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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Monday, February 23, 2015

इंसानों के समंदर में-हिन्दी कविता(insanon ke samandar mein-hindi poem)



जिंदगी की राह
सहजता से चलें
साथी ऐसे कहां मिलते हैं।

मजबूत इरादे जताते
पर मुश्किल से घबड़ाते
टूटे मनोबल को उठायें
साथी ऐसे कहां मिलते हैं।

तन बेकार
मन बेजार
ख्यालों के टूटे तार
इंसानों के समंदर में
सियार ज्यादा दिखते
मतलबपरस्ती से दूर होकर
वफा की हद तक आयें
साथी ऐसे कहां मिलते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, January 24, 2015

अर्थ और प्रतिष्ठा की प्रकृत्ति कचरे की तरह होती है-हिन्दी व्यंग्य लेख(dhan aur pratishtha ki prikriti kachara kee tarah hotee hai-hindi sartire article)



            एक लेखक होने पर अनेक बार ऐसे लोग मजाक बना जाते हैं जिनको कलम बैरी लगती है।  अगर कहीं कोई फार्म भरना हो तो मुंह उठाये बिना पेन के चले आयेंगे। कहेंगे‘फार्म भर दो’। हम पूछे अपनी लाये हो’? जवाब मिलेगा ‘हम तुम्हारी तरह लेखक थोड़ी ही हैं कि पेन लेकर घूमे।’
             पेन लायेंगे नहीं! फार्म स्वयं भरेंगे नहीं! ऐसे में अगर लेखक मित्र हो तो उसे बिना बहस के उनका काम यह सोचकर काम करना पड़ता है कि अगर अधिक  बात की तो अपना ही मजाक बनेगा।  बहरहाल बसंत पंचमी की सुबह हमने रास्ते में उन मित्र को उनका फार्म भर कर दिया।  हम चलने को उद्यत हुए तो बोले-अरे हां, 26 जनवरी आ गयी है तुम आठ साल से इंटरनेट पर लिख रहे हो। देखना कहीं तुम्हारे नाम से पुरस्कार न आये। भई, तुम जैसे लोगों ने हिन्दी के लिये इंटरनेट पर बहुत कुछ लिखा है।’’
            हमने पूछा‘तुमने पढ़ा है?’
            ’’नहीं, मेरा बच्चा बता रहा था। कहीं धोखे से वह तुम्हारे फेसबुक पर चला गया था।’’उसने बताया।
            ‘‘हां, कभी कभी धोखे से ही लोग हमारे ब्लॉग या फेसबुक पर आते हैं और उस पर लिखने से कोई न तो प्रतिष्ठा मिलती है न धन ही। कहा जाता है कि इन दोनों का व्यवहार कूड़े की तरह होता है। जहां पहले ही धन मौजूद हो वहीं लोग डालते हैं।  सम्मान भी उसी तरह ही वहां दिये जाते हैं जहां पहले ही संबंधित की प्रतिष्ठा साथ हो। हमारे भाग्य से दोनों ही कूड़ेदान दूर रहे हैं।’हमने हसंकर कहा।
            वह बोला-‘यह तो तुम्हारी खिसियाहट है।’’
            हमने हंसकर कहा-‘‘हां तुम यह कह सकते हो।
            वह बोला-‘‘यार, बुरा मत मानना मैंने अनेक बार तुम्हारे लेख पढ़े हैं। बहुत अच्छा लिखते हो।  मेरे एक बात समझ में नहीं आती कि तुम्हें अपेक्षित सम्मान क्यों नहीं मिला?’’
            हमने हंसकर कहा‘-मित्र होने के नाते तुम अपेक्षा रख सकते हो पर हमने कभी ऐसा नहीं सोचा।’’
            हम स्वयं के लिये अपेक्षा नहीं करते पर इस इंटरनेट पर हमने अनेक ऐसे लेखक देखे हैं जिन्हें अंतर्जाल पर हिन्दी जाल बिछाने के लिये हमेशा प्रयासरत देखा है। मुश्किल यह है कि इंटरनेट का उपयोग सभी कर रहे हैं पर धनपति तथा उनके प्रबंधकों  के लिये सभी प्रयोक्ता हैं।  आज आठ साल हो गये हैं तो हमारा मानना है कि अंतर्जाल पर सक्रिय कुछ लोगों को पद्मश्री या पदमविभूषण सम्मान मिल जाता तो अच्छा होता। हालांकि हमारे यहां बाज़ार और प्रचार समूहों की पकड़ हर क्षेत्र में ऐसी है कि वह किसी निष्काम अंतर्जाल लेखक को सम्मानित नहीं कर सकते।  उन्हें केवल  बने बनाये नायक और चेहरे चाहिये।  उनके लिये धन और प्रतिष्ठा का नकदीकरण करने वाला ही प्रशंसनीय है।
            अंतर्जाल पर आठ वर्ष तक बने रहने के बाद उससे बाहर के लेखक, प्रकाशक और प्रचार प्रबंधक हमारे लिये एक अजूबा उसी तरह बन गये हैं जैसे कि हम उनके लिये हो सकते हैं। उन्हें अपने लोग पुरस्कृत कराने हैं।  इस तरह  अपने अर्थतंत्र की ताकत दिखानी है। बहरहाल हमने जब अपने अध्यात्मिक यात्रा में मनुस्मृति शामिल की तब हमारे एक ब्लॉग लेखक मित्र ने बता दिया था कि किसी भी विचाराधारा का नियंत्रण आर्थिक, कला तथा समाज के क्षेत्र में हो आप कभी मनुस्मृति पर लिखने के बाद सम्मान की आशा कभी न करें।  एक अंतर्जालीय प्रयोक्ता के रूप मेें आठ सौ रुपये हर माह  खर्च करते हैं और  कभी इससे बड़ी छवि की अपेक्षा भी नहीं करते।  बहरहाल कुछ मित्रों के लेख पढ़कर लगता है कि उन्हें सम्मान अवश्य मिलना चाहिये।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, January 16, 2015

