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Sunday, September 22, 2013

कातिल ही फरिश्ते बने-हिन्दी व्यंग्य कविता (Qatil bane farishey-hindi satire poem)




जंग के लिये जो अपने  घर में हथियार बनाते हैं,
बारूद का सामान बाज़ार में  लोगों को थमाते हैं।
दुनियां में उठाये हैं वही शांति का झंडा अपने हाथ
खून खराबा कहीं भी हो, आंसु बहाने चले आते हैं।
कहें दीपक बापू, सबसे ज्यादा कत्ल जिनके नाम
इंसानी हकों के समूह गीत वही दुनियां में गाते हैं।
पराये पसीने से भरे हैं जिन्होंने अपने सोने के भंडार
गरीबों के भले का नारे वही जोर से सुनाते हैं।
अपनी सोच किसको कब कहां और  कैसे सुनायें
चालाक सौदागरों के जाल में लोग खुद ही फंसे जाते हैं।
खरीद लिये हैं उन्होंने बड़े और छोटे रुपहले पर्दे
इसलिये कातिल ही फरिश्ते बनकर सामने आते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, September 14, 2013

आस्तीन के सांप-हिन्दी व्यंग्य कविता(asteen ke saanp-hindi vyangya kavita)

आस्तीनों में कभी सांप पलते नहीं देखे हैं,
शायद इंसानों की बही में दर्ज
अपनी कारनामों के ऐसे ही लेखे हैं,
जिनके लिये भले आदमी ने की दुआ
शिखर पर चढ़ने के लिये लिये
उसके कंधे पर पांव रखकर बढ़ गये,
उनके नाम के स्तंभ जमीन पर गढ़ गये,
इतना होता तो ठीक था
दुआ करने वालों ने कुछ पाया नहीं,
सिवाय वादों के कुछ उनके हिस्से में आया नहीं।
कहें दीपक बापू
क्यों परेशान हो
खजूर के पेड़ों से
खडे़ किये तुमने
क्षमा करो और भूल जाओ
बड़ा होना लिखा रहता है  उनकी किस्मत में
बांटने का बल आया नहीं,
इसलिये उनके  हिस्से में कभी
फल होता नहीं
साथ निभाती छाया नहीं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Friday, February 15, 2013

संगम-हिन्दी कविता (sangam-hindi kavita)


पर्वत से निकली नदी
घर से चली नाली
नाले ने दोनों का संगम करा दिया,
पवित्र जल  पीयें या नहायें
आंखें बंद कर श्रद्धा से फूल चढ़ायें,
धर्म की धरती पर अधर्म का घर भरा दिया।
कहें दीपक बापू
कचड़े में कांति नहीं होती,
अशांत मन लेकर चलें
कभी साथ शांति नहीं होती,
उठती हैं ख्वाहिशें
सुंदर नजारे देखने के लिये
आदमी मचल जाता है,
काली दुनियां हैं उनके पीछे
खबर नहीं लेता कोई
धर्म का सौदागर छल कर जाता है।
जल गया है जल
जहरीला हो गया फल
इसलिये जिस धरा पर बैठे हो
वहीं ध्यान कर
ज्ञान में स्नान कर
कर अपने पर विश्वास
कर दे अपने से दूर उस ख्वाब को
जिसने ज़माने को डरा दिया है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Thursday, August 16, 2012

महंगे सामान और सस्ती ज़िन्दगी-हिंदी व्यंग्य कविता (mahange saman aur sasti zindagi-hindi satire poem)

महंगे सामानों के शौक में
आदमी ने
अपनी जिंदगी को सस्ती बना दिया,
इश्क में खून की तबाही को
अपनी मस्ती बना दिया।
कहें दीपक बापू
कृत्रिम नजारों में आखों फोडना,
ख्याली अफसानों में दिल तोड़ना,
और कभी बेकार वाह वाह करना
कभी आहें भरते हुए सांसें छोड़ना,
बन गया है फैशन
बीमारों से भरे हुए शहर
दिमागों में कूड़ेदानों की  बस्ती को बसा लिया
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लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,‘‘भारतदीप’’,
ग्वालियर, मध्यप्रदेश
 
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, April 14, 2012

सादगी का भरोसा-हिन्दी शायरी (sadagi ka bharosha-hindi shayari)

हमने देखा उनकी तरफ
बड़ी उम्मीद के साथ
शायद वह हमारी जिंदगी में
कभी बहार लायेंगे,
दोष हमारा ही था कि
बिना मतलब के
उनका साथ निभाया,
उनमें वफा करने की कला है कि नहीं
यह जाने बिना
जरूरत से ज्यादा
अपनी सादगी का रूप दिखाया,
फिर भी भरोसा है कि
इस भटकाव में भी
हम कोई नया रास्ता पायेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Thursday, January 12, 2012

विकास का पथ-हिन्दी शायरी (vikas ka path-hindi shayri,kavita or poem)

उजाड़ के खेत खलिहान
वह पत्थरों के महल बनाएंगे,
जहां खड़े हैं पेड़ पौधे
वहाँ सभ्य इंसान बसाएँगे।
कहें दीपक बापू
जिन पथों पर आती थी
अश्वों के पदचाप की आवाज,
वहाँ विचर रहे रंगो से सजे लोहे के बाज़,
अंधेरे में चिराग की रोशनी
दिखाती रही राह बरसों तक,
अब उगलती हैं बाज़ की आँखें
भ्रमित करने वाली आग
अपने नज़र पर भी होता शक,
इस छोर से उस छोर तक
वह विकास का पथ ऐसे ही बनाएंगे,
जरूरत पड़ी तो
जिंदा इंसानों को लाशों की तरह सजाएँगे।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, January 8, 2012

जिंदगी के रास्ते पर चलना संभाल कर-हिन्दी शायरी (zindagi ke raste par chalana sanbhal kar)

