर्मल भाव लेकर गया कौन भक्त अपने अंदर कटुता का भाव लाना चाहेगा।  इतना ही नहीं कुछ संगठित पंथ तो क्रिसमस, वेलेन्टाईन डे और नववर्ष पर अपने शिखर  पुरुषों को इन पर्वों के अवसर पर खास उपदेश भी दिलवाते हैं। 
         हम जैसे अध्यात्मिक व्यक्तियों की दिलचस्पी उन विवादों में नहीं होती जिनके आधार कमजोर हों।  जो सामाजिक कार्यकर्ता इन पर्वों को मनाये जाने का विरोध करते हैं वह अपने जीवन में उस पर अमल कर पाते हों यह संदेहपूर्ण है।  जब कोई समाज से जुड़ा है तो वह अपने बैरी नहंी बना सकता।  मान लीजिये हम नहीं मानते पर अगर कोई कह दे कि हैप्पी क्रिसमस, हैप्पी न्यू ईयर या हैप्पी वेलेन्टाईन डे तो क्या उसे लड़ने लगेंगे।  एक बात निश्चित है कि भारत में धर्म के विषय पर आज भी धार्मिक साधु, संतों और प्रवचको की बात अंतिम मानी जाती है।  सामाजिक कार्यकताओं को  इन पर्वो के विरोधी  अभियान के प्रति उनका समर्थन उस व्यापक आधार पर नहीं मिल पता यही कारण है कि इसमें सफलता नहीं मिलती।  हालांकि कुछ साधु, संत और प्रवचक इन सामाजिक कार्यकर्ताओं की बात का समर्थन करते हैं पर वह इतना व्यापक नहीं है।  चूंकि भारतीय धार्मिक संगठन और शिखर पुरुष भी  एक कंपनी की तरह अपने भक्त बनाये रखने की बाध्यता को स्वीकार करते हैं इसलिये वह उनके  तत्वज्ञान धारण करने की बजाय व्यवसायिक योजनाओं में जुटे रहते हैं।  हमारा मानना है कि केवल तत्वज्ञान के आधार पर हमेशा अपने पास भीड़ बनाये रखना कठिन है  और धार्मिक संगठन तथा उनके शिखर पुरुषों में यही बात आत्मविश्वास कम कर देती है।  यह आत्मविश्वास तब   ऋणात्मक स्तर पर पहुंच जाता है जब तत्वज्ञान को धारण करने से ऐसे पंथ या संगठनों के शिखर पुरुष स्वयं ही दूर होते हैं।  अपना नाम और धन जुटाने के चक्कर मे वह सब ऐसे प्रयास करते हैं जैसा कंपनियां करती है।  यही कारण है कि अंग्रेजी पर्व फिलहाल तो समाज में मनाये ही जा रहे हैं क्योंकि कहीं न कहीं धार्मिक तत्व उन्हें समर्थन दे रहे हैं।
          हमारे एक करीबी  मित्र ने सुबह मिलते ही कहा-’’हैप्पी न्यू ईयर!’’
          वह सब जानता था इसलिये हमने उससे कहा कि ‘‘हमारा नया वर्ष तो मार्च में आयेगा।’’
             वह बोला-‘‘यार, तुम कैसे अध्यात्मिकवादी हो।  कम से कम कुछ उदारता दिखाते हुए बोले ही देते कि ‘‘हैप्पी न्यू ईयर’’
    इससे पहले कि हम कुछ बोलते। एक अन्य परिचित आ गये। वह भी अपना हाथ मिलाने के लिये आगे बढ़ाते हुए बोले-‘‘नव वर्ष मंगलमय हो।’
     हमने हाथ बढ़ाते हुए उनसे कहा‘‘आपको भी नववर्ष की बधाई।’
     वह चले तो हमारे मित्र ने हमसे कहा‘‘उसके सामने तुमने अपना अध्यात्मिक ज्ञान क्यों नहीं बघारा।’’
       हमने अपने मित्र से कहा‘‘अपना अध्यात्मिक ज्ञान बघारने के लिये तुम्हीं बहुत हो।  अगर  इसी तरह हर मिलने वाले से नववर्ष पर बधाई मिलने पर ज्ञान बघारने लगे तो शाम तक घर नहीं पहुंचने वाले।’’
          एक धार्मिक शिखर पुरुष ने वेलेन्टाईन डे को मातृपितृ दिवस मनाने का आह्वान किया था।  अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओ को अच्छी लगी पर अनेक लोगों ने यह सवाल किया कि अगर वेलेन्टाईन डे को समाज से बहिष्कृत करना है तो फिर उसका नाम भी क्यों लिया जाये?  तय बात है कि दिन तो वह होना चाहिये पर हमारे हिसाब से मने।  यह बात तो ऐसे ही हो गयी कि मन में लिये कुछ ढूंढ रहा आदमी किसी व्यवसायिक कंपनी के पास न जाकर हमारी धार्मिक कंपनी की तरफ आये।
        हम जैसे योग साधकों और गीता पाठकों को लगता है कि  ऐसे विवाद किसी समाज की दिशा तय नहीं करते।  फिर यह अपने अध्यात्मिक ज्ञान  और सांसरिक विषयों दक्षता के अभाव के कारण आत्मविश्वास की कमी को दर्शान वाला भी है।  चाणक्य, विदुर, कौटिल्य और भर्तुहरि  जैसे महान दर्शनिकों ने हमारे अध्यात्मिक भंडार  ऐसा सृजन किया जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान दोनों है।   तुलसी, सूर, रहीम और मीरा जैसे महानुभावों ने ऐसी रचनायें दी जिसके सामने  दूसरे देशों का साहित्य असहाय नज़र आता है। यह आत्मविश्वास जिसमें होगा वह अंग्रेजी पर्वो के इस प्रभाव से कभी परेशान नहीं होगा।   
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, December 26, 2012

