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Sunday, September 12, 2010

कैमरा जब पिंजरा बन जाता है-हिन्दी व्यंग्य (sting operation by camra-hindi hasya vyngya)

कैमरे के सामने फोटो खिंचवाने का सभी को शौक होता है। जिन लोगों की रोजी रोटी ही कैमरे के सामने होने से चलती है उनके लिये तो अपनी अदाऐं दिखाना ही धंधा हो जाता है। यह धंधा करने वाले इसके इतने आदी हो जाते हैं कि उसे छोड़ना तो दूर उसका सोचना भी उनको डरा देता है। कैमरर उनके लिये एक महल की तरह होता है जिसमें एक बार आने पर हर कोई रहना चाहताहै पर कुछ लोगों के लिये यह पिंजरा भी बन जाता है। एक तो पिंजरा उनके लिये होता है जो मज़बूरी की वजह से इसके सामने टिके रहना चाहते हैं क्योंकि यहीं से उनकी रोजी रोटी चलती है पर मन उनका नहीं होता। दूसरे वह लोग हैं जिनको जबरन तस्वीर बनाकर इसमें लाया जाता है।
आजकल यही कैमरा टीवी चैनल तथा खोजी पत्रकारों के लिये पिंजरा (sting operation) बन गया है और वह इसे लेकर पकड़ अभियान-स्टिंग ऑपरेशन  (sting operation) चलाते हैं। कभी अभिनेता, कभी नेता, कभी अधिकारी तो कभी संत इस कैमरे में ऐसे कैद होते हैं जैसे कि पिंजरे में चूहा।
बड़ा दिलचस्प दृश्य टीवी पर चलता है जब इसमें कैदी की तरह फंसे खास शख्सियतों का असली रूप सामने आता है। उस समय हंसते हुए पेट में बल पड़ जाते हैं क्योंकि यह देखकर मजा आता है कि ‘देखो, कैसे धंधे पानी की बात कर यह आदमी जाल में फंस रहा है।’ जैसे मछली कांटे में फंसती है और जैसा चूहा पिंजर में फंसकर छटपटाता है।
शिक्षण संस्था में प्रबंधक पद पर व्यक्ति आसीन लोग बड़े आदर्श की बातें करते हैं पर जब कैमरे में कैद होते हैं तो क्या कहते हैं कि ‘इतनी रकम दो तो मैं तुम्हें कॉलिज में प्रवेश दिला दूंगा। इस विषय में इतने तो उस विषय में इतने पैसे दो। इसकी रसीद नहीं मिलेगी।’
बिचारा धंधा कर रहा है पर उसे पता नहीं कि वह चूहे की तरह फंसने जा रहा है। बड़े विद्वान बनते हैं पर लालच उनकी अक्ल को चूहे जैसा बना देती है। हा...हा...
फिल्मी लाईन वाले कहते हैं कि उनके यहां लड़कियों का शोषण नहीं होता पर उनका एक अभिनेता-खलपात्र का अभिनय करने वाला-एक लड़की से कह रहा था कि ‘यहां इस तरह ही काम चलता है। आ जाओ! तुम मेरे पास आ जाओ।’
कुछ जनकल्याण का धंधा करने वाले भी फंसे गये जो केवल सवाल उठाने के लिये पैसे मांग रहे थे।
ऐसे में हंसी आती है। यह देखकर हैरानी होती है कि कैमरा किस तरह पिंजरा बन जाता है। यह फंसने वाले कोई छोटे या आम आदमी नहीं होतें बल्कि यह कहीं न कहीं आदर्श की बातें कर चुके वह लोग दिखाई देते हैं जिनका समाज में प्रभाव है।
सबसे अधिक मजा आता है संतों का चूहा बनना। अधिकारी, नेता और अभिनेता तो चलो बनते ही लोग पैसा कमाने के लिये हैं पर संतों का पेशा ऐसा है जिसमें आदर्श चरित्र की अपेक्षा की जाती है। यह संत भारतीय अध्यात्म में वर्णित संदेशों को नारों की तरह सुनाते हैं
‘काम, क्रोध, लोभ और मोह में नहीं फंसना चाहिये।’
‘यह जगत मिथ्या है।’
‘सभी पर दया करो।’
‘किसी भी प्रकार की हिंसा मत करो।
‘अपनी मेहनत से कमा कर खाओ।’
आदि आदि।
जब यह बोलते हैं तो ऐसा लगता है कि कितने मासूम और भोले हैं। इनमें सांसरिक चालाकी नहीं है तभी तो ऐसे उल्टी बातें-जी हां, अगर आम आदमी ऐसा कहे तो उसे पागल समझा जाता है-कर रहे हैं शायद संत हैं इसलिये।
मगर कैमरे में यह बड़े संत चूहे की तरह फंसते नज़र आते हैं तब क्या कहते हैं कि
‘चिंता मत करो। तुम्हारा काम हो जायेगा। अरे यहां कोई तुम्हारा बाल बांका भी नहीं कर सकता। यहां तो बड़े बड़े ताकतवर लोग मत्था टेकने आते हैं।’’
‘तुम कहंीं से भी धन लाओ हम उसका सलीके से उपयोग करना सिखा देंगे।’
‘हम तुम्हें ठेका दिला देंगे, हमारा कमीशन दस प्रतिशत रहेगा। हमें कार और पिस्तौल दिलवा देना।’