ज़िंदगी के रास्ते
कहीं समतल हैं
कहीं टूटे हैं पुल 
कहीं कीचड़ है
कभी धीमा चलना है
कभी तेज चलना है।
हम मंज़िल तय कर सकते हैं
हालतें तय करती हैं
हमारी सवारी का साधन
जहां हमने तय किया
जज़्बातों के सहारे चलने का
वहाँ हादसों का खतरा है,
सच यह है
इंसान के हाथ में कुछ नहीं है
सिवाय खुद को काबू रखने के,
बेकाबू लोगों को गड्ढों में गिरते हमने देखा है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, January 1, 2012

नया वर्ष आया यानि कैलेंडर बदल गया-हिन्दी लेख (new year meens change of calengder naya varsha ya sal ka ana yani celader ka badlana-hindi lekh aur kavita or article or poem)

              1 जनवरी 2012 सुबह से ही बरसात की बूंदों की आवाज घंटी की तरह सुनाई दे रही थी। ऐसा भी लगा कि शायद ओले गिर रहे हों। ईसवी संवत् के नये वर्ष का नया दिन इस तरह ही शंखनाद करता हुआ बता रहा था कि वह आ गया है। 31 दिसम्बर 2011 रात्रि ग्यारह बजे हम सोये तो प्रातः निद्रा खुलते ही हमारा यह अनुभव था। बिस्तर से उठने का मन इसलिये नहीं हुआ कि सर्दी लग रही थी बल्कि हम न तो उस समय योग साधना कर सकते थे न ही उद्यान में जा सकते थे जो कि हमारे लिये प्रतिदिन शुरुआत की पहली प्रक्रिया है।
             घर की बिजली भी जा चुकी थी और इस तरह धुप अंधेरे में घड़ी में समय देखना भी मुश्किल था। अलबत्ता साढ़े चार बजे का टाईम लगाकर हम जिस ट्रांजिस्टर को रखते हैं वह बज रहा था। इसका मतलब यह था कि समय उससे आगे निकल चुका है। आखिर थोड़ी उहापोह के बाद हमनें बिस्तर का त्याग किया और कमरे में ही आसन लगाकर योग साधना प्रारंभ की। वहीं कुछ सूक्ष्म व्यायाम के साथ आसन किये जिसमें देह विस्तार रूप न ले। सूक्ष्म व्यायाम, जांधशिरासन तथा सर्वांगासन करने के पश्चात् पदमासन पर बैठकर प्राणायाम किया। प्राणायाम प्रारंभ करते हुए मनस्थिति बदलने लगी। प्रतिदिन आने वाली नवीनता ने धीरे धीरे अंदर पदार्पण किया। तब नव वर्ष जैसा आभास नहंी रहा। फिर ध्यान तथा नहान के बाद अन्य नियमित अध्यात्मिक प्रक्रिया संपन्न की। अब हमारा नवीन दिन आरंभ हो चुका था मगर वर्षा ने बता दिया कि अभी हमें घर से बाहर निकलने नहीं देगी।
         कुछ देर बरसात रुकी तो हम आश्रम चले गये। वहां से कई दूसरी जगह जाने का विचार मौसम की वजह से नहीं बन सका।
       अपने वाहन पर बैठकर हम बाहर निकले तो अपने ही वाहन पर जा रहे एक मित्र ने हाथ उठाकर अभिवादन में कहा-‘‘हैप्पी न्यू ईयर’।
        हमने औपचारिकता निभाई-‘‘आपको भी बधाई’।
वह बोले-‘‘आज तो जमकर बरसात हो रही है।’’
    हमने कहा-‘‘हां, दक्षिण में थाने नाम का तूफान आया है उसका परिणाम यहां दिखाई दे रहा है। मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया था कि इस तरह की बरसात होगी।’
       वह बोले-‘‘पर दक्षिण तो बहुत दूर है।’’
      हमने कहा‘‘हवाओं को कौन हवाई जहाज या रेल में सवार होना होता है। न ही वह किलोमीटर की माप जानती हैं जो डर जायें। वह तो चलती हैं तो चलती हैं। बादलों को भी कुछ नहंी दिखता। जहां मौका मिला पानी गिरा दिया। वैसे अपने इलाके में पानी की जरूरत है। एक तरह से कहें तो यह नये वर्ष के पहले ही दिन अमृत बरस रहा है।’’
       भले ही सर्दी बढ़ती है पर मावठ की बरसात हमारे उत्तर भारत में अमृत मानी जाी है। यही बरसात न केवल फसलों के लिये सहायक है बल्कि गर्मी तक के लिये भूजल स्तर को भी बनाये रखती है। इस दृष्टि से ईसवी संवत 2012 का नया दिन एक शुभ संदेश लेकर आया है। इतना जरूर है कि ऐसे में घर के बाहर मौज मस्ती करने में बाधा आती है। फिर हमारे देश की सड़कें इस तरह की हैं कि सामान्य स्थिति में भी वहां रात्रि को चलना खतरनाक होता है ऐसे में बरसात का पानी वहां संकट बन जाता है तब दुर्घटनाओं का भय अधिक दिखता है। फिलहाल भारत के दक्षिण के साथ ही जापान में यही दिन खतरनाक परिणामों वाला रहा है। जिस थाने ने उत्तर भारत में अमृतमयी बरसात की है वही दक्षिण में भयंकर उत्पात मचाता रहा है। जापान में भूकंप के तेज झटके अनुभव किये गये हैं। वैसे उत्तर भारत में भी सभी के लिये आरामदायक स्थिति केवल स्वस्थ लोगों के लिये हो सकती है अगर वह संयम के साथ रहें तो, मगर अनेक प्रकार रोगियों के लिये यह ठंड अत्यंत दर्दनाक हो जाती है। कुल मिलाकर हम नया वर्ष या नया दिन पर खुशियां जो मनाते हैं वह केवल मन को बहलाने के लिये है जीवन और प्रकृत्ति का जो रिश्ता है उसका इससे कोई संबंध नहीं है। इस अवसर पर प्रस्तुत है कल लिखी गयी एक कविता-
दिन बीतता है
देखते देखते सप्ताह भी
चला जाता है
महीने निकलते हुए
वर्ष भी बीत जाता है,
नया दिन
नया सप्ताह
नया माह
और नया वर्ष
क्या ताजगी दे सकते हैं
बिना हृदय की अनुभूतियों के
शायद नहीं!
रौशनी में देखने ख्वाब का शौक
सुंदर जिस्म छूने की चाहत
शराब में जीभ को नहलाते हुए
सुख पाने की कोशिश
खोखला बना देती है इंसानी दिमाग को
मौज में थककर चूर होते लोग
क्या सच में दिल बहला पाते हैं
शायद नहीं!
-------------
             वर्ष का बदलना तो कैलेंडर बदलने से ही हो जाता है। हमने कैलेंडर नया खरीदा आज सुबह लगा दिया ताकि अवसर पड़ने पर तारीखें देख सकें। शादी विवाह के निमंत्रण मिलने पर वहां जाने के कार्यक्रम बनाने या किसी त्यौहार पर उसे बाहर मनायें या घर में ही, यह फैसला करने में कैलेंडर बड़ा सहायक होता है। उसमें दूध का हिसाब लिखने का भी काम किया जा सकता है। मन चाहे तो अपना भविष्य फल भी देखा जा सकता है। पुराने साल का जो समय था वह निकल गया। अब नया इसलिये लाये कि शायद उसमें हमारे लिये नया मामला बन जाये। हां मन को बहलाने के लिये यह ख्याल बुरा नहीं है। यह मन ही तो है जो मनुष्य को चलाता है। मनुष्य की बुद्धि को यह भ्रम होता है कि वह उसे चला रही है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, December 19, 2011