जिंदगी जीने के तरीके-हिन्दी कविता(zindagi jeene ke tarike-hindi poem)



बदलते मौसम के साथ
सेहत बचाने के
तरीके भी बदल जाते हैं।

बदलती स्थिति के साथ
जीवन युद्ध जीतने के
तरीके भी बदल जाते हैं।

कहें दीपक बापू यथास्थिति पर
बने रहने की इच्छा
इंसान को आलसी बना देती है,
समृद्धि दिखाने की तत्परता
विलासी बना देती है,
बुरी आदतों से बंधी जिंदगी
से आयी जड़ता
बेबस बना देती है,
सच यह है कि
घूमते समय चक्र के साथ
धरती के नियमों के साथ
तरीके भी बदल जाते हैं।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Thursday, December 4, 2014

चमकते सिंहासन पर भक्ति-हिन्दी कविता(chamakte sinhasay par bhaki-hindi poem)





दूसरे पर तरह खाते वही
अपनी देह पर तरह तरह के
वेश धारण करने में
जिनकी आसक्ति है।

चमकते सिंहासन पर विराजे
समाज सेवा के व्यापार में
बेचते भ्रम सत्य के नाम पर
उनके शब्दों में इतनी शक्ति है।


कहें दीपक बापू प्रमाण पत्र
कोई नहीं  देखता
प्रसिद्ध हो जाने पर
प्रश्न नहीं उठाता
चतुराई में सिद्धि आने पर,
गुरु को दोष देना व्यर्थ
शिष्य वही आते
जिनकी जादू में भक्ति है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, October 31, 2014

इतिहास और सत्य-हिन्दी कविता(history and trurh-hindi poem,ithas aur satya-hindi poem)



इतिहास में लिखा
हर शब्द सत्य है
यह कौन कहता है।

अस्त्र शस्त्रों से
लड़े गये युद्ध
विजेता और पराजित
बड़े वीरों का
प्रसिद्ध हुआ नाम
मगर रक्त बहाने वालों
आम इंसानों की चर्चा  पर
हर कोई मौन रहता है।

