समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
Showing posts with label व्यापार. Show all posts
Showing posts with label व्यापार. Show all posts

Thursday, February 12, 2009

प्रचार का नया नुस्खा-व्यंग्य कविता

चर्चा के लिये रोज नये विषय
वह बाजार में ला रहे हैं।
शायद मंदी से मरते व्यापार को
संजीवनी मिल जाये
इसलिये झगड़ों में तौहफे की
परंपरा चला रहे हैं।
लोग पहने या ओढ़ें नहीं
बस नारों में बह जायें
इसलिये कहीं से तारीफ खरीदते तो
कहीं अपने उत्पाद के लिये विरोध सजाते
बाजार बहुत है ताकतवर
प्रचार का यह नया नुस्खा है कि
जाति, धर्म,भाषा और लिंग के आधार पर
उत्पादों को बहस के लिये वह मुद्दा बना रहे हैं।

...........................................+.

यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान- पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Sunday, February 1, 2009

कंपनी देवता और दानव-आलेख

कंपनियों का सच यही है कि वह आम निवेशक और उपभोक्ता और अपने कर्मचारी का शोषण करने के लिये बनायी जाती हैं। प्राचीन व्यापार में सेठ साहूकार यही काम करते थे पर जैसे लोगों के जागृति बढ़ने लगी उनके चेहरे स्याह दिखने लगे। तब कंपनी नाम का एक ऐसा दैत्य खड़ा किया जिसमें शोषक और अनाचारी व्यक्ति का चेहरा नहीं दिखता क्योंकि वह एक बोर्ड या तख्ती दिखाई देती है। पहले भी बोर्ड या तख्ती दिखती थी पर सेठ साहूकार की साख ही उसके साथ जुड़ी होती थी। तब यह भी निश्चित था कि आदमी के व्यापार के साथ उसका मालिक भी बदनाम होता था।
वैसे तो भारत में भी कंपनियों का प्रचलन बहुत समय से है पर पिछले बीस वर्षों से कंपनी शब्द भी आम जनता में प्रचलित हो गया है।

