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Thursday, June 30, 2011

आधुनिक चिकित्सा में ध्यान का उपयोग-हिन्दी लेख *surgery and yoga sadhanna-hindi lekh

                ईरान के डाक्टर का एक किस्सा प्रचार माध्यमों में देखने को मिला जिसे चमत्कार या कोई विशेष बात मानकर चला जाये तो शायद बहस ही समाप्त हो जाये। दरअसल इसमें ध्यान की वह शक्ति छिपी हुई है जिसे विरले ही समझ पाते हैं। साथ ही यह भी कि भारतीय अध्यात्म के दो महान ग्रंथों ‘श्रीमद््भागवत गीता’ तथा ‘पतंजलि योग साहित्य’ को भारतीय शिक्षा प्रणाली में न पढ़ाये जाने से हमारे देश में से जो हानि हो रही है उसका अब शिक्षाविदों को अंांकलन करना चाहिए। यह भी तय करना चाहिए कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इन दो ग्रंथों का शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल न कर कहीं हम अपने देश के लोगों के अपनी पुरानी विरासत से परे तो नहीं कर रहे हैं।
           पहले हम ईरान के डाक्टर हुसैन की चर्चा कर लें। ईरान के हुसैन नाम के चिकित्सक अपने मरीजों को बेहोशी का इंजेक्शन दिये बिना ही उनकी सर्जरी यानि आपरेशन करते हैं। अपने कार्य से पहले वह मरीज को आंखें बंद कर अपनी तरफ घ्यान केंद्रित करते हैं। उसके बाद अपने मुख से वह कुछ शब्द उच्चारण करते हैं जिससे मरीज का ध्यान धीरे धीरे अपने अंगों से हट जाता है और आपरेशन के दौरान उसे कोई पीड़ा अनुभव नहीं होती। इसे कुछ लोग हिप्टोनिज्म विधा से जोड़ रहे हैं तो कुछ डाक्टर साहब की कला मान रहे हैं। हमें यहां डाक्टर हुसैन साहब की प्रशंसा करने में कोई संकोच नहीं है। उनके प्रयासों में कोई दिखावा नहीं है और न ही वह कोई ऐसा काम कर रहे हैं जिससे अंधविश्वास को बढ़ावा मिले। ऐसे लोग विरले ही होते हैं जो अपने ज्ञान का दंभ भरते हुए दिखावा करते हैं। सच कहें तो डाक्टर हुसैन संभवत उन नगण्य लोगों में हैं जो जान अनजाने चाहे अनचाहे ध्यान की विधा का उपयोग अपने तरीक से करना सीख जाते हैं या कहें उनको प्रकृत्ति स्वयं उपहार के रूप में ध्यान की शक्ति प्रदान करती है । उनको पतंजलि योग साहित्य या श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने की आवश्यकता भी नहीं होती। ध्यान की शक्ति उनको प्रकृति इस तरह प्रदान करती है कि वह समाधि आदि का ज्ञान प्राप्त किये बिना उसका लाभ लेने के साथ ही दूसरों की सहायता भी करते हैं।
           हुसैन साहब के प्रयासों से मरीज का ध्यान अपनी देह से परे हो जाता है और जो अवस्था वह प्राप्त करता है उसे हम समाधि भी कह सकते हैं। उस समय उनका पूरा ध्यान भृकुटि पर केद्रित हो जाता है। शरीर से उनका नाता न के बराबर रहता है। इतना ही नहीं उनके हृदय में डाक्टर साहब का प्रभाव इतना हो जाता है कि वह उनकी हर कही बात मानते है। स्पष्टतः ध्यान के समय वह हुसैन साहब को केंद्र बिन्दु बनाते हैं जो अंततः सर्वशक्मिान के रूप में उनके हृदय क्षेत्र पर काबिज हो जाते हैं। वहां चिक्त्सिक उनके लिये मनुष्य नहीं शक्तिमान का आंतरिक रूप हो जाता है। ऐसी स्थिति में उनकी देह के विकार वैसे भी स्वतः बाहर निकलने होते है ऐसे में हुसैन जैसे चिकित्सक के प्रयास हों तो फिर लाभ दुगुना ही होता है। देखा जाये तो ध्यान में वह शक्ति है कि वह देह को इतना आत्मनिंयत्रित और स्वच्छ रखता है उसमें विकार अपना स्थान नहीं बना पाते।