ऐसी ऐसी विकट बातें सुनकर कानों में यकीन नहीं होता। सोचते हैं कि-अरे, यार इसे तो रोज टीवी पर देखते हैं, कहां इसे संत और विद्वान समझते हैं यह तो बिल्कुल एक मामूली दुकानदार की तरह बात करने के साथ ही मोलभाव भी कर रहा है।’
पिंजरे में फंसे संत कहते हैं कि ‘चिंता मत करो, हमारे यहां तो तुमसे भी बड़े खतरनाक लोग आसरा पाते हैं’।
तब हम सोचते हैं कि यह रावण और कंस के विरुद्ध प्रतिदिन प्रवचन करने वाले उनसे भी खतरनाक लोगों को पनाह देते हैं। यहां यह बता दें कि कंस और रावण खतरनाक तत्व थे पर फिर भी कहीं न कहीं के राजा थे और उनके कुछ सिद्धांत भी थे पर आज के यह खतरनाक तत्व ऐसे हैं कि पुराने खलनायक हल्क नज़र आते हैं।
यह संत लोग कैमरे में फंसे पिंजरे में कहते हैं कि ‘कितना भी काला धन लाओ कमीशन देकर उसे सफेद पाओ।’
ऐसे प्रसंगों में एक संत की यह बात सबसे अज़ीब लगी कि ‘अमेरिका में कोई भी काम हो एक मिनट में हो जायेगा।’
मतलब वहां भी ताकतवर इंसानों की खरीद फरोख्त कर लेते हैं-वाकई धर्म की आड़ में अधर्म कितना ताकतवर हो जाता है। अभी तक अमेरिका और ब्रिटेन के बारे में यह धारणा हमारे यहां रही है कि वहां के लोग देशभक्त होते हैं और इस तरह नहीं बिकते पर एक मिनट में काम होने वाली बात से तो यही लगता है कि बाज़ार के वैश्वीकरण के साथ ही अपराध और आतंक का भी वैश्वीकरण हो गया है। उसके साथ ही हो गया है उनको धर्म की आड़ देने का व्यापार।
किस्सा मज़ेदार है। पकड़ अभियान-स्टिंग ऑपरेशन  (sting operation) करने वालों ने संत को बताया कि उनके साथ जो महिला है वह अमेरिका से आर्थिक अपराध कर भागी है। उसे शरण चाहिये। वह संत अपने आश्रम में शरण देने को तैयार है और कहता है कि
‘यहां तुम किसी को कुछ मत बताना! कहना यह कि ध्यान और दर्शन के लिये आयी हूं।’
बेसाख्ता हमारे मन में बात आयी कि ‘जैसे यह ध्यान और दर्शन करा रहे हैं।’
क्या सीख है! दर्शन और ध्यान की आड़ में छिप जाओ। यही संत कैमरे के सामने जब बोलते हैं तो उनके भक्त मंत्रमुग्ध हो जाते हैं पर इन पकड़ कर्ताओं ने उनको अपने गुप्त कैमरे को पिंजरा बनाकर चूहे की तरह फंसा डाला।
फिल्म वालों ने एक अंधविश्वास फैला रखा है कि भूत केवल आदमी को दिखता है मगर कैमरे में नहीं फंसता। एक फिल्म आई थी नागिन! जिसमें एक नागिन रूप बदल कर अपने नाग के हत्यारों से बदला ले रही थी। उसमें वह हत्यारों को तो अपनी इंसानी प्रेमिका में दिखती थी और बाद में उनको डस कर बदला लेती थी। उसमें एक नायक उसे पहचान लेता है क्योंकि वह कांच में नागिन ही दिखाई देती है। कैमरे में ही यह दर्पण भी होता है। जिस तरह वह रूपवती स्त्री कांच में नागिन दिखाई देती थी वही कैमरे की भी असलियत होती है। यह धर्म भी शायद एक भूत है जो पिंजरा बन जाने पर कैमरे में अधर्म जैसा दिखाई देता है। रहा धर्म का असली रूप में दिखने का सवाल तो उसके लिये चिंतन का होना जरूरी है क्योंकि वह एक अनुभूति है जो बाहर हमारे आचरण के रूप में अभिव्यक्त होती है और उसके बारे में निर्णय दूसरे लोग करते हैं और सबसे बड़ी बात यह कि सच्चे धर्म वाले कभी किसी पिंजरे में नहीं फंसते।
आखिरी बात यह कि यह व्यंग्य का विषय नहीं बल्कि गंभीर बात है कि श्रीमद्भागवत गीता एक कैमरे का रूप है जिसका अध्ययन कर उसकी बात समझें तो अपना चित्र स्वयं ही खीचकर देख सकते हैं और साथ ही माया के पिंजरे में फंसे लोगों की अदायें देखने का लुत्फ् भी उठा सकते हैं। गीता सिद्ध जानते हैं कि धर्म क्या है और उसकी रक्षा कैसे होती है। उनके लिये कैमरा कभी पिंजरा नहीं बन पता क्योंकि वह उसके सहज अभ्यासी होते हैं और कथनी करनी में अंतर न होने की वजह से कभी चूहे नहीं बनते।
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Thursday, August 26, 2010

