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Tuesday, August 19, 2008

आदमी अपने दिल पर नकाब लगा लेता है-हिंदी शायरी

काम पर है तो घर की याद
और घर पर अपने काम की चिंता
आदमी हो गया है एकाकी
हर पल बस एक ही सोच
कोई काम न रह जाये बाकी

सब जानते हैं दुनियां उनके
दम पर नहीं चलतीं
पाल रहे हैं जो जिंदगियां
वह भी उनके सहारे नहीं पलती
जिनके मालिक कहलाते हैं
मुसीबत के साथ देंगे
कहां यह ख्याल कर पाते हैं
दुनियां चलती है
अपनी गति से
आदमी को यह खुशफहमी पालना
अच्छा लगता है कि
सब हो रहा है उसकी मति से
अंधी दौड़ मे दौड़ रहा है आदमी
कोई चीज मिलना न रह जाये बाकी

अपनी असलियत से बेखबर आदमी
अपने दिल पर ही नकाब लगा लेता है
किसी और को क्या देगा
अपने आप को दगा देता है
आसमान में उड़ता हुआ आदमी
जमीन की हकीकतों को
चाहता है भुलाना
भेजता है अपने तनाव को स्वयं बुलाना
शोर में करता शांति की तलाश
बीभत्स दृश्यों में कांति की आस
हर पल भाग रहा है आदमी
कहीं कुछ देखना न रह जाये बाकी
.............................................
दीपक भारतदीप

Saturday, August 16, 2008

तुम मोबाइल भाई बन जाओ-हास्य कविता

सास ने कहा बहू से
‘देखो, आज है राखी का दिन
सब बहनों को भाईयों से निभाना
तुम जल्दी भाई को जाकर राखी बांधकर
लौट आओ
फिर पूरा घर है तुम्हें संभालना
फिर मुझे अपने भाई के घर है जाना
वहीं होगा मेरा आज खाना
पीछे से तुम्हारी ननद आयेगी
उसके लिये जल्दी भोजन बनाना
वह लौट जायेगी
फिर उसकी ननद अपने मायके
भाई को राखी बांधने आयेगी
फिर वह भी लौट जायेगी
ज्यादा लंबा क्या खींचूं इस तरह
सभी की ननदें बहुऐं का कर्तव्य भी निभाऐंगी
बाकी तुम सब स्वयं ही समझ जाना’

बहू ने कहा
‘मैं तो अपने भाई को मोबाइल पर ही
कह देती हूं कि मैं तो ट्रांसमीटर की तरह
खड़ी हूं तुम मोबाइल भाई बन जाओ
यहीं राखी बंधवाने आ जाओ
मैं आई तो ससुराल के रक्षाबंधन का
दूर तक फैला लिंक टूट जायेगा
टूट पड़ेगा मुझ पर जमाना
वैसे भी मां ने कहा है
बेटी, आजकल बेदर्द हैं लोग
सभी को है दिखावे का रोग
मुश्किल है बहु का कर्तव्य निभाना
फिर भी सास की हर बात को
चुपचाप मानती जाना
आप तो बेफिक्र होकर मायके जाओ
चाहे जब आओ
मेरा भाई जानता है
राखी के कच्चे बंधनों को पक्का बनाना
.......................................

यह हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’ पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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Friday, August 15, 2008

इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चलके-व्यंग्य

इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ’ चल के‘-यह उस गीत का मुखरा है तो हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को अक्सर कहीं न कहीं सुनाई देता है। आज तो इसे कई बार सुना जा सकता है। कितनी अजीब बात है कि इस गीत के बोल कानों से सुनकर मजा तो सभी लेते रहे पर पूरे समाज ने कभी इसे हृदयंगम नहीं किया।