         इतिहास में ईरान का भारत से अच्छा नाता रहा है। राजनीतिक रूप से विरोध और समर्थन के इतिहास से परे होकर देखें तो अनेक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि ईरान की संस्कृति हमारे भारत के समान ही है। कुछ तो यह मानते हैं कि हमारी संस्कृति वहीं से आकर यहां परिष्कृत हुई पर मूलतत्व करीब करीब एक जैसे हैं।
         ध्यान कहने को एक शब्द है पर जैसे जैसे इसके अभ्यस्त होते हैं वैसे ही इस प्रक्रिया से लगाव बढ़ जाता है। वैसे देखा जाये तो हम दिन भर काम करते हैं और रात को नींद अच्छी आती है। ऐसे में हम सोचते हैं कि सब ठीक है पर यह सामान्य स्थिति है इसमें मानसिक तनाव से होने वाली हानि का शनैः शनै प्रकोप होता है। हम दिन में काम करते है और रात को सोते हैं इसलिये मन और देह की शिथिलता से होने वाले सुख की अनुभूति नहीं कर पाते। जब कोई सामान्य आदमी ध्यान लगाना प्रारंभ करता है तब उसे पता लगता है कि उससे पूर्व तो कभी उसका मन और देह कभी विश्राम कर ही नहीं सकी थी। सोये तो एक दिमाग ने काम कर दिया और दूसरा काम करने लगा और जागे तो पहले वाली दिमाग में वही तनाव फिर प्रारंभ हो गया। इसके बीच में उसे विश्राम देने की स्थिति का नाम ही ध्यान है और जिसे जाग्रत अवस्था में लगाकर ही अनुभव किया जो सकता है।
ध्यान के विषय में यह लेख अवश्य पढ़ें
पतंजलि योग विज्ञान-योग साधना की चरम सीमा है समाधि (patanjali yog vigyan-yaga sadhana ki charam seema samadhi)
        भारतीय योग विधा में वही पारंगत समझा जाता है जो समाधि का चरम पद प्राप्त कर लेता है। आमतौर से अनेक योग शिक्षक योगासन और प्राणायाम तक की शिक्षा देकर यह समझते हैं कि उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया। दरसअल ऐसे पेशेवर शिक्षक पतंजलि योग साहित्य का कखग भी नहीं जानते। चूंकि प्राणायाम तथा योगासन में दैहिक क्रियाओं का आभास होता है इसलिये लोग उसे सहजता से कर लेते हैं। इससे उनको परिश्रम से आने वाली थकावट सुख प्रदान करती है पर वह क्षणिक ही होता है । वैसे सच बात तो यह है कि अगर ध्यान न लगाया जाये तो योगासन और प्राणायाम सामान्य व्यायाम से अधिक लाभ नहीं देते। योगासन और प्राणायाम के बाद ध्यान देह और मन में विषयों की निवृत्ति कर विचारों को शुद्ध करता है यह जानना भी जरूरी है।
    पतंजलि योग साहित्य में बताया गया है कि 
           ------------------------------
      देशबंधश्चित्तस्य धारण।।
    ‘‘किसी एक स्थान पर चित्त को ठहराना धारणा है।’’
     तत्र प्रत्ययेकतानता ध्यानम्।।
       ‘‘उसी में चित्त का एकग्रतापूर्वक चलना ध्यान है।’’
        तर्दवार्थमात्रनिर्भासयं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।
        ‘‘जब ध्यान में केवल ध्येय की पूर्ति होती है और चित्त का स्वरूप शून्य हो जाता है वही ध्यान समाधि हो जाती है।’’
        त्रयमेकत्र संयम्।।
          ‘‘किसी एक विषय में तीनों का होना संयम् है।’’