कसूरवारों की शख्सियत-हिन्दी शायरी (kasurvaron ki shakhsiyat-hindi shayari)

कौन कहता है
अखबार की खबर बासी हो जाती है,
बस!
हादसों, हत्याओं और हमलों की घटनाओं में
इलाकों के नाम और चरित्र बदल जाते हैं
इसलिये कहानियां ताजी हो जाती हैं।
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लूट और व्यापार में
अब अंतर नज़र नहीं आता है,
झूठ भी सच की तरह
बाज़ार में सज जाता है,
कातिलों के भी इंसानी हकों की
मांग उठती है चारों तरफ
कसूरवारों के कसूर की बजाय
जाति, धर्म और भाषा के आधार पर भी
उनकी शख्सियत की पहचान कर
सजा देने या बहाल करने का
फैसला अब सरेआम किया जाता है।
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Sunday, August 22, 2010

मतलब का सरफरोश-हिन्दी शायरी (matlab ka sarfarosh-hindi shayari)

लुट रहे हैं शहर, मगर हर आदमी खामोश है,
खुलेआम खंजर चलते, जैसे कि ज़माना बेहोश है।
सरेराह खज़ाना लुट गया, किसी ने देखा नहीं,
पहरेदारों के हिस्सा मिल जाने पर बहुत जोश है।
हर शहरी डरा हुआ है हादसों के खौफ से,
मगर कातिलों की नज़र न पड़े, इसलिये खामोश है।
दीपक बापू ढूंढ रहे जिंदा दिल को सड़कों पर,
दौड़ती भीड़ में हर कोई, अपने मतलब का सरफरोश है।
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Saturday, August 14, 2010

