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Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
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आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 20, 2010

भलाई का धंधा आजकल चोखा है-हिन्दी व्यंग्य कविता (bhalai ka dhandha aajkal chokha hai-hindi vyangya kavita)

पूरे ज़माने की तरक्की करने का दावा
अपने आप में बस, एक धोखा है,
बिक जाता है आम इंसानों के बीच
यह नारा केवल वादों की कीमत पर
भलाई का धंधा आजकल बहुत चोखा है।
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एक धोखा देकर चला गया
दूसरा विश्वास निभाने का वादा लेकर आया,
उसने धोखा दिया तो
पहला फिर दिल औद दल बदल का आया,
अपने चेहरे पर उसने नया नकाब लगाकर,
जुबां पर नया वादा सजाया,
इस तरह सिंहासन का चक्र
भलाई के धंधे में समाया
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Sunday, September 19, 2010

एकता की अपील-व्यंग्य कविता (ekta kee apeel-hindi vyangya kavita

फिर हुआ है शहर में विस्फोट
इसलिये
आओ एकता की अपील के लिये
कुछ नये शब्द चुनें
जिनसे नयापन लगे
तभी लोगों को समझा पायेंगे।
एक जैसे शब्द लिखते हुए
बीत गये बहुत सारे वर्ष
इसलिये उनका प्रभाव नहीं दिखता
हम होंगे कामयाब तभी
जब नयापन लायेंगे।
हादसे रोकना हमारे बस में नहीं है
पर एकता की अपीलों में
हम अपना पूरा दम दिखायेंगे।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, August 22, 2010

मतलब का सरफरोश-हिन्दी शायरी (matlab ka sarfarosh-hindi shayari)

लुट रहे हैं शहर, मगर हर आदमी खामोश है,
खुलेआम खंजर चलते, जैसे कि ज़माना बेहोश है।
सरेराह खज़ाना लुट गया, किसी ने देखा नहीं,
पहरेदारों के हिस्सा मिल जाने पर बहुत जोश है।
हर शहरी डरा हुआ है हादसों के खौफ से,
मगर कातिलों की नज़र न पड़े, इसलिये खामोश है।
दीपक बापू ढूंढ रहे जिंदा दिल को सड़कों पर,
दौड़ती भीड़ में हर कोई, अपने मतलब का सरफरोश है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, August 14, 2010

भूत पर यकीन-हास्य कविता (bhoot par yakin-hasya kavita)

पोते ने दादा से पूछा
‘‘अमेरिका और ब्रिटेन में
कोई इतनी भूतों की चर्चा नहीं करता,
क्या वहां सारी मनोकामनाऐं पूरी कर
इंसान करके मरता है,
जो कोई भूत नहीं बनता है।
हमारे यहां तो कहते हैं कि
जो आदमी निराश मरते हैं,
वही भूत बनते हैं,
इसलिये जहां तहां ओझा भूत भगाते नज़र आते हैं।’’

दादा ने कहा-
‘‘वहां का हमें पता नहीं,
पर अपने देश की बात तुम्हें बताते हैं,
अपना देश कहलाता है ‘विश्व गुरु’
इसलिये भूत की बात में जरा दम पाते हैं,
यहां इंसान ही क्या
नये बनी सड़कें, कुऐं और हैंडपम्प
लापता हो जाते हैं,
कई पुल तो ऐसे बने हैं
जिनके अवशेष केवल काग़ज पर ही नज़र आते हैं,
यकीनन वह सब भूत बन जाते हैं।’’
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Thursday, August 12, 2010

एकता की मेलागिरी-हिन्दी हास्य कविता (ekta ki melagiri-hindi hasya kavita)