           आमतौर से लोग धारणा, ध्यान और समाधि का अर्थ, ध्येय और लाभ नहीं समझते जबकि इनके बिना योग साधना में पूर्णता नहीं होती। धारणा से आशय यह है कि किसी एक वस्तु, विषय या व्यक्ति पर अपना चित्त स्थिर करना। यह क्रिया धारणा है। चित्त स्थिर होने के बाद जब वहां निरंतर बना रहता है उसे ध्यान कहा जाता है। इसके पश्चात जब चित्त वहां से हटकर शून्यता में आता है तब वह स्थिति समाधि की है। समाधि होने पर हम उस विषय, विचार, वस्तु और व्यक्ति के चिंत्तन से निवृत्त हो जाते हैं और उससे जब पुनः संपर्क होता है तो नवीनता का आभास होता है। इन क्रियाओं से हम अपने अंदर मानसिक संतापों से होने वाली होनी को खत्म कर सकते हैं। मान लीजिये किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति को लेकर हमारे अंदर तनाव है और हम उससे निवृत्त होना चाहते हैं तो धारणा, ध्यान, और समाधि की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। संभव है कि वस्तु,, व्यक्ति और विषय से संबंधित समस्या का समाधाना त्वरित न हो पर उससे होने वाले संताप से होने वाली दैहिक तथा मानसिक हानि से तो बचा ही जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com


Sunday, October 24, 2010

योग फिनोमिना-हिन्दी लेख (yoga sadhna and all religion-hindi article)

इंटरनेट पर एक हिंद ब्लॉग में लिखा   गया वह एक दिलचस्प लेख था! मन में आया टिप्पणी करना चाहिए! लेख दोबारा पढ़ा तो लगा कि चलो एक अपना पाठ ही लिख लेते हैं क्योंकि भारतीय योग साधना से संबंधित विधियां और उनके महत्व को लेकर विश्व भर में चर्चा हो रही है पर उसके मूल तत्व किसी को नहीं दिखाई दे रहे हैं। एक तरह से अंधों का हाथी हो गया है भारतीय योग जो केवल देह के इर्दगिर्द ही घूम रहा है और मन और विचारों में उससे होने वाले परिवर्तनों को अनदेखा किया जा रहा है।

बात उन दिनों की है जब इस लेखक ने योग साधना प्रारंभ की थी। शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी तब बाबा रामदेव का नाम इतना प्रसिद्ध नहीं था। भारतीय योग संस्थान के शिविर में अनेक साधकों से भेंट होती। कुछ अन्यत्र शिविरों की भी जानकारी आती थी। ऐसे ही अन्यत्र चल रहे योग शिविर की जानकारी मिली कि एक शिक्षक ने अचानक ही साधना का परित्याग कर दिया था। एक साधक ने बताया कि उनके किसी संत गुरु ने उनको योग साधना करने से मना कर कहा था कि इससे भगवान के प्रति भक्ति भाव कम होता है। अपने गुरु के आदेश का उन्होंने पालन किया। बात आई गयी खत्म होना चाहिए थी, मगर हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अनेक लोग योग साधना के बारे में अनेक संशय पाले हुए हैं। उससे भी ज्यादा यह बात कि लोग इससे अनेक प्रकार की सिद्धियां होने का दावा करते हैं। यह दोनों ही बुरी बात है और मन में असहजता का भाव उत्पन्न करती हैं जो कि ठीक योग के विरुद्ध है। योग साधना से केवल देह, मन और विचारों में सकारात्मक भाव पैदा होता है इससे अधिक कुछ नहीं। अगर कोई योग साधक श्रीमद्भागवत गीता पढ़ ले तो वह अध्यात्मिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाता है और तब स्वर्ग में टिकट दिलाने, हर मर्ज की दवा देने, मनोरंजन करने, सौंदर्य बनाये रखने और काम शक्ति बढ़ाने के उपाय बताने के नाम पर उस पर शासन करने वाले बाज़ार तथा प्रचार का उस नियंत्रण उस पर से समाप्त हो जाता है। सभी योग साधक श्रीमद्भागवत गीता पढ़ें यह जरूरी नहीं है पर चरम पर आने के बाद