भूत पर यकीन-हास्य कविता (bhoot par yakin-hasya kavita)

पोते ने दादा से पूछा
‘‘अमेरिका और ब्रिटेन में
कोई इतनी भूतों की चर्चा नहीं करता,
क्या वहां सारी मनोकामनाऐं पूरी कर
इंसान करके मरता है,
जो कोई भूत नहीं बनता है।
हमारे यहां तो कहते हैं कि
जो आदमी निराश मरते हैं,
वही भूत बनते हैं,
इसलिये जहां तहां ओझा भूत भगाते नज़र आते हैं।’’

दादा ने कहा-
‘‘वहां का हमें पता नहीं,
पर अपने देश की बात तुम्हें बताते हैं,
अपना देश कहलाता है ‘विश्व गुरु’
इसलिये भूत की बात में जरा दम पाते हैं,
यहां इंसान ही क्या
नये बनी सड़कें, कुऐं और हैंडपम्प
लापता हो जाते हैं,
कई पुल तो ऐसे बने हैं
जिनके अवशेष केवल काग़ज पर ही नज़र आते हैं,
यकीनन वह सब भूत बन जाते हैं।’’
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Thursday, August 12, 2010

एकता की मेलागिरी-हिन्दी हास्य कविता (ekta ki melagiri-hindi hasya kavita)

च्रेले ने कहा गुरु से
‘आप समाज में एकता की बात
हमेशा लोगों के सामने चलाते हो,
उनसे तालियां बजवाते हो,
पर एक बात समझ में नहीं आयी
आप ही जाति, भाषा और धर्म का नाम लेकर
लोगों के आपस में बंटे होने की तरफ
करते हैं इशारा,
जबकि क्या आम इंसान आपस में लड़ेगा
इन छोटी बातों को लेकर
वह तो काम से फुर्सत नहीं पाता बिचारा,
कभी कभी अपने समाज की
तरक्की का प्रश्न भी उठाते हो,
फिर भी एकता के मसीहा नाम से जाने जाते हो।’
सुनकर गुरुजी बोले,
कमबख्त!
इतने साल से करता रहा है चेलागिरी,
सीख नहीं पाया यह एकता की मेलागिरी,
आम इंसान को कहां फुरसत है
जाति, भाषा और धर्म के नाम लड़ने की
पर हमें जरूरत है उसके दिमाग में
एकता का भूत जड़ने की,
हर समाज में जाकर उसके उत्थान की
बात हम यूं ही करते हैं,
बंटे रहें लोग इसी तरह
अपने समाज की चिंता में वही मरते हैं,
एकता लाने के लिये
उनमें फूट डालना जरूरी है,
अपना घर भरने के लिये
आम इंसान की जेब की लूट जरूरी है,
नहीं दिखायेंगे टुकडे़ टुकड़े समाज के,
बज जायेंगी बाजे अपने राज के,
एकता का मसीहा
जंग के बिना संभव नहीं,
यह बात तुम क्यों नहीं समझ पाते हो।।
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Sunday, August 8, 2010

खेल प्रबंधन-हास्य कविता (sports manegment-hindi comic poem)

खेल के पीरियड में
बहुत से छात्र नहीं आये,
यह सुनकर विद्यालय के
प्राचार्य तिलमिलाये
और अनुपस्थित छात्रों को फटकारा
‘‘तुम लोगों को शर्म नहीं आती
खेल के समय गायब पाये जाते हो,
क्या करोगे जिंदगी में सभी लोग,
बिना फिटनेस के ऊंचाई पर जाने के
सपने यूं ही सजाते हो,
अरे, खेलने में भी आजकल है दम,
पैसा नहीं है इसमें कम,
कोई खेल पकड़ लो,
दौलत और शौहरत को अपने साथ जकड़ लो,
देश का भी नाम बढ़ेगा,
परिवार का भी स्तर चढ़ेगा,
यही समय है जब अपनी सेहत बना लो
वरना आगे कुछ हाथ नहीं आयेगा।’’

