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Saturday, June 11, 2011

द्वन्द्व की पटकथा-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ

अब मंच और पर्दे के नाटक
नहीं किसी को भाते हैं,
खबरों के लिए होने वाले
प्रायोजित आंदोलन और अनशन ही
मनोरंजन खूब कर जाते हैं।
------------------
हर मुद्दे पर
उन्होने समर्थन और विरोध की
अपनी भूमिका तय कर ली है,
उनके आपसी द्वन्द्व के
पर्दे पर चलते हुए दृश्य को
देखकर कभी व्यथित न होना
कुछ हंसी तो
कुछ दर्द की
चाशनी में नहाये शब्दों से
उन्होंने  पहले ही अपनी  पटकथा भर ली है।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Wednesday, May 18, 2011

पर्दे की हकीकत-हिन्दी शायरी (parde ki hakikat-hindi shayari)

इंसानों को भीड़ को
भेड़ों की तरह हांका जा सकता है,
सपने बेचना आना चाहिए।

लोगों की आंखें खुली रहें
पर देख न सकें,
कान बजते रहें
गाना सुर में हो या बेसुर
गाना आना चाहिए।

अपने होश को
जिंदा रखो हमेशा
कर लो दुनियां मुट्ठी में
ज़माने को बेहोश करना आना चाहिए।
---------
चाहे जो भाव खरीदो
सपने बाजार में बिकतें,
मगर सच के आगे नहीं टिकते हैं,
सौदागर खेलते हैं जज़्बातों से
उनके मातहत कलमकार
दाम लेकर ही ख्वाब लिखते हैं।

पर्दे की हकीकत
जमीन पर नहीं आती
भले ही अरमान पूर होते दिखते हैं।
--------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Saturday, May 14, 2011

समाज सेवा कि आप सेवा-हिन्दी हास्य कवितायें (samaj seva ki aap seva-hindi hasya kavitaen)

देशभक्ति और जनकल्याण का
जिम्मा उठाया किसने,
अपने पेट और बैंक में जमा
अपनी रकम के आंकड़े बढ़ाने की
कसम खाई जिसने।
----------
कमरे के बाहर
लगा दिया उन्होंने
‘समाज सेवा’ का बोर्ड
अंदर काम घिनौने करने लगे,
जमाना भी अक्ल का अंधा
लोग केवल नारे पर ही यकीन कर
वाह वाह का शोर भरने लगे।

अंदर झांककर देखा
जब कुछ अक्लमंदों ने तो पाया
सजा था पूरा कमरा
गरीबों के खून की भरी बोतलों से,
कहीं शराब के छींटे थे
पलंग पर फैले चमकते बिस्तर लगे होटलों से,
खूबसूरत चेहरे
अपने गालों पर दाग लगाये,
बैठे थे प्यार की महफिल सजाये,
सभी अपनी जुबां से
‘आप सेवा’ के दावे करने लगे।’’
--------------

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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Sunday, September 26, 2010

चाटुकारिता-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (chatukarita-hindi vyangya kavitaen)

महंगाई ने इंसान की नीयत को
सस्ता बना दिया है,
पांच सौ और हजार के नोट
छापने के फायदे हैं
इसलिये एक बड़े नोट के साये ने
बदनीयत लोगों को खरीदकर
थोकबंद जमा कर दिया है।
--------
जिंदगी में सफलता के लिये
अब पापड़ नहीं बेलने पड़ते,
चाटुकारिता से ही बन जाती है चाट
बस, बड़े लोगों की दरबार में हाज़िर होकर
उनकी तारीफ में चंद शब्द कहीं ठेलने पड़ते।
-------
अपने हाथों से ही सजा देना अपनी छबि
इंसान खो चुके हैं पहचान अच्छे बुरे की।
अपने आप बन रहे सभी मियां मिट्ठू
तारीफों में परोसते बात ऐसी, जो लगे छुरे की।
--------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Sunday, September 12, 2010

कैमरा जब पिंजरा बन जाता है-हिन्दी व्यंग्य (sting operation by camra-hindi hasya vyngya)

कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने का सभी को शौक होता है। जिन लोगों की रोजी रोटी ही कैमरे के सामने होने से चलती है उनके लिये तो अपनी अदाऐं दिखाना ही धंधा हो जाता है। यह धंधा करने वाले इसके इतने आदी हो जाते हैं कि उसे छोड़ना तो दूर उसका सोचना भी उनको डरा देता है। कैमरर उनके लिये एक महल की तरह होता है जिसमें एक बार आने पर हर कोई रहना चाहताहै पर कुछ लोगों के लिये यह पिंजरा भी बन जाता है। एक तो पिंजरा उनके लिये होता है जो मज़बूरी की वजह से इसके सामने टिके रहना चाहते हैं क्योंकि यहीं से उनकी रोजी रोटी चलती है पर मन उनका नहीं होता। दूसरे वह लोग हैं जिनको जबरन तस्वीर बनाकर इसमें लाया जाता है।
आजकल यही कैमरा टीवी चैनल तथा खोजी पत्रकारों के लिये पिंजरा (sting operation) बन गया है और वह इसे लेकर पकड़ अभियान-स्टिंग ऑपरेशन  (sting operation) चलाते हैं। कभी अभिनेता, कभी नेता, कभी अधिकारी तो कभी संत इस कैमरे में ऐसे कैद होते हैं जैसे कि पिंजरे में चूहा।
बड़ा दिलचस्प दृश्य टीवी पर चलता है जब इसमें कैदी की तरह फंसे खास शख्सियतों का असली रूप सामने आता है। उस समय हंसते हुए पेट में बल पड़ जाते हैं क्योंकि यह देखकर मजा आता है कि ‘देखो, कैसे धंधे पानी की बात कर यह आदमी जाल में फंस रहा है।’ जैसे मछली कांटे में फंसती है और जैसा चूहा पिंजर में फंसकर छटपटाता है।
शिक्षण संस्था में प्रबंधक पद पर व्यक्ति आसीन लोग बड़े आदर्श की बातें करते हैं पर जब कैमरे में कैद होते हैं तो क्या कहते हैं कि ‘इतनी रकम दो तो मैं तुम्हें कॉलिज में प्रवेश दिला दूंगा। इस विषय में इतने तो उस विषय में इतने पैसे दो। इसकी रसीद नहीं मिलेगी।’
बिचारा धंधा कर रहा है पर उसे पता नहीं कि वह चूहे की तरह फंसने जा रहा है। बड़े विद्वान बनते हैं पर लालच उनकी अक्ल को चूहे जैसा बना देती है। हा...हा...
फिल्मी लाईन वाले कहते हैं कि उनके यहां लड़कियों का शोषण नहीं होता पर उनका एक अभिनेता-खलपात्र का अभिनय करने वाला-एक लड़की से कह रहा था कि ‘यहां इस तरह ही काम चलता है। आ जाओ! तुम मेरे पास आ जाओ।’
कुछ जनकल्याण का धंधा करने वाले भी फंसे गये जो केवल सवाल उठाने के लिये पैसे मांग रहे थे।
ऐसे में हंसी आती है। यह देखकर हैरानी होती है कि कैमरा किस तरह पिंजरा बन जाता है। यह फंसने वाले कोई छोटे या आम आदमी नहीं होतें बल्कि यह कहीं न कहीं आदर्श की बातें कर चुके वह लोग दिखाई देते हैं जिनका समाज में प्रभाव है।
सबसे अधिक मजा आता है संतों का चूहा बनना। अधिकारी, नेता और अभिनेता तो चलो बनते ही लोग पैसा कमाने के लिये हैं पर संतों का पेशा ऐसा है जिसमें आदर्श चरित्र की अपेक्षा की जाती है। यह संत भारतीय अध्यात्म में वर्णित संदेशों को नारों की तरह सुनाते हैं
‘काम, क्रोध, लोभ और मोह में नहीं फंसना चाहिये।’
‘यह जगत मिथ्या है।’
‘सभी पर दया करो।’
‘किसी भी प्रकार की हिंसा मत करो।
‘अपनी मेहनत से कमा कर खाओ।’
आदि आदि।
जब यह बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि कितने मासूम और भोले हैं। इनमें सांसरिक चालाकी नहीं है तभी तो ऐसे उल्टी बातें-जी हां, अगर आम आदमी ऐसा कहे तो उसे पागल समझा जाता है-कर रहे हैं शायद संत हैं इसलिये।
मगर कैमरे में यह बड़े संत चूहे की तरह फंसते नज़र आते हैं तब क्या कहते हैं कि
‘चिंता मत करो। तुम्हारा काम हो जायेगा। अरे यहां कोई तुम्हारा बाल बांका भी नहीं कर सकता। यहां तो बड़े बड़े ताकतवर लोग मत्था टेकने आते हैं।’’
‘तुम कहंीं से भी धन लाओ हम उसका सलीके से उपयोग करना सिखा देंगे।’
‘हम तुम्हें ठेका दिला देंगे, हमारा कमीशन दस प्रतिशत रहेगा। हमें कार और पिस्तौल दिलवा देना।’
ऐसी ऐसी विकट बातें सुनकर कानों में यकीन नहीं होता। सोचते हैं कि-अरे, यार इसे तो रोज टीवी पर देखते हैं, कहां इसे संत और विद्वान समझते हैं यह तो बिल्कुल एक मामूली दुकानदार की तरह बात करने के साथ ही मोलभाव भी कर रहा है।’
पिंजरे में फंसे संत कहते हैं कि ‘चिंता मत करो, हमारे यहां तो तुमसे भी बड़े खतरनाक लोग आसरा पाते हैं’।
तब हम सोचते हैं कि यह रावण और कंस के विरुद्ध प्रतिदिन प्रवचन करने वाले उनसे भी खतरनाक लोगों को पनाह देते हैं। यहां यह बता दें कि कंस और रावण खतरनाक तत्व थे पर फिर भी कहीं न कहीं के राजा थे और उनके कुछ सिद्धांत भी थे पर आज के यह खतरनाक तत्व ऐसे हैं कि पुराने खलनायक हल्क नज़र आते हैं।
यह संत लोग कैमरे में फंसे पिंजरे में कहते हैं कि ‘कितना भी काला धन लाओ कमीशन देकर उसे सफेद पाओ।’
ऐसे प्रसंगों में एक संत की यह बात सबसे अज़ीब लगी कि ‘अमेरिका में कोई भी काम हो एक मिनट में हो जायेगा।’
मतलब वहां भी ताकतवर इंसानों की खरीद फरोख्त कर लेते हैं-वाकई धर्म की आड़ में अधर्म कितना ताकतवर हो जाता है। अभी तक अमेरिका और ब्रिटेन के बारे में यह धारणा हमारे यहां रही है कि वहां के लोग देशभक्त होते हैं और इस तरह नहीं बिकते पर एक मिनट में काम होने वाली बात से तो यही लगता है कि बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपराध और आतंक का भी वैश्वीकरण हो गया है। उसके साथ ही हो गया है उनको धर्म की आड़ देने का व्यापार।
किस्सा मज़ेदार है। पकड़ अभियान-स्टिंग ऑपरेशन  (sting operation) करने वालों ने संत को बताया कि उनके साथ जो महिला है वह अमेरिका से आर्थिक अपराध कर भागी है। उसे शरण चाहिये। वह संत अपने आश्रम में शरण देने को तैयार है और कहता है कि
‘यहां तुम किसी को कुछ मत बताना! कहना यह कि ध्यान और दर्शन के लिये आयी हूं।’
बेसाख्ता हमारे मन में बात आयी कि ‘जैसे यह ध्यान और दर्शन करा रहे हैं।’
क्या सीख है! दर्शन और ध्यान की आड़ में छिप जाओ। यही संत कैमरे के सामने जब बोलते हैं तो उनके भक्त मंत्रमुग्ध हो जाते हैं पर इन पकड़ कर्ताओं ने उनको अपने गुप्त कैमरे को पिंजरा बनाकर चूहे की तरह फंसा डाला।
फिल्म वालों ने एक अंधविश्वास फैला रखा है कि भूत केवल आदमी को दिखता है मगर कैमरे में नहीं फंसता। एक फिल्म आई थी नागिन! जिसमें एक नागिन रूप बदल कर अपने नाग के हत्यारों से बदला ले रही थी। उसमें वह हत्यारों को तो अपनी इंसानी प्रेमिका में दिखती थी और बाद में उनको डस कर बदला लेती थी। उसमें एक नायक उसे पहचान लेता है क्योंकि वह कांच में नागिन ही दिखाई देती है। कैमरे में ही यह दर्पण भी होता है। जिस तरह वह रूपवती स्त्री कांच में नागिन दिखाई देती थी वही कैमरे की भी असलियत होती है। यह धर्म भी शायद एक भूत है जो पिंजरा बन जाने पर कैमरे में अधर्म जैसा दिखाई देता है। रहा धर्म का असली रूप में दिखने का सवाल तो उसके लिये चिंतन का होना जरूरी है क्योंकि वह एक अनुभूति है जो बाहर हमारे आचरण के रूप में अभिव्यक्त होती है और उसके बारे में निर्णय दूसरे लोग करते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि सच्चे धर्म वाले कभी किसी पिंजरे में नहीं फंसते।
आखिरी बात यह कि यह व्यंग्य का विषय नहीं बल्कि गंभीर बात है कि श्रीमद्भागवत गीता एक कैमरे का रूप है जिसका अध्ययन कर उसकी बात समझें तो अपना चित्र स्वयं ही खीचकर देख सकते हैं और साथ ही माया के पिंजरे में फंसे लोगों की अदायें देखने का लुत्फ् भी उठा सकते हैं। गीता सिद्ध जानते हैं कि धर्म क्या है और उसकी रक्षा कैसे होती है। उनके लिये कैमरा कभी पिंजरा नहीं बन पता क्योंकि वह उसके सहज अभ्यासी होते हैं और कथनी करनी में अंतर न होने की वजह से कभी चूहे नहीं बनते।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, August 26, 2010