अपनी दवा खुद ढूंढ लेते हैं-कविता (apni dawa khud dhoondh lete hain-kavita)

बेदर्द लोग बेच रहे हैं
दर्द दूर करने की दवा,
बहारें लाने का भरोसा
दिखाकर लूट रहे वह लोग वाह वाह
रोके बैठे हैं जो बहती हुई हवा।
कहें दीपक बापू
मन में अंधेरा हैं जिनके  
ज्ञान का दीपक
जगह जगह जला रहे हैं पाखंडी,
बेच दिया ईमान जिन्होंने कौड़ियों के भाव
आदर्श की लगा रहे वही मंडी,
चेहरे चमका लिये हैं नायकों ने
झगड़ रहे हैं इस बात पर
कौन लुटेरा नंबर एक है
कौन बेईमानी में सबसे सवा।
छोड़ दिया है मशहूर लोगों की
बताई राह पर चलना
अपने दिल और दिमाग के दर्द  की
खुद ही ढूंढ  लेते हैं खुश होकर दवा।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Friday, December 14, 2012

इंसान ने वफा में शर्तों को जोड़ दिया-हिन्दी कविता (insan ne vafa mein sharton ko jod diya-hindi kavita or poem)

हमने बरसों तक उन पर रखा यकीन
मौका आया तो
पल भर में उन्होंने तोड़ दिया,
हर कदम पर हमसफर रहे
पल भर लड़खड़ायी हमारी किस्मत
उन्होंने हमें अकेला छोड़ दिया।
कहें दीपक बापू
किसके मिलने पर खुश हों
किसके बिछड़ने पर रोयें
धरती पर सांस ले रहे पशु और पक्षी भी
भरोसे के दिखते हैं
इंसानों ने रिश्ते निभाने में
जोड़ दी अपनी अपनी शर्तें
जहां दिखी अपने लिये उम्मीद
वहीं वफा का नाता जोड़ दिया।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, November 26, 2012

