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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Tuesday, January 6, 2015

बड़े इंसान का पद-हिन्दी कविता(bade insan ka pad-hindi poem)




जिनके मस्तिष्क में
स्वार्थ का बबूल उगा है
वह वाणी से कभी
फूल जैसे शब्द नहीं बरसाया करते।

बड़े इंसान का पद पाया
संपदा के जंगल में
बना उनका महल
अपने बचाव के लिये
कठोर वाक्यों के
शूल ही चुभाया करते।


कहें दीपक बापू सोने की चमक से
जिनकी आंखें अभिभूत हैं,
वह मायामयी मुद्रा के
अधिकृत दूत हैं
नैतिकता और आदर्श की
राह चलते व्यक्तित्वों को
धूल ही बताया करते।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Monday, December 29, 2014

फिल्म वाले बोले तो ठीक हम बोले तो पीके आये-हिन्दी लघु व्यंग्य चिंत्तन(film wale bole to theek ham bole to pk aaye-hindi short satire thought)


    हमने पीके फिल्म न देखी है न देखेंगे पर उसे देखने वाले दर्शक जिस तरह बता रहे हैं उसमें हमारी पहली आपत्ति तो धर्म की आड़ में एक प्रेम कहानी थोपने दूसरी गाय को घास खिलाने के विरोध दिखाने की बात पर है। हमने ओ माई गॉड फिल्म में भारतीय धर्म के अंधविश्वास का विरोध करने के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के विश्वास की स्थापना का प्रयास होने के कारण उसका समर्थन किया था। उसमें युवक युवती की शारीरिक जरूरतों को इंगित करती हुई कहानी नहीं थी।  शिवलिग पर दूध चढ़ाने पर कटाक्ष भी तार्किक ढंग से किया गया था।  कोई बता रहा था कि पीके गाय को घास खिलाने पर भी कटाक्ष किया गया है।  इससे हमारा विरोध है। मुंबईया फिल्म में अधिकतर शराब और शवाब की छाप बदलकर उपभोग करने की प्रवृत्तियां प्रचारित की जाती हैं।  फिल्म में काम करने वालों प्रसिद्ध लोगों  के चरित्र ही नहीं वरन् परिवार भी आदर्श नहीं रह पाते।  उपभोग के प्रेरक कभी योग के संदेशवाहक बने यह अपेक्षा हम नही रखतें है, उनको धर्म कर्म की बातों पर सोच समझकर पटकथायें लिखनी चाहिये। कभी गाय के सामने  रोटी या घास पेश कर उसे खाकर तुप्त होकर सुख उठाना ऐसे लोग नहीं जानते जिन्हें शब्दों और चित्रों का व्यापार करना है।  हम यहां यह भी बता दें पाश्चात्य विचारों में फंस ऐसे लोग यह मानते हैं कि यह संसार केवल मनुष्यों के लिये ही है।  जबकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों के अनुसार यहां पशु पक्षी भी महत्वपूर्ण है।  श्रेष्ठ जीव होने के कारण मनुष्य का यह दायित्व है कि प्रकृति संसाधनों के साथ ही वन, पशु तथा पक्षी संपदा की रक्षा करते हुए विकास करे।
            हम सुबह घर के बाहर चबूतरे पर योग साधना करते हैं तब अक्सर गायें खड़ी होकर देखती रहती हैं।  वह जिस मासूमियत से निहारती है उससे मन द्रवित हो  जाता है उनको रोटी या खाने की दूसरी सामग्री दे ही देते हैं।  खाने के बाद वह एक दृष्टि हम पर डालकर चली जाती हैं तब होठों पर अचानक ही मुस्कराहट आ जाती है।  उस सुख का शब्दों में वर्णन करना कठिन है।  पीके फिल्म हमने नहीं देखी फिर भी इस पर टिप्पणी करना हम उसी तरह नैतिकता का प्रतीक मानते हैं जैसे चलचित्र निर्माता निर्देशक पशु पक्षियों को खिलाये पिलाये बिना ऐसे कर्म में लोगों का मजाक बनाते हैं। इतना ही नहीं भारतीय धर्म ग्रंथों के पढ़े बगैर वह सुनी सुनाई बातों के आधार पर समाज का चरित्र तय कर लेते हैं।
            हमारे एक मित्र ने हमसे कहा-‘चलो, तुम्हें पीके दिखा दूं।’’
            हमने कहा-‘‘पीके हमने देख लिया है। कोई मजा नहीं आता।’’
            वह बोला-‘‘मैं फिल्म पीके की बात कर रहा हूं।’’
            हमने कहा।-‘‘उस पर पैसे खर्च करने से अच्छा है खाने पीने पर ही खर्च करें।’’
            वह बोला-‘‘पैसे मैं खर्च करूंगा।’’
            हमने कहा-‘समय तो खर्च होगा। आंखों को तकलीफ भी होगी। इससे अच्छा है अंतर्जाल पर दो चार बेसिरपैर की कवितायें ही लिखकर जश्न मनायें।’
            वह चला गया पर हम पर तनाव का बोझ डाल गया।  हमारे पास इसके निवारण का  एक ही उपाय रहा  कि कुछ इस पर लिख डालें। वही हम कर रहे हैं।  इस पर कोई कविता समझ में नहीं आ रही। कोई व्यंग्य भी बनाने का सामर्थ्य नहीं लग रहा।
चाकलेटी चेहरे वाले