उसका मन ऐसे तत्व ज्ञान की तरफ स्वतः ही बढ़ता है। ऐसे में वह इस संसार में बुद्धि और मन के आधार पर सामान्य मनुष्यों पर शासन करने वाली शक्तियों के घेरे से बाहर हो जाता है। कोई वाद या विचार उसके आगे निरर्थक विषय के अलावा कुछ नहीं रह जाता। वह संसार के सामान्य कर्म नहीं त्यागता वरन् वह एक स्वतंत्र और मौलिक कर्मयोगी मनुष्य बन जाता है। यही से शुरु होता है योग का विरोध जो शासन और बाज़ार के स्वामी अपने प्रचारकों से करवाते हैं।
उस लेख में बाबा रामदेव के फिनोमिना की बात कही गयी थी। लिखने वाले स्वयं ही कार्ल मार्क्स की किताब पूंजी से प्रभावित हैं। कार्ल मार्क्स का नाम और उनकी पूंजी किताब का भी एक समय फिनोमिना रहा है। कार्ल मार्क्स एक विदेशी लेखक था और उसके विचारों को भारत के संबंध में अप्रासंगिक माना जाता रहा है, मगर शैक्षणिक संस्थानों तथा साहित्यक क्षेत्रों में एक समय ऐसे लोगों का जमावड़ा था जो सोवियत संघ की कथित क्रांति के प्रभाव में वैसी ही क्रांति अपने देश में लाना चाहते थे और गरीब और मज़दूर का उद्धार करना ही उनका लक्ष्य था। उनकी बहसें कॉफी हाउसों में होती थी। यह बहसें या मुलाकतें एक फैशन थी जो किसी विचार या आंदोलन का निर्माण करने में सहायक नहीं थी। उन्होंने इस देश में बुद्धिजीवियों की ऐसी छबि का निर्माण किया जिसका अपना फिनोमना जनता में था। यही कारण था कि ऐसे लोग जो कार्ल मार्क्स के विचारों से प्रभावित नहीं थे और कहीं न कहीं उनके मन में अपने भारत की विचाराधारा का प्रभाव था वह भी उनकी शैली अपनाने लगे। इससे भारत में विचारधाराओं का फिनोमिना बढ़ा। नये नये देवता गढ़े गये मगर चूंकि सभी भारतीय अध्यात्म ज्ञान से परे थे इसलिये चिंतन केवल चिंता तक सिमट गया। ऐसे में भारतीय योग को देशी विचारधारा के लोग भी एक बेकार चीज़ मानने लगे थे। उनका मानना था कि योगियों की निष्क्रियता की वज़ह से ही विदेशी यहां आकर जम गये जबकि सच यह है कि यह केवल अधंविश्वासी तथा पाखंडी लोगों की सक्रियता से हुआ था। श्रीमद्भागवत गीता को तो केवल सन्यासियों के लिये प्रचारित किया गया।
ऐसे में यह देश बहुत बड़े वैचारिक भटकाव में फंस गया और नतीजा यह निकला कि नारे और वाद ही दर्शन बनकर रह गये मगर यह समाज बिना फिनोमिना के चलने के आदी नहीं है। एक आदर्श आदमी के फिनोमिना में चलने के आदी इस समाज को अगर बाबा रामदेव नाम का नायक मिल गया तो उस पर अध्यात्मिकवादी लोग खुश ही होते हैं। रहा बाज़ार और उसके प्रचारतंत्र का सवाल तो उसके दोनों ही हाथों में लड्डू रहने है और इसे रोकना मुश्किल काम हैं। मुश्किल यह है कि वैचारिक भटकाव के समय इस देश में ऐसे बुद्धिजीवियों की भरमार हो गयी जो चिंतन कम चिंताओं पर अधिक लिखते हैं। समस्याओं को उभारते हैं पर हल उनके पास नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि वह समाज को वैचारिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर समस्याओं का हल ढूंढने की बजाय सरकारी कानूनों से करने की शैली आज के बुद्धिजीवियों में है। पराश्रित बुद्धिजीवी जब योग साधना पर लिखते हैं तो उनका सामना करने वाले लोग भी वैसे ही हैं। आदमी जब दैहिक तनाव से मुक्त होगा वह मानसिक और वैचारिक रूप से स्वतंत्र हो जायेगा। ऐसे में इन बुद्धिजीवियों की सुनेगा कौन?