अमेरिका के नये राष्ट्रपति ओबामा ने अपने देश की कंपनियों के कामकाज के रवैये पर तीखी नाराजगी प्रकट की है। इसका कारण यह है कि वह एक तरफ मंदी की वजह से अपनी आय कम होने के संकट का प्रचार कर रही हैं दूसरी ओर अपने ही उच्चाधिकारियों को बोनस बांटने में लगी हैं-जी हां, यही कंपनियां सामान्य कर्मचारी को भी निकालने पर तुली हैंं। एक तरफ अपने संकट से उबरने के लिये सरकार से राहत की मांग और दूसरी तरफ अपने उच्चाधिकारियों को बोनस देना विरोधाभासी है। दरअसल कंपनी के उच्चाधिकारी भी अपने आपको सेवक के रूप में प्रस्तुत करते हैं, पर वह होते तो पुराने सेठ साहुकारों की तरह हैं। अंतर केवल यह है कि सुठ साहुकार अपनी जेब से भी पैसा लगाते थे पर यह आजकल के कंपनी प्रमुख सारे मजे सामान्य कर्मचारी के परिश्रम, आमभोक्ता के शोषण और निवेशक के धन से करना चाहते हैं। कंपनी बनाने वाले शायद ही कभी अपनी जेब से पैसा लगाते हों पर उनके ठाठ ऐसे होते हैं जैसे कि उनका खुद का धन हों। कंपनी नाम के देवता ने कई लोगों के जमीन से उठाकर आसमान में पहुंचा दिया पर इसी कंपनी नाम के दानव ने उनको आम आदमी के कर्मचारी,श्रमिक, और अपभोक्ता के शोषण का वरदान भी प्रदान किया।
समय बदल रहा है। वैश्वीकरण ने जहां बाजार को व्यापक आधार प्रदान किया है वहीं लोगों को प्रचार के शक्तिशाली माध्यम भी प्रदान किये हैं। अभी तक कंपनियां एक अंधेरे कुुएं की तरह थी पर मंदी के सूरज ने उन पर ऐसी रोशनी डाली है कि उनकी पोल पूरी दुनियों को दिखाई दे रही है।
पूरे विश्व के अनेक देशों में अनेक कंपनियों ने किसी न किसी तरह सरकारी खजाने पर अपना हाथ साफ किया है-हालांकि कई प्रसिद्ध कंपनियां इसका अपवाद भी हैं। इन्हीं कपंनी संगठनों ने इतनी शक्ति अर्जिकत कर ली कि वह सरकार बनाने और बिगाड़ने तक के काम अपनी इच्छानुसार सफलता पूर्वक कर लेती हैं। अब इस मंदी ने उनको पिचका दिया है। कहते हैं कि अमेरिका में पहली बार कोई अश्वेत व्यक्ति राष्ट्रपति बना और यह विश्व में बदलाव का संकेत है। अमेरिका में कंपनियों पर भी श्वेतों का वर्चस्व रहा और राष्ट्रपति पद पर भी। अब कंपनियों की पकड़ मंदी से संघर्ष के कारण कमजोर हो गयी है तो क्या यह बदलाव इसी कारण स्वाभाविक रूप से आ गया या कंपनियों ऐसा कुछ करने का समय नहीं निकाल सकंीं। इसका प्रमाण है कि अभी तक अमेरिका के राष्ट्रपति कभी अपने देश की कंपनियों के विरुद्ध नहीं बोलते थे पर नये अश्वेत राष्ट्रपति ने उनकी आलोचना कर यह साबित कर दिया कि कंपनी नाम के संगठन अब इतने मजबूत नहीं रहने वाले। कंपनियों में पैसा अनेक लोगों का होता है और उसके अनेक सामान्य कर्मचारी कार्यरत होते हैं पर उच्च अधिकारी-एक तरह से कहा जाये आजकल के सेठ-अपने हिसाब से मनमाने निर्णय लेते हैं। आपने सुना होगा कि अनेक कंपनियां प्रसिद्ध फिल्मी, खेल तथा समाज सेवा के क्षेत्र में कार्यरत हस्तियों को सम्मानित करने के साथ महंगे उपहार भी देती हैं। बाहर से सामान्य दिखने वाली इस बात पर अनेक लोग संशय अपने संशय भी भी व्यकत करते हैं। एक तो ऐसे सम्मानों और उपहारों का कंपनी के व्यापार से कोई संबंध नहीं होता दूसरा उसमें आम निवेशक की कोई भूमिका नहीं होती। हां, कथित उच्चाधिकारी इससे अपना नाम कमाने के साथ कंपनी से अलग अपनी भूमिका और छबि बनाने के लिये इसी तरह पैसा व्यय करते हैं। यही स्थिति कंपनियों के उत्पादों के विज्ञापनों के साथ भी है। कई कंपनियां बहुत प्रसिद्ध हैं और वह अपनी उत्पादों का विज्ञापन न भी करें तो भी उनकी बिक्री पर अंतर नहीं पड़े पर उसके उच्चाधिकारी प्रचार माध्यमों से अच्छे संबंध बनाने के लिये महंगी दरों पर विज्ञापन देकर अपने लिये एक सामाजिक सुरक्षा प्राप्त करते हैं जिससे उनके एक व दो नंबर दोनों प्रकार की गतिविधियां जान सामान्य के परिदृश्य में न आये। बहरहाल कंपनी संगठन आधुनिक व्यवस्था में आर्थिक और सामाजिक से बहुत शक्ति प्राप्त कर लेते हैं और उसके उच्चाधिकारी अपने विवेक के अनुसार उसका सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही करने में समर्थ होते हैं। वैसे उदारीकरण के प्रांरम्भिक दौर में कई कंपनियां कुकुरमुतों की तरह उगे आयीं थीं और उसमें लोगों ने विनिवेश कर अपने पैसे गंवाये। अनेक कंपनियों के तो अब नाम भी नहीं आते। हां, कुछ पुरानी और प्रतिष्ठित कंपनियां आज भी लोगों के लिये बहुत बेहतर हैं और उसमें वह विनिवेश करते हैं। आजकल लोग कंपनियों के प्रबंधकों का नाम देखकर ही उस पर विश्वास या अविश्वास करते हैं। यह अलग बात है कि कभी कभी प्रसिद्ध और ईमानदार नाम जुड़े होने के बावजूद भी धोखे की गुंजायश तो रहती ही है।