अगर राज्य प्रमुख जाग्रत रहे तो द्वापर काल का दर्शन हो सकता है-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन (agar rajya pramukh jagrat rahe to dwapar kal ka darshan sakta hai-hindu relgion thought besed on kautilya ka arthshastra)

                      हमारे देश में समाज, परिवार और राज्य व्यवस्था से निराश लोग आमतौर से यह सोचकर तसल्ली करते हैं कि यह कलियुग चल रहा है और कभी सतयुग आयेगा तो सभी ठीक हो जायेगा।  इतना ही नहीं  सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग को लेकर हमारे अनेक कथित महान संत देश के धर्मभीरु लोगों को  आज की वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक तथा पारिवारिक स्थितियों से उपजी निराशा को कलियुग होने के कारण सहने का संदेश देते हैं।  यह विश्वास दिलाते हैं कि सतयुग आने वाला है। इतना ही नहीं सतयुग में भगवान विष्णु, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम तथा द्वापर में  श्रीकृष्ण के अवतार को लेकर कलियुग में भी कल्कि अवतार होने का दावा प्रस्तुत किया जाता है।  हमारे देश में अनेक धार्मिक पेशेवर लोग श्रीराधा, श्रीकृष्ण और भगवान शिव के अवतार होने का दावा भी इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे कि वह सभी का कल्याण कर देंगे।
            इस तरह युगों के नाम पर यह पाखंड वास्तव में तब मजाक लगता है जब हमें पता लगता है कि दरअसल यह सब राज्य और प्रजा की स्थिति पर निर्भर करता है।  पहले राजतंत्र था अब तो हमारे यहां पाश्चात्य पद्धति के आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था है।  यहां कथित रूप से प्रजा से चुने लोग राज्य कर्म  के लिये उच्च पदों पर बैठते हैं।  ऐसी स्थिति में जब हम कहते हैं कि ‘घोर कलियुग आ गया है’ तब न केवल राज्यकर्म में लिप्त लोग के आचरण पर दृष्टिपात किया जाये  बल्कि प्रजा के लिये भी यह आत्ममंथन का विषय होता है। अगर हम धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें तो वास्तव में राज्य व्यवस्था सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर तथा कलियुग का निर्माण करती है। इसके लिये राज्य प्रमुख की चेष्टायें ही आधार होती हैं 
              कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि
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             कृतं त्रेतायुगं चैप द्वापरं कलिरेव च।
             राज्ञोवृत्तानि सर्वाणि राजा के हि युगमुच्यते।
           हिन्दी में भावार्थ-किसी राज्य में राजा जिस तरह प्रजा के लिये व्यवस्था तथा चेष्टा करता है वही युग कहलाती है।  एक तरह से राजा का राज्यकाल ही सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होती है। एक तरह से राजा का कार्यकाल ही युग होता है।
               कलिः प्रसुप्तो भवति सः जाग्रद्द्वापरं युगम।
               कर्मस्यभ्युद्यतस्वेत्ता विचरेस्तु कृतं युगम्।।
             हिन्दी में भावार्थ-राजा के निरुद्यम होने पर कलियुग, जाग्रत रहने पर द्वापर, कर्म में तत्पर रहने पर त्रेता तथा यज्ञानुष्ठान में रत होने पर सतयुग की अनुभूति होती है।