अमेरिका के एक पादरी ने घोषित किया कि भारतीय योग साधना ईसाई धर्म के विरुद्ध है। इस पर भारत में कुछ लोगों ने विरोध किया। विरोध करने वालों का कहना है कि यह ईसाई धर्म के विरुद्ध नहीं है। यह विरोध करने वाले नहीं जानते कि अनेक हिन्दू संत ही इसका विरोध करते हैं।
सच बात तो यह है कि पूरे विश्व में इतने सारे धर्म होना ही इसका प्रमाण है कि इसके नाम पर जनसमुदाय में भ्रम फैलाया जाता रहा है। किसी भी भारतीय ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है और इसका आशय केवल आचरण से लिया जाता रहा है। मतलब पूरी दुनियां में दो ही प्रवृतियां रहती हैं एक धर्म की दूसरी अधर्म की! धर्म के नाम पर बांटने का काम तो पश्चिम से ही आया है। इसका कारण यह रहा है कि लोग अपने संकटों, बीमारियों तथा अन्य समस्याओं का हल दूसरे से कराना चाहते हैं। योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक रूप से आत्मनिर्भर बनाता है। जब व्यक्ति आत्मनिर्भर हो जायेगा और धर्म का मतलब समझ जायेगा तब वह किसी भी धर्म के किसी ठेकेदार के पास नहीं जायेगा। यह योग तो हर धर्म के लिये खतरा है जिसमें इंसान स्वयं ही इंसान होकर जीना सीख जाता है। ऐसे में सभी धर्म प्रेम, अहिंसा तथा दया भाव से जीना सिखाते हैं जैसी बातें सुनाकर बहसें और चर्चा करने वाले तथा शांति संदेश बेचने वालों का क्या होगा? यही कारण है कि योग फिनोमिना से बहुत लोग आतंकित हैं क्योंकि आधुनिक बाज़ार तथा उसके प्रचारकों का फिनोमिना कम होने का खतरा है। हमने फिनोमिना शब्द का अर्थ इधर उधर ढूंढा पर मिला नहीं। इसका आशय हिन्दी में प्रभाव या प्रभावी हो सकता है और इसीलिये फिनोमिना शब्द प्रयोग करके देखा है। जब आप योग साधना करते हैं तो ऐसे प्रयोगों की प्रेरणा स्वतः पैदा होती है। यह लेखक कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं है पर योग फिनोमिना की वजह से ही यह लिखने को विवश हुआ है इसमें संदेह नहीं है।
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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Friday, May 1, 2009

एकता की बात और इज्जत की लड़ाई-हास्य व्यंग्य

वह कुटिल साधु अपने लिये स्थाई ठिकाना ढूंढने निकला था पर उसे कुछ समझ में नहीं आया कि कहां रुकें? वह चाहता था कि वह ऐसी जगह रुके जहां चारों तरफ पेड़ पौद्ये हों? जहां के निवासी मेहनती और धनी हों। पास में कोई नदी बहती हो। वह एक अपराधी था और राज्य के दबाव के चलते वह अपने धंधे छोड़कर दूसरा धंधा करना चाहता था। इसलिये उसने साधु का वेश बना लिया। वह चलता थक गया पर चलता जा रहा। आखिर वह थक कर एक पेड़ के नीच आंखें बंद कर बैठ गया। कुछ देर बार उसने आंखे खोली तो देखा सामने चार लोग जमीन पर बैठकर उसे देख रहे हैं। फिर उसने अपने चारों तरफ देखा तो दंग रह गया। वैसी ही जगह वहां थी जैसी वह चाहता था। उसने चारों तरफ देखा। पक्के मकान ही दिखाई दिये। खेतों में फसल लहरा रही थी तो पेड़ के झुंड उनके किनारे खडे थे दूर बहती नहर भी उसने देखी।
फिर उसने उन चारों लोगों की तरफ देखा और कहा-‘बच्चों तुम कौन हो? और यहां कैसे आये हो?’
उनमें एक न कहा-‘हम चारों आसपास के चार गावों के हैं। यहां दोपहर में गपशप करने के लिये मिलते हैं। आज आप यहां विराजे हैं। आपको ध्यान में देखकर हम चुपचाप बैठ गये कि आप ध्यान से निवृत हों तो कुछ आपसे ज्ञान की बात सुनें ताकि हमारे मन का संताप दूर हो जाये।’
साधु ने पूछा-‘तुम्हारे अंदर कैसा मानसिक संताप है?’