बिना पांव का झूठ उड़ता चलेगा-हिन्दी कविता (bina paanv ke jhooth udta chalega-hindi kavita or poem or shayari)

जोर से चिल्लाओं
बेबस, गरीब और मरीजों की सेवा करेंगे,
कुछ कायदे कागज पर छपवाओ
सारे जहान के घर में मेवा भरेंगे।
कहें दीपक बापू
झूठ बिना पांव के
इसलिये उड़ता चलेगा,
तुम ही नहीं
तुम्हारा भाविष्य का खानदान भी
इतिहास के सहारे पलेगा,
अगर चले सत्य की राह
कुब्बत होगी तो
चढ़ जाओगे आसमान पर
वरना गैर ही क्या
अपने ही तुम पर हंसेंगे।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, December 3, 2011

पूरा फोटो दिखाओ, हास्य कविता लिखाओ-हिन्दी हास्य कविता (pura foto dikhao, hasya kavita likhao-hindi comedy poem)

फंदेबाज हांफता हुआ आया और बोला
’’दीपक बापू सभी टीवी चैनलों ने
पाकिस्तान से भारत में आयातित
फिल्म अभिनेत्री का नग्न फोटो दिखाया,
मगर बहुत सारा हिस्सा काले रंग में छिपाया,
आप लिखो इस पर कोई कविता,
शायद आपके ऊपर लगा फ्लाप का ठप्पा मिट जाये,
बहने लगे सफलता की सरिता,
देखो
उसकी हरकातें से अपने देश में
पूरा ज़माना बिगड़ जायेगा,
चारों तरफ नग्न फोटो का जाल छायेगा,
अपनी संस्कृति इस तरह मिट जायेगी,
संस्कारों की जगह संकीर्णता आयेगी,
आज जैसे ज्ञानियों और ध्यानियों पर
अब देश का भविष्य टिका है
कुछ करो
वरना देश की अस्मिता खतरे में पड़ जायेगी।’’

दीपक बापू ने घूरकर फंदेबाज को देखा
फिर मुंह में रखी लोंग चबाते हुए कहा
‘‘कमबख्त,
पहली बात यह है कि हमें ज्ञानी और ध्यानी कहना
एक तरह से मजाक लग रहा है,
या फिर तू तस्वीर देखकर वाकई
हादसे का शिकार हो गया है
इसलिये तेरा तीसरा नेत्र जग रहा है,
वरना क्या हमारी कविताऐं पढ़कर
तू अभी तक समझा नहीं इस बाज़ार का खेल,
खींचना है जिसे आम आदमी की जेब से पैसा
भले ही निकल जाये उसका तेल,
हम किस आधार पर
इस फिक्स निर्वस्त्र धारावाहिक पर
अपनी हास्य कविता लिखें,
बिना पूरी तस्वीर देखे टिप्पणी कर
किस तरह जिम्मेदार शहरी दिखें,
हमने देखा टीवी चैनलों पर
पूरी तस्वीर नहीं दिखा रहे हैं
किसी तरह नैतिकता का पाठ
आज के जवानों को सिखा रहे हैं,
लगता है तेरे को गुस्सा इस बात पर नहीं कि
उसने नग्न फोटो क्यों प्रकाशित कराया,
बल्कि तुझे अफसोस है इस बात का
फोटो खिंचते समय वहां तू नहीं था
इस अफसोस ने तुझे सताया,
बिगड़ा है इस बात पर कि
पूरा फोटो किसी चैनल ने क्यों नहीं दिखाया,
तेरी आंखें तरस गयी
पाकिस्तानी अभिनेत्री का जिस्म देखने के लिये
जिसने अपने देश को नंगपन सिखाया,
मगर गुरु हम भी कम नहीं है,
बाज़ार हमसे लिखवा ले
आधे अधूरे प्रमाण पर
उसमें यह दम नहीं है,
पहले पूरा फोटो लाकर दिखाओ,
हमसे एक फड़कती हास्य कविता लिखाओ,
एक नंगे फोटो से संस्कृति और संस्कारों पर खतरा
दिखाकर हमें न डराओ,
हमारे दर्शन में बहुत ताकत है
यह सभी जानते हैं,
मगर दौलत और शौहरतमंद इंसान
अपनी हवस के लिये
धर्म, संस्कृति और नैतिकता की सीमाऐं
लांघ जाते हैं
यह भी मानते हैं,
अपनी हवस मिटाने के लिये
दुश्मन देश से दोस्ती करते हैं,
फिर बिगड़ जाये तो
यहां आकर देशभक्ति का दम भरते हैं,
क्रिकेट, फिल्म और टीवी के धारावाहिकों में
फिक्सिंग होती है यह सभी को पता है,
फंसते जो लोग उनकी अपनी खता है,
इसलिये आधे अधूरे फोटो पर
हम कुछ नही लिख सकते,
शालीनता और अश्लीलता के बीच
पाखंड बहुत चल रहा है
हम अपने को उसमें फंसते नहीं दिख सकते।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Friday, November 11, 2011