               आधुनिक लोकतंत्र में पूरे विश्व के देशें में राज्य की व्यवस्था में लगे लोग तथा प्रमुख के बीच अनेक प्रकार के पद होते हैं।  इस व्यवस्था में राज्य का आधार किसी राजा की बजाय  संविधान होता है जिसका संरक्षक राज्य प्रमुख प्रजा से चुना जाता है। इस तरह के संविधानों में राज्य प्रमुख की स्थिति निरुद्यम हो जाती है।  वह देख सकता है, बोल सकता है और सुन भी सकता है पर कर कुछ नहीं सकता।  उसे भी संविधान की तरफ देखना होता है।  फिर उस  पद पर उसके बने रहने की  भी निश्चित अवधि होने से  यह भय उसमें होना स्वाभाविक है कि वहां से हटने के बाद कुछ ऊंच नीच होने पर उसे परेशानी होगी। इतना ही एक बार पद से हटे तो सुविधायें, सम्मान और साथी कम हो जायेंगें। यही कारण है कि वह पद पर आने के बाद प्रजाहित की बजाय अपने वैभव को स्थाई बनाये रखने के लिये संचय के मार्ग की ओर प्रवृत्त होता है। यही प्रवृत्ति उसे भ्रष्टाचार की तरफ ले जाती हैं  पूरे विश्व में इस समय भ्रष्टाचार को लेकर अनेक आंदोलन चल रहे हैं यह उसका प्रमाण है।  
         आमतौर से लोग राज्यतंत्र को आधुनिक समय में एक असभ्य व्यवस्था बताते हैं पर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राज्य प्रमुख अपनी धवल छवि बनाये रखने के लिये दंड, अपराध की जांच और उद्दंड व्यक्तियों के विरुद्ध कोई भी प्रत्यक्ष कार्यवाही करने से अपने हाथ दूर रखते हैं।  उनके अंतर्गत आने वाली संस्थाओं पर यह जिम्मा रहता है और उनमें कार्यरत लोगों की कार्यप्रणाली में उस मानसिक दृढ़ता का अभाव दिखता है जो  कि प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने वाले राज्य प्रमुख में होता है।  इतना ही नहीं आधुनिक लोकतंत्र व्यवथा में सभी पदों पर नियुक्त लोगों की राज्य प्रमुख स्वयं प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं रहता।  एकदम निचले पद पर काम करने वाले व्यक्ति के लिये राज्य प्रमुख दूर का विषय होता है जबकि कानून, नीतियां, कार्यक्रम तथा प्रजा से प्रत्यक्ष संपर्क करने वाले यही निम्न पदों पर कार्यरत लोग ही होते हैं।  इस तरह राज्य प्रमुख और प्रजा की बहुत दूरी होती है जिसका लाभ भ्रष्टाचार करने वाले खूब उठाते हैं।  प्रजा के सामने राज्य प्रमुख की छवि एक निष्क्रिय पदाधिकारी की होती है जो कलियुग का प्रमाण है।
        इस आधुनिक व्यवस्था में सतयुग और त्रेतायुग के दर्शन तो हो नहीं सकते क्योंकि इसके लिये राज्य प्रमुख का स्वयं ही युद्धवीर होना आवश्यक है  अलबत्ता प्रचलित  लोकतंत्र व्यवथा में राज्य प्रमुख के निरंतर जाग्रत होकर प्रजा हित के लिये तत्पर रहने  पर द्वापर का दर्शन हो सकता है क्यों  उसमें  राज्य प्रमुख को अपनी ही व्यवस्था में लोगों से महाभारत करते रहना होगा।  एक बात तय रही कि हमें इन युगों को प्राकृतिक रूप से परिवर्तन होने वाली स्थिति नहीं माना जा सकता।  अगर ऐसा न होता तो हर युग में भ्रष्टाचारी और अपराधी नहीं होते जिनका संहार करने के लिये भगवान के अवतार होते रहे हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
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Sunday, October 21, 2012

बेजान सच-हिंदी कविता (bejan sach-hindi kavita)

लोकतंत्र में
आम आदमी का मन लगाने के लिये
हर रोज नये चेहरे लाना जरूरी है,
चाल जैसी भी हो
मगर अदायें खूबसूरत रहें
भीड़ का दिल बहलाना जरूरी है।
कहें दीपक बापू
बाज़ार के सौदागरों के हाथ में फंसी दुनियां
दौलत से भरे महलों के आदी हैं सभी
ज़माने को काबू रखने के लिये
उनके  पहरेदारों के पास रहता डंडा
बिठा देते सिंहासनों पर खामोश बुत
झूठ छिपा रहे
इसलिये बेजान सच साथ रखना जरूरी है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Wednesday, September 26, 2012

