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Tuesday, August 9, 2011

कोई एक आयेगा-हिन्दी कविता (wait for one man army-hindi poem)

कोई एक हाथ ऐसा
आकाश से आयेगा,
जो हालात सुधार जायेगा
बाकी सभी हाथ सामान बटोरते रहेंगे।

कोई एक पांव जमीन पर
चलकर
सभी कांटों को कुचल जायेगा,
बाकी पांव मखमली घास पर चलते रहेंगे।

कोई एक इंसान
फरिश्ता बनकर मजबूरों का
सहारा बन जायेगा,
बाकी इंसान अपने घरों में सांस लेते रहेंगे।

यह सोच कितना अजीब है ज़माने का
एक अकेला सर्वशक्तिमान
यह दुनियां चला रहा है
वैसे ही उसका कोई एक कारिंदा
उनके टूटते हुए घर बचायेगा,
धरती के लोग तो
एक दूसरे को उजाड़ते रहेंगे।

अपनी चाहतों के जाल में फंसे लोग
ताक रहे इधर उधर
 कोई चूहा आकर आज़ाद करायेगा,
वह तो बेसुध होकर नाचते रहेंगे।
--------------
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, June 22, 2011

रिश्ते बन गये कर्ज जैसे-हिन्दी शायरी (ban gaye karz jaise-hindi shayari)

उधार की रौशनी में
जिंदगी गुजारने के आदी लोग
अंधेरों से डरने लगे हैं,
जरूरतों पूरी करने के लिये
इधर से उधर भगे हैं,
रिश्त बन गये हैं कर्ज जैसे
कहने को भले ही कई सगे हैं।
--------------
आसमान से रिश्ते
तय होकर आते हैं,
हम तो यूं ही अपने और पराये बनाते हैं।
मजबूरी में गैरों को अपना कहा
अपनों का भी जुर्म सहा,
कोई पक्का साथ नहीं
हम तो बस यूं ही निभाये जाते हैं।
--------------
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, November 17, 2009

अहसास-हिंदी शायरी (ahsas-hindi shayri)

अपने पथ पर चलते हुए
उसके कठिन होने का होता है
सभी को अहसास,
मगर यहाँ किसकी ज़िन्दगी में 
फूल बिछे हैं 
जिन पर किसी के कदम चलते हैं
सच तो यह है कि  
हमेशा ही चारों ओर फ़ैली  सुगन्ध 
बिखरी  हरियाली 
बहुते
हुए पानी के झरने 

देखते  हुए भी मन उकता जाता है
दर्द के बिना भी  बुरा लगता है अहसास..
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com

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Monday, August 3, 2009

लफ्जों के सौदे-हिंदी शायरी (lafzon ke saude-hindi kavita)

उनको आसमान दिखता है
इसलिये उड़ते जाते हैं।
जमीन पर पांव रखना
उन्हें गवारा नहीं इसलिये
उड़ने के लिये लड़े जाते हैं।

दौलतमंदों के प्यादे बनना उनको मंजूर है
पर गरीब का वजीर होने पर भी शर्माते हैं।

लफ्जों का ढेर बेचने बैठे हैं
कोई चाहे तो ईमान भी उपहार में ले जायें
पैसे की खातिर किताबें सजाये जाते हैं।

यह दुनियावी खेल है
आदमी अपने ख्याल क्या खुद
बिकने को तैयार बैठा है
खरीददार के इंतजार में पलकें पसारे जाते हैं।

नामा हो तो लोग नाम बदल दें
मशहूरी के लिये हंगामा हो तो
अपना काम बदल दें
दौलतमंदों का काम है ईमान से खेलना
बेईमानों का काम है सामान बेचना
अक्लमंदों की अक्ल जब तुलती हो
कौड़ियों के दाम में
तब लफ्जों के सौदे पर
भला क्यों शोर मचाये जाते हैं।
झूठ के पांव नहीं पर पंख होते हैं
जमीन पर न चले पर
आसमान में लोग उसे खूब उड़ाये जाते हैं।
सच तो खड़ा रहेगा अपनी जगह
फिर उसकी चिंता में दिमाग क्यों खपाये जाते हैं।