बिग बॉस के घर में स्वामी-हिन्दी हास्य व्यंग्य (a swami in house of big boss-hindi satire article)

           दीपक बापू हाथ में पुराना थैला लेकर सब्जी खरीदने मंडी जा रहे थे। उनके मोहल्ले और मंडी के मार्ग के बीच में एक बहुत बड़ी कॉलोनी पड़ती थी। दीपक बापू जब भी मंडी जाते तो उसी कालोनी से होकर जाते थे। वहां बीच में पड़ने वाले शानदार मकानों, बहुमंजिला इमारतों और किसी नायिका के चेहरे की तरह चिकनी सड़कों पर अपनी साइकिल चलाते हुए वह आहें भरते थे कि ‘काश! हमारा मोहल्ला भी इस तरह का होता’।
         कुछ दिन पहले वह इसी कालोनी में जब गुजरे तब उनकी मुलाकात आलोचक महाराज से हुई तो दीपक बापू ने अपने मन की यही बात उनसे कही थी तो उन्होंने झिड़कते हुए कहा कि-‘‘रहे तुम ढेड़ के ढेड़! यह क्यों नहंी सोचते कि तुम्हारा घर ऐसी कालोनी में होता। वैसे ऐसा घर तुम्हारा भी यहां होता अगर इस तरह की बेहूदी कवितायें लिखकर बदनाम नहीं हुए होते। चाहे जिसे अपना हास्य का शिकार बनाते हो। कोई तुम्हें प्रायोजित नहीं कर सकता। बिना प्रायोजन के कवि या लेखक तो रचनाओं का बोझ ढोले वाला एक गधे की तरह होता है जो कभी अपने तो कभी जमाने का दर्द ढो्रता है।’’
            उस कालोनी में अक्सर आलोचक महाराज का आना होता था और दीपक बापू उनसे मुलाकात की आशंका से भी भयग्रस्त रहते थे। अगर उनको कहंी दूर से आलोचक महाराज दिखते तो वह साइकिल से अपना रास्ता बदल लेते या पीछे मुड़कर वापस चले जाते। आज उन्होंने देखा कि कालोनी में दूर तक सड़क पर कोई नहंी दिखाई दे रहा था-न आदमी न कुत्ता। यह दीपक बापू के लिये साइकिल चलाने की आदर्श स्थिति थी। ऐसे में चिंत्तन और साइकिल एक साथ चलना आसान रहता है। इसलिये आराम से साइकिल पर बैठे उनके पांव यंत्रवत चल रहे थे।
वह एक मकान से गुजरे तो एक जोरदार आवाज उनके कानों में पड़ी-‘ओए दीपक बापू! हमसे नजरें मिलाये बगैर कहां चले जा रहे हो।’’
          दीपक बापू के हाथ पांव फूल गये। वह आवाज आलोचक महाराज की ही थी। उन्होंने झैंपकर अपनी बायें तरफ देखा तो पाया कि चमकदार कुर्ता और धवन चूड़ीदार पायजामा पहने, माथे पर तिलक लगाये और गले में सोने की माला पहने आलोचक महाराज खडे थे। खिसियाते हुए वह आलोचक महाराज के पास गये और बोले-‘‘महाराज आप कैसी बात करते हैं, आपकी उपेक्षा कर हम यहां से कैसे निकल सकते हैं? कभी कभार हल्की फुल्की रचनायें अखबारों में छप जाती हैं यह सब आपकी इस कृपा का परिणाम है कि आपकी वक्रदृष्टि हम पर नहीं है। वैसे यहां आप ‘बिग बॉस निवास’ के बाहर खड़े क्या कर रहे हैं? जहां तक हमारी जानकारी है इस घर में आप जैसे रचनाकारों का घुसना वर्जित है। यहां की हर घटना का सीधा प्रसारण टीवी चैनलों पर दिखता है। आप जैसे उच्च व्यक्त्त्वि इसके अंदर प्रविष्ट होना तो दूर बाहर इस तरह खड़ा रहे यह भी उसके स्तर के अनुकूल नहीं दिखता।’’
           आलोचक महाराज बोलें-‘अच्छा, हमें समझा रहे हो! तुम्हारे जैसे स्तर का महान हास्य कवि यहां से निकल रहा है इस पर भी कोई सवाल कर सकता है। बिग बॉस में ढेर सारी सुंदरियां आती है, कहीं उनको देखने के प्रयास का आरोप तुम पर भी लग सकता है।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘नहीं महाराज, हमें तो कोई जानता भी नहीं है। आप तो प्रसिद्ध आदमी है। बहरहाल हमें आज्ञा दीजिये। बिना आज्ञा यहां पोर्च तक आ गये यही सोचकर डर लग रहा है। निवास रक्षक ने अगर आपत्ति कहीं हमें पकड़ लिया तो आप हमें यहां बुलाने की बात से भी इंकार कर पहचानने ने मना कर देंगे।’’
आलोचक महाराज बोले-‘‘आज हम यहां स्वामी आगवेशधारी का इंतजार कर रहे हैं। उनको हमने बिग निवास में प्रवेश दिलवाया है। उनको समझाना है कि क्या बोलना है, कैसे चलना है? तुम जानते हो कि हम तो अब कंपनियों के पटकथाकार हो गये हैं।’’
           दीपक बापू बोले-‘‘स्वामी आगवेशधारी का यहां क्या काम है? वह तो गेरुऐ वस्त्र पहनते है और उनका अभिनय से क्या वास्ता है?’’