च्रेले ने कहा गुरु से
‘आप समाज में एकता की बात
हमेशा लोगों के सामने चलाते हो,
उनसे तालियां बजवाते हो,
पर एक बात समझ में नहीं आयी
आप ही जाति, भाषा और धर्म का नाम लेकर
लोगों के आपस में बंटे होने की तरफ
करते हैं इशारा,
जबकि क्या आम इंसान आपस में लड़ेगा
इन छोटी बातों को लेकर
वह तो काम से फुर्सत नहीं पाता बिचारा,
कभी कभी अपने समाज की
तरक्की का प्रश्न भी उठाते हो,
फिर भी एकता के मसीहा नाम से जाने जाते हो।’
सुनकर गुरुजी बोले,
कमबख्त!
इतने साल से करता रहा है चेलागिरी,
सीख नहीं पाया यह एकता की मेलागिरी,
आम इंसान को कहां फुरसत है
जाति, भाषा और धर्म के नाम लड़ने की
पर हमें जरूरत है उसके दिमाग में
एकता का भूत जड़ने की,
हर समाज में जाकर उसके उत्थान की
बात हम यूं ही करते हैं,
बंटे रहें लोग इसी तरह
अपने समाज की चिंता में वही मरते हैं,
एकता लाने के लिये
उनमें फूट डालना जरूरी है,
अपना घर भरने के लिये
आम इंसान की जेब की लूट जरूरी है,
नहीं दिखायेंगे टुकडे़ टुकड़े समाज के,
बज जायेंगी बाजे अपने राज के,
एकता का मसीहा
जंग के बिना संभव नहीं,
यह बात तुम क्यों नहीं समझ पाते हो।।
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Wednesday, June 23, 2010

बगुला भगत-हास्य कविताएँ (bagula bhagat-hindi hasya kavitaen)

सच्चे भक्त हैं जो लोग
भला वह कहां अपनी ताकत
दिखाने चौराहे पर आते हैं,
जो आकर भीड़ जुटायें
इंसानों को भेड़ बनाकर
वही बगुला भगत कहलाते हैं।
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वह भगत था पर बगुला न बना
इसलिये बगुला ही भगत बन गया,
करता रहा जो रोज भक्ति का शिकार,
हर शहर में उसका आशियाना तन गया।
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Saturday, May 29, 2010

फरिश्ता और हैवान-हिन्दी शायरी (farishta aur haivan-hindi shayari)

इंसानों में फरिश्ता दिखने की चाहत
उसे हैवान बना देती है,
बात करते हैं जो लोग सभी के भले की
मशहूरी पाने की उनकी चाहत
बंदूकें हाथ में थमा देती है।
मज़दूरों और गरीब की
इबादत करने का दिखावा है उनका
उनके बिछाये बम की धमक
बेबसों को भी लाश बना देती है।
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Monday, May 24, 2010

ज़िंदगी का सबसे बड़ा अर्थ-हिन्दी शायरी (zindagi ka arth-hindi shayari)

जो चले हैं स्वयं कालिख की राह,
उनसे स्वच्छ चरित्र के लिये
प्रमाण पाने की चाह,
एकदम व्यर्थ है,
काला अक्षर भैंस बराबर मानते जो लोग
उनके लिये गाय के गुण में भी अनर्थ है।

हर इंसान ढूंढता है
अपने ही जैसे साथी
अच्छा यह बुरा होना नहीं कोई शर्त है।

दागदार है जिनके चरित्र
रंगीन कहलाते हैं खुद को
साफ चेहरे उनको कबाड़ नज़र आते हैं,
रंगे हैं हाथ जिनके खून से
आत्मीय उनके बन जाते हैं,
बदनाम न हो इसलिये
लगाते हैं पैबंद इनामों का,
मुश्किल हो जाये तो उनके लिये
झूंड चल पड़ता लड़ने बेईमानों का
उनसे दरियादिली की आशा करना बेकार है
अपना साम्राज्य हर कीमत पर बचाने में ही
उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा अर्थ है।
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Thursday, May 6, 2010

अकेले में कब तक मस्ती मनाओगे-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (masti ki basti-hindi vyangya kavitaen)

ज़माने से अलग कब तक
अपनी बस्ती मनाओगे,
मुश्किल यह है कि
सभी इंसानों के जीने का एक ही सलीका है,
तन्हाईयों में हमेशा रहना कठिन है
दर्द और खुशियां
भीड़ में आने का यही तरीका है,
अकेले में कब तक मस्ती मनाओगे।
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समझौतों से जिंदगी में
ऊब आ जाती है,
बगावत करने पर
जिन्दगी तन्हाई के खतरे में घिर जाती है।
हालत बदलने का ख्याल अच्छा है
पर इंसानी फितरत बदलने में
बहुत मुश्किल आती है।
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समय बदलता है ज़माने को
पर कुछ इंसान उसके लिये
जद्दोजेहद कर रहे हैं,
फुरसत में समय बिताने के लिये
यह अच्छा काम है,
खाली वक्त में खाली जगह पर
बदलाव के नारे भर रहे हैं।
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Sunday, April 11, 2010

अपने अरमानों का आसमान-हिन्दी शायरी (apne araman ka asman-hindi shayri)