कसूरवारों की शख्सियत-हिन्दी शायरी (kasurvaron ki shakhsiyat-hindi shayari)

कौन कहता है
अखबार की खबर बासी हो जाती है,
बस!
हादसों, हत्याओं और हमलों की घटनाओं में
इलाकों के नाम और चरित्र बदल जाते हैं
इसलिये कहानियां ताजी हो जाती हैं।
----------
लूट और व्यापार में
अब अंतर नज़र नहीं आता है,
झूठ भी सच की तरह
बाज़ार में सज जाता है,
कातिलों के भी इंसानी हकों की
मांग उठती है चारों तरफ
कसूरवारों के कसूर की बजाय
जाति, धर्म और भाषा के आधार पर भी
उनकी शख्सियत की पहचान कर
सजा देने या बहाल करने का
फैसला अब सरेआम किया जाता है।
---------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, August 12, 2010

एकता की मेलागिरी-हिन्दी हास्य कविता (ekta ki melagiri-hindi hasya kavita)

च्रेले ने कहा गुरु से
‘आप समाज में एकता की बात
हमेशा लोगों के सामने चलाते हो,
उनसे तालियां बजवाते हो,
पर एक बात समझ में नहीं आयी
आप ही जाति, भाषा और धर्म का नाम लेकर
लोगों के आपस में बंटे होने की तरफ
करते हैं इशारा,
जबकि क्या आम इंसान आपस में लड़ेगा
इन छोटी बातों को लेकर
वह तो काम से फुर्सत नहीं पाता बिचारा,
कभी कभी अपने समाज की
तरक्की का प्रश्न भी उठाते हो,
फिर भी एकता के मसीहा नाम से जाने जाते हो।’
सुनकर गुरुजी बोले,
कमबख्त!
इतने साल से करता रहा है चेलागिरी,
सीख नहीं पाया यह एकता की मेलागिरी,
आम इंसान को कहां फुरसत है
जाति, भाषा और धर्म के नाम लड़ने की
पर हमें जरूरत है उसके दिमाग में
एकता का भूत जड़ने की,
हर समाज में जाकर उसके उत्थान की
बात हम यूं ही करते हैं,
बंटे रहें लोग इसी तरह
अपने समाज की चिंता में वही मरते हैं,
एकता लाने के लिये
उनमें फूट डालना जरूरी है,
अपना घर भरने के लिये
आम इंसान की जेब की लूट जरूरी है,
नहीं दिखायेंगे टुकडे़ टुकड़े समाज के,
बज जायेंगी बाजे अपने राज के,
एकता का मसीहा
जंग के बिना संभव नहीं,
यह बात तुम क्यों नहीं समझ पाते हो।।
-------------

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, August 8, 2010

खेल प्रबंधन-हास्य कविता (sports manegment-hindi comic poem)

खेल के पीरियड में
बहुत से छात्र नहीं आये,
यह सुनकर विद्यालय के
प्राचार्य तिलमिलाये
और अनुपस्थित छात्रों को फटकारा
‘‘तुम लोगों को शर्म नहीं आती
खेल के समय गायब पाये जाते हो,
क्या करोगे जिंदगी में सभी लोग,
बिना फिटनेस के ऊंचाई पर जाने के
सपने यूं ही सजाते हो,
अरे, खेलने में भी आजकल है दम,
पैसा नहीं है इसमें कम,
कोई खेल पकड़ लो,
दौलत और शौहरत को अपने साथ जकड़ लो,
देश का भी नाम बढ़ेगा,
परिवार का भी स्तर चढ़ेगा,
यही समय है जब अपनी सेहत बना लो
वरना आगे कुछ हाथ नहीं आयेगा।’’