एक छात्र बोला
‘‘माननीय
आप जो कहते है वह सही है,
मगर हॉकी या बल्ला पकड़ने से
अधिक प्रबंध कौशल होना
सफलता की गारंटी रही है,
पैसा तो केवल क्रिकेट में ही है
बाकी खेलों में तो बिना खेले ही
बड़े बड़े बड़े खेल हो जाते हैं,
जिन्होंने सीख ली प्रबंध की कला
वह चढ़ जाते हैं शिखर पर
नहीं तो बड़े बडे खिलाड़ी
मैदान पर पहुंचने से पहले ही
सिफारिश न होने पर फेल हो जाते हैं,
अच्छा खिलाड़ी होने के लिये जरूरी नहीं
कोई खेले मैदान पर जाकर खेल,
बस,
निकालना आना चाहिये उसमें से कमीशन की तरह तेल,
आपके यहां प्रबंध का विषय भी हमें पढ़ाया जाता है,
पर उसमें नये ढंग का तरीका नहीं बताया जाता है,
हम रोज अखबारों में पढ़ते हैं
जब होता है विद्यालय में खेल का पीरियड
तब हम खेल के प्रबंध पर चर्चा करते हैं,
किस तरह खेलों में नाम कमायें,
तय किया है कि ‘कुशल प्रबंधक‘ बन जायें,
आप बेफिक्र रहें
किसी से कुछ न कहें,
कोई न कोई आपके यहां का छात्र
खेल जगत में नाम कमायेगा,
मैदान पर नहीं तो
खेल प्रबंधन में जाकर
अपने साथ विद्यालय की इज्ज़त बढ़ायेगा,
उसकी खिलाड़ी करेंगे चाकरी,
खिलाड़िनों को भी नचायेगा,
भले ही न पकड़ता हो हॉकी,
बॉल से अधिक पकड़े साकी,
पर खेल जगत में नाम कमायेगा।’’

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Monday, August 2, 2010

कबाड़ चैनल-हिन्दी हास्य व्यंग्य (kabad news chainal-hindi hasya vyangya)