           आलोचक महाराज बोले-‘तुम इसलिये फ्लाप रहे क्योंकि तुम बाज़ार और प्रचार का रिश्ता समझे नहीं । अरे, दीपक बापू आजकल वही कंपनियां साहित्य, कला, राजनीति, धर्म और फिल्म में अपना पैसा लगा रही हैं जो हमें सामान बनाकर बेचती हैं। टीवी चैनल और अखबार भी उनकी छत्रछाया में चलते है। वही समाज में सक्रिय अभिनेताओं, स्वामियों, लेखकों, चित्रकारों और समाज सेवकों को प्रायोजित करती है। किसको कब कहां फिट कर दें पता नहीं। फिल्म और टीवी की पटकथा तक कंपनियां लिखवाती हैं। आदमी इधर न खप सका तो उधर खपा दिया। स्वामी धर्म और समाज सेवा के धंधे में न चला तो अभिनेता बना दिया। हमे क्या? हम तो ठहरे रचनाकार! जैसा कहा वैसा बना दिया।’’
           दीपक बापू अवाक खड़े होकर सुनते रहे फिर बोले-‘‘महाराज अब हमारे समझ में आया कि हम फ्लाप क्यों हैं? इतना बड़ा राज हमने पहली बार सुना। यह आगवेशधारी स्वामी तो कभी गरीब बंदूकचियों की दलाली करता था। फिर यह इधर हमारे तीर्थयात्रियों पर कुछ अनाप शनाप बोला। बाद में समाज सुधार आंदोलन में चला आया। वहां उसने अपने ही लोगों को पिटवाने का इंतजाम करने का प्रयास किया। बाहर किया गया। फिर कहीं श्रीश्री के यहां मौन व्रत पर चला गया। अब फिर इधर बिग बॉस के घर आ रहा है। अपने समझ में अभी तक नहीं आया। यह बाज़ार और प्रचार का मिलाजुला खेल है।’’
           आलोचक महाराज बोले-‘‘तुम्हारी समझ में नहीं आयेगा! तुम्हारी बुद्धि मोटी हैं। तुम्हें इतना पहले भी कई बार समझाया कि हमारे यहां बंदूकची हों या चिमटाधारी समाज सेवा में लगें या विध्वंस मे,ं आदमी का प्रायोजन तो कंपनियां ही करती हैं, पर तुम अपनी हास्य कविताओं तक ही सीमित रहे।’’
इतने में दीपक बापू ने देखा कि एक गेरुए वस्त्रधारी पगड़ी पहने एक स्वामी कार से उतर रहे हैं। आलोचक महाराज दनदनाते हुए वहां पहुंच गये और बोले-‘‘आईये महाराज, आईये महाराज! बिग बॉस के घर में आपका स्वागत है।’’
          स्वामी ने कहा-‘‘तुम बिग बॉस हो। लगता तो नहीं है! बिग बॉस तो जींस पहने, काला चश्मा लगाये और सिर पर टोपी धारण करने वाला कोई  जवान आदमी होना चाहिए। तुम तो जैसे कुर्ता पायजामा पहनने के साथ माथे पर तिलक लगाये और सोने की माला पहने कोई नेता लग रहे हो।’
        आलोचक महाराज बोले-‘हुजूर बिग बॉस वास्तव में कौन है पता नहीं! अलबत्ता चाहे इस घर में विज्ञापन मैनेजर जिस अभिनेता को चाहते हैं वही बनकर हमारे सामने आता है। अब बताईये इस कंपनी राज में बिग बॉस भला कभी दिखता है? यहां तक कंपनियों के बॉस भी अपने को दूसरे नामों से पुकारे जाते हैं। हां, आपकी भूमिका मुझसे ही लिखवाई गयी थी। एक कंपनी ने कहा कि हमारा प्रायोजक आदमी इस समय फालतु घूम रहा है उसे काम दो। वह समाज सुधार में फ्लाप हुआ तो गरीबों के उद्धार में उसके सामने पैंच आ जाते हैं ? आपका चेहरा जनता के सामने से गायब न हो जाये इसलिये किसी टीवी धारावाहिक में उपयोग करें। इसलिये हमने तय किया कि आपको बिग बॉस से अच्छी जगह नहीं मिल सकती।’
          स्वामी ने कहा-‘कोई बात नहीं। इस समय मेरा समय ठीक नहीं चल रहा है। बिग बॉस के घर से अपनी छवि सजाकर फिर समाज सेवा करने जाऊंगा। वैसे मुझे तुम्हारे लिखे डायलाग की जरूरत नहीं है। मेरे पास अपना अध्यात्मिक ज्ञान बहुत हैं।’’
          आलोचक महाराज बोले-‘महाराज, वह ठीक है। डायलाग लिखना मेरा काम है। आप अपने चाहे मेरे लिखे बोलें या अपने सुनायें पर नाम मेरा ही होगा।’’
           स्वामी ने दीपक बापू की तरफ देखते हुए पूछा-‘‘यह बूढ़ा आदमी यहां क्या कर रहा है?’’
आलोचक महाराज ने कहा-‘यह एक फ्लाप हास्य कवि है। काम मांगने आया था। मैंने कहा कि हमें तो हमारे महाराज मिल गये अब तुम निकल लो।’’
           स्वामी ने कहा-‘‘अच्छा किया! मुझे हास्य कवियों से नफरत हैं। वैसे यह फटीचर धोती, कुर्ता और टोपी पहने हुए है। इससे बिग बॉस के घर क्या बरामदे तक नहीं आने देना चाहिए। कुछ हास्य कवियों ने मेरा मजाक बनाया है इसलिये उनसे चिढ़ हो गयी है।’
        आलोचक महाराज ने वहां से दूर ले जाकर दीपक बापू से कहां-‘‘निकल लो गुरु तुम यहां से! तुमने इस पर एक हास्य कविता लिखी थी। हमने इंटरनेट पर पढ़ी है। अगर कहीं तुम्हारा नाम इसे पता चला तो हो सकता है एकाध चमाट मार दे।’’
        दीपक बापू बाहर निकलते हुए बोले-सच कहते हो आलोचक महाराज। यह बिग बॉस का निवास और इधर यह स्वामी! फिर आपकी मौजूदगी! हमारे लिये यहां हास्य कविता लायक लिखने का विषय हो नहीं सकता। गंभीर चिंत्तन और दर्दनाक रचनायें हमसे होती नहीं हैं। सो हम तो चले।’’
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, October 16, 2011