एक छात्र बोला
‘‘माननीय
आप जो कहते है वह सही है,
मगर हॉकी या बल्ला पकड़ने से
अधिक प्रबंध कौशल होना
सफलता की गारंटी रही है,
पैसा तो केवल क्रिकेट में ही है
बाकी खेलों में तो बिना खेले ही
बड़े बड़े बड़े खेल हो जाते हैं,
जिन्होंने सीख ली प्रबंध की कला
वह चढ़ जाते हैं शिखर पर
नहीं तो बड़े बडे खिलाड़ी
मैदान पर पहुंचने से पहले ही
सिफारिश न होने पर फेल हो जाते हैं,
अच्छा खिलाड़ी होने के लिये जरूरी नहीं
कोई खेले मैदान पर जाकर खेल,
बस,
निकालना आना चाहिये उसमें से कमीशन की तरह तेल,
आपके यहां प्रबंध का विषय भी हमें पढ़ाया जाता है,
पर उसमें नये ढंग का तरीका नहीं बताया जाता है,
हम रोज अखबारों में पढ़ते हैं
जब होता है विद्यालय में खेल का पीरियड
तब हम खेल के प्रबंध पर चर्चा करते हैं,
किस तरह खेलों में नाम कमायें,
तय किया है कि ‘कुशल प्रबंधक‘ बन जायें,
आप बेफिक्र रहें
किसी से कुछ न कहें,
कोई न कोई आपके यहां का छात्र
खेल जगत में नाम कमायेगा,
मैदान पर नहीं तो
खेल प्रबंधन में जाकर
अपने साथ विद्यालय की इज्ज़त बढ़ायेगा,
उसकी खिलाड़ी करेंगे चाकरी,
खिलाड़िनों को भी नचायेगा,
भले ही न पकड़ता हो हॉकी,
बॉल से अधिक पकड़े साकी,
पर खेल जगत में नाम कमायेगा।’’

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Monday, August 2, 2010

कबाड़ चैनल-हिन्दी हास्य व्यंग्य (kabad news chainal-hindi hasya vyangya)