एक कबाड़ी ने जब सुना कि अमुक चैनल अपना पूरा तामझाम बेचकर दूसरी जगह से चालू होने वाला है तो वह तत्काल अपने साथी दूसरे कबाड़ी के पास पहुंचा।
दूसरे कबाड़ी ने उसे देखते ही कहा-‘आ गये जासूसी करने!’
पहल कबाड़ी बोला-‘‘नहीं यार, आज तो मैं एक साझा काम करने का प्रस्ताव लाया हूं। हम दोनों अमुक टीवी चैनल को खरीद लेते हैं वह बिक रहा है और दूसरी जगह से शुरु होने वाला है। उसके प्रबंधक नाम के अलावा सबकुछ बेचने वाले हैं। वहां के एक चपरासी ने मुझे बताया जो कि वहां से अब निकाले जाने वाला है।’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘‘ तो हम क्या करेंगे? इतना महंगा सामान होगा, हमारे किस काम का? उसे बेचेंगे कहां?’’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘बेचना नहीं है। हमें वह चैनल कबाड़ी न्यूज चैनल के नाम से चलाना है। अरे, ठीक है हम कबाड़ी हैं पर हमारे पास पैसा कोई कम नहीं है। फिर अपने बच्चों के नाम से कबाड़ी नाम का संबोधन कितना बुरा लगता हैै।’’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘मूर्ख कहीं के! कबाड़ी का काम है पुरानी चीजें खरीद कर बेचना न कि घर में रखना।’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘लगता है कि अपने बच्चों के भविष्य से तुम्हें प्रेम नहीं है। फिर आगे चलकर हम भी नयी जगह पर वह चैनल चलायेंगे तब सारा सामान बेच देंगे।’
दोनों जब बातचीत कर रहे थे तब उनका ध्यान पास बैठे उस आदमी की तरफ नहीं गया जो चुपचाप एक बैंच पर बैठ कर बीड़ी पी रहा था। वह एकदम मैला कुचला सफेद पायजमा कुर्ता पहने हुए था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और बालों से ऐसा लग रहा था कि जैसे बरसों से नहाया न हो। दरअसल वह तीसरा कबाड़ी था जो व्यवसाय से संबंधित गोपनीय सूचनायें एकत्रित करने दूसरे कबाड़ी के पास आकर बैठता था।
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘पर चैनल चलाने का अपने पास तो अनुभव ही नहीं है। हां, यह बात सही है कि मैं समाचारों का शौकीन हूं और अमुक चैनल पहले बहुत देखता था पर अब वह तो बेकार हो गया है।’
पहले ने कहा-‘यार, कैसे कबाड़ी हो, तुम्हें पता है यहां अनुभव वगैरह तो केवल दिखाने के लिये हैं। वरना सच तो यह है कि अधिकतर लोग धूप में बाल सफेद करते हैं। समाचार चैनल चलाना कौन सा मुश्किल काम है।’
दूसरे ने कहा-‘जरा अपनी योजना बताओ तो सही।
पहला कबाड़ी-‘सुनो! समाचार चैनलों में एक घंटे के दौरान केवल दो मिनट के समाचार होते हैं बाकी तो इधर उधर की कबाड़ में मिलने वाली कटिंग से ही काम चलायेंगे। अपना घीसू कबाड़ी है न............’
दूसरे ने कहा-‘वही न! जो फिल्म लाईन में चला गया है।’
पहले ने कहा-‘काहे की फिल्म लाईन! पुरानी फिल्में कबाड़ में लाकर बेचता है। उससे कहेंगे कि अब वह थोड़ा कम पुरानी फिल्में खरीद कर हमारे अमुक चैनल पर दे। वैसे भी आजकल की फिल्में तीन दिन में ही कबाड़ हो जाती हैं। फिर क्रिकेट के खिलाड़ियों का रैम्प में नाचना, किसी फिल्म अभिनेता द्वारा लोगों से मारपीट की सच्ची घटना तथा लाफ्टर शो जैसे कार्यक्रम दूसरे चैनल आज दिखाते हैं हम तीन दिन बाद कबाड़ में खरीद कर उसे चलायेंगे। वैसे इस देश में गिनती के तीन चार लोग ऐसे भी हैं जो अपने छिछोरेपन की वजह से हमेशा ही न्यूज में बने रहते हैं। उनका भी सभी कुछ मसाला कबाड़ में मिल जायेगा। घीसू कबाड़ी के रिश्ते दूर दूर तक हैं। कोई ना करे यह संभव नहीं है। प्रबंध निदेशक उस चपरासी को बनायेंगे जिसने यह समाचार दिया है। हां, बस दो मिनट के लिये कोई समाचार वाचक रखना पड़ेगा और संपादक भी। ’