सुरसा महंगाई से कौन करेगा लड़ाई-हिन्दी कविताएँ (sursa mehangai se kaun karega ladai-hindi kavitaen)

जरूरत चीजों की दामों में महंगाई पर
उनको फिक्र नहीं है,
गरीब के दर्द का उनके बयानों में जिक्र नहीं है,
मगर फिर भी देशभक्ति दिखाने का नारा दिये जाते हैं,
कौन समझायें उनको
वफादारी के सबसे बड़े सबूत हैं कुत्ते
वह भी रोटी न देने पर गद्दार हो जाते हैं।
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बरसों से सुन रहे हैं
सुरसा की तरह बढ़ रही महंगाई,
इंतजार है हमें
कोई हनुमान आकर करे लड़ाई।
इंसानों में फरिश्ते नहीं होते,
हुक्मराम और प्रजा में बराबर के रिश्ते नहीं होते,
महलों में बैठे लोग
मशगुल हैं अपने ही आप में
कभी लड़ते लूट की कमाई पर
कभी करते एक दूसरे की बड़ाई।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Tuesday, August 9, 2011

कोई एक आयेगा-हिन्दी कविता (wait for one man army-hindi poem)

कोई एक हाथ ऐसा
आकाश से आयेगा,
जो हालात सुधार जायेगा
बाकी सभी हाथ सामान बटोरते रहेंगे।

कोई एक पांव जमीन पर
चलकर
सभी कांटों को कुचल जायेगा,
बाकी पांव मखमली घास पर चलते रहेंगे।

कोई एक इंसान
फरिश्ता बनकर मजबूरों का
सहारा बन जायेगा,
बाकी इंसान अपने घरों में सांस लेते रहेंगे।

यह सोच कितना अजीब है ज़माने का
एक अकेला सर्वशक्तिमान
यह दुनियां चला रहा है
वैसे ही उसका कोई एक कारिंदा
उनके टूटते हुए घर बचायेगा,
धरती के लोग तो
एक दूसरे को उजाड़ते रहेंगे।

अपनी चाहतों के जाल में फंसे लोग
ताक रहे इधर उधर
 कोई चूहा आकर आज़ाद करायेगा,
वह तो बेसुध होकर नाचते रहेंगे।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, August 4, 2011

आज की कहानियों के दर्पण में समाज का प्रतिबिंब-हिन्दी लेख (today hindi story on TV chianal'episod and society)

          हिंदी में जो भी टीवी चैनल हम देखते हैं उसमे प्रसारित हास्य हो या सामाजिक पृष्ठभूमि वाला धारावाहिक, उनकी कहानियों का आधार बड़े शहरों की बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले लोगों की दिनचर्या ही होती है। कहा जाता है की साहित्य समाज का दर्पण है और इन कहानियों को यदि साहित्य माना जाये तो फिर कहना पड़ेगा कि पूरा भारत एक सभ्य और सम्पन्न देश है। छोटे शहरों, गांवों और गली, मुहल्लों और छोटे बाजारों का अस्तित्व ही मिट चुका है। इसका आभास बहुत कम बुद्धिजीवियों को होगा कि वह बड़े शहरों से बाहर जिस समुदाय को केवल प्रयोक्ता या उपभोक्ता समझकर चल रहा है, वह छोटे शहरों और गांवों में रहता है वह मानसिक रूप से धीरे धीरे इस बात को समझता है कि देश के बड़े शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी, रचनाकार, साहित्यकार, चित्रकार और फिल्मकार उसके साथ विदेशी जैसा व्यवहार कर रहे हैं। देखा तो यह भी जा रहा है कि हमारे देश के प्रसिद्ध बौद्धिक पुरुष किसी न किसी विदेशी समाज की सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा आर्थिक विचारधारा से प्रभावित होकर अपना काम करते हैं। छोटे शहरों में रहने वाले लेखक, कवि, रचनाकार तथा कलाकार भी इस बात को मानते हैं कि बड़े शहरों का न होने के कारण उनको कभी राष्ट्रीय परिदृश्य पर नहीं आ सकते। इस तरह हम देश में एक वैचारिक विभाजन देख सकते हैं।
            देश का शक्तिशाली बौद्धिक तबका अभी इस बात कि परवाह नहीं कर रहा है क्योंकि उसको लगता है कि देश में किसी भी प्रायोजित मुद्दे पर अपनी मुखर आवाज के दम पर चाहे जब लोगों को अपनी लय पर चला सकता है क्योंकि प्रचार माध्यम तो आखिर बड़े शहरों में ही चल रहे हैं और वहाँ केवल उसकी आवाज ही गूँजती है। सच कहें तो ऐसा लगता है कि देश केवल महानगर और राजधानियाँ रह गई हैं और छोटे श्हर उनके शासित प्रजा जहां के लोगों का अस्तित्व बेजुबानों से अधिक नहीं है।
                      कालांतर में इसके भयावह परिणाम होंगे। अभी तक देश का कथित बौद्धिक समुदाय सभी देश प्रेम तो कभी हादसों के समय समस्त लोगों को आंदोलित कर लेता है पर जैसे जैसे अधिक से अधिक लोगों में अपने छोटे शहर या गाँव की उपेक्षा का भाव होने की अनुभूति बढ़ती जाएगी वह उनके उठाया मुद्दों से विरक्ति दिखन लगेगा।
             टीवी चैनलों की कहानियों और कथानक साहित्य नहीं होते यह हम विशाल भारत की स्थिति को देखें तो साफ दिखाई देता है। विदेशी प्रष्ठभूमि की कहानी को देशी पात्रों के मिश्रण से तैयार करना वैसे भी साहित्य नहीं होता। व्यावसायिक रूप से यह इसलिए लाभप्रद दिखता है क्योंकि जिस हालत में रहता है उसे विपरीत कहानी देखना और सुनना चाहता है। भारत में छोटे शहरों में रहने वाले लोग बहुमंजलीय इमारतों में रहने वाले पात्रों को इसलिए देखते हैं क्योंकि उनके घर वैसे नहीं हैं और न वैसा माहोल मिलता है। कालांतर में वह इससे उसक्ता जाएगा और तब चित्तन और मनन का जब दौर चलगा तब उसका सोच अपनी उपेक्षा की तरफ जाएगा। तब देश के कथित बौद्धिक समुदाय के मुद्दों पर ऐसी प्रतिक्रिया नहीं देगा जैसी वह अपेक्षा करेगा।