एक कबाड़ी ने जब सुना कि अमुक चैनल अपना पूरा तामझाम बेचकर दूसरी जगह से चालू होने वाला है तो वह तत्काल अपने साथी दूसरे कबाड़ी के पास पहुंचा।
दूसरे कबाड़ी ने उसे देखते ही कहा-‘आ गये जासूसी करने!’
पहल कबाड़ी बोला-‘‘नहीं यार, आज तो मैं एक साझा काम करने का प्रस्ताव लाया हूं। हम दोनों अमुक टीवी चैनल को खरीद लेते हैं वह बिक रहा है और दूसरी जगह से शुरु होने वाला है। उसके प्रबंधक नाम के अलावा सबकुछ बेचने वाले हैं। वहां के एक चपरासी ने मुझे बताया जो कि वहां से अब निकाले जाने वाला है।’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘‘ तो हम क्या करेंगे? इतना महंगा सामान होगा, हमारे किस काम का? उसे बेचेंगे कहां?’’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘बेचना नहीं है। हमें वह चैनल कबाड़ी न्यूज चैनल के नाम से चलाना है। अरे, ठीक है हम कबाड़ी हैं पर हमारे पास पैसा कोई कम नहीं है। फिर अपने बच्चों के नाम से कबाड़ी नाम का संबोधन कितना बुरा लगता हैै।’’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘मूर्ख कहीं के! कबाड़ी का काम है पुरानी चीजें खरीद कर बेचना न कि घर में रखना।’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘लगता है कि अपने बच्चों के भविष्य से तुम्हें प्रेम नहीं है। फिर आगे चलकर हम भी नयी जगह पर वह चैनल चलायेंगे तब सारा सामान बेच देंगे।’
दोनों जब बातचीत कर रहे थे तब उनका ध्यान पास बैठे उस आदमी की तरफ नहीं गया जो चुपचाप एक बैंच पर बैठ कर बीड़ी पी रहा था। वह एकदम मैला कुचला सफेद पायजमा कुर्ता पहने हुए था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और बालों से ऐसा लग रहा था कि जैसे बरसों से नहाया न हो। दरअसल वह तीसरा कबाड़ी था जो व्यवसाय से संबंधित गोपनीय सूचनायें एकत्रित करने दूसरे कबाड़ी के पास आकर बैठता था।
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘पर चैनल चलाने का अपने पास तो अनुभव ही नहीं है। हां, यह बात सही है कि मैं समाचारों का शौकीन हूं और अमुक चैनल पहले बहुत देखता था पर अब वह तो बेकार हो गया है।’
पहले ने कहा-‘यार, कैसे कबाड़ी हो, तुम्हें पता है यहां अनुभव वगैरह तो केवल दिखाने के लिये हैं। वरना सच तो यह है कि अधिकतर लोग धूप में बाल सफेद करते हैं। समाचार चैनल चलाना कौन सा मुश्किल काम है।’
दूसरे ने कहा-‘जरा अपनी योजना बताओ तो सही।
पहला कबाड़ी-‘सुनो! समाचार चैनलों में एक घंटे के दौरान केवल दो मिनट के समाचार होते हैं बाकी तो इधर उधर की कबाड़ में मिलने वाली कटिंग से ही काम चलायेंगे। अपना घीसू कबाड़ी है न............’
दूसरे ने कहा-‘वही न! जो फिल्म लाईन में चला गया है।’
पहले ने कहा-‘काहे की फिल्म लाईन! पुरानी फिल्में कबाड़ में लाकर बेचता है। उससे कहेंगे कि अब वह थोड़ा कम पुरानी फिल्में खरीद कर हमारे अमुक चैनल पर दे। वैसे भी आजकल की फिल्में तीन दिन में ही कबाड़ हो जाती हैं। फिर क्रिकेट के खिलाड़ियों का रैम्प में नाचना, किसी फिल्म अभिनेता द्वारा लोगों से मारपीट की सच्ची घटना तथा लाफ्टर शो जैसे कार्यक्रम दूसरे चैनल आज दिखाते हैं हम तीन दिन बाद कबाड़ में खरीद कर उसे चलायेंगे। वैसे इस देश में गिनती के तीन चार लोग ऐसे भी हैं जो अपने छिछोरेपन की वजह से हमेशा ही न्यूज में बने रहते हैं। उनका भी सभी कुछ मसाला कबाड़ में मिल जायेगा। घीसू कबाड़ी के रिश्ते दूर दूर तक हैं। कोई ना करे यह संभव नहीं है। प्रबंध निदेशक उस चपरासी को बनायेंगे जिसने यह समाचार दिया है। हां, बस दो मिनट के लिये कोई समाचार वाचक रखना पड़ेगा और संपादक भी। ’
दूसरे ने कहा-‘तुम चिंता मत करो। समाचार संपादक तो मैं ही बन जाऊंगा क्योंकि आजकल समाचार न सुन पाने की भड़ास निकालने के लिये मौका मुझे चाहिए। वाचक की चिंता मत करो मेरा भतीजा निकम्मा घूम रहा है। वह इस काम के लिये कई जगह आवेदन भेज चुका है उसको काम पर रख लेंगे। मैंने भाई से कर्जा लेकर यह काम शुरु किया था तो उसका भी बदला चुक जायेगा। हां, एक तो महिला या लड़की भी तो रखनी पड़ेगी।’
पहले ने कहा-‘उसकी चिंता नहीं है। मेरी साली इसके लिये योग्य है।’
दूसरे ने कहा-‘यार, पर मुझे डर लग रहा है। इतना बड़ा काम है!
पहले ने कहा-‘तुमने अगर कबाड़ का काम किया है इसलिये कोई भी काम कर लोगे। इसलिये तो चैनल का ही नाम मैंने कबाड़ी सुझाया है।’
दूसरे ने कहा-फिर देर किस बात की।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, तो मेरी मोटर साइकिल पर बैठो और चलो।’
दोनों मोटर साइकिल पर चल पड़े। थोड़ी दूर जाकर वह बंद हो गयी तो दूसरा कबाड़ी बोला-‘यार, कैसी मोटर साइकिल लाये हो।’
पहला कबाड़ी-‘कल ही कबाड़ में खरीदी है कोई पुरानी नहीं लाया।’
थोड़ी देर तक दोनों पैदल ही मोटर साइकिल घसीटते रहे तब कहंी जाकर उसको बनाने वाली दुकान मिली। वहां एक घंटा लग गया। मैकनिक से बहुत चिकचिक होती रही। दोनों बैठकर फिर अपनी राह चले। थोड़ी दूर चले तो पिछला पहिये से हवा निकल गयी। फिर दोनों घसीटते हुए पंचर बनवाने की दुकान पर आये।
पंचर बनाने वाले ने पहिये में से ट्यूब निकाला और उसे बनाने लगा। उसके यहां छोटे टीवी पर अमुक चैनल आ रहा था। दूसरा कबाड़ी उसे देखने लगा तो वहां ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। दूसरा कबाड़ी एकदम चिल्ला पड़ा-‘अरे यार देख, अमुक चैनल बिक गया है और दूसरी जगह से शुरु होगा। किसी चालू कबाड़ी ने खरीदा है।’
पहले कबाड़ी का मुंह खुला का खुला रह गया-‘बहुत बुरा हुआ। अब समझ में आया। अरे, यही चालू कबाड़ी वही था जो हमारी बातें सुन रहा था। मैं उसे जानता हूं पर वहां वेश बदले बैठा था इसलिये समझ नहीं पाया। वह तुम्हारे यहां तुम्हारी जासूसी करने अक्सर ऐसे ही आता है मुझे उसके एक नौकर ने बताया था।’’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘उसने चैनल का नाम भी रख दिया है, ‘‘कबाड़ न्यूज चैनल’’, हमारी पूरी योजना चोरी कर गया। चल उससे रॉयल्टी मांगते हैं।’’
पहला बोला-‘‘कोई फायदा नहीं। उसने अपने चैनल का नाम ‘कबाड़ी’ नहीं बल्कि ‘कबाड़’ चैनल रखा है।’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘तेरे को धंधे  का उसूल नहीं मालुम। अरे, हम पुराने सामान खरीदने और बेचने वाले हैं न कि उनके इस्तेमाल करने वाले। तुझे यह कबाड़ में खरीदी मोटर साइकिल नहीं लानी थी। इस चालू कबाड़ी को देख नयी कार चलाता है और कितनी जल्दी फुर्र से उड़कर वहां पहुंच गया।’
पहले ने कहा-‘‘चिंता मत करो, खरीदा तो है पर चला नहीं पायेगा।’
दूसरे ने कहा-‘‘पर तुमने तो कहा था कि कबाड़ी कुछ भी कर सकता है।’’
पहले ने कहा-‘‘यह मैंने अपने और तुम्हारे लिये कहा था। उसके लिये नहीं। देखना वह जल्दी इसे बेच देगा। तब हम उससे सस्ते में खरीदेंगे।’
दूसरे ने कहा-‘नहीं, कबाड़ी से कोई सामान नहीं खरीदना यह मेरा उसूल है। वह भले ही न्यूज चैनल वाला हो गया है पर मेरी नज़र में रहेगा तो कबाड़ी ही न!’
पहले वाले ने कहा-‘नहीं पर उसकी असलियत बदल गयी है। मैंने तुम्हें बताया था न!’
दूसरे ने कहा-‘अब तुम्हारी नहीं सुनना। मेरी नज़र में उसकी असलियत नहीं बदलेगी।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, कोई बात नहीं। यह चालू कबाड़ी तो ऐसा है कि सब जगह कबाड़ कर देता है। इस धंधे  का भी यही करेगा, तब दूसरे चैनल कबाड़ में खरीद कर चलायेंगे।’
दोनों खुश होकर वहां से चले गये। उधर चालू कबाड़ी घीसू कबाड़ी को फोन कर रहा था।
नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वहीं इसके लिये जिम्मेदार होगा। इसे पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।
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Saturday, July 24, 2010

आशिक, माशुका और इश्क गुरु-हास्य कविता (ashiq, mushuka aur ishq guru-hasya kavita)