2 अक्टुबर महात्मा गांधी जयंती पर विशेष हिन्दी लेख-उनकी छवि राजनीतिक संत के रूप में रही (special hindi article 2 october mahatam gadhi barth's day)


          2 अक्टोबर को महात्मा गांधी की जयंती है।  आधुनिक भारतीय इतिहास में महात्मा गांधी को पितृपुरुष के रूप में दर्ज किया गया है।  हम जब  भारत की बात करते हैं तो एक बात भूल जाते हैं कि प्राचीन  समम में इसे भारतवर्ष कहा जाता था।  इतना ही नहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान, भूटान, श्रीलंका, माले तथा वर्मा मिलकर हमारी पहचान रही है।  अब यह सिकुड़ गयी है।  भारतवर्ष से प्रथक होकर बने देश अब भारत शब्द से ही इतना चिढ़ते हैं कि वह नहीं चाहते  शेष विश्व उनको भारतीय उपमहाद्वीप माने।  इस तरह भारतवर्ष सिकुड़कर भारत रह गया है।  उसमें भी अब इंिडया की प्रधानता है।  इंडिया हमारे देश की पहचान वाला वह शब्द है जिसे पूरा विश्व जानता है। भारत वह है जिसे हम मानते हैं।  यह वही भारत है जिसका आधुनिक इतिहास है 15 अगस्त से शुरु होता है।  यह अलग बात है कि कुछ राष्ट्रवादी अखंड भारत का स्वप्न देख रहे हैं। 
     बहरहाल विघटित भारतवर्ष के शीर्ष पुरुषों में महात्मा गाधंी का नाम पूज्यनीय है।  उन्होंने भारत की राजनीतिक आजादी की लड़ाई लड़ी।  इसका अर्थ केवल इतना था कि भारत का व्यवस्था प्रबंधन यहीं के लोग संभालें।  संभव है कुछ लोग इस तर्क को  संकीर्ण मानसिकता का परिचायक माने पर तब उन्हें यह जवाब देना होगा देश की आजादी के बाद भी अंग्रेजों के बनाये ढेर सारे कानून अब तक क्यों चल रहे हैं?  देश के कानून ही व्यवस्था के मार्गदर्शक होते हैं और तय बात है कि हमारी वर्तमान आधुनिक व्यवस्था का आधार अंग्रेजों की ही देन है। 
       महात्मा गांधी ने अपना सार्वजनिक जीवन दक्षिण अफ्रीका   में प्रारंभ हुआ था। वहां गोरों के भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष में जो उन्होंने जीत दर्ज की उसका लाभ यहां के तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम आंदोलनकारियों ने उठाने के लिये उनको आमंत्रित किया।  तय बात है कि किसी भी अन्य क्षेत्र में लोकप्रिय चेहरों को सार्वजनिक रूप से प्रतिष्ठत कर जनता को संचालित करने का सिलसिला यहीं से शुरु हुआ जो आजतक चल रहा है।  अगर महात्मा गांधी इंग्लैंड से अपनी पढ़ाई प्रारंभ कर भारत लौटते तो यकीनन उस समय स्वतंत्रता संग्राम के तत्कालीन शिखर पुरुष उनको अपने अभियान में सम्म्लिित होने का आंमत्रण नहीं भेजते।
             महात्मा  गाँधी  का जीवनकाल  हम जैसे लोगों के जन्म से बहुत पहले का है।  उन पर जितना भी पढ़ा और जाना उससे लेकर उत्सुकता रहती है। फिर जब चिंत्तन का कीड़ा कुलबुलाता है तो कोई नयी बात नहीं निकलती। इसलिये आजकल के राजनीतिक और सामाजिक हालात देखकर अनुमान करना पड़ता है क्योंकि व्यक्ति बदलते हैं पर प्रकृति नहीं मिलती।  यह अवसर अन्ना हजारे साहब ने प्रदान किया।  वैसे तो अन्ना हजारे स्वयं ही महात्मा गांधी के अनुयायी होने की बात करते हैं पर उन्होंने ही सबसे पहले भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के दौरान यह कहकर आश्चर्यचकित किया कि अब वह दूसरा स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ‘‘हमें तो अधूरी आजादी मिली थी‘।  ऐसे में हमारे जैसे लोगों किंकर्तव्यमूढ़ रह जाते हैं।  प्रश्न उठता है कि फिर महात्मा गांधी ने किस तरह की आजादी की जंग जीती थी।  अगर अन्ना हजारे के तर्क माने जायें तो फिर यह कहना पड़ेगा कि उन्हें इतिहास एक ऐसे युद्ध के विजेता नायक के रूप में प्रस्तुत करता है जो अभी तक समाप्त नहीं हुआ है।  