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, July 6, 2011

गरीब की झुग्गी, अमीर का आशियाना-हिन्दी शायरी (garib ki jhuggi aur amir ka ashiyana-hindi shayri)

पहले अपनी फिक्र और
फिर अपनों की चिंता में
बड़े लोग महान बनते जा रहे हैंे,
कहीं पूरी बस्ती
कहीं पूरे शहर
खास पहचान लिये
इमारतों से तनते जा रहे हैं।
वहां बेबस और लाचार
आम इंसान का प्रवेश बंद है,
हर आंख पसरी है उनके लिये
जिनके पास सोने के सिक्के चंद हैं,
दब रही है गरीब की झुग्गी
अमीरी के आशियाने उफनते आ रहे हैं।
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Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
--------------
आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Friday, April 22, 2011

भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन-हास्य कविता (bhrashtachar ke virodh mein andolan or anti corruption movement-hasya kavita)

समाज सेवक ने अपने चेले को
बुलाकर डांटते हुए कहा
‘‘ यह अखबार में मैंने खबर पढ़ी है
तुम्हारी बीवी भ्रष्टाचार के विरोध में
चौराहे पर आंदोलन लिये खड़ी है,
उसे जाकर बताना
मेरे ही दम पर तुम्हारी रोटी बनाने वाली आग जल रही है
मेरे ही पैसे से खरीदे मेकअप के सामान से
उसकी खूबसूरत शक्ल पल रही है,
उससे कहो भ्रष्टाचार का विरोध छोड़कर,
आंदोलनकारियों से नाता तोड़कर,
अपना घर संभाले
या फिर यहां से होकर विदा तुम संभालो।’

चेला बोला
‘महाराज,
लगता है कि
आप नयी राजनीति समझ नहीं पाये,
इसलिये आपके विरोधी सभी जगह छाये,
आजकल भ्रष्टाचार का विरोध बन गया फैशन,
नहीं उसका रिश्वत रोकने से कोई कनेक्शन,
इधर समाज सेवा संभालने के लिये
पैसा जरूरी है
तो गरीब से भी नहीं रखना दूरी है,
अगर समाज पर काबू रखना है,
प्रसिद्धि और पैसे की मलाई चखना है,
तो आम लोगों के लिये
भ्रष्टाचार के विरोध में आंदोलन चलाकर
उनका मन भी बहलाना है,
अपनी हरकतें छिपाने के लिये
उनका समर्थन करने का भी करना जरूरी बहाना है,
कुछ ईमानदार दिखने वाले चेहरे
आंदोलन में सजाये गये हैं,
सोच से पैदल हैं पर विद्वान बताये गये हैं,
मैं आपका सेवक हूं वहां नहीं जा सकता,
वरना मेरे साथ आपका भी नाम
बदनामी की दलदल में फंसता,
इसलिये बीवी को वहां भेजकर
आपका अस्तित्व वहां बचाया है,
इससे हम चाहे जैसे आंदोलन को मोड़ देंगे
मन में आया तो तोड़ देंगे,
इसलिये आप बेफिक्र रहो
अपना घर भी भरते रहो, हमें भी पालो।’’
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Monday, April 4, 2011

नकली कप की खुशी भी नकली-हिन्दी व्यंग्य लेख (nakli cup ki khushi bhi nakli-hindi vyangya lekh)