यह गाना किसी समय प्रासंगिक रहा होगा पर क्या आज हम वर्तमान में इसकी पंक्तियों में हम अपने भूतकाल की निराशा को भविष्य के कर्णधारों के कंधों पर आशा के रूप में स्थापित कर अपने दायित्व से मूंह मोड़ते नजर नहीं आते? जब यह गीत बना होगा तब लोगों ने इसमें पता नहीं कौनसा देशभक्ति का जज्बात देखा। क्या उस समय की पीढ़ी अपनी नयी पीढ़ी को यह संदेश देना चाहती थी कि हमने तो आजादी प्राप्त कर ली अब तो हम आराम करेंगे और जब तुम बड़े हो जाओ तब तुम्हीं यह देश अच्छी तरह संभालना। चलिये यह मान लिया कि पुराने लोग ठीक थे पर जब तक बच्चे बड़ें हो तब तक इस देश का क्या होना था? देश में चिंतन,मनन और अध्ययन की प्रक्रिया निरंतर चलती रहना चाहिए थी पर लोगों ने शायद उसे भविष्य की पीढ़ी पर छोड़ दिया। इस मध्य क्या हुआ? जिन लोगों को अपने लाभ के लिये समाज पर वर्चस्व स्थापित करना था कर लिया। ऐसे गीतों से समाज केवल भविष्य की पीढ़ी पर ही सारा दारोमदार डाल कर स्वयं चलता रहा। बच्चे बड़े हो गये पर उन्होंने भी फिर अपनी आगे वाली पीढ़ी के लिये गाया‘इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चलके’। मतलब हमें नहीं चलना। हम तो लाचार हैं तुम ही चलना।

वाद और नारों पर चलाने के लिये इस देश में फिल्मों ने बहुत बड़ा योगदान दिया है। यही कारण है कि लोग आगे नहीं सोच पाते। दृढ़संकल्पित और जूझारू लोग नाइंसाफ करना और सहना दोनों ही अपराध मानते हैं। इंसाफ केवल दूसरों के साथ ही नहीं अपने साथ भी करना चाहिए। दूसरे के साथ इंसाफ करना और अपने लिये पाना दोनों ही वह डगर है जिस पर हर इंसान को चलना चाहिए। मगर यह क्या? आदमी न स्वयं दूसरे से इंसाफ करने के लिये तैयार है और न ही दूसरे से स्वयं पाने के लिये जूझने को तैयार है। उसे तो बस गाना है भविष्य की पीढ़ी के लिये‘इंसाफ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के’।
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Thursday, August 14, 2008

बड़ा गुलाम तो छोटे गुलाम का साहब होता है-व्यंग्य

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था या एक राष्ट्र के रूप में स्थापना हुई थी। परंतत्र देश स्वतंत्र हुआ पर क्या परतंत्र का मतलब गुलामी होता है। कुछ प्रश्न है जिन पर विचार किया जाना चाहिये। विचार होगा इसकी संभावना बहुत कम लगती है क्योंकि वाद ओर नारों पर चलने वाले भारतीय बुद्धिजीवी समाज की चिंतन करने की अपनी सीमायें हैं और अधिकतर इतिहास में लिखे गये तथ्यों-जिनकी विश्वसनीयता वैसे ही संदिग्ध हेाती है- के आधार पर भविष्य की योजनायें बनाते है।

कई ऐसे नारे गढ़े गये हैं जिनको भुलाना आसान नहीं लगता। कोई कहता है कि चार हजार वर्ष तक भारत गुलाम रहा तो कोई दो हजार वर्ष बताकर मन का बोझ हल्का करता है। अगर मन लें वह गुलामी थी तो फिर क्या आज आजादी हैं? अगर यह आजादी है तो यह पहले भी थी। परंतत्रता और गुलामी में अंतर हैं। तंत्र से आशय कि आपके कार्य करने के साधनों से हैं। शासन, परिवार और संस्थाओं का आधार उनके कार्य करने का तंत्र होता है जिसमें मनुष्य और साधन संलिप्त रहकर काम करते हैं। परतंत्रता से आशय यह है कि इन कार्य करने वालों साधनों और लोगों का दूसरे के आदेश पर काम करना। सीधी बात करें तो देश का शासन करने का तंत्र ही आजाद हुआ था पर लोग अपनी मानसिकता को अभी भी गुलामी में रखे हुए हैे। अधिकतर लोगों का मौलिक चिंतन नहीं है और वह इतिहास की बातें कर बताते हैं कि वह ऐसा था और वहां यह था पर भविष्य की कोई योजना किसी के पास नहीं है।
जैसे जैसे प्रचार माध्यमों की शक्ति बढ़ रही है लोग सच से रू-ब-रू हो रहे हैं और वह इस आजादी को ही भ्रम बता रहे हैं। वह अपने विचार आक्रामक ढंग से व्यक्त करते हैं पर फिर गुलामों जैसे ही निष्कर्ष निकालते हैं। बहुत विचार करना और उससे आक्रामक ढंग से व्यक्त करने के बाद अंत में ‘हम क्या कर सकते हैं’ पर उनकी बात समाप्त हो जाती है।
शायद कुछ लोगों को यह लगे कि यह तो विषय से भटकाव है पर अपने समाज के बारे में विचार किये बिना किसी भी प्रकार की आजादी को मतलब समझना कठिन है। आज भी विश्व के पिछड़े समाजों में हमारा समाज माना जाता है। बीजिंग में चल रहे ओलंपिक में एक ही स्वर्ण पदक पर पूरा देश नाच उठा पर 110 करोड़ के इस देश में कम से कम 25 स्वर्ण पदक होता तो मानते कि हमारा तंत्र मजबूत है। जब भी इन खेलों में भारतीय दलों की नाकाम की बात होती है तो तंत्र को ही कोसा जाता है। यानि हमारा तंत्र कहीं से भी इतना प्रभावशाली नहीं है कि वह 25 स्वर्ण पदक जुटा सके। इक्का-दुक्का स्वर्ण पदक आने पर नाचना भी हैरानी की बात है। भारत ने व्यक्तिगत स्पर्धा में पहली बार अब यह स्वर्ण पदक जीता जबकि पाकिस्तान का एक मुक्केबाज इस कारनामे को पहले ही अंजाम दे चुका है पर वहां भी एसी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई थी। हमारे देश एक स्वर्ण पदक पर इतना उछलना ही इस बात का प्रमाण है कि लोगों के दिल को यह तसल्ली हो गयी कि ‘चलो एक तो स्वर्ण पदक आ गया वरना तो बुरे हाल होते’।