दूसरे ने कहा-‘तुम चिंता मत करो। समाचार संपादक तो मैं ही बन जाऊंगा क्योंकि आजकल समाचार न सुन पाने की भड़ास निकालने के लिये मौका मुझे चाहिए। वाचक की चिंता मत करो मेरा भतीजा निकम्मा घूम रहा है। वह इस काम के लिये कई जगह आवेदन भेज चुका है उसको काम पर रख लेंगे। मैंने भाई से कर्जा लेकर यह काम शुरु किया था तो उसका भी बदला चुक जायेगा। हां, एक तो महिला या लड़की भी तो रखनी पड़ेगी।’
पहले ने कहा-‘उसकी चिंता नहीं है। मेरी साली इसके लिये योग्य है।’
दूसरे ने कहा-‘यार, पर मुझे डर लग रहा है। इतना बड़ा काम है!
पहले ने कहा-‘तुमने अगर कबाड़ का काम किया है इसलिये कोई भी काम कर लोगे। इसलिये तो चैनल का ही नाम मैंने कबाड़ी सुझाया है।’
दूसरे ने कहा-फिर देर किस बात की।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, तो मेरी मोटर साइकिल पर बैठो और चलो।’
दोनों मोटर साइकिल पर चल पड़े। थोड़ी दूर जाकर वह बंद हो गयी तो दूसरा कबाड़ी बोला-‘यार, कैसी मोटर साइकिल लाये हो।’
पहला कबाड़ी-‘कल ही कबाड़ में खरीदी है कोई पुरानी नहीं लाया।’
थोड़ी देर तक दोनों पैदल ही मोटर साइकिल घसीटते रहे तब कहंी जाकर उसको बनाने वाली दुकान मिली। वहां एक घंटा लग गया। मैकनिक से बहुत चिकचिक होती रही। दोनों बैठकर फिर अपनी राह चले। थोड़ी दूर चले तो पिछला पहिये से हवा निकल गयी। फिर दोनों घसीटते हुए पंचर बनवाने की दुकान पर आये।
पंचर बनाने वाले ने पहिये में से ट्यूब निकाला और उसे बनाने लगा। उसके यहां छोटे टीवी पर अमुक चैनल आ रहा था। दूसरा कबाड़ी उसे देखने लगा तो वहां ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। दूसरा कबाड़ी एकदम चिल्ला पड़ा-‘अरे यार देख, अमुक चैनल बिक गया है और दूसरी जगह से शुरु होगा। किसी चालू कबाड़ी ने खरीदा है।’
पहले कबाड़ी का मुंह खुला का खुला रह गया-‘बहुत बुरा हुआ। अब समझ में आया। अरे, यही चालू कबाड़ी वही था जो हमारी बातें सुन रहा था। मैं उसे जानता हूं पर वहां वेश बदले बैठा था इसलिये समझ नहीं पाया। वह तुम्हारे यहां तुम्हारी जासूसी करने अक्सर ऐसे ही आता है मुझे उसके एक नौकर ने बताया था।’’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘उसने चैनल का नाम भी रख दिया है, ‘‘कबाड़ न्यूज चैनल’’, हमारी पूरी योजना चोरी कर गया। चल उससे रॉयल्टी मांगते हैं।’’
पहला बोला-‘‘कोई फायदा नहीं। उसने अपने चैनल का नाम ‘कबाड़ी’ नहीं बल्कि ‘कबाड़’ चैनल रखा है।’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘तेरे को धंधे  का उसूल नहीं मालुम। अरे, हम पुराने सामान खरीदने और बेचने वाले हैं न कि उनके इस्तेमाल करने वाले। तुझे यह कबाड़ में खरीदी मोटर साइकिल नहीं लानी थी। इस चालू कबाड़ी को देख नयी कार चलाता है और कितनी जल्दी फुर्र से उड़कर वहां पहुंच गया।’
पहले ने कहा-‘‘चिंता मत करो, खरीदा तो है पर चला नहीं पायेगा।’
दूसरे ने कहा-‘‘पर तुमने तो कहा था कि कबाड़ी कुछ भी कर सकता है।’’
पहले ने कहा-‘‘यह मैंने अपने और तुम्हारे लिये कहा था। उसके लिये नहीं। देखना वह जल्दी इसे बेच देगा। तब हम उससे सस्ते में खरीदेंगे।’
दूसरे ने कहा-‘नहीं, कबाड़ी से कोई सामान नहीं खरीदना यह मेरा उसूल है। वह भले ही न्यूज चैनल वाला हो गया है पर मेरी नज़र में रहेगा तो कबाड़ी ही न!’
पहले वाले ने कहा-‘नहीं पर उसकी असलियत बदल गयी है। मैंने तुम्हें बताया था न!’
दूसरे ने कहा-‘अब तुम्हारी नहीं सुनना। मेरी नज़र में उसकी असलियत नहीं बदलेगी।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, कोई बात नहीं। यह चालू कबाड़ी तो ऐसा है कि सब जगह कबाड़ कर देता है। इस धंधे  का भी यही करेगा, तब दूसरे चैनल कबाड़ में खरीद कर चलायेंगे।’
दोनों खुश होकर वहां से चले गये। उधर चालू कबाड़ी घीसू कबाड़ी को फोन कर रहा था।
नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वहीं इसके लिये जिम्मेदार होगा। इसे पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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