उपभोग जगत में

इस कदर छाये

कभी वस्त्रहीन होकर

कभी सामने पीके आये।



कहें दीपक बापू भाग्य की बात

भांडों का जमाना है,

अपनी अदाओं से

उनको कमाना है,

नशे का विरोध करते हुए

समाज सुधारने के लिये

नारे लगाते

उनका हर कम

अभिनय कहलाता

हम समझायें तो

कहा जाता है यह पीके आये।

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            इस सर्दी में कहीं जाने का मन नहीं कर रहा था।  सोचा किस तरह दिमाग में गर्मी लायें। पीना छोड़ दिया है इसलिये बोतल को हाथ लगा नहीं सकते।  इसलिये ऐसी सोच बना ली जैसे हम पीके आये। तभी यह बिना सिर पैर का लघु व्यंग्य लिख पाये।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Tuesday, December 23, 2014

तरक्की और शिक्षा के दावे-हिन्दी कविता(tarakki aur shiksha ke dave-hindi poem)



तरक्की बेमतलब लगती

जब ज़माने में

वफा के कुऐं सूखे हों।



शिक्षा के दावे खोखले लगते

जब लोग बोलते ढेर सारे शब्द

मगर उनके अर्थ रूखे हों।





कहें दीपक बापू भरोसे के साथ

चलना भूल गये सभी,

दिमाग में हलचल थमी

सामानों की भीड़ में

दिल खो गये हैं अभी,

दौलत के लगा लिये ढेर

लगता है फिर भी

लोग अभी भूखे हों।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, December 16, 2014

समझदारी-हिन्दी कविता(samajhdari-hindi poem)




खोदे थे राह में गड्ढे
दूसरे को गिराने के लिये
धोखे में स्वयं गिर गये।

लगाते रहे दूसरों पर आरोप
अपनी नाकामियों का
सोचा कभी नहीं
कामयाबी के पीछे दौड़ते हुए
लालच के जाल में घिर गये।

कहें दीपक बापू नीयत का खेल
कोई समझे या नहीं,
अपने ख्याल आते हैं सामने
सच के रूप में हर कहीं,
नासमझों ने बुलाई आफतें
समझदारों के दिन फिर गये।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Tuesday, November 25, 2014

भक्ति और भक्त का रहस्य-हिन्दी कविता(bhakti aur bhakt ka rahasya-hindi poem)



कोई भोजन करने
कोई भजन सुनने
सर्वशक्तिमान के दरबार में
हाजिरी लगाता है।

हृदय में हो या नहीं
हाथ नचाकर
अपना विश्वास जताता है।

कहें दीपक बापू भक्ति का रहस्य
नहीं समझता कोई
भक्त के मन की भी
खबर किसी को नहीं
मगर तोल रहे  खबरची
अंधविश्वास का वजन
चीख चीख कर सुना रहे
पर वह बढ़ नहीं पाता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, November 15, 2014