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Wednesday, July 29, 2009

जमाना जड़ रहे-हिंदी व्यंग्य कविता (hindi hasya kavita)

वह लोग आसमान से नहीं उतरे
जो जमाने में बदलाव लायेंगे।
किताबों ने बना दिया है
उनकी अक्ल को जड़
इतिहास के इंसानों को
वह आसमान से उतरा बतायेंगे।
जमीन पर पैदा आदमी
जड़ की तरह जमा रहे
भीड़ में भेड़ की तरह सजता रहे
इसलिये झूठे किस्से बाजार में सजायेंगे।
ओ। भीड़ में सजे भेड़ की तरह सजे इंसानों
जिनके इशारों पर चलते हुए
अपनी जिंदगी और जमाने में
बदलाव की उम्मीद लगाये बैठे हो
अपनी कामयाबी की जड़ों को
तुम्हारी लिये वह मिट्टी में नहीं मिलायेंगेे।
गुलाम बनकर अपने पैरों पर
मारोगे तुम कुल्हारी
वह उनके दर्द से अपना कक्ष सजायेंगे।
.................................
जड़ बनकर लोग खड़े रहें
उन पर खड़ा करें अपनी कामयाबी महल।
बदलाव की वह कभी नहीं करेंगेपहल।
............................
नारा लगाते हैं वह
जमाने को बदल देंगे।
पर उनके काबू में रहे आम इंसान
इसलिये सभी जगह वह दखल देंगे।
....................................
जमाना जड़ रहे
उसी पर उनकी पीढ़ियों का भविष्य टिका है।
इसलिये कहते हैं वह सबसे यही
‘होगा वही सब कुछ
जो सर्वशक्तिमान ने लिखा है’।

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Monday, July 13, 2009

सच से परे होकर-हिंदी शायरी (sach se pare hokar-hindi shayri)

खड़े हो जिस ख्याली शिखर पर
वह अब बिफर रहा है।
तुम चले जा रहे जिस मंजिल की तरफ
उसका ढांचा अब बिखर रहा है।
दुनियां में हर जंग से लड़कर
उसे जीतना आसान तो तब होगा
जब अपने दुश्मन को पहले समझ पाओ
अपनी उल्झनों में पड़कर
तुम्हारा दिल दिमाग सिहर रहा है
सच से परे होकर
अंदाज से दुनियां की शयों से
मोहब्बत करने वाले
तेरे ही उल्टे दावों से तेरा खेल बिगड़ रहा है।

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Wednesday, June 24, 2009

अल्फ़ाजों की लहरें-हिंदी शायरी (hindi shayri)

दिल में जलती गम की आग
गर्मी में दोपहर की तपिश
उसे और बढ़ा देती है।
वर्षा की बूंदों के इंतजार में
में पथरा गयी हैं आंखें
जल रहा है बदन
कोई सागर ढूंढता हूं
जिसकी ठंडक तसल्ली दे सके
पर नउम्मीदी नरक सजा देती है।
उठा रहा हूं इसलिये अल्फाजों की लहरें
शायद बन जाये शायरी का कोई सागर
जिससे रौशन हो दिल
यही उम्मीद आसरा बढ़ा देती है।
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Wednesday, April 22, 2009

परदे के पीछे और सामने-हिंदी व्यंग्य कविता

परदे के सामने जो उन्होंने दिखाया
अपनी समझ में नहीं आया
हमने कहा
‘हमें परदे के पीछे ले जाओ।
बाकी हम समझ लेंगे
तुम मत समझाओ’।