तंत्र की नाकामी को सभी जानते हैं। इस पर बहसें भी होती हैं पर निष्कर्ष के रूप में कदम कोई नहीं उठाता। वर्तमान हालतों से सब अंसतुष्ट हैं पर बदलाव की बात कोई सोचता नहीं है। अग्रेज अपनी ऐसाी शैक्षणिक प्रणाली यहां छोड़ गये जिसमें गुलाम पैदा होते हैंं। यह अलग बात है कि बड़ा गुलाम छोटे गुलाम का साहब होता है।

समाज और लोगों की आदतों को ही देख लें वह किस कदर सुविधाओं के गुलाम हो गये है। देश में आयात अधिक है और निर्यात कम। विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता क्या गुलामी नहीं है। जिसे पैट्रोल पर पूरा देश दौड़ रहा है उसका अधिकांश भाग विदेश से आता है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग करने का प्रयास उसका अंग था पर क्या वह आज कोई कर रहा है। पूरा देश गैस, पैट्रोल का गुलाम हो गया है। अगर इनका उत्पादन पूरी तरह देश में होता तो कोई बात नहीं पर अगर किसी कारण वश कोई देश भारत को तेल का निर्यात बंद कर दे या ेिकसी अन्य कारण से बाधित हो जाये तो फिर इस देश का क्या होगा? पूरा का पूरा समाज अपंग हो जायेगा। अपने शारीरिक तंत्र से लाचार होकर सब देखता रहेगा।

फिर जिन अंग्रेजों को खलनायक मानते थे आज उसकी प्रशंसा करते हैं। उसकी हर बात को बिना किसी प्रतिवाद के मान लेते हैं। हमारे देश के अनेक लोग वहां अपने लिये रोजगार पाने का सपना देखते हैं। वैसी भी अंग्रेजों का रवैया अभी साहबों से कम नहीं है। वैसे पहले तो अपने भाषणों में सभी वक्ता अंग्रेजों को कोसते थे पर अब यह काम किसी के बूते का नहीं है। अमेरिका के मातहत अंग्रेजों से कोई टकरा पाये इसका साहस किसी में नहीं है। फिर उनके द्वारा छोड़ी गयी साहब और गुलाम की व्यवस्था में हम कौनसा बदलाव ला पाये।