अनेक लोग अन्ना हजारे की गांधी से तुलना पर आपत्ति कर सकते हैं पर सच यही है कि उनका चरित्र भी विशाल रूप ले चुका है।  उन्होंने भी महात्मा गांधी की तरह राजनीतिक पदों के प्रति अपनी अरुचि दिखाई है।  सादगी, सरलता और स्पष्टतवादिता में वह अनुकरणीण उदाहरण पेश कर चुके हैं। हम जैसे निष्पक्ष और स्वतंत्र लेखक उनकी गतिविधियों में इतिहास को प्राकृतिक रूप से दोहराता हुआ देख रहे हैं। इसलिये भारतीय दृश्य पटल पर स्थापित बुद्धिजीवियों, लेखकों और प्रयोजित विद्वानों का कोई तर्क स्वीकार भी नहीं करने वाले।
               महात्मा गांधी को कुछ विद्वानों ने राजनीतिक संत कहा।  उनके अनुयायी इसे एक श्रद्धापूर्वक दी गयी उपाधि मानते हैं पर इसमें छिपी सच्चाई कोई नहीं समझ पाया।  महात्मा गांधी भले ही धर्मभीरु थे पर भारतीय धर्म ग्रंथों के विषय में उनका ज्ञान सामान्य से अधिक नहीं था।  अहिंसा का मंत्र उन्होंने भारतीय अध्यात्म से ही लिया पर उसका उपयोग  एक राजनीति अभियान में उपयोग करने में सफलता से किया। मगर यह नहीं भूलना चाहिए  पूरे विश्व के लिये वह अनुकरणीय हैं। यह अलग बात है कि जहां अहिंसा का मंत्र सीमित रूप से प्रभावी हुआ तो वहीं राजनीति प्रत्येक जीवन का एक भाग है सब कुछ नहीं।  अध्यात्म की दृष्टि से तो राजनीति एक सीमित अर्थ वाला शब्द है।  यही कारण है कि अध्यात्मिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण कार्य न करने पर महात्मा गांधी का परिचय एक राजनीतक संत के रूप में सीमित हो जाता है।  अध्यात्मिक दृष्टि से महात्मा गांधी कभी श्रेष्ठ पुरुषों के रूप में नहीं जाने गये।  जिस अहिंसा मंत्र के लिये शेष विश्व उनको प्रणाम करता है उसी के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर जैसे परम पुरुष इस धरती पर आज भी उनसे अधिक श्रद्धेय हैं।  कई बार ऐसे लगता है कि महात्मा गांधी वैश्विक छवि और राष्ट्रीय छवि में भारी अंतर है। वह अकेले ऐसे महान पुरुष हैं जिनको पूरा विश्व मानता है पर भारत में भगवान राम, श्रीकृष्ण, महात्मा बुद्ध तथा  महावीर जैसे परमपुरुष आज भी जनमानस की आत्मा का भाग हैं।  इतना ही नहीं गुरुनानक देव, संत कबीर, तुलसीदास, रहीम, और मीरा जैसे संतों की  भी भारतीय जनमानस में ऊंची छवि है। धार्मिक और सामाजिक रूप से स्थापित परम पुरुषों के  क्रम में कहीं महात्मा गांधी का नाम जोड़ा नहीं जाता।  एक तरह से कहें कि कहीं न कहीं महात्मा गांधी वैश्विक छवि की वजह से अपनी छवि यहां बना पाये।
                महात्मा गांधी जब एक रेलगाड़ी में सफर कर रहे थे तब एक गोरे अधिकारी ने उनको उस बोगी से उतार दिया क्योंकि वह गोरे नहीं थे।  उसके बाद उन्होंने जो अपना जीवन जिया वह एक ऐसी वास्तविक कहानी है जिसकी कल्पना  उस समय बड़े से बड़ा फिल्मी पटकथा लेखक भी नहीं कर सकता था।  उनकी पृष्ठभूमि पर ही शायद बाद में जीरो से हीरो बनने की कहानियां फिल्मों पर आयी होंगी।  उनके जीवन से प्रेरणा लेकर एक स्वाभिमानी व्यक्ति बना जा सकता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि भोगी नहीं त्यागी बड़ा होता है। महात्मा गांधी ने सभ्रांत जीवन की बजाय सादा जीवन बिताया। यह उस महान त्याग था क्योंकि उस समय अंग्रेजी जीवन के लिये पूरा समाज लालायित हो रहा था।  उन्होंने सरल, सादा सभ्य जीवन गुजारने की प्रेरणा दी। ऐस महापुरुष को भला कौन सलाम ठोकना नहीं चाहेगा।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Wednesday, September 12, 2012