आशिक ने माशुका से कहा
‘कल गुरूपूर्णिमा है
इसलिये तुमसे नहीं मिल पाऊंगा,
जिसकी कृपा से हुआ तुमसे मिलन
उस गुरु से मिलने
उनके गुप्त अड्डे पर जाऊंगा,
क्योंकि उन पर एक प्रेम प्रसंग को लेकर
कसा है कानून का शिकंजा
पड़ सकता है कभी भी उन पर धाराओं का पंजा
इसलिये इधर उधर फिर रहे हैं,
फिर भी चारों तरफ से घिर रहे हैं,
उन्होंने ही मुझे तुमसे प्रेम करने का रास्ता बताया,
इसलिये तुम्हें बड़ी मुश्किल से पटाया,
वही प्रेम पत्र लिखवाते थे,
बोलने का अंदाज भी सिखाते थे,
जितनी भी लिखी तुम्हें मैंने शायरियां,
अपने असफल प्रेम में उनसे ही भरी थी
मेरे गुरूजी ने अपनी डायरियां,
इसलिये कल मेरी इश्क से छुट्टी होगी।’

सुनकर भड़की माशुका
और लगभग तलाक की भाषा में बोली
‘अच्छा हुआ जो गुरुजी की महिमा का बखान,
धन्य है जो पूर्णिमा आई
हुआ मुझे सच का भान,
कमबख्त, इश्क गुरु से अच्छा किसी
अध्यात्मिक गुरु से लिया होता ज्ञान,
ताकि समय और असमय का होता भान,
मैं तो तुम्हें समझी थी भक्त,
तुम तो निकले एकदम आसक्त,
मंदिर में आकर तुमने मुझे अपने
धार्मिक होने का अहसास दिलाया,
मगर वह छल था, अब यह दिखाया,
कविता की बजाय शायरियां लिखते थे,
बड़े विद्वान दिखते थे,
अपनी और गुरुजी की असलियत बता दी,
इश्क की फर्जी वल्दियत जता दी,
इसलिये अब कभी मेरे सामने मत आना
कल से तुम्हारे इश्क से मेरी कुट्टी,
मैं तुमसे और तुम मुझसे पाओ छुट्टी।।
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Monday, July 19, 2010

कागज़ की ताकत-हिन्दी हास्य कवितायें (kagaz ki takat-hindi hasya kavitaen)

शहर में हर जगह कागज़    पर सड़क बन गयी,
सभी गांवों मे तालाब खुद गया,
और हर कालोनी में हराभरा पार्क खिलाखिलाता
नज़र आया।
शायद आम आदमी आंखों से देख नहीं पाते
वरना तो हर अखबार की
छपी रिपोर्टों में सुखद समाचारों का
झुंड हर रोज आया।
------------
कागज़ की ताकत
आम आदमी की जुबान से बढ़ी है,
वह चाहे कुछ भी बोले
सच है वही कारनामा
जिसकी कलम से लिखापढ़ी है।
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Thursday, July 15, 2010

शराब और रूह-व्यंग्य कवितायें (sharab aur rooh-hindi vyangya kavitaen)

कहीं बनते हैं
कहीं उजड़ जाते हैं आशियाने,
छत के नीचे खड़े हैं
इस भरोसे कि सदा सिर पर रहेगी
मगर कहीं कुदरत उजाड़ देती है
कहीं बुलडोजर चला आता है
तो कहीं इंसानी बुत चले आते लतियाने।
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भरोसा कर हमेशा धोखा खाया,
मगर मजबूर हुए, तब फिर जताया,
धोखा करने से डरे हैं हम हमेशा,
हैरानी है तब भी किसी का भरोसा न पाया।
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शराब गम भुलाती है,
मगर यह बात केवल लुभाती है,
सच यह है कि
इंसान ज़ाम दर ज़ाम पीते हुए
हो जाता है गुलाम
मर जाती है रूह उसकी
जो नशे में कभी उसे नहीं बुलाती है।
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Thursday, July 8, 2010

विकास पुरुष-हिन्दी हास्य कविता (vikas purush-hindi hasya kavita)

चमचे ने कहा
‘विकास पुरुष जी
आप भी कमाल का कर रहे विकास,
इधर हो रहा है विनाश,
कारों के उत्पादन को
विकास का प्रतीक बता रहे हैं,
उत्पादन में ही हित जता रहे हैं,
मगर घटिया सड़कें बनवा देते हैं,
जिसके प्राण दो मिनट की बरसात के छींटे ही ले लेते हैं,
हो जाता है जिससे रास्ता जाम,
जहां सुबह पहुंचना हो
हो जाती है वहां शाम,
कारों के नये नये माडल बनवाने से अच्छा है
पहले सड़कें बनवायें
सच में विकास पुरुष की छबि बनायें।’

सुनकर भड़के विकास पुरुष
‘अरे ओए थकेले चमचे
अब तेरा दिमाग फिर गया है,
इसलिये जनता के कल्याण की
गंदी सोच में घिर गया है,
अगर हम तेरी तरह सोचते,
तो चमचे होकर किसी के अपने ही बाल नौंचते,
कारों के नये नये कारखानों से
हमें चंदा मिलता है,
पेट्रोल की बिक्री से भी
कमीशन का धंधा खिलता है,
सड़कों पर जाम लगने से भी हमें फायदा है,
क्योंकि अपने लाभ लेने की कायदा है,
जाम से पेट्रोल ज्यादा बिकता है
धूल और झटकों से कार होती जल्दी पुरानी
नया माडल जल्दी बाजार में दिखता है,
फिर दुनियां के प्रचार माध्यमों में
जाम में फंसी रंग बिरंगी कारों के झुंड
के फोटो छपने से
अपने विकास का मंजर प्रचार पाता है
पहियों तले दबी फटेहाल सड़कों का
हाल कौन देख पाता है,
सड़के चमचमाती बन जायेंगी,
तो हर साल कमीशन भी नहीं दिलवायेंगी,
अभी तो विकास के नाम पर
वहां से भी अच्छा पैसा आता है,
विकास तो वही श्रेष्ठ होता हमारे लिये
जो कभी लक्ष्य नहीं पाता है,
यह बात तुम्हें कितनी बार समझायें।’’
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Tuesday, July 6, 2010