फिर अंग्रेजों ने कोई भारत को गुलाम नहीं बनाया था। उन्होंने यहां रियासतों के राजा और महाराजाओं को हटाकर अपना शासन कायम किया था। यही कारण है कि आज भी कई लोग उनको वर्तमान भारत के स्वरूप का निर्माता मानते हैं। अगर देखा जाये तो जिस आम आदमी के आजादी से सांस लेकर जीने का सपना देखा गया वह कभी पूरा नहीं हो सका क्योंकि तंत्र के संचालक बदले पर तंत्र नहीं। जब हम स्वतंत्रता की बात करते हैं तो अंग्रेजों की बात करनी पड़ती है पर अगर स्थापना दिवस की बात की जाये तो इस बात को भुलाया जा सकता है कि उनके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता था। पिछले दिनों अखबारों में छपा था कि ब्रिटेन में भी सरकारी दफ्तर लालफीताशाही और कागजबाजी के शिकार हैं। वहां भी काम कम होता है। यानि हमारे यहां उनके द्वारा यहां स्थापित तंत्र ही काम रहा है जिसमें कागजों में लिखा पढ़कर फैसला किया जाता है या छोटे से छोटे काम पर चार लोग बैठकार लंबे समय तक विचार कर उसे करने का निर्णय करते हैं। वैसे तो लगता था कि अंग्रेजों ने केवल यहां ही साहब और गुलाम की व्यवस्था रखी पर दरअसल यह तो उनके यहां भी यही तंत्र काम कर रहा है। वहां भी कोई सभी साहब थोड़े ही हैं। वहां भी आम आदमी है और सभी लार्ड नहीं है। भारत से गये कुछ लोग भी वहां लार्ड की उपाधि से नवाजे गये हैं। मतलब यह कि भारतीय भी लार्ड हो सकते हैं यह अब पता चला है। ऐसे में ख्वामख्वाह में अंग्रेजों को महत्व देना। इससे तो अच्छा है कि इसे स्थापना दिवस के रूप में मनाया जाता तो अच्छा था।
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Saturday, August 9, 2008

अपने हाथ से पिए जहर की शिकायत नजर नहीं आती है-हिन्दी शायरी

सांप काटे से आदमी के मरने की
खबर ज़माने भर में
सनसनी फैला जाती है
उसके जहर को शौहरत दिला जाती है
पर पेट्रोल और गैस से निकला जहर
शराब और अफीम के नशे का कहर
पूरे समाज को डस रहा है धीरे धीरे
इसे लोगों की भीड़ जानते हुए भी
अपने से छिपा जाती है
दूसरों के मरने का दर्द होता है कम
पर शोक जताकर जमाने को बताया जाता है
संवेदनाएं का अहसास दिलाया जाता है
जहर है उसी का नाम जो पिए आदमी खुद
अपने हाथों से
पर जाहिर न करे बातों से
मर जाता है अपने ही

हाथ से फैलाए जहर से आदमी
पर उसके शिकायत कहीं नजर नहीं आती है
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Friday, August 8, 2008

आग के पास चैन की तलाश में जाते हैं-हिंदी शायरी

चलने को ताज महल भी चल जाता है
हिलने को कुतुबमीनार भी हिल जाता है
चांद लाकर यहां भेंट किया जाता है
तारा तोड़ कर जमीन पर सजाया जाता है
बेचने वाला सौदागर होना चाहिए
ख्वाब और भ्रम बेचना यहां आसान है
अपढ़ क्या पढ़ालिखा भी खरीददार बन जाता है

सच से परे ज्ञान पाकर
अक्ल से कौन काम कर पायेगा
जिनके पास ज्ञान है
वह कभी क्यों ख्वाब या भ्रम के बाजार जायेगा
सुख-सुविधा की दौड़ में
इनाम के रूप में चाहते लोग आराम
दिल में बैचेनी और ख्वाहिशों का बोझ ढोते हुए
गुजारते है सुबह और शाम
अंधेरे में जाते रौशनी की तलाश में
रहते है सौदागरों से वफा की आस में
बदन और मन को कर देती है जो राख
उसी आग के पास चैन की तलाश में जाते हैं
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Sunday, August 3, 2008

भीड़ में मचायें शोर अपनी जिंदगी के तजूर्बे का-हिंदी नज्म

जिंदगी जीने का उनको बिल्कुल सलीका नहीं है
उनके पास वफा बेचने का कोई एक तरीका नहीं है
भीड़ में मचायें शोर अपनी जिंदगी के तजूर्बे का
पर उससे कभी कुछ खुद सीखा नही है
ख्वाहिश है कि जमाना उनको सलाम करे
आवाजें हैं उनकी बहुत तेज,पर शब्द तीखा नहीं है
बेअसर बोलते हैं पर जमाना फिर भी मानता है
उनको परखने का खांका किसी ने खींचा नहीं है
ईमानदार के ईमान को ही देते हैं चुनौती
खुद कभी उसका इस्तेमाल करना सीखा नही है
फिर भी नाम चमक रहा है इसलिये आकाश में
जमीन पर लोगों ने अपनी अक्ल से चलना सीख नहीं है
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