मुंबई में संपन्न विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता 2011 के फायनल या अंतिम मुकाबले में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की टीम की जीत पर नकली कप दिया जाना कोई बिना सोची समझी बात नहीं थी अब इस पर विश्वास करना कठिन है। कप लाने वाले जानते थे कि उसे कस्टम वाले रोक लेंगे। अधिकारियों के टीवी चैनलों पर दिये गये बयान की बात माने तो उसे वापस लेने के कोई प्रयास नहीं किये गये। उनको शुल्क मुक्त के लिये कोई आवेदन भी नहीं मिला। आईसीसी का बयान है कि उस नकली कप को अब वह दुबई में अपने मुख्यालय ले जायेगी। इसका मतलब कि कोई ऐसी चाल है जिसका पता नहीं चल पा रहा।
यह सही है कि वह कप भारत में नहीं  रहना था। केवल प्रतीक के रूप में कप्तान को दिया जाना था। यह नियम भी है कि असली कप एक बार कप्तान अपने हाथ में लेता है और अपने खिलाड़ियों से मिलकर फोटो खिंचवाता है। फिर उसे वापस करने दूसरा कप दिया जाता है जो विजेता देश के पास रह जाता है। जो कप मिल गया वही मिलना था पर सवाल है कि औपचारिकता क्यों नहंी निभाई गयी?
इस विषय पर लिखे गये लेख का सर्च इंजिन पर पीछा करते हुए गये तो पता चला कि पाकिस्तान के कुछ लोगों ने एसएमएस अभियान चला रखा है। मतलब वहां खुशी का माहौल है कि भारतीयों को नकली कप मिला। वह निहायत मूर्ख हैं, उनको यह मालुम नहीं कि यह घटना भी उनको खुश करने के लिये प्रायोजित की गयी हो सकती है। पाकिस्तान सेमीफायनल में भारत से हारा जो कि विश्वकप मुकाबलों में उसकी पांचवीं हार है। बीस ओवरीय विश्व कप प्रतियोगिता का मैच जोड़ा जाये तो यह उनकी छठवीं हार है। अब यह अलग बात है कि वह स्वयं अपने खिलाड़ियों पर ही हार फिक्स करने का आरोप लगाते हैं। यह नकली कप भी फिक्सिंग का मामला लगता है। यह असली है या नकली यह अलग विषय है पर पाकिस्तान की हार एक सच है जो वहां के लोगों को माननी ही पड़ेगी।
आईसीसी का मुख्यालय दुबई में हैं जहां के शिखर पुरुषों की पाकिस्तान से हमदर्दी जगजाहिर है। पाकिस्तान में बैठे भारत विरोधियों को मिलने वाला उनका संरक्षण भी किसी से छिपा नहीं है। क्रिकेट को काला करने में दुबई के धनपतियों का हाथ रहा है और भारत इसी कारण उनके यहां मैच नहीं खेलता। कहीं न कहीं यह बात दुबई के धनपतियों को अखरती है। फिर पाकिस्तान में बैठे कुछ लोगों को भारत की हार से चिंता है क्योंकि वह भारत विरोध के कारण ही वहां रह रहे हैं। कहीं न कहीं क्रिकेट की फिक्सिंग में भी उनका नाम आता है। ऐसे में संभव है कि गोरे अंग्रेजों के साथ मिलकर उन्होंने भारत की खिल्ली उड़ाने की यह घटिया योजना बनाई हो हालांकि इससे इतिहास पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। भारत का विश्व कप जीतना उनके लिये असहनीय घटना है। फिर क्रिकेट का भारत सबसे बड़ा धनदाता है पर धनपतियों के तार कहीं न कहीं दुबई और पाकिस्तान से भी निकलते हैं।
यकीनन यह प्रचार में स्कोर का मामला है। इस विश्व कप में पाकिस्तान पिट गया, संयुक्त अरब अमीरात की टीम को शामिल होने का अवसर ही नहीं मिला। दुबई में धनपतियों को अपने दो नंबर के धंधे चलाने हैं। सो यह दुबई और पाकिस्तान के लोगों को खुश करने के लिये किया गया नाटक लगता है कि भारत को नकली कप थमा दिये जाने का समाचार रचा गया। सच यह है कि इसे नकली कप नहीं कहा जा सकता। मिलना तो यही था अलबत्ता औपचारिकता वश आईसीसी का मूल कप न दिया जाना अच्छी बात नहीं है। मगर यह इतनी भी नहीं कि इसे तूल देकर विरोधियों को खुश किया जाये। अलबत्ता असली बात सामने नहीं आ पायेगी क्योंकि हमारे देश में क्रिकेट और उसका व्यापार अलग अलग अभी तक नहीं माने गये पर सच यही है कि क्रिकेट के व्यापारी सभी को खुश रखने का प्रयास कर रहे हैं। व्यापारी आदमी सभी को खुश करता है। वह यहां भी देता है वहां भी देता है। यहां भी लोगों को खुश करता है वहां भी करता है। पाकिस्तान के लोगों को हिन्दी देवनागरी नहीं आती और हम रोमन में लिखने वाले नहीं है जैसा कि वह लिख रहे हैं। वह हम पर हंस सकते हैं पर ऐसा करके हमेें भी अपने पर हंसने का अवसर दे रहे हैं। अगर कोई पाकिस्तानी इसे रोमन में पढ़े तो यह जान ले कि इस पाठ का लेखक प्रतिदिन सुबह हास्यासन करता है और अगले कुछ दिन तक पाकिस्तानी एक विषय रहेंगे। वैसे उन्हें भी खुश होने का हक है भले ही वह नकली कारण से क्यों न हो?
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Friday, December 10, 2010

तालियां और गालियां-हिन्दी व्यंग्य कविता (taaliyan aur galiyan-hindi vyangya kavita)

भीड़ में जाकर अपने भ्रष्टाचार को
शिष्टाचार समझ जो लोग पी जाते हैं,
मंचों पर वही नैतिकता का पाठ
सुनाकर तालियां बजवाते हैं।
अपने किस्से जब होते हैं आम
तब सफाई में दिखाते खानदान का ईमान,
जब दूसरे पर लगे इल्ज़ाम
उसके लिये तख्ती पर गालियां लगवाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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Friday, December 3, 2010

सपना जगा है-हिन्दी कवितायें (sapna jaga hai-hindi kavitaen)

ईमानदारी की बात करते हुए
अब डर लगने लगा है,
अपना चाल चलन भी
अब शक के घेरे लगता है,
सुला दिया है इसलिए सोच को
आंखें खुली हैं मगर सपना जगा है।
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आओ, कुछ किताबों में लिखे
कल्पित नायकों को
दूनियां के सच की तरह रच लें,
लोग उनको ढूंढते रहें,
हम दोस्त बनकर
उनके घर की दौलत लूटते रहें,
इस तरह पहरेदारों से बच लें।
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बेईमान और ईमानदारी के फर्क को
अब कोई इंसान नहीं जानता है,
उच्च चरित्र की बातें किताबों में
पढ़ते हैं सभी
मगर जिंदगी में हर कोई
चादर के बाहर पांव तानता है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
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