खुलकर हंसना भी एक बहुत बड़ा फन है-हिन्दी शायरी (khulkar hansna ek fun hai-hindi shayari)

मेरी नाकामी पर ताने न मारो
क्योंकि तुम्हारी कामयाबी
किसी को क्या खुशी देगी
जब तुम्हें ही न दे सकी
क्योंकि उसके नीचे कई लोगों की
सिसकी दफन है
तुम्हारे घर बिछे कालीन के नीचे
मरे हुए इंसानों का चुराया कफन है।
बोझिल होकर मुस्कराते हो,
हवा के एक झौंके से डर जाते हो,
मुझसे हमदर्दी जताने वाले, तुम नहीं जानते
ढेर सारे दर्द के साथ जीते हुए
खुलकर हंसना भी एक बहुत बड़ा फन है।
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Monday, June 21, 2010

दुनियां का सच-हिन्दी क्षणिका (duniyan sa sach-hindi short poem)

मुखौटों से रिश्ते रखते हुए
अब हम ऊबने लगे हैं,
वादों की नाव कभी चलती नहीं
इसलिये ख्वाबों में ही डूबने लगे हैं,
इंसानों के मर गये जज़्बात,
गद्दारी और वफादारी की नहीं जानते जात,
देखा हमने, क्योंकि रोज दुनियां के सच के साथ जगे हैं।
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Monday, November 30, 2009

दिल अपना-हिन्दी शायर (Dil apna-hindi shayri)

शर्म आंखों में होती है
पर्दे कभी उसका बयां नहीं करते
इज्जत की जगह दिल में है
शब्दों में बयां कभी नहीं करते।
जब खौफ हो इंसान के अंदर
किसी की दौलत और शौहरत का
उसे दिखाने के लिये
जमाना करता है सलाम,
पर वहां शर्म और इज्जत होती है हराम,
लोग अपने बयां में
दिल की दुआयें नहीं भरते
--------------
जब तक सोचते रहे
अपनी जिंदगी की बदतर हालात पर
तब मन पर बोझ रहा
आंखों से नहीं निकले आंसू
पर दिल में दलदल करते रहे।
जमाना हंसा जब हमने दर्द कहे।
जबसे अपने रोने पर ही
खिलखिलाना सीख लिया
तब से हैरान हैं लोग
अक्सर पूछते हैं कि
‘क्या तुम्हारे गमों ने साथ छोड़ा
कैसे खुशियों को अपनी तरफ मोड़ा
तुम्हारे गमों पर हंसकर
बहलाते थे दिल अपना
उसी से अपना दिल हल्का करते रहे।।
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Friday, November 13, 2009

मार खाने का खेल-हिंदी व्यंग्य (mar khane ka khel-hindi vyangya)