कहें दीपक बापू बुद्धि की सिद्धि से
आज उगे फल को
कल बोया ही जानो,
आज बो रहे हो
वह कल सामने होगा
यह भी मानो,
घटना और पात्र हर बार
पर्दे पर बदल जाते हैं,
मगयर भूमिका  एक जैसी पाते हैं,
इतिहास के कूड़ेदान में
अमृत ढूंढनें के लिये मत रुको
समय एक नदी की तरह है
वही जल भरो
सामने जो नदी में मौन बहता है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, October 25, 2014

दीपावली और स्वच्छता अभियान-हिन्दी हास्य कविता(deepawali aur swachchhta abhiyan-hindi comedy poem)



दीपावली बाद बधाई देने
घर आया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू, सुना है तुमने
केवल दिये जलाकर
सूखी दिवाली मनाई,
पटाखों से दूर रहे
न मिठाई किसी की  चखी
न किसी को चखाई।’’

सुनकर दीपक बापू बोले
‘‘यार, होली पर नकली रंग की तरह
दिवाली पर मिठाई से भी
डर लगने लगा है,
आनंद के पीछे
बीमारी आने का भय
हृदय में घर करने लगा है,
देश में पंचवर्षीय स्वच्छता अभियान
वैसे ही धीमी गति से चल रहा है,
इस पर पटाखों से प्रदूषण
हवाओं में ज्यादा अच्छी तरह पल रहा है,
लोगों को कोई नहीं  परवाह,
घर साफ कर कचरे से
सजा देते सभी की राह,
त्यौहार से तो अब आम दिन
ज्यादा अच्छे लगते हैं,
आता कोई विशेष दिवस
यह टीवी चैनले वाले
चिंतायें जताते
समझ में नहीं आता
हम सुख के पते पर
दुुःख को आमंत्रण भेजकर
किसे ठगते हैं,
बाहर से आकर्षक
अंदर से अस्वस्थ शरीर लेकर
लोग आनंद ढूंढने जाते हैं,
 जो पा नहीं सकते अंदर
वह बाहर भी नहीं लूट पाते हैं,
इसलिये हमने देह के साथ
देश में भी रखने के लिये सफाई,
अपने मन पर नियंत्रण कर ही
यह दीपावली बनाई।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, September 26, 2014

गांधी जयंती पर स्वच्छता अभियान प्रांरभ होना अच्छा प्रयास-हिन्दी चिंत्तन लेख(gandhi jayanti par swachchhata abhiyan prarambh hona achchha prayas-hindi chinttan lekh, A Special article on gandhi's birthday 2 october )