वह बोले
‘यहां परदे के सामने
आकर ही खेल देखने की
तुमको इजाजत मिली है
परदे के पीछे का खेल
देखना इतना आसान नहीं
वहां की बात तो हम भी
नहीं कर सकते
अपनी जुबान इस तरह सिली है
यहां चलते फिरते और बोलते
हमारे बुत एकदम प्रशिक्षित हैं
खेल चाहे जो भी हो यही सामने आयेंगे
कभी थोड़ी देर के लिये बुत सजायेंगे
फिर उसकी जगह दूसरा ले आयेंगे
यह रंगमंच सजाया है हमने
जिनकी मर्जी से
कितने भी बादशाह हों कहीं के तुम
नाराज हो गये वह तो
शतरंज की इस बिसात पर
देंगे वह मात अपने फर्जी से
परदे के पीछे धुप अंधेरे में बैठे हैं
दौलत और शौहरत बेचने वाले
अंधे सौदागर
तुम उनकी असलियत देख लोगे
तो डर जाओगे
इसलिये परदे के सामने
खेल देखकर सीधे अपने घर जाओ।

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Sunday, March 8, 2009

झूठ की आकर्षक चादर सभी को भाती-हिंदी शायरी

उजाड़ दिये चमन बेअक्ली से खुद जिन्होंने अपने
वही बाजार में बेच रहे हैं खुशी के महंगे सपने।

मदारी की तरह कहीं नारी पुरुष तो
कही अमीर गरीब को सांप नेवले की तरह लड़ाकर
खुशहाली का ख्वाब चादर से पांव बढ़ाकर
भीड़ को बहला रहे हैं
किसी को खून बहता नहीं
पर वह अपने तरीके से जख्म सहला रहे हैं
न आग है न अंगारा
लोगों के जज्बात लगते हैं कंपने।

धुंआ हो गयी है जमाने की सोच
झूठ की आकर्षक चादर सभी को भाती है
सच कड़वा है
सामने न आये इसलिये
सब लगे हैं उसे ढंकने

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Monday, September 1, 2008

फिर भी अंधों में काने राजा की तरह सज जाते-व्यंग्य कविता

किताबों में स्याही से लिखे शब्द

तब तक ज्ञान नहीं हो जाते

जब तक पढ़ नहीं जाते

पढ़े गये शब्द भी तब तक ज्ञान नहीं होते

जब तक उसके अर्थ समझे नहीं जाते

अर्थ समझने का मतलब भी

ज्ञान का आना नहीं

जब तक उन पर अमल नहीं कर पाते

ढेर सारी किताबों पढ़कर भी

कोई ज्ञान के सिंहासन पर नहीं बैठ जाता

भले ही कितना भी इतराता

जब आंखों से पढ़े

और कानों से सुने जाते हैं

अगर उन पर मनन नहीं करता आदमी तो

कुछ शब्द बाहर बह जाते

कुछ अंदर ही कीचड़ की तरह जम जाते

इसलिये लोग आधे अधूरे ज्ञान को ही

पूरा समझ जाते


इसलिये अहंकार की खाई से कभी नहीं निकल पाते

पर फिर भी अंधों में काने राजा की तरह सज जाते

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Friday, August 29, 2008

अपने मतलब होते गहरे-हिंदी शायरी

उनके हैं सुंदर चेहरे

पर दिल पर हैं काली नीयत के पहरे

मुस्कराती आंखों के पीछे हैं

कुटिल भाव ठहरे

तुम्हारी सुनते लगते हैं

पर कान हैं उनके बहरे

लच्छेदार बातों से मन बहलाते हैं

सपने दिखाते महलों में बसाने के

तरीके बताते हैं जिंदगी में

चालाकियों के दांव आजमाने के

संवारने का दावा करते हैं जिंदगी

आ जाते हैं बहुत करीब

जैसे पितृपुरुष हों

पर उनके अपने मतलब होते गहरे

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Sunday, August 24, 2008

समय से पहले चेत जाओ-हिंदी शायरी

शब्दों के शोर का आतंक मचाओ
दूसरे की गल्तियों को अपराध न बताओ
तुम्हारी आवाज को मिल गयी है
आजादी के साथ दौलत की ताकत
पर उस पर इतना न इतराओ