एक चीनी ने अपना ऐसा धंधा प्रारंभ किया है जो यकीनन अनोखा है। ऐसा अनोखा धंधा तो कोई दूसरा हो ही नहीं सकता। वह यह कि उसने दूसरे घरों में परेशान औरतों को गुस्सा अपने पर उतारने के लिये स्वयं को प्रस्तुत करता है। वह पिटने की फीस लेता है। अगर समाचार को सही माने तो उसका व्यवसाय चल भी रहा है।
वाकई समय के साथ दुनियां बदल रही है और बदल रहे हैं रिश्ते। दूसरा सच यह है कि इस दुनियां में दो ही तत्व खेलते हैं सत्य और माया। इंसान की यह गलतफहमी है कि वह खेल रहा है। पंाच तत्वों से बने हर जीवन में मन बुद्धि और अहंकार की प्रकृत्तियां भी होती है। वही आदमी से कभी खेलती तो कभी खिलवाड़ करती हैं।
यहां एक बात याद रखने वाली है कि संस्कार और संस्कृति के मामले में चीन हमसे पीछे नहीं है-कम से कम उसे अपने से हल्का तो नहीं माना जा सकता। पूर्व में स्थित यह देश अनेक मामलों में संस्कृति और संस्कारों में हमारे जैसा है। हां, पिछले पचास वर्षों से वहां की राजनीतिक व्यवस्था ने उसे वैसे ही भौतिकवादी के जाल में लपेटा है जैसे कि हमारे यहां की अर्थव्यवस्था ने। अगर हमारा देश अध्यात्मिक रूप से संपन्न नहीं होता तो शायद चीनी समाज हमसे अधिक बौद्धिक समाज कहलाता। वहां बुद्ध धर्म की प्रधानता है जिसके प्रवर्तक महात्मा गौतम बुद्ध भारत में ही उत्पन्न हुए थे।
माया का अभिव्यक्त रूप भौतिकतावाद ही है। इसमें केवल आदमी की देह उसकी आवश्यकतायें दिखती हैं और कारों, रेलों, तथा सड़क पर कम वस्त्र पहने युवतियां ही विकास का पर्याय मानी जाती है। विकास का और अधिक आकर्षक रूप माने तो वह यह है कि नारियां अपना घर छोड़कर किसी कार्यालय में नौकरी करते हुए किसी बौस का आदेश मानते हुए दिखें। उससे भी अधिक आकर्षक यह कि नारी स्वयं कार्यालय की बौस बनकर अपने पुरुष मातहतों को आदेश देते हुए नजर आयें। घर का काम न करते हुए बाहर से कमाकर फिर अपने ही घर का बोझ उठाती महिलायें ही उस मायावी विकास का रूप हैं जिसको लेकर आजकल के अनेक बुद्धिजीवी जूझ रहे हैं। बोस हो या मातहत हैं तो सभी गुलाम ही। यह अलग बात है कि किसी गुलाम पर दूसरा गुलाम नहीं होता तो वह सुपर बोस होता है। यह कंपनी प्रणाली ऐसी है जिसमें बड़े मैनेजिंग डाइरेक्टर एक सेठ की तरह व्यवहार करते हैं पर इसके लिये उनको राजकीय समर्थन मिला होता है वरना तो कंपनी के असली स्वामी तो उसके शेयर धारक और ऋणदाता होते हैं। कंपनी पश्चिम का ऐक ऐसा तंत्र हैं जिसमें गुलाम को प्रबंधक निदेशक के रूप में स्वामी बना दिया जाता है। पैसा उसका होता नहीं पर वह दिखता ऐसा है जैसे कि स्वामी हो। इसे हम यूं कह सकते हैं कि गुलामों को स्वामी बनाने का तंत्र हैं कंपनी! जिसमें गुलाम अपनी चालाकी से स्वामी बना रहता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई स्त्री कंपनी की प्रबंध निदेशक है तो वह अपने धन पर नहीं शेयर धारकों और ऋणदाताओं के कारण है। फिर उसके साथ तमाम तरह के विशेषज्ञ रहते हैं जो अपनी शक्ति से उसे बनाते हैं। कंपनी के प्रबंध निदेशक तो कई जगह मुखौटे होते हैं। ऐसे में यह कहना कठिन है कि किसी स्त्री का शिखर पर पहुंचना अपनी बुद्धि और परिश्रम के कारण है या अपने मातहतों के कारण।
बहरहाल स्त्री का जीवन कठिन होता है। यह सभी जानते हैं कि कोई भी स्त्री अपनी ममता के कारण ही अपनी पति और पुत्र की सेवा करने में जरा भी नहीं झिझकती। पिता अपनी संतान के प्रति मोह को दिखाता नहीं है पर स्त्री की ममता को कोई धीरज का बांध रोक नहीं सकता।
ऐसे में जो कामकाजी औरते हैं उनके लिये दोहरा तनाव होता है। यह तनाव अनेक तरह की बीमारियों का जनक भी होता है।
ऐसे में उन चीनी सज्जन ने जो काम शुरु किया है पता नहीं चल कैसे रहा है? कोई औरत कितनी भी दुःखी क्यों न हो दूसरे को घूंसा मारकर खुश नहीं हो सकती। भारी से भारी तकलीफ में भी वह दूसरे के लिये अपना प्यार ही व्यक्त करती है। अब यह कहना कठिन है कि कथित आधुनिक विकास ने-मायावी विकास का चरम रूप इस समय चीन में दिख रहा है-शायद ऐसी महिलाओं का एक वर्ग बना दिया होगा।
आखिरी बात यह है कि उस व्यक्ति ने अपने घर पर यह नहीं बताया कि उसने दूसरी महिलाओं से पिटने काम शुरु किया है। वजह! अरे, घर पर पत्नी ने मारा तो पैसे थोड़े ही देगी! जब गुस्से में होगी तो एक थप्पड़ मारेगी, पर जिस दिन धंधा मंदा हुआ तो पता लगा कि इस दुःख में अधिक थप्पड़ मार रही है कि पति के कम कमाने के कारण वह बड़ गया। फिलहाल भारत में ऐसे व्यवसाय की सफलता की संभावना नहीं है क्योंकि भारतीय स्त्रियां भले ही मायावी विकास की चपेट में हैं पर सत्य यानि अध्यात्मिक ज्ञान अभी उनका लुप्त नहीं हुआ है। वैसे जब पश्चिम का मायावी विकास कभी इसे खत्म कर देगा इसमें संदेह नहीं है।

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Tuesday, October 13, 2009

पुरानी याद-हिंदी साहित्यक कविता (purani yad-hindi sahitya kavita)

सपने जैसे शहर में
ख्वाब लगती उस इमारत की छत के नीचे
रौशनी की चमक से आंखें चुंधिया गयी हैं
फिर याद आती है
पीछे छोड़ आये उस शहर और घर की
जहां अंधेरे भी अक्सर आ जाते हैं।
राहें ऊबड़ खाबड़ है
गिरने का डर साथ लिये हर पल चलते जाते हैं
सपना जो सच बन कर सामने खड़ा है
फिर एक ख्वाब बन जायेगा
लौटकर कदम जाने हैं अपने शहर और घर
कितना अजीब है
अपना सच हमेशा साथ रहता है
चाहे भले ही सपनों की दुनियां में
सच होकर सामने आ जाये
ख्वाब जब हकीकत बनते हैं
तब भी पुरानी याद कहां छोड़ पाते हैं।
..........................


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Thursday, September 17, 2009

दूसरे की सोच के गुलाम-व्यंग्य कविता (soch ke gulam-vyangya kavita)

हम यूं तन्हा नही रह जाते
अगर उस भीड़ में शामिल होते।
सभी चले जा रहे थे
उम्मीदों के गीत गा रहे थे
हमने वजह पूछी
पर किसी ने नहीं बताई
ऐसा लगा किसी के खुद ही समझ नहीं पाई
हम भी बढ़ाते उनके साथ कदम
अगर दूसरे की सोच के गुलाम होते।
.......................
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Sunday, September 6, 2009

जिन्न और पियक्कड़-हास्य व्यंग्य कविता (jinna aur drunkar-hasya kavita)

शराब की बोतल से जिन्न निकला
और उस पियक्कड़ से बोला
-"हुकुम मेरे आका!
आप जो भी मुझसे मंगवाओगे
वह ले आउंगा
बस शराब की बोतल नहीं मंगवाना
वरना मुझसे हाथ धोकर पछताओगे.


सुनकर पियक्कड़ बोला
-"मेरे पास बाकी सब है
उनसे भागता हुआ ही शराब के नशे में
घुस जाता हूँ
दिल को छु ले, ऐसा कोई प्यार नहीं देता
देने से पहले प्यार, अपनी कीमत लेता
तुम भी दुनिया की तमाम चीजें लेकर
मेरा दिल बहलाओगे
मैं तो शराब ही मांगूंगा
मुझे मालूम है तुम छोड़ जाओगे.
जाओ जिन्न किसी जरूरतमंद के पास
मुझे नहीं खुश कर पाओगे..
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