इसमें भी कोई संशय नहीं है कि यह कंपनी संगठन ही है जिन्होंने पूरे विश्व में तकनीकी,सूचना,इंटरनेट तथा अन्य प्रचार माध्यमों को व्यापक आधार प्रदान किया पर अब उनका काला पक्ष भी लोगों के सामने आने लगा है। ऐसे में वही कंपनियां अपनी साख बचा सकेंंगे जिनके प्रमुख वाकई प्रबंध कौशल में दक्ष होने के साथ नैतिकता और ईमानदारी के आधारों पर भी काम करेंगे। हालांकि कंपनी एक ऐसा व्यवसायिक स्वरूप है जिसमें देवत्व और दानवता दोनों साथ ही विद्यमान रहते हैं।
.......................................
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान- पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, January 8, 2009

तेजी होती तूफानी अमृत और मंदी है धीमा जहर-आलेख

भारत की चौथी बड़ी कंपनी का अध्यक्ष अगर अपनी कंपनी के खातों में जालसाजी की बात स्वीकार करता है तो पूरे विश्व में उसकी प्रतिक्रिया होगी। सत्यम की साख पिछले कुछ वर्षों से इतनी अच्छी बनी हुई थी कि उसके शेयर और म्यूचल फंड खरीदने वालों को अपना विनिवेश फायदे का सौदा लगता था। अब हालत बदल गयी है और उसके शेयरों के भाव बुरी तरह नीचे आ गये हैं।

मध्यम वर्ग के अनेक निवेशकों को इससे जो आघात लगेगा उसकी कल्पना वही कर सकते हैं जिन्होंने उसके शेयर और म्यूचल फंड खरीदे हैं। पिछले कुछ समय से मंदी को जो दौर शुरु हुआ है उसमें कई कंपनियों के पांव लड़खड़ाते हुए नजर आ रहा हैं। यह एक कंप्यूटर कंपनी की जालसाजी तक ही सीमित मुद्दा नहीं है बल्कि अब दुनियां में भारतीयों की विश्वसनीयता पर सवाल उठना प्रारंभ होंगे। जिन लोगों ने जन्म से ही अपने घर में व्यापार के रंग ढंग देखे हैं वह जानते हैं कि किसी एक बड़े व्यवसायिक संस्थान के दिवालिया या बंद होने से उसके साथ जुड़े अन्य छोटे संस्थान भी विकट स्थिति में पहुंच जाते हैं। उसमें विनिवेश करने वाले छोटे और बड़े लोग-जिन्होंने दूसरों से उधार लिया होता है-अपने दायित्वों से भागते हैं।

आप जानते हैं कि आज भी कई महिलायें और पुरुष अपनी बचतें सरकारी बैंकों में ही कम ब्याज पर रखना पसंद करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि निजी क्षेत्र विश्वसनीय नहीं होते हैं। यहां यह भी याद रखने वाली है कि उनकी बचतें ही इन सार्वजनिक बैंकों के संजीवनी का काम करती हैं। जो लोग देश में सरकारीकरण के विरोधी है वह भी निजीकरण की विश्वसनीयता को संदेह से ही देखते हैं।