उन पर क्या एतबार करें
जो यकीन की बाज़ार कीमत
लगाये जाते हैं,
वफादारी की कसमें खाते हैं रोज
पर किसी से निभाई हो
इसका सबूत नहीं देते
क्या वह रिश्ता निभायेंगे
प्यार और दोस्ती का
जो पहले अपनी जरूरत पूरी करने का
शोर मचाये जाते हैं।
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इस दुनियां में रिश्तों का
मतलब इतना ही रह गया है कि
खुद निभा सको तो निभाओ,
वरना अपने हों या गैर
सारे रिश्ते समय के साथ भूल जाओ।
अपने ऊपर बेवफाई का आरोप न आने देना
रिश्तों का नाम भी रहते लेना
मगर अरमानों का अपना आसमान
उनसे बहुत दूर लगाओ।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
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Wednesday, February 10, 2010

बड़े लोगों की बेहतर बातों पर चिंतन-हिन्दी लेख (behtar baton par chintan

प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार कृष्णा सोबती और और नाटककार बादल सरकार ने पद्मविभूषण की उपाधि लेने से इंकार कर दिया है।  उनके द्वारा यह सम्मान न लेने का कारण चाहे जो भी हो पर सच यह है कि ऐसे रचनाकार तथा कलाकार इतना सृजन कर चुके  होते हैं कि कोई भी सम्मान या पुरस्कार उनके सामने छोटा होता है।  वैसे हमारे यहां चाहे निजी क्षेत्र के हों या सार्वजनिक क्षेत्र के सम्मान अब धीरे धीरे अपना महत्व खोते जा रहे हैं।  इसका कारण यह है कि अगली पीढ़ी को साहित्य सृजन, कला, संगीत तथा समाज सेवा के लिये प्रेरित करने का उद्देश्य इनसे अब पूरा नहीं किया जाता बल्कि इसके पीछे आत्मप्रचार का भाव अधिक रहता है।
दरअसल यह सम्मान ऐसे लोगों को दिया जाना चाहिये जिन्होंने अपने क्षेत्र में वास्तविक रूप से असाधारण कार्य किया और वह उस पुरस्कार से बड़े हों जो दिया जा रहा है ताकि लोग यह समझ सकें कि राज्य, समाज, आर्थिक तथा इतिहास सामाजिक महत्व के लिये कार्यों को सराहता है।  सीधी भाषा में कहें तो किसी असाधारण व्यक्त्तिव को प्रभावित या प्रसन्न करने की बजाय उससे अगली पीढ़ी प्रेरणा ले, यही पुरस्कार या सम्मान प्रदान करने का  उद्देश्य होना चाहिये।  जबकि ऐसा हो नहीं रहा है।  इसके बावजूद जो लोग साहित्य सृजन, कला, संगीत-फिल्मी संगीत नहीं जी-तथा समाज सेवा कर रहे हैं उनकी प्रशंसा की जाना चाहिऐ।  उस पर  ऐसे पुरस्कारों को उनके द्वारा नकारा जाना उनके असाधारण होने का ही प्रमाण है।
प्रोफेसर यशपाल भी ऐसे महानुभावों में हैं जिनका हर वाक्य दिल को छू लेता है।  विज्ञान में महारथ हासिल करने वाले प्रोफेसर यशपाल का मानना है कि तकनीकी शिक्षा पर इतना जोर भी नहीं दिया जाना चाहिये कि  लोग साहित्य, कला या संगीत से परे हो जायें।  उनका यह मानना है कि शैक्षणिक स्थानों पर रैगिंग की प्रवृत्ति इसलिये बढ़ रही है कि लोग रचनात्मक प्रवृत्ति से दूर है।