संवेदनाओं के साथ अकविता में कवित्व-हिन्दी कविता(sanwedanaon ke sath akvita mein kavitva-hindi kavita)




कभी कभी हम
कुछ पंक्तियों में
अपनी बात कह जाते हैं।
हालातों से बेजार ज़माना
भटका है बाज़ार की
भूलभुलैया में
किससे कहें अपने शब्द
लोगों के कान
अपने मतलब की बात
सुनने के लिये ही रहते आतुर
हम स्वयं से ही कहते
दिल की बात
कागज अपना साथी बनाते हैं।
कहें दीपक बापू संवेदना से
जिनका नाता है
वही अकविता में भी
कवित्व समझ पाते हैं। 
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Sunday, October 19, 2014

मस्तिष्क में चिंताओं के धागे-हिन्दी कविता(mastishka mein chintaon ke dhage-hindi )



poem)
सभी इंसान
अपने भविष्य के लिये
सपने बुनते हैं।

अंतर इतना है
समझदार अपनी औकात देखकर
रास्ते पर चलते
नासमझ अपनी ताकत से
ज्यादा लक्ष्य चुनते हैं।

कहें दीपक बापू विकास का रथ
उधार और मदद के पहियों से
बढ़ रहा आगे,
सामान घर में भरा
मस्तिष्क में उलझे
चिंताओं के धागे,
चमकते चेहरों के मुख से भी
अंतरंग क्षणों में
लड़खड़ाते स्वर से
टूटते शब्दों को हम सुनते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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Monday, October 6, 2014

वचन और चरित्र में अंतर-हिन्दी कविता(vachan aur charitra mein antar-hindi poem)



सभी के श्रीमुख से
श्रेष्ठ वचन
हर चर्चा में
बाहर निकल ही आते हैं।

जिसके भी चरित्र पर
कोई प्रश्न उठाओ
निजता में छिप जाते हैं।

कहें दीपक बापू शब्दों के खेल में
सभी पेशेवर खिलाड़ी लगते हैं,
तालियां बजवाने के लिये
महफिलों में तकते हैं,
व्यसन से बचने की राय
देते हैं जो ऊंची आवाज में
शराब की एक बोतल से
निकली कुछ बूंदों में बहकर
अपनी औकात पर आ जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Wednesday, October 1, 2014

चेतना और जाग्रति-हिन्दी व्यंग्य कविता(chetna aur jagrati-hindi vyangya kavita)





सुख सुविधाओं के गुलाम
ज़माने में बदलाव लाने के
नारे लगाते हैं।

अपनी चेतना रख दी गिरवी
राजमहलों में रहकर
पूरे समाज को वही जगाने आते हैं।

कहें दीपक बापू हाथ की सफाई में
महारत जिन्होंने हासिल कर लिया,
वही रोशनी का वादा करते
रखकर सड़क पर खाली दिया,
रौशनी का चलाते काला बाज़ार
गलियों में प्रकाश करने का
दावा वही जताते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, September 19, 2014

सपने और योग्यता-हिन्दी कविता(sapne aur yogyata-hindi poem)



धनहीन हो
मगर अज्ञानी न हो
वरना चालाक लोग खेलते
खिलौना मानकर।

सूरत से असुंदर हो
पर वाणी का कठोर न हो
वरना चेहरे पर ताने कसेगा
हर कोई करेला मानकर।

कहें दीपक बापू  शहर में
हजारों लोग बसते हैं,
किसी के नखरे भी होते महंगे
किसी के आत्मसम्मान के दाम
एकदम सस्ते हैं,
अपनी शक्ति के अनुसार
निद्रा में देखें सपने,
जागते हुए स्वयं की योग्यता के
पैमाने पर विचार करें अपने,
कदम सोच समझकर बढ़ाना
पीछे न हटने की ठानकर।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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