दूसरे ने कहा-‘बाबा, हमारे गांवों में आपसी दुश्मनी है। लोग हमारी मित्रता को देखकर ताने कसते हैं। कहते हैं कि तुम अपने गांव के वफादार नहीं हो और दुश्मन गांव वाले से दोस्ती करते हो। आप बताओ यहां एकता कैसे करवायें?
साधु ने कहा-‘उनमें लड़ाई बढ़ाकर फायदा उठाओ। एकता से तुम्हें क्या मिलने वाला है?’
चारों एक दूसरे का मूंह देखने लगे। तीसरा बोला-‘बाबा, दरअसल हम यही तो सोचते हैं कि एकता से हमें फायदा होगा कोई व्यापार करेंगे तो चारों गावों के ग्राहक मिलेंगे। अभी तो यह हाल है कि बीच में कोई दुकान खोलो तो दुश्मन गांव का आदमी रात को जलाकर भाग जाता है। हमारे गांव का आदमी इसलिये सामान नहीं खरीदता कि हमारी दुश्मन गांव वाले से दोस्ती है दूसरे गांव वाले द्वारा खरीदने का सवाल ही नहीं है। इसलिये बेकार घूम रहे हैं। वैसे अगर उनकी दुश्मनी से फायदा उठाने की कोई योजना हो तो हम उसी भी चलने को तैयार हैं एकता की बात भी तो हम अपने फायदे के लिये सोच रहे हैं।’
उस कुटिल साधु ने कहा-‘ठीक है! तुम अपने गांवों में जाओ और इस बात का हमारे बारे में प्रचार करो कि खूब चढ़ावा हमारे पास आ रहा है। इस पेड़ के नीचे आज ही हम एक कच्ची कुटिया बना लेते हैं। तुम जाकर दुश्मन गावों के लोगों द्वारा हम पर अधिक चढ़ावे की बात करो। उनमें होड़ लग जायेगी। अपने गांव की इज्जत दाव पर लगने के भय से लोग खूब चढ़ावा लायेंगे। गांव में जाकर बाहर के गांव के मुकाबले और गांव में जाति, भाषा और धर्म के मुकाबले इज्जत की बात करना। बस देखो! कैसे काम बनता है। इसमें तुम्हारा कमीशन भी बन जायेगा। हम यहां एक मूर्ति लगा लेते हैं तुम यहां पर उस प्रसाद तथा दूसरा सामान चढ़ाने का सामान बेचने का काम शुरू कर देना। बस! फिर देखो धन दौलत तुम्हारे कदम चूमने लगेगी।’
चैथे ने कहा-‘पर हम वहां जाकर यह झूठ कैसे बोलें कि आपके पास चढ़ावा बहुत आ रहा हैं अभी तो आपकी कुटिया भी नहीं बनी और बनेगी तो उसमें दिखाने के लिये भारी चढ़ावा कैसे आयेगा?’
साधु ने कहा-‘हम जनता को कुटिया के बाहर दर्शन देंगे। हमारी कुटिया में प्रवेश किसी का हाल फिलहाल तो नहीं होगा। जब हम अंदर हों तो तुम यहां पहरा देना और कहना कि ‘साधु महाराज अभी अंदर साधना और ध्यान कर रहे है। जैसे हम अभी बैठे बैठे नींद ले रहे थे और तुमको लगा कि हम ध्यान लगा रहे हैं। वैसे ही भक्तों को भी यही वहम बना रहेगा कि अंदर कुटिया में भारी चढ़ावा होगा। वैसे इस बहाने अनजाने में सही तुम्हारा दुश्मन गावों में एकता लाने का सपना भी पूरा कर लोगे, पर हां एकता की बात करना पर चारों गांवों एकता होने बिल्कुल नहीं देना। एकता उतनी होने देना तुम्हारे धंधे के लिये खतरा न हो और इज्जत की लड़ाई को कभी बंद नहीं होने देना।’

वह चारों चले गये। अगले दिन सुबह चारों गावों से भीड़ उस कुटिल साधु के पास तमाम तरह का सामान लिये चली आ रही थी और वह मंद मंद मुस्करा रहा था।
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