शिकायतों का पुलिंदा साथ लिये घूमते हो
पर अपनी गल्तियों को मजबूरी कहकर चूमते हो
नक्कारखाने से निकल आये हो
अपनी तूती में दूसरों के लिये
चुभने वाले तीर क्यों ढूंढते हो
अपनी कलम के तलवार हो जाने का जश्न न मनाओ

कब तब बहलाओगे
झूठ को सच बनाओगे
अपने दृष्टा होने के अहसास को
सृष्टा की तरह मत समझाओ
जमाने में कई लाचार है
जिनसे तुम्हारी तरह गल्तियां हो जाती हैं
पर छिपने के लिये वरदहस्त के अभाव में
सभी के सामने आ जाती हैं
उन पर तुम अपनी रोटी न पकाओ

जमाने में खून की होली खुले में खेलने वाले बहुत हैं
उनसे अपनी दृष्टि न छिपाओ
बढ़ सकते हैं उनके हाथ तुम्हारी तरफ भी
शुतुरमुर्ग की तरह अपनी गरदन रेत में न छिपाओ
दूसरों की इज्जत से खेलने वाले खबरफरोशों
जब तक उसके पर्दे का सहारा है
लोग सह जाते हैं
अपना दर्द पी जाते हैं
तुम उन्हें मत डराओ
जमाना जब डरता है
तब ख्यालों से मरता है
कौम अगर शब्दों के शोर के आतंक तले
इस तरह मरती रही
तुम्हारी खबरें बेअसर हो जायेंगी
अनसुनी और अनदेखी कर दी जायेंगी
अपने आजादी के हथियार की धार को
बेजा इस्तेमाल कर उसे कुंद मत करो
नहीं तो फिर जुर्म पसंद दौलतमंदों के गुलाम हो जाओगे
समय से पहले चेत जाओ

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Saturday, August 16, 2008

तुम मोबाइल भाई बन जाओ-हास्य कविता

सास ने कहा बहू से
‘देखो, आज है राखी का दिन
सब बहनों को भाईयों से निभाना
तुम जल्दी भाई को जाकर राखी बांधकर
लौट आओ
फिर पूरा घर है तुम्हें संभालना
फिर मुझे अपने भाई के घर है जाना
वहीं होगा मेरा आज खाना
पीछे से तुम्हारी ननद आयेगी
उसके लिये जल्दी भोजन बनाना
वह लौट जायेगी
फिर उसकी ननद अपने मायके
भाई को राखी बांधने आयेगी
फिर वह भी लौट जायेगी
ज्यादा लंबा क्या खींचूं इस तरह
सभी की ननदें बहुऐं का कर्तव्य भी निभाऐंगी
बाकी तुम सब स्वयं ही समझ जाना’

बहू ने कहा
‘मैं तो अपने भाई को मोबाइल पर ही
कह देती हूं कि मैं तो ट्रांसमीटर की तरह
खड़ी हूं तुम मोबाइल भाई बन जाओ
यहीं राखी बंधवाने आ जाओ
मैं आई तो ससुराल के रक्षाबंधन का
दूर तक फैला लिंक टूट जायेगा
टूट पड़ेगा मुझ पर जमाना
वैसे भी मां ने कहा है
बेटी, आजकल बेदर्द हैं लोग
सभी को है दिखावे का रोग
मुश्किल है बहु का कर्तव्य निभाना
फिर भी सास की हर बात को
चुपचाप मानती जाना
आप तो बेफिक्र होकर मायके जाओ
चाहे जब आओ
मेरा भाई जानता है
राखी के कच्चे बंधनों को पक्का बनाना
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