यह एकदम सच बात है कि हमने अध्यात्मिक साहित्यक विषय  को बड़ी उम्र में अपनाने योग्य मानकर अपने समाज का सत्यानाश किया है।  जब रैगिंग की हृदय विदारक घटनायें सामने आती हैं तब मन में क्रोध भर जाता है।  हम हर क्षेत्र में धर्म की बात लेने के विरुद्ध हैं पर जब रैगिंग की बात आती है तो उसे धर्म विरोधी कहने में संकोच क्यों कर जाते हैं? क्या लगता है कि इससे समाज के युवा वर्ग में हमारी छबि खराब होगी।  इस मूर्खतापूर्ण प्रवृत्ति को रोकने के लिये हम धर्म को अस्त्र शस्त्र की तरह उपयोग में लाने के विरुद्ध नहीं है।  नये लड़के लड़कियों को स्पष्ट रूप से यह बात अपने वरिष्ठ साथियों के समक्ष कह देना चाहिये कि रैगिंग के नाम पर उनकी छोटी से छोटी बात भी नहीं मानेंगे क्योंकि वह उनके धर्म के विरुद्ध है भले ही रैगिंग करने वाले उनके सहधर्मी हों। वरिष्ठ छात्र भले ही दावा करें कि वह भी उसी धर्म की बात मानते हैं तो उनको बता देना चाहिये कि वह इस मामले में कच्चे हैं।  हो सके तो अपने गले में गेरुए रंग का साफा डाले लें। उस पर कोई धार्मिक चिन्ह लगा लें या फिर माथे पर तिलक लगाकर तब तक उस शैक्षणिक संस्था में रहें जब तक पुराने छात्रों की श्रेणी में न आ  जायें। कहने का आशय यह है कि अपने व्यक्तित्व के तेजस्वी या दूसरे शब्दों में कहें कि  आक्रामक होने की अनुभूति करायें।  वैसे भी  गेरुए रंग कसे वी होने का प्रमाण माना जाता है।
दूसरी बात जो माता पिता हैं वह अपने बच्चों को अध्यात्मिक शिक्षा से परे न रखें क्योंकि उससे जो आत्मविश्वास आता है वह देखने लायक होता हे।
दरअसल जन्मदिन और पुण्यतिथियां मनाने के साथ ही रैंगिंग जैसी प्रथा भी इस देश में आयी है। जिस तरह अनेक युवक युवतियों ने अपने प्राण इसमें गंवायें हैं उससे बचने का उपाय करना ही होगा।  यह प्रथा तो पशु प्रवृत्ति का प्रमाण है।  जिस तरह कोई श्वान दूसरे मोहल्ले में पहुंचता है तो उसे दूसरे श्वान भौंकने लगते हैं।   कभी कोई सुअर आ जाता है तो कुत्ते उस पर भी हमला करने लगते हैं। इसमें जब कोई पशु पलटकर कुतों की तरफ देखता है तो वह वहीं खड़े रह जाते हैं। 
एक बार इस लेखक ने अपनी आंखों से  देखा कि एक कुत्ता बिल्ली के पीछे दौड़ा। बिल्ली भागते एक ऐसी जगह पहुंच गयी जहां दीवार थी पर निकल नहीं सकती थी। वह पलटकर कुत्ते की तरफ देखने लगी। कुत्ता वही स्तब्ध होकर उसे देखकर भौंकता रहा पर हमला नहीं कर सका।  तब वह पलटकर दूसरी तरफ से भागी। कुत्ता फिर उसके पीछे भागा। ऐसा तीन बार हुआ और अंततः बिल्ली अपनी जान बचाने में सफल रही।  जिन युवक युवतियों में थोड़ा बहुत भी अध्यात्मिक ज्ञान है वह दृढ़ता पूर्वक रहें तो उनको कोई  झुका नहीं  सकता।  वह स्पष्ट रूप से अपने धर्म का यह संदेश सभी जगह दोहरायें कि वह अपने माता, पिता और गुरु के अलावा किसी अन्य का आदेशा मानना धर्म विरोधी समझते हैं।  इसके लिये यह जरूरी है कि उनके पास अपने देश का अध्यात्मिक ज्ञान हो । जब दीवार से कोई चिपका दे तो अपने दिमाग को खोलना ही पड़ता है। अरे, एक बिल्ली कुत्ते तक को हड़का देती है तो फिर मनुष्य का बच्चा क्या नहीं  कर सकता?
 इसके लिये यह जरूरी है कि अपनी तकनीकी और उच्च शिक्षा की पुस्तकों के साथ अपने अध्यात्मिक साहित्यक ज्ञान का भी अध्ययन करना चाहिये। उसमें केवल भक्ति करने का तरीका ही नहीं  जीवन संघर्षों में विजय प्राप्त करने का भी तरीका बताया जाता है। धर्मांध नहीं होना चाहिये पर आत्मरक्षा में अगर सहायता मिले तो दृढ़ धर्मज्ञ दिखने का प्रयास तो करना ही चाहिये। अलबत्ता प्रोफेसर ने अध्यात्मिक ज्ञान होने की बात नहीं कही वह तो हमने अपनी तरफ से जोड़ी है। 


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