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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका

Thursday, July 15, 2010

शराब और रूह-व्यंग्य कवितायें (sharab aur rooh-hindi vyangya kavitaen)

कहीं बनते हैं
कहीं उजड़ जाते हैं आशियाने,
छत के नीचे खड़े हैं
इस भरोसे कि सदा सिर पर रहेगी
मगर कहीं कुदरत उजाड़ देती है
कहीं बुलडोजर चला आता है
तो कहीं इंसानी बुत चले आते लतियाने।
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भरोसा कर हमेशा धोखा खाया,
मगर मजबूर हुए, तब फिर जताया,
धोखा करने से डरे हैं हम हमेशा,
हैरानी है तब भी किसी का भरोसा न पाया।
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शराब गम भुलाती है,
मगर यह बात केवल लुभाती है,
सच यह है कि
इंसान ज़ाम दर ज़ाम पीते हुए
हो जाता है गुलाम
मर जाती है रूह उसकी
जो नशे में कभी उसे नहीं बुलाती है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, July 11, 2010

फैशन की धारा संस्कारों का समंदर-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (fashan ki dhara aur sanskar-hindi vyangya kavitaen)

अपने देश के लोग
हर नई चीज को दहेज के
लेन देने में जोड़ जाते हैं,
हर पश्चिमी फैशन की धारा को
अपने संस्कारों के समंदर की तरफ मोड़ जाते हैं।
बुद्धिमान कर रहे धर्म और संस्कारों को लेकर
लंबी चौड़ी बहसें
दुनियां में अपनी संस्कृति का
झंडा फहराने की व्यर्थ होड़ लगाते हैं।
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टूट जाता है मन
रोज झूठ सुनते सुनते
हर कदम पर फरेब और बेईमानी की बोली
लोग बोलने लग जाते हैं,
कसम उठती है
पर खामोशी एक हथियार की तरह
अपने पास रख ली है हमने
हल्का कर लेते हैं अपना दिमाग
जब पाते है लोगों को हल्का
उनके शब्दों के सच को तोलने लग जाते हैं।
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Thursday, July 8, 2010

विकास पुरुष-हिन्दी हास्य कविता (vikas purush-hindi hasya kavita)

चमचे ने कहा
‘विकास पुरुष जी
आप भी कमाल का कर रहे विकास,
इधर हो रहा है विनाश,
कारों के उत्पादन को
विकास का प्रतीक बता रहे हैं,
उत्पादन में ही हित जता रहे हैं,
मगर घटिया सड़कें बनवा देते हैं,
जिसके प्राण दो मिनट की बरसात के छींटे ही ले लेते हैं,
हो जाता है जिससे रास्ता जाम,
जहां सुबह पहुंचना हो
हो जाती है वहां शाम,
कारों के नये नये माडल बनवाने से अच्छा है
पहले सड़कें बनवायें
सच में विकास पुरुष की छबि बनायें।’

सुनकर भड़के विकास पुरुष
‘अरे ओए थकेले चमचे
अब तेरा दिमाग फिर गया है,
इसलिये जनता के कल्याण की
गंदी सोच में घिर गया है,
अगर हम तेरी तरह सोचते,
तो चमचे होकर किसी के अपने ही बाल नौंचते,
कारों के नये नये कारखानों से
हमें चंदा मिलता है,
पेट्रोल की बिक्री से भी
कमीशन का धंधा खिलता है,
सड़कों पर जाम लगने से भी हमें फायदा है,
क्योंकि अपने लाभ लेने की कायदा है,
जाम से पेट्रोल ज्यादा बिकता है
धूल और झटकों से कार होती जल्दी पुरानी
नया माडल जल्दी बाजार में दिखता है,
फिर दुनियां के प्रचार माध्यमों में
जाम में फंसी रंग बिरंगी कारों के झुंड
के फोटो छपने से
अपने विकास का मंजर प्रचार पाता है
पहियों तले दबी फटेहाल सड़कों का
हाल कौन देख पाता है,
सड़के चमचमाती बन जायेंगी,
तो हर साल कमीशन भी नहीं दिलवायेंगी,
अभी तो विकास के नाम पर
वहां से भी अच्छा पैसा आता है,
विकास तो वही श्रेष्ठ होता हमारे लिये
जो कभी लक्ष्य नहीं पाता है,
यह बात तुम्हें कितनी बार समझायें।’’
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Tuesday, July 6, 2010

खुलकर हंसना भी एक बहुत बड़ा फन है-हिन्दी शायरी (khulkar hansna ek fun hai-hindi shayari)

मेरी नाकामी पर ताने न मारो
क्योंकि तुम्हारी कामयाबी
किसी को क्या खुशी देगी
जब तुम्हें ही न दे सकी
क्योंकि उसके नीचे कई लोगों की
सिसकी दफन है
तुम्हारे घर बिछे कालीन के नीचे
मरे हुए इंसानों का चुराया कफन है।
बोझिल होकर मुस्कराते हो,
हवा के एक झौंके से डर जाते हो,
मुझसे हमदर्दी जताने वाले, तुम नहीं जानते
ढेर सारे दर्द के साथ जीते हुए
खुलकर हंसना भी एक बहुत बड़ा फन है।
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Wednesday, June 23, 2010

बगुला भगत-हास्य कविताएँ (bagula bhagat-hindi hasya kavitaen)

सच्चे भक्त हैं जो लोग
भला वह कहां अपनी ताकत
दिखाने चौराहे पर आते हैं,
जो आकर भीड़ जुटायें
इंसानों को भेड़ बनाकर
वही बगुला भगत कहलाते हैं।
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वह भगत था पर बगुला न बना
इसलिये बगुला ही भगत बन गया,
करता रहा जो रोज भक्ति का शिकार,
हर शहर में उसका आशियाना तन गया।
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Monday, June 21, 2010

दुनियां का सच-हिन्दी क्षणिका (duniyan sa sach-hindi short poem)

मुखौटों से रिश्ते रखते हुए
अब हम ऊबने लगे हैं,
वादों की नाव कभी चलती नहीं
इसलिये ख्वाबों में ही डूबने लगे हैं,
इंसानों के मर गये जज़्बात,
गद्दारी और वफादारी की नहीं जानते जात,
देखा हमने, क्योंकि रोज दुनियां के सच के साथ जगे हैं।
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Thursday, June 3, 2010

जगहंसाई-हिन्दी शायरी (jaghasai-hindi shayari)

किसी की दौलत और शौहरत देखकर
क्यों अपना दिल जला रहे हो,
अपने चिराग खुद जलाओ
दूसरों की रौशनी देखकर
अपनी आंखें क्यों गला रहे हो।

कह दिये किसी ने अपशब्द
भूल जाने में ही भलाई है,
रोकर सभी को दर्द बयान करने
व्यर्थ में ही जंगहंसाई है,
बोलने वाले को जलने दो
अपनी आग में
तुम क्यों याद कर
अपनी सोच को कांटों पर चला रहे हो।
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