            2 अक्टूबर गांधी जयंती पर भारत में स्वच्छता अभियान प्रारंभ हो रहा है।  जीवन में स्वच्छता का  महत्व योग तथा अध्यात्मिक ज्ञान साधक अच्छी तरह जानते हैं।  देह की स्वच्छता मन और विचार में पवित्रता, शहर की स्वच्छता मनुष्यों के पारस्परिक संबंध में सौहार्द तथा उद्यान की स्वच्छता समाज के स्वास्थ्य में पवित्र भावनात्मक धारा प्रवाहित करती है।  अगर हम अपने आसपास विभिन्न लोगों की मानसिकता का अध्ययन करें तो यह निष्कर्ष सामने आता है कि रहन सहन का वातावरण सभी को प्रभावित करता है।  जिन्हें गंदे, प्रदूषित तथा असुरक्षित वातावरण में सांस लेना पड़ती है उनसे सद्व्यवहार की आशा करना ही व्यर्थ है।
            श्रीमद्भागवत् गीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों में बरतते हैं।  इस आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जिनकी सांसों में ही विष घुल रहा हो उनसे भद्र व्यवहार की आशा करना ही व्यर्थ होता है चाहे वह स्वयं ही क्यों न हों?
            आज प्रातःकाल उद्यान में घूमते हमें अपनी सांसों में शीतल हवा के मिश्रण से प्रसन्नता अनुभव हो रही थी कि अचानक कहीं से धुम्रपान की दुर्गंध ने उसे बाधित कर दिया।  हमनें दायें तरफ मुड़कर देखा तो एक बुजुर्ग सज्जन के पास से ही उसका उद्गम स्थल दिखाई दिया।  हमारे मन में उसे समय क्रोध आने से जो विचार क्रम  मस्तिष्क में चला अगर हम उसे वहां व्यक्त करते तो झगड़ा होता और अगर यहां लिखें तो अज्ञानी कहलायेंगे।  एक बार तो लगा कि हम उन सज्जन को बतायें कि वह कानून का उल्लंघन कर रहे हैं पर फिर लगा कि सुबह सुबह सांसरिक विषय से परे रहने की अपनी ही नीति का उल्लंघन करना ठीक नहीं है। यह काम उन लोगों को ही करना चाहिये जो प्रातःकाल की सैर में भी सांसरिक विषयों का चिंत्तन साथ लिये रहते हैं।
            अनेक बार हम देखते हैं दोपहर या सांयकाल उद्यान में सैर सपाटे के लिये लोग वहां खाने पीने के सामान के अवशेष वहीं छोड़ देते हैं।  उन्हें खाना याद रहता है पर सामान के अवशेष बाहर फैंककर प्रातःकाल आने वाले लोगों के चक्षुओं को कष्ट से दूर रहकर उन्हें अनुग्रहीत करने का विचार तक नहीं आता। भारत में मृत्युदर अधिक रही है और इसी कारण माना जाता है कि यहां की जनंसख्या बढ़ रही है। किसी समय हमारे यहां बच्चों की मृत्यु दर अधिक इसलिये लोग अपनी संतानों के जीवन को लेकर संशय के कारण अधिक बच्चे पैदा करते थे।  अब सभ्रातं वर्ग ने तो अपने लिये स्वच्छ घरों का निर्माण कर इस संशय से मुक्ति पा ली है पर सामान्य वर्ग में अब भी परिवार नियोजन को लेकर उदासीनता का भाव है।  यही कारण है कि हमारे यहां जनसंख्या अब भी बढ़ रही है।  समस्या यह है कि हमारे यहां अभी भी स्वच्छता को लेकर गंभीरता नहीं देखी जाती।
            महात्मा गांधी जी ने स्वचछता को महत्व दिया था।  स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर समाज में स्वच्छता रखनें का भाव हो तो बहुत हद तक रोगों पर  नियंत्रण रखा जा सकता है।  अध्यात्मिक साधकों का तो पहले से ही मानना है कि जिस वातावरण में मनुष्य रहेगा उसके प्रभाव या दुष्प्रभाव से वह बच नहीं सकता। हमें स्वच्छता का भाव केवल इसलिये नहीं लाना चाहिये कि समाज स्वस्थ रहे बल्कि यह सोचना चाहिये कि हम ही उससे लाभान्वित होंगे। एक बात निश्चित है कि स्वच्छता है तो सुंदरता है और सुंदरता है तो सद्भाव है और सद्भाव है तो यही धरती स्वर्ग है। हम आशा करते हैं कि स्वच्छता अभियान सफल होगा।


लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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Friday, August 1, 2014

गुलामों ने पहन लिया उधार का ताज-हिन्दी कविताऐं(gulamon ne pahan liya udhar ka taaz-hindi peom's)



लिखे गये हिन्दी में
इतिहास में ऐसे मशहूर किस्से भी हो गये।
कहें दीपक बापू गुलामी का भूत
जिनके सिर पर  चढ़ा
आधुनिक दिखने की चाह में
अधकचड़े लोग अंग्रेजी के हिस्से हो गये।
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गुलामों ने पहन लिया उधार का ताज,
आकाओं की भाषा का चला रहे राज।
कहें दीपक बापू  अंधेरे में तीर चलाते,
देशी इतिहास में विदेशी पीर ढलाते,
गांव से चलकर वह शहर आये
फिर भी नहीं जाने मातृभूमि का सच
कर रहे हैं परदेसी गुलामी पर नाज।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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