बहुत समय पहले एक बिस्कुट कंपनी दिवालिया हुई थी। यह बिस्कुट कंपनी अपना एक बैंक भी चलाती थी और उसमें शहर भर के लोगों के छोटे और बड़े निविशकों ने अधिक ब्याज की लालच में अपना पैसा जमा करा रखा था। वह बिस्कुट कंपनी और उसका बैंक दोनो ही दिवालिया हो गये। उससे अनेक छोटे निवेशकों को रोना तक आ गया। उसमें कुछ औरतों के भी पैसे थे जो अपने परिवार वालों से छिपा कर इस आशा के साथ विनिवेश करती थी कि समय या विपत्ति आने पर वह उस पैसे से अपने आश्रितों की सहायता कर गौरवान्वित अनुभव करेंगी पर बैंक के धोखे ने उनका मन बुझा दिया। बिस्कुट कंपनी की बैंक में कई सेठों ने भी हुंडियों पर पैसा लेकर विनिवेश किया था। जब वह कंपनी फेल हुई तो अनेक सेठ भी शहर छोड़कर भागे। अर्थात उन्होंने अपने विनिवेशकों से मूंह फेर लिया। एक बात याद रखिये जिस तरह भारत की अर्थव्यवस्था का आधार कृषक हैं उद्योगपति नहीं वैसे ही बाजार का मुख्य आधार आम उपभोक्ता और विनिवेशक मध्यम और निम्न वर्ग हैं सेठ नहीं। बड़े और सेठ लोग तो केवल दोहन करते है।

इन पंक्तियों ने ऐसे लोगों को देखा है जो उस बिस्कुट कंपनी के धोखे से अभी तक नहीं उबर पाये क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी भर की बचतें उसमें गंवा दी थी। कुछ महिलायें जिन्होंने उसमें अपना पैसा गंवाया था अब उम्रदराज हो गयी हैं और वह आज भी डाकघर और सार्वजनिक बैंकों में अपना थोड़ा पैसा रखती हैं। कितना भी लालच दिया जाये वह निजी बैंक पर यकीन नहीं करती। सच बात तो यह है कि जिन्होंने बाजारों में जीवन गुजारते हुए बड़े बड़े सेठों को दिवालिया होते भागते देखा है वह कभी भी निजी क्षेत्र पर विश्वास नहीं करते। ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में कृषि या दुग्ध व्यवसाय तथा व्यापार से जुड़े लोग अच्छी तरह जानते हैं कि किस तरह आदमी दिवालिया होकर भाग जाता है और उनकी मेहनत की कमाई से बाद में भी अपना जीवन शान से गुजारते हैं।

सीधे शब्दों में कहें तो आत्मनिर्भर कृषकों और व्यवसायियों के लिये बड़े सेठ कभी विश्वसनीय नहीं होते। पिछले कुछ वर्षों से भारतीय पूंजीपतियों की विदेशों में प्रतिष्ठा का यहां के प्रचार माध्यम अक्सर जिक्र करते हैं मगर भारत के लोग उससे प्रभावित नहीं होते। वजह साफ है कि भारतीय पूंजीपतियों ने समाज से मूंह फेर लिया है और वह विदेशों में अपनी छबि बनाने में लगे हैं क्योंकि वह जानते है कि यहां उनकी विश्वसनीयता हमेशा संदेहास्पद रहेगी। अनेक भारतीय पूंजीपतियों ने विदेशों में नाम कमाया है पर अब एक प्रतिष्ठित कंप्यूटर कंपनी की इस जालसाजी से पर उन सभी की विश्वसनीयता पर पूरे विश्व में सवाल उठेंगे इसमें संदेह नहीं है।

सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिका से आयातित इस कपंनी रूपी व्यवसायिक ढांचा यहां के सेठों को बहुत पंसद आया है। कहने को वह पदासीन अधिकारी की तरह होते हैं पर वास्तव में वह होते तो वैसे ही सेठ हैं। उनके आचार, विचार और रहन सहन से कभी यह नहीं लगता कि वह वेतनभोगी हैं जैसा कि वह प्रचारित करते हैं। उनके मातहत उनको उच्च पदाधिकारी नहीं बल्कि मालिक के रूप में वैसे ही देखते हैं जैसे सेठ को देखा जाता है। इससे उनको फायदा यह होता है जब तक कंपनी हिट है वह सेठ की तरह मजे लेते हैं और जो फ्लाप हुई वैसे ही उससे पीछा छुड़ा लेते हैं। लोग यह नहीं कहते कि अमुक सेठ डूबा बल्कि यही कहते हैं कि ‘वह कंपनी फेल हो गयी।’