१४ सितम्बर हिन्दी दिवस पर लेख-हिन्दी अध्यात्म की भाषा है इसलिये जुड़े रहें (hindi adhyatma ki bhasha hai-hindi diwas or hindi divas par lekh and article

         अंतर्जाल पर हिन्दी दिवस को लेकर जमकर खोज हो रही है।  इस लेखक के ब्लॉगों जिन पाठों में हिन्दी दिवस के विषय पर लिखा गया है उन पर पाठकों की संख्या पहले से इन दिनों  छह गुना अधिक है।  इसका मतलब यह है कि पूरे वर्ष में    कम से कम एक दिन तो ऐसा है जब बौद्धिक प्रवृत्ति के लोगों को हिन्दी की याद आती है। कौन लोग हैं जो सर्च इंजिनों में हिन्दी दिवस से से जुड़े शब्द डालकर इससे संबंधित पाठ खोज रहे होंगे?
     एक बात तय है कि अभी इंटरनेट पर हिन्दी जनसामान्य में लोकप्रिय नहीं है। नयी पीढ़ी के लोग तथा कंप्यूटर के जानकार बौद्धिक व्यक्ति ही यह खोज कर रहे होंगें।  नयी पीढ़ी में वह लोग हैं जिनको शायद हिन्दी दिवस पर अपनी शैक्षणिक संस्थानों के अलावा हिन्दी में अनुदान प्राप्त संघों के यहां  होने वाली निबंध,कहानी, कविता अथवा वाद विवाद प्रतियोगिताओं मे भाग लेना हो। इसलिये  यहां से कुछ प्रेरणा प्राप्त करना चाहते हो।  इसके अलावा कुछ बौद्धिक लोगों को समाचार पत्रपत्रिकाओं के लिये लेख लिखने अथवा राजकीय धन से आयोजित परिचर्चा या भाषण देने के लिये कोई नयी सामग्री की तलाश हो।  वह भी शायद इंटरनेट पर कुछ खोज रहे हों।  इसी कारण इस लेखक को अपने पाठ पढ़ने का दोबारा अवसर मिल रहा है।
         उन लेखों से कोई प्रेरणादायी सामग्री मिल सकती है यह भ्रम लेखक नहीं पालता।  दरअसल हिन्दी के महत्व पर लिखे गये एक लेख पर अनेक टिप्पणीकार यह लिख चुके हैं कि आपने उसमें असली बात नहीं लिखी।  विस्तार से हिन्दी का महत्व बतायें।  इस बात पर हैरानी होती है कि हिन्दी का महत्व अभी भी समझाना बाकी है।  इस लेखक का विश्वास है कि हिन्दी दिवस पर लिखे गये पाठों वाले ब्लॉग इस समय किसी भी हिन्दी वेबसाइट या ब्लॉग  से अधिक पाठक जुटा रहे हैं।  शिनी स्टेटस में साहित्य वर्ग में एक ब्लॉग अंग्रेजी ब्लॉगों को पार करता हुआ तीन नंबर के स्थान में पहुंच गया है। कल इसके एक नंबर पर पहुँचने की संभावना है।  इस वर्ग के पंद्रह ब्लॉग में तीन  इस लेखक के हैं। मनोरंजन के अन्य वर्ग में एक ब्लॉग पंद्रहवें नंबर पर है। 14 सितंबर को हिन्दी दिवस है और 13 सितंबर वह दिन है जब इस लेखक के अनेक ब्लॉग अपनी पिछली संख्या का कीर्तिमान पार करेंगे। यह संख्या एक दिन में ढाई से तीन हजार होगी।
    हिन्दी का महत्व क्या बतायें? यह रोटी देने वाली भाषा नहीं है।  अगर प्रबंध कौशल में दक्ष नही है तो इसमें लिखकर कहीं सम्मान वगैरह की आशा करना भी व्यर्थ है।  फिर सवाल पूछा जायेगा कि इसका महत्व क्या है?

     इसका हम संक्षिप्त जवाब भी देते हैं।  अनेक भाषाओ का ज्ञान रखना अच्छी बात है पर जिस भाषा में सोचते हैं अभिव्यक्ति के लिये वही भाषा श्रेयस्कर है।  फेसबुक पर नयी पीढ़ी के लोगों को देखकर तरस आता है।  वह हिन्दी में सोचते हैं-यह प्रमाण रोमनलिपि में उनकी हिन्दी देखकर लगता है- मगर प्रस्तुति के  समय वह हकला जाते हैं।  हिन्दी लिखने के ढेर सारे टूल उनके पास है वह इसका उपयोग नहीं जानते। जानते हैं तो कट पेस्ट में समय खराब करना उनको अच्छा नहीं लगता।  उनका लिखा हमें हकलाते हुए पढ़ना पढ़ता है।  तय बात है कि वह लिखते हुए समय बचाते हैं पर जब दूसरे का लिखा  पढ़ने का समय आता है तो उनका दिमाग भी लिखे गये विषय को हकलाते हुए पकड़ता है।  कुछ लोग अंग्रेजी में लिखते हैं पर पढ़ते समय साफ लगता है कि उनके मन का विचार हिन्दी में है। हिन्दी भाषा अध्यात्म की भाषा है यह इस लेखक की मान्यता है।  जब हिन्दी में सोचकर अंग्रेजी भाषा या रोमन लिपि में लिखते हैं तो हकलाहट का आभास होता है।  भाषा का संबंध भूमि, भावना और भात यानि रोटी से है।  भारत में रोमन लिपि और अंग्रेजी भाषा की गेयता कभी पूरी तरह से निर्मित नहीं हो सकती।  इस सच्चाई को मानकर जो हिन्दी को अपने बोलचाल के साथ ही अपने जीवन में अध्यात्मिक रूप से उपयोग करेगा उसके व्यक्त्तिव में दृढ़ता, वाणी में शुद्धता और विचारों में पवित्रता का वास होगा।  यह तीनों चीजें अध्यात्मिक तथा भौतिक विकास दोनों में सहायक होती हैं।  अध्यात्मिक विकास की लोग सोचते नहीं है पर भौतिक विकास के पीछे सभी हैं।  कुछ लोग भौतिक संपन्नता प्राप्त भी करते हैं तो उसका सुख नहीं ले पाते।  सीधी मतलब यह है कि अध्यात्मिक शक्तियां ही भौतिक सुख दिलाने में सहायक हैं और इसी कारण हर भारतवासी को हिन्दी के साथ जुड़े रहना होगा। 
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak Raj kukreja "Bharatdeep"
Gwalior madhyapradesh


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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