हमेशा की तरह यह जुमला लिखना ठीक लगता है कि ‘यह तो तस्वीर वह दिखा रहे हैं पर पीछे क्या है जो वह छिपा रहे हैं’। इन अध्यक्ष महोदय ने जो जालसाजी का बयान दिया है उसके पीछे अन्य बहुत सारे सच भी होंगे पर वह बतायेंगे क्योंकि कोई भी आदमी तस्वीर का वही रूप सामने दिखाता है जो लोगों को अच्छा लगे-न लगे तो कम से बुरा भी अनुभव न हो। वह कहते हैं कि उन्होंने अस्सी हजार करोड़ का धन जाली रूप से दिखाया था। यह तो वह कह रहे हैं कि पर वास्तविकता क्या है? यह तो कोई वही व्यक्ति जान सकता है जो उसकी तह में जाकर जांच करे। वैसे हिंदी या भारतीय आकर्षक नाम देखकर हम बहुत प्रभावित होते हैं जब तक सब ठीक चलता है तब तक हम उसे गाते हैं और जब कोई गड़बड़झाला होता है तो विपरीत शब्द लगाने में नहीं चूकते। यहां यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि अनेक कंपनियों ने अनेक आकर्षक शब्दों से अपने नाम सजा रखे है पर जिस तरह की मंदी चल रही है वह उनके अर्थ के प्रभाव को कितना मंद कर देगी कोइ नहीं कह सकता है। एक बात तय रही कि तेजी एक तूफानी अमृत है जो कई लोगों को न बल्कि जीवन देती है बल्कि उसे चमक भी देती है यह मंदी एक धीमा जहर है जो धीरे धीरे पतन के गर्त में ले जाती है। तेजी में धनाढ्य होते लोग बड़े सज्जन लगते हैं पर मंदी में उनकी पोल खुल जाती है।
---------------------------
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान- पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिकालेखक संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, October 6, 2008

अल्फाज़ का भाव भी बाज़ार में नीचे ऊपर चलता है-हिन्दी शायरी

उनकी आँखों में प्यार का दरिया
हमेशा बहता लगता है
क्योंकि बाज़ार के खिलाडी हैं
जहां इन्हीं अदाओं पर सौदागर का
काम चलता है

बाज़ार में दोस्ती होती नहीं
की जाती हैं फायदे के लिए
चले तो कई बरसों तक
प्यार और दोस्ती का सफ़र
यूं ख़त्म हो जाता है
जहां टूटा फायदे और मतलब का क्रम
वही सामने आ जाता है रिश्तों का भ्रम
जज्बातों का व्यापार ऐसे ही
सदियों से चलता है

चेहरे पर नाकाब सभी पहने
जरूरी नहीं हैं
अब तो जुबान से भी यह काम चलता है
अपने दिल की बात किसी को कहने से
कोई फायदा नहीं
बेच सकता है उसे सुनने वाला और कहीं
दोस्ती के व्यापारियों का क्या
सस्ते में प्यार बेच दें
अपने दिल की घाव क्या दिखाएँ उनको
दर्द का भाव तो बाज़ार में और महँगा चलता है

क्या अपनी जुबान से कहें
समय का इन्तजार ही है
आने से पहले सब खामोशी से सहें
अल्फाज़ हमारे अभी सस्ते ही सही
पर यह बाज़ार का खेल है
जिसमें भाव कभी नीचे तो कभी ऊपर चलता है
------------------------

यह हिंदी लघुकथा मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’ पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की हिंदी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्दयोग
कवि और संपादक-दीपक भारतदीप

लोकप्रिय पत्रिकायें

विशिष्ट पत्रिकायें

हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर